विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 237, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें२१४ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे
आप्लुतं सर्वतीर्थेषु सरित्सु सह दैवतैः ।
दिव्या त्रिधारा दृष्टा मे पुण्या त्रिपथगा नदी ॥ १० ॥
स्मरणादेव सर्वेषामंहसां या विभेदिनी ।
'तात ! मैं ब्रह्मलोक आदि सभी स्वर्गीय लोकोंमें घूमता हुआ उस विशाल मेरुपर्वतपर जा पहुँचा, जो सूर्यदेवका सखा है। फिर नन्दनवन और चैत्ररथवनका दर्शन करके मैंने देवताओंके साथ सम्पूर्ण तीर्थों और सरिताओंमें स्नान किया। उसके बाद तीन धाराओंमें बँटी हुई दिव्य त्रिपथगा नदी पुण्यसलिला गङ्गाका दर्शन किया, जो स्मरणमात्रसे ही समस्त पापोंका विनाश कर देनेवाली हैं ॥ ८–१०॥'
उपस्पृष्टं च तीर्थेषु दिव्येषु च यथाक्रमम् ॥ ११ ॥
दृष्टं मे ब्रह्मसदनं ब्रह्मर्षिगणसेवितम् ।
देवगन्धर्वनिर्घोषैरप्सरोभिश्च नादितम् ॥ १२ ॥
'तत्पश्चात् क्रमशः दिव्य तीर्थोंमें स्नान एवं आचमन करके मैंने ब्रह्मर्षियोंसे सेवित ब्रह्माजीके भवनका दर्शन किया, जो देवगन्धर्वोंके वाद्यघोषमे गूँजता और अप्सराओंके मधुर गीतों-से निनादित होता रहता है ॥ ११-१२ ॥'
सोऽहं कदाचिद् देवानां समाजे मेरुमूर्धनि ।
संगृह्य वीणां संसकामगच्छं ब्रह्मणः सभाम् ॥ १३ ॥
'वहाँसे होकर मैं किसी समय हाथमें वीणा लिये मेरुके शिखरपर विराजमान ब्रह्माजीकी सभामें गया, जहाँ देवताओं-का समाज जुटा हुआ था ॥ १३ ॥'
सोऽहं तत्र सितोष्णीषान् नानारत्नविभूषितान् ।
दिव्यासनगतान् देवानपश्यं सपितामहान् ॥ १४ ॥
'वहाँ देखा कि श्वेत पगड़ी धारण किये नाना रत्नोंसे विभूषित ब्रह्मा आदि सभी देवता दिव्य सिंहासनपर बैठे हुए हैं ॥ १४ ॥'
तत्र मन्त्रयतामेवं देवतानां मया श्रुतः ।
भवतः सानुगस्यैव वधोपायः सुदारुणः ॥ १५ ॥
'उस सभामें देवताओंकी जो गुप्त मन्त्रणा हो रही थी, उसमें मैंने सुना कि सेवकोंसहित तुम्हारे वधके अत्यन्त दारुण उपायका ही विचार हो रहा है ॥ १५ ॥'
तत्रैषा देवकी या ते मथुरायां लघुस्वसा ।
योऽस्यां गर्भोऽष्टमः कंस स ते मृत्युर्भविष्यति ॥ १६ ॥
'कंस ! वहाँ जो कुछ मैंने सुना है, उसके अनुसार मथुरामें जो तुम्हारी यह छोटी बहिन देवकी है, इसका आठवाँ गर्भ तुम्हारे लिये मृत्युरूप होगा ॥ १६ ॥'
देवानां स तु सर्वस्वं त्रिदिवस्य गतिश्च सः ।
परं रहस्यं देवानां स ते मृत्युर्भविष्यति ॥ १७ ॥
'वह गर्भ देवताओंका सर्वस्व तथा स्वर्गलोकका आश्रय होगा। वह देवताओंका परम गोपनीय रहस्य है। वही तुम्हारी मृत्युका कारण होगा ॥ १७ ॥'
परश्चैवापरस्तेषां स्वयम्भूश्च दिवौकसाम् ।
ततस्ते तन्महद्भूतं दिव्यं च कथयाम्यहम् ॥ १८ ॥
'वही देवताओंका पर और अपर (मोक्ष और स्वर्ग) है। वही उन स्वर्गवासियोंका स्वयम्भू ब्रह्मा है। इसीलिये मैं तुमसे कहता हूँ कि वह महान् दिव्य भूत है ॥ १८ ॥'
श्लाघ्यश्च स हि ते मृत्युर्भूतपूर्वश्च तं स्मर ।
यत्नश्च क्रियतां कंस देवक्या गर्भकृन्तने ॥ १९ ॥
'कंस ! वही पहले भी तुम्हारी मृत्यु रहा है और इस समय भी तुम्हारे लिये प्रशंसनीय मृत्युरूप होगा, अतः तुम देवकीके गर्भका उच्छेद करनेके लिये प्रयत्न करो ॥ १९ ॥'
एषा मे त्वयता प्रीतिर्यदर्थं चाहमागतः ।
भुज्यतां सर्वकामार्थाः स्वस्ति तेऽस्तु व्रजाम्यहम् ॥ २० ॥
'यह मेरा तुम्हारे ऊपर प्रेम है, जिसके लिये मैं यहाँतक आया हूँ। अच्छा, अब तुम सम्पूर्ण मनोवाञ्छित भोगोंका उपभोग करो, तुम्हारा कल्याण हो, मैं जाता हूँ' ॥ २० ॥
इत्युक्त्वा नारदे याते तस्य वाक्यं विचिन्तयन् ।
जहासोच्चैस्ततः कंसः प्रकाशदशनश्चिरम् ॥ २१ ॥
ऐसा कहकर जब नारदजी चले गये, तब कंस बहुत देरतक उनकी बातों पर विचार करता रहा; फिर वह दाँत दिखाकर जोर-जोरसे अट्टहास करने लगा ॥ २१ ॥
प्रोवाच सस्मितं चैव भृत्यानामग्रतः स्थितः ।
हास्यः खलु स सर्वेषु नारदो न विशारदः ॥ २२ ॥
और अपने सेवकोंके सामने खड़ा हो मुसकराकर बोला— 'यह नारद मुनि सर्वसाधारणमें उपहासके ही पात्र हैं, विशेष चतुर नहीं हैं ॥ २२ ॥'
नाहं भीषयितुं शक्यो देवैरपि सवासवैः ।
आसनस्थः शयानो वा प्रमत्तो मत्त एव च ॥ २३ ॥
'मैं बैठा अथवा सोया रहूँ, असावधान या मतवाला होऊँ, किसी भी दशामें इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता भी मुझे डरा नहीं सकते ॥ २३ ॥'
योऽहं दोर्भ्यामुदाराभ्यां क्षोभयेयं धरामिमाम् ।
कोऽस्ति मां मानुषे लोके यः क्षोभयितुमुत्सहेत् ॥ २४ ॥
'मैं अपनी दोनों विशाल भुजाओंसे इस धरातलको क्षुब्ध कर सकता हूँ। मनुष्यलोकमे कौन ऐसा पुरुष है, जो मुझे क्षोभमें डालनेका साहस कर सके ॥ २४ ॥'
अद्यप्रभृति देवानामेष देवानुवर्तिनाम् ।
नृपक्षिपशुसंघानां करोमि कदनं महत् ॥ २५ ॥
'यह लो, आजसे मैं देवताओं तथा उनका अनुसरण