विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 233, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३१० | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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मानुषे पार्थिवे लोके मानुषत्वमुपागतम्।
बाणं च शोणितपुरे गुहप्रतिमतेजसम् ॥ ९ ॥
दृप्तं बाहुसहस्रेण देवैरपि सुदुर्जयम्।
मय्यासक्तां च जानामि भारतीं महतीं धुरम् ॥ १० ॥
'भूतलके मानवलोकमें जो मनुष्यरूप धारण करके उत्पन्न हुआ है, जिसका तेज कुमार कार्तिकेयके समान है, जो शोणितपुरमें निवास करता है और अपनी सहस्र भुजाओंके कारण देवताओंके लिये भी अत्यन्त दुर्जय हो रहा है, उस बलाभिमानी दैत्य बाणासुरको भी मैं जानता हूँ तथा यह भी समझता हूँ कि पृथ्वीपर जो भारती सेनाका महान् भार बढ़ा हुआ है, उसे उतारनेका कार्य मुझपर ही अवलम्बित है ॥ ९-१० ॥
सर्वं तच्च विजानामि यथा योत्स्यन्ति ते नृपाः।
क्षयो भुवि मया दृष्टः शक्रलोके च सत्क्रिया।
एषां पुरुषदेहानामपरावृत्तदेहिनाम् ॥ ११ ॥
'मैं उन सारी बातोंसे परिचित हूँ कि किस प्रकार वे राजालोग आपसमें युद्ध करेंगे, भूतलपर उनका किस तरह संहार होगा और पुनर्जन्मसे रहित दिव्य पुरुष-देह धारण करनेवाले इन नरेशोंको इन्द्रलोकमें किस प्रकार सत्कार प्राप्त होगा—यह सब कुछ मेरी आँखोंके सामने है ॥ ११ ॥
सम्प्रेवेक्ष्याम्यहं योगमात्मनश्च परस्य च।
सम्प्राप्य पार्थिवं लोकं मानुषत्वमुपागतः ॥ १२ ॥
'मैं भूलोकमें पहुँचकर मानवशरीर धारण करके स्वयं तो उद्योगका आश्रय लूँगा ही, दूसरोंको भी इसके लिये प्रेरित करूँगा ॥ १२ ॥
कंसादींश्चापि तान् सर्वान् वधिष्यामि महासुरान्।
तेन तेन विधानेन येन यः शान्तिमेष्यति ॥ १३ ॥
'जिस-जिस विधिसे जो-जो असुर मर सकेगा, उस-उस उपायसे ही मैं उन सभी कंस आदि बड़े-बड़े असुरोंका वध करूँगा ॥ १३ ॥
अनुप्रविश्य योगेन तास्ता हि गतयो मया।
अमीषां हि सुरेन्द्राणां हन्तव्या रिपवो युधि ॥ १४ ॥
'मैं योगसे इनके भीतर प्रवेश करके इनकी अन्तर्धान आदि गतियोंको नष्ट कर दूँगा और इस प्रकार युद्धमें इन देवेश्वरोंके शत्रुओंका संहार कर डालूँगा ॥ १४ ॥
जगत्यर्थे कृतो योऽयमंशोत्सर्गो दिवौकसैः।
सुरदेवर्षिगन्धर्वैरितश्चानुमते मम ॥ १५ ॥
विनिश्चयो प्रागेव नारदाय कृतो मया।
'नारद ! पृथ्वीके हितके लिये स्वर्गवासी देवताओं, देवर्षियों तथा गन्धर्वोंने यहाँसे जो अपने-अपने अंशका उत्सर्ग किया है, यह सब मेरी अनुमतिसे हुआ है; क्योंकि मैंने पहलेसे ही ऐसा निश्चय कर लिया था ॥ १५½ ॥
निवासं ननु मे ब्रह्मन् विदधातु पितामहः ॥ १६ ॥
यत्र देशे यथा जातो येन वेषेण वा वसन्।
तानहं समरे हन्यां तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १७ ॥
'ब्रह्मन् ! अब वह ब्रह्माजी मेरे लिये निवासस्थानकी व्यवस्था करें। पितामह ! अब आप ही मुझे बताइये कि मैं किस प्रदेशमें कैसे प्रकट होकर अथवा किस वेशमें रहकर उन सब असुरोंका समरभूमिमे संहार करूँगा ?'॥ १६-१७ ॥--
ब्रह्मोवाच
नारायणेमं सिद्धार्थमुपायं शृणु मे विभो।
भुवि यस्ते जनयिता जननी च भविष्यति ॥ १८ ॥
यत्र त्वं च महाबाहो जातः कुलकरो भुवि।
यादवानां महद् वंशमखिलं धारयिष्यसि ॥ १९ ॥
तांश्चासुरान् समुत्पाट्य वंशं कृत्वाऽऽत्मनो महत्।
स्थापयिष्यसि मर्यादां नृणां तन्मे निशामय ॥ २० ॥
ब्रह्माजीने कहा—सर्वव्यापी नारायण ! आप मुझसे इस उपायको सुनिये, जिसके द्वारा सारा प्रयोजन सिद्ध हो जायगा। महाबाहो ! भूतलपर जो आपके पिता होंगे, जो माता होंगी और जहाँ जन्म लेकर आप अपने कुलकी वृद्धि करते हुए यादवोंके सम्पूर्ण विशाल वंशको धारण करेंगे तथा उन समस्त असुरोंका संहार करके अपने वंशका महान् विस्तार करते हुए जिस प्रकार मनुष्योंके लिये धर्मकी मर्यादा स्थापित करेंगे, वह सब बताता हूँ; सुनिये ॥ १८–२० ॥
पुरा हि कश्यपो विष्णो वरुणस्य महात्मनः।
जहार यज्ञिया गा वै पयोदास्तु महामखे ॥ २१ ॥
विष्णो ! पहलेकी बात है, महर्षि कश्यप अपने महान् यज्ञके अवसरपर महात्मा वरुणके यहाँसे कुछ दुधारू गौएँ माँग लाये थे, जो अपने दूध आदिके द्वारा यज्ञकार्यमें बहुत ही उपयोगिनी थीं ॥ २१ ॥
अदितिः सुरभिश्चैते द्वे भार्ये कश्यपस्य तु।
प्रदीयमाना गास्तास्तु नैच्छतां वरुणस्य वै ॥ २२ ॥
यज्ञ-कार्य पूर्ण हो जानेपर भी कश्यपकी दो पत्नी अदिति और सुरभिने वरुणको उनकी गौएँ लौटा देनेकी इच्छा नहीं की ॥ २२ ॥
ततो मां वरुणोऽभ्येत्य प्रणम्य शिरसा ततः।
उवाच भगवन् गावो गुरुणा मे हृता इति ॥ २३ ॥
तब वरुणदेव मेरे पास आये और मस्तक झुकाकर मुझे प्रणाम करनेके पश्चात् बोले—'भगवन् ! पिताजीने मेरी गौएँ लाकर रख ली हैं ॥ २३ ॥
कृतकार्यो हि गास्तास्तु नानुजानाति मे गुरुः।
अन्ववर्तत भार्ये द्वे अदितिं सुरभिं तथा ॥ २४ ॥
'यद्यपि उन गौओंसे जो कार्य लेना था, वह पूरा हो गया