भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 235, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 235
२१२श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंश

'मधुसूदन ! योगमायाके द्वारा स्वयं ही अपने स्वरूपको आच्छादित करके आप लोकहितके लिये वहाँ अवतार लीजिये॥
जयाशीर्वचनैस्त्वेते वर्धयन्ति दिवौकसः।
आत्मानमात्मना हि त्वमवतार्य महीतले ॥ ४१ ॥
देवकीं रोहिणीं चैव गर्भाभ्यां परितोषय।
गोपकन्यासहस्राणि रमयंश्चर मेदिनीम् ॥ ४२ ॥
'ये देवतालोग विजयसूचक आशीर्वाद देकर आपके अभ्युदयकी कामना करते हैं। आप पृथ्वीपर स्वयं अपने-आप-को उतारकर दो गर्भोके रूपमें प्रकट हो माता देवकी तथा रोहिणीको संतुष्ट कीजिये। साथ ही यथासमय सहस्रों गोप-कन्याओंको आनन्द प्रदान करते हुए व्रजभूमिमें विचरण कीजिये ॥ ४१-४२ ॥
गाश्च ते रक्षतो विष्णो वनानि परिधावतः।
वनमालापरिक्षिप्तं धन्या द्रक्ष्यन्ति ते वपुः ॥ ४३ ॥
'विष्णो ! वहाँ गौओंकी रक्षा करते हुए जब आप वन-वनमें दौड़ते फिरेंगे, उस समय आपके वनमालाविभूषित मनोहर रूपका जो लोग दर्शन करेंगे, वे धन्य हो जायँगे ॥ ४३ ॥
विष्णौ पद्मपलाशाक्षे गोपालवसतिं गते।
बाले त्वयि महाबाहो लोको बालत्वमेष्यति ॥ ४४ ॥
'महाबाहो ! विकसित कमलदलके समान नेत्रवाले आप सर्वव्यापी परमेश्वर जब ग्वालबालके रूपमें व्रजमें निवास करेंगे, उस समय सब लोग आपके बालरूपकी झाँकी करके स्वयं भी बालक बन जायँगे (बाललीलाके रसास्वादनमें मग्न हो जायँगे) ॥ ४४ ॥
त्वद्भक्ताः पुण्डरीकाक्ष तव चित्तवशानुगाः।
गोषु गोपा भविष्यन्ति सहायाः सततं तव ॥ ४५ ॥
'कमलनयन ! आपके चित्तके अनुकूल चलनेवाले आप-के भक्तजन वहाँ गौओंकी सेवाके लिये गोप बनकर प्रकट होंगे और सदा आपके साथ-साथ रहेंगे ॥ ४५ ॥
वने चारयतो गाश्च गोष्ठेषु परिधावतः।
मज्जतो यमुनायां च रतिं प्राप्स्यन्ति ते त्वयि ॥ ४६ ॥
'जब आप वनमें गौएँ चराते होंगे, व्रजमे इधर-उधर दौड़ते होंगे तथा यमुनाजीके जलमे गोते लगाते होंगे, उन सभी अवसरोंपर आपका दर्शन करके वे भक्तजन आपमें उत्तरोत्तर अनुराग प्राप्त करेंगे ॥ ४६ ॥
जीवितं वसुदेवस्य भविष्यति सुजीवितम्।
यस्त्वया तात इत्युक्तः स पुत्र इति वक्ष्यति ॥ ४७ ॥
'वसुदेवका जीवन वास्तवमें उत्तम जीवन होगा, जो आपके द्वारा 'तात' कहकर पुकारे जानेपर आपसे 'बेटा' कहकर बोलेंगे ॥ ४७ ॥
अथवा कस्य पुत्रत्वं गच्छेथाः कश्यपादृते।
का च धारयितुं शक्ता त्वां विष्णो अदितिं विना ॥ ४८ ॥
'विष्णो ! अथवा आप कश्यपके सिवा दूसरे किसके पुत्र होंगे? देवी अदितिके बिना दूसरी कौन-सी स्त्री आपको गर्भमें धारण कर सकेगी ॥ ४८ ॥
योगेनात्मसमुत्थेन गच्छ त्वं विजयाय वै।
वयम्प्याल्यान् खान् खान् गच्छामो मधुसूदन ॥ ४९ ॥
'मधुसूदन ! आप अपने स्वाभाविक योगबलसे असुरों-पर विजय पानेके लिये यहाँसे प्रस्थान कीजिये और अब हम-लोग भी अपने-अपने निवासस्थानको जा रहे हैं' ॥ ४९ ॥

वैशम्पायन उवाच
स देवानभ्यनुज्ञाय विविक्ते त्रिदिवालये।
जगाम विष्णुः स्वं देशं क्षीरोदस्योत्तरां दिशम् ॥ ५० ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! देवलोकके उस पुण्यप्रदेशमें बैठे हुए भगवान् विष्णु देवताओंको जाने-की आज्ञा देकर क्षीरसागरसे उत्तर दिशामें स्थित अपने निवासस्थानको चले गये ॥ ५० ॥
तत्र वै पार्वती नाम गुहा मेरोः सुदुर्गमा।
त्रिभिस्तस्यैव विक्रान्तैर्नित्यं पर्वसु पूजिता ॥ ५१ ॥
वहाँ मेरुपर्वतकी पार्वती नामसे प्रसिद्ध एक अत्यन्त दुर्गम गुफा है, जो भगवान् विष्णुके तीन चरणचिह्नोंसे उपलक्षित होती है; इसलिये पर्वके अवसरोंपर सदा उसकी पूजा की जाती है ॥ ५१ ॥
पुराणं तत्र विन्यस्य देहं हरिरुदारधीः।
आत्मानं योजयामास वसुदेवगृहे प्रभुः ॥ ५२ ॥
उदारबुद्धिवाले भगवान् श्रीहरिने अपने पुरातन विग्रह-को वहीं स्थापित करके अपने-आपको वसुदेवजीके घरमें अवतीर्ण होनेके कार्यमें लगा दिया ॥ ५२ ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि पितामहवाक्ये पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५५ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें ब्रह्माजीका वचनविषयक पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५५ ॥

हरिवंशपर्व सम्पूर्ण।

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