भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 231
२०८श्रीमद्भारते खिलभागे[ हरिवंशे

न राजधर्माभिरतो नात्मपक्षसुखावहः।
नात्मराज्ये प्रियकरश्चण्डः कररुचिः सदा ॥ ६८॥
'वह न तो राजधर्ममें अनुराग रखता है, न अपने पक्षके लोगोंको ही सुख देता है और न अपने राज्यमें ही किसीका प्रिय करता है। सदा ही अत्यन्त क्रोधमें भरा रहता है और केवल प्रजासे कर वसूल करनेकी ही रुचि रखता है॥ ६८॥

स कंसस्तत्र सम्भूतस्त्वया युद्धे पराजितः।
क्रव्यादो बाधते लोकानासुरेणान्तरात्मना ॥ ६९॥
'आपने जिसे युद्धमें पराजित किया था, वह कालनेमि ही वहाँ 'कंस' बनकर प्रकट हुआ है। उसकी अन्तरात्मा आसुरभावसे युक्त है, जिसके द्वारा वह मांसभक्षी राक्षस समस्त लोकोंको पीड़ा देता है ॥ ६९॥

योऽप्यसौ हयविक्रान्तो हयग्रीव इति स्मृतः।
केशी नाम हयो जातः स तस्यैव जघन्यजः ॥ ७०॥
'पहले जो घोड़ेके समान चलनेवाला अथवा पराक्रमी हयग्रीव नामसे विख्यात दैत्य था, वही 'केशी' नामक अश्वके रूपमें भूतलपर उत्पन्न हुआ है। इस समय केशी मानो कंसका छोटा भाई बना हुआ है ॥ ७० ॥

स दुष्टो हेषितपटुः केसरी निरवग्रहः।
वृन्दावने वसत्येको नृणां मांसानि भक्षयन् ॥ ७१॥
'वह दुष्ट केशी हींसने या हिनहिनानेमें बड़ा पटु है। उसकी गर्दनपर बड़े-बड़े बाल हैं। वह सर्वथा उच्छृङ्खल है। वह मनुष्योंके मांसका ही आहार करता हुआ वृन्दावनमें अकेला ही निवास करता है ॥ ७१ ॥

अरिष्टो बलिपुत्रश्च ककुद्मी वृषरूपधृक्।
गवामरित्वमापन्नः कामरूपी महासुरः ॥ ७२ ॥
'बलिको पुत्र अरिष्ट ऊँचे पुट्ठोंसे युक्त बैलका रूप धारण करके प्रकट हुआ है। वह कामरूपी महान् असुर गौओंका शत्रु बन गया है ॥ ७२ ॥

रिष्टो नाम दितेः पुत्रो वरिष्ठो दानवेषु यः।
स कुञ्जरत्वमापन्नो दैत्यः कंसस्य वाहनः ॥ ७३॥
'दानवोंमें श्रेष्ठ दितिपुत्र रिष्ट नामक दैत्य हाथीके रूपमें उत्पन्न होकर इस समय कंसका वाहन बना हुआ है ॥ ७३ ॥

लम्बो नामेति विख्यातो योऽसौ दैत्येषु दर्पितः।
प्रलम्बो नाम दैत्योऽसौ वटं भाण्डीरमाश्रितः ॥ ७४॥
'दैत्योंमें अभिमानी जो लम्बो नामसे विख्यात दैत्य था, वह इस समय प्रलम्ब नामसे प्रसिद्ध हो भाण्डीर वटका आश्रय लेकर रहता है ॥ ७४ ॥

खर इत्युच्यते दैत्यो धेनुकः सोऽसुरोत्तमः।
घोरं तालवनं दैत्यश्चरत्युद्वासयन् प्रजाः ॥ ७५॥
'जो खर नामक दैत्य कहा जाता था, वही इस समय असुरोंमें श्रेष्ठ धेनुक बना हुआ है। वह दैत्य प्रजाजनोंको उजाड़ता हुआ भयानक तालवनमें विचरता रहता है ॥ ७५॥

वाराहश्च किशोरश्च दानवौ यौ महाबलौ।
मल्लौ रङ्गगतौ तौ तु जातौ चाणूरमुष्टिकौ ॥ ७६ ॥
'पूर्वकालमें वाराह और किशोर नामवाले जो दो महाबली दानव थे,वे ही चाणूर और मुष्टिकके नामसे उत्पन्न हुए हैं। वे दोनों इस समय कंसके अखाड़ेके प्रमुख मल्ल (पहलवान) हैं ॥ ७६ ॥

यौ तौ मयश्च तारश्च दानवौ दानवान्तक।
प्राग्ज्योतिषे तौ भौमस्य नरकस्य पुरे रतौ ॥ ७७ ॥
'दानव-विनाशक नारायण ! मय और तार नामसे प्रसिद्ध जो दो दानव थे, वे इस समय प्राग्ज्योतिषपुरमें, जो भूमिपुत्र नरकासुरका नगर है, निवास करते हैं ॥ ७७ ॥

एते दैत्या विनिहतास्त्वया विष्णो निराकृताः।
मानुषं वपुरास्थाय बाधन्ते भुवि मानुषान् ॥ ७८॥
'विष्णो ! आपके द्वारा पराजित और निहत हुए ये दैत्य मानव-शरीर धारण करके भूतलपर मनुष्योंको पीड़ा दे रहे हैं ॥ ७८ ॥

त्वत्कथाद्वेषिणः सर्वे त्वद्भक्तान् घ्नन्ति मानुषान्।
तव प्रसादात् तेषां वै दानवानां क्षयो भवेत् ॥ ७९ ॥
'ये सब-के-सब आपकी कथावार्तासे द्वेष रखते हैं और आपमें भक्ति रखनेवाले मनुष्योंको मार डालते हैं। आपके कृपा-प्रसादसे ही इन दानवोंका संहार हो सकता है ॥ ७९ ॥

त्वत्तस्ते बिभ्यति दिवि त्वत्तो बिभ्यति सागरे।
पृथिव्यां तव बिभ्यन्ति नान्यतस्तु कदाचन ॥ ८० ॥
'वे आकाश या स्वर्गमें रहें तो भी आपसे डरते हैं। समुद्रमे रहें तो भी आपसे ही भयभीत होते हैं और पृथ्वीपर रहकर भी केवल आपसे ही भय खाते हैं, दूसरे किसीसे कदापि नहीं डरते हैं ॥ ८० ॥

दुर्वृत्तस्य हतस्यापि त्वया नान्येन श्रीधर।
दिवश्च्युतस्य दैत्यस्य गतिर्भवति मेदिनी ॥ ८१ ॥
'श्रीधर ! जो आपके ही द्वारा मारा जाता है, दूसरेके द्वारा नहीं, उस दैत्यकी, वह दुराचारी ही क्यों न रहा हो, आप ही प्राप्त होते हैं। परंतु जो दूसरेके द्वारा मारा गया है, वह दैत्य स्वर्गसे भ्रष्ट होनेपर पृथ्वीपर ही जन्म लेता है !

व्युत्थितस्य च मेदिन्यां हतस्य नृशरीरिणः।
दुर्लभं स्वर्गगमनं त्वयि जाग्रति केशव ॥ ८२ ॥
'केशव ! जबतक यमराजसे आप पापियोंको नरकमें गिरानेके लिये जागरूक है, तबतक पृथ्वीपर जो दूसरेके हाथसे मारा जाता है, उसे स्वर्गकी प्राप्ति भी दुर्लभ रहती है;