विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 229, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| २०६ | श्रीमद्भारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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रखनेवाले तुझ-जैसे व्रतधारीके हाथसे एक स्त्रीके कारण मारा गया ॥ ३७ ॥
यदि ते निहतः संख्ये दुर्बुद्धिरजितेन्द्रियः ।
युध्यस्वाद्य मया सार्धं मृधे यद्यसि वीर्यवान् ॥ ३८ ॥
'यदि तुमने खोटी बुद्धिवाले उस अजितेन्द्रिय रावणको युद्धमें मारा है और ऐसा करके तुम पराक्रमी बन रहे हो तो आओ, आज रणक्षेत्रमें मेरे साथ युद्ध करो ॥ ३८ ॥
तस्य दूतस्य तच्छ्रुत्वा भाषितं रूक्षवादिनः ।
धैर्यादसम्भ्रान्तवपुः सस्मितं राघवोऽब्रवीत् ॥ ३९ ॥
'उस कटुवादी दूतका वह भाषण सुनकर रघुनन्दन श्रीराम अपने स्वाभाविक धैर्यके कारण विचलित नहीं हुए, अपितु मुसकराते हुए बोले-॥३९॥
असदैतत् त्वया दूत भाषितं तस्य गौरवात् ।
यन्मां क्षिपसि दोषेण वेदात्मानं च सुस्थिरम् ॥ ४० ॥
'दूत ! तूने उस दानवके प्रति गौरव-बुद्धिके कारण जो कुछ कहा है, वह सब ओछी बात है; क्योंकि तू मुझपर तो दोषारोपण करके आक्षेप करता है और अपनेको न्यायमार्गमें भलीभाँति स्थित समझता है ॥ ४० ॥
यद्यहं सत्पथे मूढो यदि वा रावणो हतः ।
यदि वा मे हृता भार्या का तत्र परिदेवना ॥ ४१ ॥
'यदि मैं सन्मार्गपर चलनेका विवेक खो बैठा था, यदि मेरे द्वारा रावण मारा गया था अथवा यदि मेरी स्त्रीका अपहरण हुआ था तो तू क्यों इन सब बातोंका रोना रो रहा है ? ॥ ४१ ॥
न वाङ्मात्रेण दुष्यन्ति साधवः सत्पथे स्थिताः ।
जागर्ति च यथा देवः सदा सत्स्वितरेषु च ॥ ४२ ॥
'सन्मार्गपर स्थित रहनेवाले साधुपुरुष किसीके कहनेमात्र-से कलङ्कित नहीं होते हैं । सत् और असत् पुरुषोंके भीतर बैठे हुए भगवान् सदा जागते रहते हैं (कौन बुरा है और कौन भला—यह उनकी दृष्टिसे छिपा हुआ नहीं है) ॥४२॥
कृतं दूतेन यत् कार्यं गच्छ त्वं दूत मा चिरम् ।
नात्मश्लाघिषु नीचेषु प्रहरन्तीह मद्विधाः ॥ ४३ ॥
'दूत ! तुझ-जैसे दूतको जो कुछ करना चाहिये, वह कार्य तूने कर लिया । अब यहाँसे चला जा, विलम्ब न कर । मेरे-जैसे पुरुष यहाँ अपनी झूठी प्रशंसा करनेवाले नीच जनों-पर प्रहार नहीं करते ॥ ४३ ॥
अयं ममानुजो भ्राता शत्रुघ्नः शत्रुतापनः ।
तस्य दैत्यस्य दुर्बुद्धेर्मृधे प्रतिकरिष्यति ॥ ४४ ॥
'यह मेरा छोटा भाई शत्रुघ्न, जो शत्रुओंको पूर्ण संताप देनेवाला है, युद्धमें उस दुर्बुद्धि दैत्यको उसके कुकृत्योंका भरपूर बदला देगा' ॥ ४४ ॥
एवमुक्तः सः दूतस्तु ययौ सौमित्रिणा सह ।
अनुज्ञातो नरेन्द्रेण राघवेण महात्मना ॥ ४५ ॥
'महात्मा राजा रघुकुलनन्दन श्रीरामने ऐसा कहकर जब उसे जानेकी आज्ञा दी, तब वह दूत सुमित्राकुमार शत्रुघ्नके साथ चला गया ॥ ४५ ॥
स शीघ्रयानः सम्प्राप्तस्तद् दानवपुरं महत् ।
चक्रे निवेशं सौमित्रिर्बनान्ते युद्धलालसः ॥ ४६ ॥
'सुमित्रानन्दन शत्रुघ्न शीघ्रतापूर्वक रथ हाँकते हुए लवणासुरके उस विशाल नगरमें जा पहुँचे । वहाँ युद्धकी लालसा लेकर उन्होंने उसके वनके समीप ही पड़ाव डाल दिया ॥ ४६ ॥
ततो दूतस्य वचनात् स दैत्यः क्रोधमूर्च्छितः ।
पृष्ठतस्तद् वनं कृत्वा युद्धायाभिमुखः स्थितः ॥ ४७ ॥
'तदनन्तर दूतकी बातोंसे सब कुछ जानकर वह दैत्य क्रोधसे अचेत-सा हो गया और उस वनको पीछे करके युद्धके लिये शत्रुघ्नके सामने आकर खड़ा हो गया ॥ ४७ ॥
तद् युद्धमभवद् घोरं सौमित्रेर्दानवस्य च ।
उभयोरेव बलिनोः शूरयो रणमूर्धनि ॥ ४८ ॥
'सुमित्राकुमार शत्रुघ्न तथा दानव लवणासुर दोनों ही बड़े बलवान् और शूरवीर थे । युद्धके मुहानेपर उन दोनोंमें घोर संग्राम हुआ ॥ ४८ ॥
तौ शरैः साधु निशितैरन्योन्यमभिजघ्नतुः ।
न च तौ युद्धवैमुख्यं श्रमं वाप्युपजग्मतुः ॥ ४९ ॥
'वे तीखे बाणोंद्वारा एक दूसरेको भलीभाँति चोट पहुँचाने लगे । दोनों ही न तो युद्धसे विमुख हुए और न उन्हें थकावट ही हुई ॥ ४९ ॥
अथ सौमित्रिणा वाणैः पीडितो दानवो युधि ।
ततः स शूलरहितः पर्यहीयत दानवः ॥ ५० ॥
'तदनन्तर उस युद्धस्थलमें सुमित्राकुमारने दानव लवण-को बाणोंद्वारा अधिक पीड़ित किया, इससे उसका शूल हाथसे छूटकर गिर पड़ा । अब वह सर्वथा कमजोर पड़ने लगा ॥
स गृहीत्वाङ्कुशं चैव देवैर्दत्तवरं रणे ।
कर्षणं सर्वभूतानां लवणो विररास ह ॥ ५१ ॥
'तब उसने युद्धमें अङ्कुश उठाया, जिसके लिये उसको देवताओंसे वर प्राप्त हो चुका था । वह अङ्कुश समस्त प्राणियों-को आकर्षित करनेवाला था । उसे लेकर लवणासुर जोर-जोर-से गर्जना करने लगा ॥ ५१ ॥
शिरोधरायां जग्राह सोऽङ्कुशेन चकर्ष ह ।
प्रवेशयितुमारब्धो लवणो राघवानुजम् ॥ ५२ ॥
'उसने वह अङ्कुश श्रीरामके छोटे भाई शत्रुघ्नके गलेमें फँसा दिया और खींचकर उसे उनके कण्ठमें घुसाना आरम्भ किया ॥ ५२ ॥
स रुक्मत्सरुमुद्यम्य शत्रुघ्नः खड्गमुत्तमम् ।
शिरश्शिच्छेद खड्गेन लवणस्य महामृधे ॥ ५३ ॥