विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 236, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीमद्महाभारतम्
तस्य खिलभागो हरिवंशः
( तत्र विष्णुपर्व )
प्रथमोऽध्यायः
मङ्गलाचरण, नारदजीका मथुरामें आकर कंसको आनेवाले भयकी सूचना देना और कंसका अपने सेवकोंके सामने बढ़-चढ़कर बातें बनाना
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥
बदरिकाश्रमनिवासी प्रसिद्ध ऋषि श्रीनारायण ( अथवा अन्तर्यामी नारायण ), नर ( नारायणसखा अर्जुन अथवा आदि जीव हिरण्यगर्भ ) तथा नरोत्तम ( इन हिरण्यगर्भ एवं अन्तर्यामीसे भी श्रेष्ठ शुद्ध सच्चिदानन्दघन पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण) को और ( इन नर-नारायण तथा नरोत्तमके तत्त्वको प्रकट करनेवाली ) देवी सरस्वतीको एवं ( देवी सरस्वतीने संसारपर अनुग्रह करनेके लिये जिनके शरीरमें प्रवेश किया है, उन ) व्यासजीको प्रणाम करके अविद्यारूपी अज्ञानान्धकारको जीतनेवाले इतिहास-पुराण आदि ग्रन्थोंका पाठ आरम्भ करे ॥
वैशम्पायन उवाच
ज्ञात्वा विष्णुं क्षितिगतं भागांश्च त्रिदिवौकसाम्।
विनाशशंसी कंसस्य नारदो मथुरां ययौ ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! भगवान् विष्णु और देवताओंके अंश भूतलपर अवतीर्ण हो चुके हैं, यह जानकर देवर्षि नारद कंसको उसके निकटवर्ती विनाशकी सूचना देनेके लिये मथुराको गये ॥ १ ॥
त्रिविष्टपादपातितो मथुरोपवने स्थितः।
प्रेषयामास कंसस्य दूतं स मुनिपुङ्गवः ॥ २ ॥
स्वर्गसे उतरकर वे मथुराके उपवनमें खड़े हो गये और वहींसे उन मुनिश्रेष्ठने कंसके पास एक दूत भेजा ॥ २ ॥
स दूतः कथयामास मुनेरागमनं वने ।
स नारदस्यागमनं श्रुत्वा त्वरितविक्रमः ॥ ३ ॥
निर्जगामासुरः कंसः स्वपुर्याः पद्मलोचनः।
उस दूतने कंसके पास जाकर बताया कि नगरके उपवनमें देवर्षि नारद पधारे हैं। नारदजीके आगमनका समाचार सुनकर कमलोचन असुर कंस जल्दी-जल्दी पैर बढ़ाता हुआ अपनी पुरीसे बाहर निकला ॥ ३ ॥
स ददर्शातिथिं श्लाघ्यं देवर्षि वीतकल्मषम् ॥ ४ ॥
तेजसा ज्वलनाकारं वपुषा सूर्यवर्चसम् ।
सोऽभिवाद्यार्चये तस्मै पूजां चक्रे यथाविधि ॥ ५ ॥
उपवनमें पहुँचकर उसने वहाँ अपने स्पृहणीय अतिथि देवर्षि नारदका दर्शन किया, जो पाप-तापसे रहित थे। उनका तेज प्रज्वलित अग्निके समान जान पड़ता था, वे शरीरसे सूर्यके समान दीप्तिमान् दिखायी देते थे। कंसने देवर्षिको प्रणाम करके उनका विधिपूर्वक पूजन किया ॥ ४-५ ॥
आसनं चाग्निवर्णाभं विसृज्योपजहार सः।
निषसादासने तस्मिन् स वै शक्रसखो मुनिः ॥ ६ ॥
उसने उनके लिये अग्निके समान कान्तिमान् सुवर्णमय आसन देकर क्रमशः अर्घ्य, पाद्य आदि उपहार प्रस्तुत किये। तत्पश्चात् इन्द्रके सखा नारद मुनि उस आसनपर बैठे ॥ ६ ॥
उवाच चोग्रसेनस्य सुतं परमकोपनम् ।
पूजितोऽहं त्वया वीर विधिदृष्टेन कर्मणा ॥ ७ ॥
गते त्वेवं मम वचः श्रूयतां गृह्यतां त्वया ।
बैठनेके बाद वे परम क्रोधी उग्रसेनपुत्र कंससे बोले— 'वीर ! तुमने मेरा शास्त्रीय विधिसे पूजन किया है, इसलिये मैं तुम्हें एक आवश्यक बात बताता हूँ, तुम मेरे उस वचनको सुनो और ग्रहण करो ॥ ७ ॥
अनुसृत्य दिवोलोकानहं ब्रह्मपुरोगमान् ॥ ८ ॥
गतः सूर्यसखं तात विपुलं मेरुपर्वतम् ।
सनन्दनवनं चैव दृष्ट्वा चैत्ररथं वनम् ॥ ९ ॥