भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 230

हरिवंशपर्व ] चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः [ २०७


'यह देख उस महासमरमें शत्रुघ्नने सोनेकी मूठवाली अच्छी तलवार उठा ली और उसके द्वारा उस दानवका मस्तक काट गिराया ॥ ५३ ॥

स हत्वा दानवं संख्ये सौमित्रिर्मित्रवत्सलः ।
तद् वनं तस्य दैत्यस्य चिच्छेदास्त्रेण बुद्धिमान् ॥ ५४ ॥

'मित्रोंपर स्नेह रखनेवाले बुद्धिमान् शत्रुघ्नने युद्धस्थलमें उस दानवका वध करके उसके उस वनको भी अपने अस्त्रों-द्वारा काट डाला ॥ ५४ ॥

छित्त्वा वनं तत् सौमित्रिनिवेशं सोऽभ्यरोचयत् ।
भवाय तस्य देशस्य पुर्याः परमधर्मवित् ॥ ५५ ॥

'वनको काटकर परम धर्मज्ञ सुमित्राकुमारने उस देशके अभ्युदयके लिये वहाँ एक नगर बसानेकी इच्छा की ॥ ५५॥

तस्मिन् मधुवनस्थाने मथुरा नाम सा पुरी ।
शत्रुघ्नेन पुरा सृष्टा हत्वा तं दानवं रणे ॥ ५६ ॥

'रणभूमिमें उस दानवका वध करके शत्रुघ्नने पूर्वकालमें उसी मधुवनकी जगह उस पुरीका निर्माण किया, जिसका नाम मथुरा है ॥ ५६ ॥

सा पुरी परमोदारा साट्टप्राकारतोरणा ।
स्फीता राष्ट्रसमाकीर्णा समृद्धबलवाहना ॥ ५७ ॥

'वह मथुरापुरी बहुत बड़ी है। उसमें ऊँची अट्टालिकाएँ, चहारदीवारी तथा फाटक यथास्थान बने हुए हैं। वह समृद्धि-शालिनीपुरी समूचे राष्ट्रके लोगोंसे भरी रहती है तथा सेना और सवारियोंसे सम्पन्न है ॥ ५७ ॥

उद्यानवनसम्पन्ना सुसीमा सुप्रतिष्ठिता ।
प्रांशुप्राकारवसना परिखाकुलमेखला ॥ ५८॥

'नाना प्रकारके उद्यान और वन उसकी शोभा बढ़ाते हैं। उसकी सीमा सुन्दर है। वह अच्छी तरहसे बसायी तथा दृढ़तापूर्वक स्थापित की गयी है। (वह नगरी एक नारीके समान जान पड़ती है) ऊँची-ऊँची चहारदीवारी उसके लिये साड़ीका काम देती है। चारों ओरसे खुदी हुई खाई मेखला (करधनी) के समान जान पड़ती है ॥ ५८ ॥

चयाट्टालककेयूरा प्रासादवरकुण्डला ।
सुसंवृतद्वारमुखी चत्वरोद्गारहासिनी ॥ ५९ ॥

'नगरद्वार और अट्टालिकाएँ उसके केयूर (भुजबंद)-सी प्रतीत होती हैं। श्रेष्ठ प्रासाद सुन्दर कुण्डलके समान शोभा देते हैं। किवाड़रूपी अञ्चलसे अच्छी तरह ढका हुआ प्रधान द्वार मानो उसका मुख है तथा भीतरके आँगनका उद्घाटन उसकी हँसीका प्रकाश है ॥ ५९ ॥

अरोगवीरपुरुषा हस्त्यश्वरथसंकुला ।
अर्धचन्द्रप्रतीकाशा यमुनातीरशोभिता ॥ ६० ॥

'उस पुरीमें नीरोग वीर पुरुषोंका निवास है । हाथी, घोड़े तथा रथ आदि वाहनोंसे वह भरी रहती है । यमुनाजीके तटपर बसी हुई वह शोभाशालिनी पुरी अर्धचन्द्राकार प्रतीत होती है ॥ ६० ॥

पुण्यापणवती दुर्गा रत्नसंचयगर्विता ।
क्षेत्राणि सस्यवन्त्यस्याः काले देवश्च वर्षति ॥ ६१ ॥

'इसके भीतर सुन्दर एवं पवित्र हाट हैं । इसमें प्रवेश करना दूसरोंके लिये कठिन है तथा इसे अपने रत्नराशि-संग्रह-पर गर्व है । इसके पार्श्ववर्ती जनपदके खेत अनाजके हरे-भरे पौधोंसे शोभा पाते हैं और वहाँ पर्जन्यदेव समयपर वर्षा करते हैं ॥ ६१ ॥

नरनारीप्रमुदिता सा पुरी स्म प्रकाशते ।
निविष्टविषयश्चैव शूरसेनस्ततोऽभवत् ॥ ६२ ॥

'नर-नारियोंके आमोद-प्रमोदसे पूर्ण मथुरापुरी सदा अपनी शोभासे प्रकाशित होती रहती है । इस पुरी और प्रदेशमें किसी समय राजा शूरसेन निवास करते थे ॥ ६२ ॥

तस्य पुर्यां महावीर्यो राजा भोजकुलोद्वहः ।
उग्रसेन इति ख्यातो महासेनपराक्रमः ॥ ६३ ॥

'उसी पुरीमें इस समय महाबली राजा उग्रसेन हैं, जो भोजवंशका भार वहन करते हैं। उनका पराक्रम कुमार कार्तिकेयके समान है ॥ ६३ ॥

तस्य पुत्रत्वमापन्नो योऽसौ विष्णो त्वया हतः ।
कालनेमिर्महादैत्यः संग्रामे तारकामये ॥ ६४ ॥

'विष्णो ! आपने तारकामय संग्राममें जिस कालनेमि नामक महादैत्यका वध किया था, वह अब उन्हीं राजा उग्रसेनका पुत्र होकर प्रकट हुआ है ॥ ६४ ॥

कंसो नाम विशालाक्षो भोजवंशविवर्धनः ।
राजा पृथिव्यां विख्यातः सिंहविस्पष्टविक्रमः ॥ ६५ ॥

'उसका नाम है कंस । उसके नेत्र बड़े-बड़े हैं। वह भोजवंशकी वृद्धि करनेवाला है । उसकी चाल-ढाल और पराक्रम सिंहके समान है। राजा कंस भूतलपर सर्वत्र विख्यात है ॥ ६५ ॥

राज्ञां भयंकरो घोरः शङ्कनीयो महीक्षिताम् ।
भयदः सर्वभूतानां सत्पथाद् बाह्यतां गतः ॥ ६६ ॥

'वह राजाओंके लिये अत्यन्त भयंकर है । भूमिपालोंके लिये शङ्कनीय हो गया है। समस्त प्राणियोंको भय देनेवाला कंस सदाचारसे गिर गया है ॥ ६६ ॥

दारुणाभिनिवेशेन दारुणेनान्तरात्मना ।
युक्तस्तेनैव दर्पेण प्रजानां रोमहर्षणः ॥ ६७ ॥

'दारुण प्रकृति और क्रूर अन्तरात्मासे युक्त हो वह कंस अपने पूर्वजन्मके दर्पसे ही उन्मत्त हो इस समय प्रजावर्ग-के लिये रोमाञ्चकारी बन गया है ॥ ६७ ॥