विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 232, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंहरिवंशपर्व ] पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः २०५
(फिर आपकी प्राप्ति तो दूरकी बात है। अतः आप दया करके दैत्योंको मारकर उन्हें सद्गति प्रदान करनेके लिये ही भूतलपर अवतार ग्रहण करें) ॥ ८२ ॥
तदागच्छ स्वयं विष्णो गच्छामः पृथिवीतलम् ।
दानवानां विनाशाय विसृजात्मानमात्मना ॥ ८३॥
'अतः विष्णो ! आप स्वयं आइये। चलिये पृथ्वीपर चलें। वहाँ दानवोंके विनाशके लिये आप स्वयं ही अपने-आपको प्रकट करें ॥ ८३ ॥
मूर्तयो हि तवाव्यक्ता दृश्याऽदृश्याः सुरोत्तमैः ।
तासु सृष्टास्त्वया देवाः सम्भविष्यन्ति भूतले ॥ ८४ ॥
'आपकी बहुत-सी मूर्तियाँ हैं, जो व्यक्त नहीं होती हैं। श्रेष्ठ देवता भी आपकी कुछ मूर्तियोंको देख पाते हैं और कुछको नहीं देख पाते हैं। आपके द्वारा रचे गये देवता उन्हीं मूर्तियोंमे भूतलपर प्रकट होंगे ॥ ८४ ॥
तवावतरणे विष्णो कंसः स विनशिष्यति ।
सेत्स्यते च स कार्यार्थो यस्यार्थे भूमिरागता ॥ ८५ ॥
'विष्णो ! आपके अवतार लेनेपर ही कंसका विनाश होगा और जिसके लिये पृथ्वी यहाँ आयी थी, वह सारा प्रयोजन सिद्ध हो सकेगा ॥ ८५ ॥
त्वं भारते कार्यगुरुस्त्वं चक्षुस्त्वं परायणम् ।
तदागच्छ हृषीकेश क्षितौ ताञ्जहि दानवान् ॥ ८६ ॥
'हृषीकेश ! आपको भारतवर्षमें महान् कार्य करना है। आप ही सबके नेत्र हैं (नेत्रोंकी भाँति सन्मार्गका दर्शन कराते हैं) और आप ही सबके परम आश्रय हैं; अतः आइये, भूतलपर अवतार लेकर उन दानवोंका वध कीजिये' ॥ ८६ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि नारदवाक्ये चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें नारदका वाक्यविषयक चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५४ ॥
पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
भगवान् विष्णुके द्वारा नारदजीके कथनका उत्तर तथा ब्रह्माजीका भगवान्से उनके अवतार लेने योग्य स्थान और पिता-माता आदिका परिचय देना
वैशम्पायन उवाच
नारदस्य वचः श्रुत्वा सस्मितं मधुसूदनः ।
प्रत्युवाच शुभं वाक्यं वरेण्यः प्रभुरीश्वरः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! भोग और मोक्षकी अभिलाषा रखनेवाले पुरुषोंके द्वारा जो एकमात्र वरण करने योग्य हैं, वे सर्वशक्तिमान् परमेश्वर मधुसूदन श्रीहरि नारदजीकी पूर्वोक्त बात सुनकर मुस्कराये और अपनी कल्याणमयी वाणीद्वारा उन्हें उत्तर देते हुए बोले—॥ १ ॥
त्रैलोक्यस्य हितार्थाय यन्मां वदसि नारद ।
तस्य सम्यक्प्रवृत्तस्य श्रूयतामुत्तरं वचः ॥ २ ॥
'नारद ! तुम तीनों लोकोंके हितके लिये मुझसे जो कुछ कह रहे हो, तुम्हारी वह बात उत्तम प्रवृत्तिके लिये प्रेरणा देनेवाली है, अब तुम उसका उत्तर सुनो ॥ २ ॥
विदिता देहिनो जाता मयैते भुवि दानवाः ।
यां च यस्तनुमादाय दैत्यः पुष्यति विग्रहम् ॥ ३ ॥
'अब मुझे भलीभाँति विदित है कि ये दानव भूतलपर मानव-शरीर धारण करके उत्पन्न हो गये हैं। मैं यह भी जानता हूँ कि कौन-कौन दैत्य किस-किस शरीरको ग्रहण करके वैरभावकी पुष्टि कर रहा है ॥ ३ ॥
जानामि कंसं सम्भूतमुग्रसेनसुतं भुवि ।
केशिनं चापि जानामि दैत्यं तुरगविग्रहम् ॥ ४ ॥
'मुझे यह भी ज्ञात है कि कालनेमि उग्रसेनपुत्र कंसके रूपमें इस पृथ्वीपर उत्पन्न हुआ है। घोड़ेका शरीर धारण करनेवाले केशी नामक दैत्यसे भी मै अपरिचित नहीं हूँ ॥ ४ ॥
नागं कुवलयापीडं मल्लौ चाणूरमुष्टिकौ ।
अरिष्टं चापि जानामि दैत्यं वृषभरूपिणम् ॥ ५ ॥
'कुवलयापीड़ हाथी, चाणूर और मुष्टिक नामक मल्ल तथा वृषभरूपधारी दैत्य अरिष्टासुरको भी मैं अच्छी तरह जानता हूँ ॥ ५ ॥
विदितो मे खरश्चैव प्रलम्बश्च महासुरः ।
सा च मे विदिता विप्र पूतना दुहिता बलेः ॥ ६ ॥
'विप्रवर ! खर और प्रलम्ब नामक महान् असुर भी मुझसे अज्ञात नहीं हैं। राजा बलिकी पुत्री पूतनाको भी मैं जानता हूँ ॥ ६ ॥
कालियं चापि जानामि यमुनाह्रदगोचरम् ।
वैनतेयभयाद् यस्तु यमुनाह्रदमाविशत् ॥ ७ ॥
'यमुनाके कुण्डमे रहनेवाले कालियानागको भी मैं जानता हूँ, जो गरुड़के भयसे उस कुण्डमें जा घुसा है ॥ ७ ॥
विदितो मे जरासंधः स्थितो मूर्ध्नि महीक्षिताम् ।
प्राग्ज्योतिषपुरे चापि नरकं साधु तर्कये ॥ ८ ॥
'मैं उस जरासंधसे भी परिचित हूँ, जो इस समय समस्त भूमिपालोंके मस्तकपर खड़ा है। प्राग्ज्योतिषपुरमें रहनेवाले नरकासुरको भी मैं भलीभाँति जानता हूँ ॥ ८ ॥