विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 234, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंहरिवंशपर्व ] पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः २११
है, तो भी पिताजी मुझे उन्हें वापस ले जानेकी आज्ञा नहीं देते हैं। इस विषयमे उन्होंने अपनी दो पत्नियों अदिति और सुरभिके मतका अनुसरण किया है ॥ २४ ॥
मम ता ह्यक्षया गावो दिव्याः कामदुहः प्रभो ।
चरन्ति सागरान् सर्वान् रक्षिताः स्वेन तेजसा ॥ २५ ॥
'प्रभो ! मेरी वे गौएँ दिव्य, अक्षय एवं कामधेनु है तथा अपने ही तेजसे सुरक्षित रहकर समस्त समुद्रोंमें विचरण करती हैं ॥ २५ ॥
कस्ता धर्षयितुं शक्तो मम गाः कश्यपादृते ।
अक्षयं वा क्षरन्त्यम्यं पयो देवामृतोपमम् ॥ २६ ॥
'देव ! जो अमृतके समान उत्तम दूधको अविच्छिन्न रूपसे देती रहती हैं, मेरी उन गौओंको पिता कश्यपजीके सिवा दूसरा कौन बलपूर्वक रोक सकता है ? ॥ २६ ॥
प्रभुर्वा व्युत्थितो ब्रह्मन् गुरुर्वा यदि वेतरः ।
त्वया नियम्याः सर्वे वै त्वं हि नः परमा गतिः ॥ २७ ॥
'ब्रह्मन् ! कोई कितना ही शक्तिशाली हो, गुरुजन हो अथवा और कोई हो, यदि वह मर्यादाका त्याग करता है तो आप ही ऐसे सब लोगोंपर नियन्त्रण कर सकते हैं; क्योंकि आप हम सब लोगोंके परम आश्रय हैं ॥ २७ ॥
यदि प्रभवतां दण्डो लोके कार्यमजानताम् ।
न विद्यते लोकगुरो न स्युर्वै लोकसेतवः ॥ २८ ॥
'लोकगुरो ! यदि संसारमे अपने कर्तव्यसे अनभिज्ञ रहनेवाले शक्तिशाली पुरुषोंके लिये दण्डकी व्यवस्था न हो तो जगत्की सारी मर्यादाएँ नष्ट हो जायँगी ॥ २८ ॥
यथा वास्तु तथा वास्तु कर्तव्ये भगवान् प्रभुः ।
मम गावः प्रदीयन्तां ततो गन्तास्मि सागरम् ॥ २९ ॥
'इस कार्यका जैसा परिणाम होनेवाला हो वैसा ही कर्तव्यका पालन करने या करानेमें आप ही हमारे प्रभु हैं। मुझे मेरी गौएँ दिलवा दीजिये, तभी मै समुद्रको जाऊँगा ॥ २९ ॥
या आत्मदेवता गावो या गावः सत्त्वमव्ययम् ।
लोकानां त्वत्प्रवृत्तानामेकं गोब्राह्मणं स्मृतम्॥ ३० ॥
'इन गौओंके देवता साक्षात् परब्रह्म परमात्मा हैं तथा ये अविनाशी सत्त्वगुणका साकाररूप हैं । आपसे प्रकट हुए जो-जो लोक है, उन सबकी दृष्टिमे गौ तथा ब्राह्मण एक समान माने गये हैं ॥ ३० ॥
त्रातव्याः प्रथमं गावस्त्रातास्त्रायन्ति ता द्विजान् ।
गोब्राह्मणपरित्राणे परित्रातं जगद् भवेत् ॥ ३१ ॥
'पहले गौओंकी रक्षा करनी चाहिये। फिर सुरक्षित हुई गौएँ ब्राह्मणोंकी रक्षा करती हैं । गौओ और ब्राह्मणोंकी रक्षा होनेपर सम्पूर्ण जगत्की रक्षा हो जाती है' ॥ ३१ ॥
इत्येवम्वुपतिना प्रोक्तो वरुणेनाहमच्युत ।
गवां कारणतत्त्वज्ञः कश्यपे शापमुत्सृजम् ॥ ३२ ॥
अच्युत ! जलके स्वामी वरुणके ऐसा कहनेपर गौओंके कारण-तत्त्वको जाननेवाले मैने कश्यपको शाप देते हुए कहा—॥ ३२ ॥
येनांशेन हृता गावः कश्यपेन महर्षिणा ।
स तेनांशेन जगतीं गत्वा गोपत्वमेष्यति ॥ ३३ ॥
'महर्षि कश्यपने अपने जिस अंशसे गौओंका अपहरण किया है, उस अंशसे वे पृथ्वीपर जाकर गोप होंगे ॥ ३३ ॥
या च सा सुरभिर्नाम अदितिंश्च सुरारणिः ।
तेऽप्युभे तस्य भार्ये वै तेनैव सह यास्यतः ॥ ३४ ॥
'वे जो सुरभि नामवाली देवी हैं तथा देवतारूपी अग्नि-को प्रकट करनेवाली अरणीके समान जो अदिति देवी हैं, वे दोनों पत्नियाँ कश्यपके साथ ही भूलोकमें जायँगी ॥ ३४ ॥
ताभ्यां च सह गोपत्वे कश्यपो भुवि रंस्यते ।
स तस्य कश्यपस्यांशस्तेजसा कश्यपोपमः ॥ ३५ ॥
वसुदेव इति ख्यातो गोषु तिष्ठति भूतले ।
'गोपयोनिमे प्रकट हुए कश्यप भूतलपर अपनी उन दोनों पत्नियोंके साथ सुखपूर्वक रहेगे । कश्यपका जो दूसरा अंश कश्यपके समान ही तेजस्वी है, वह भूतलपर वसुदेव नामसे विख्यात हो गौओ और गोपोंके अधिपति रूपसे निवास करेगे ॥ ३५१/२ ॥
गिरिर्गोवर्धनो नाम मथुरायास्त्वदूरतः ॥ ३६ ॥
तत्रासौ गोषु निरतः कंसस्य करदायकः ।
तस्य भार्याद्वयं जातमदितिः सुरभिश्च ते ॥ ३७ ॥
देवकी रोहिणी चेमे वसुदेवस्य धीमतः ।
सुरभी रोहिणी देवी चादितिर्देवकी त्वभूत् ॥ ३८ ॥
'मथुरासे थोडी दूरपर गोवर्धन नामक पर्वत है, जहाँ वे गौओंकी रक्षामे तत्पर रहेंगे और कंसको कर देनेवाले होंगे। वहाँ अदिति और सुरभि नामक इनकी दोनो पत्नियाँ बुद्धिमान् वसुदेवकी देवकी और रोहिणी नामक ही दो भार्याएँ होंगी; उनमे सुरभि तो रोहिणीदेवी कहलायेगी और अदिति देवकी ॥ ३६-३८ ॥
तत्र त्वं शिशुरेवादौ गोपालकृतलक्षणः ।
वर्धयस्व महाबाहो पुरा त्रैविक्रमे यथा ॥ ३९ ॥
'महाबाहो ! वहाँ आप पहले शिशुरूपमे ही रहकर गोप-बालकका चिह्न धारण करके क्रमशः बड़े होइये । ठीक वैसे ही, जैसे त्रिविक्रमावतारके समय आप वामनसे बढ़कर विराट् हो गये थे ॥ ३९ ॥
छादयित्वाऽऽत्मनाऽऽत्मानं मायया योगरूपया ।
तत्रावतर लोकानां भवाय मधुसूदन ॥ ४० ॥