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विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

हरिवंशपर्व ] चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः २०५


घोरं मधुवनं नाम यत्रासौ न्यवसत् पुरा ॥ २३ ॥
‘वहीं उसका विशाल एवं भयंकर मधुवननामक वन था, जो बड़े-बड़े वृक्षोंसे हरा-भरा रहता था। पूर्वकालमें वह दानव उस मधुवनमें ही निवास करता था ॥ २३ ॥

तस्य पुत्रो महानासील्लवणो नाम दानवः ।
त्रासनः सर्वभूतानां महाबलपराक्रमः ॥ २४ ॥
‘उसका पुत्र लवण नामसे प्रसिद्ध महान् दानव था। वह भी समस्त प्राणियोंको भयभीत करनेवाला तथा महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न था ॥ २४ ॥

स तत्र दानवः क्रीडन् वर्षपूगाननेकशः ।
स दैवतगणाँल्लोकानुद्वासयति दर्पितः ॥ २५ ॥
‘वह दानव बहुत वर्षोंतक वहाँ क्रीड़ा करता रहा। फिर बलके घमंडमें भरकर देवताओंसहित समस्त लोकोंको उजाड़ने या उद्विग्न करने लगा ॥ २५ ॥

अयोध्यायामयोध्यायां रामे दाशरथौ स्थिते ।
राज्यं शासति धर्मज्ञे राक्षसानां भयावहे ॥ २६ ॥
स दानवो बलश्लाघी घोरं वनमुपाश्रितः ।
प्रेषयामास रामाय दूतं परुषवादिनम् ॥ २७ ॥
‘जिसपर आक्रमण करना किसीके लिये भी असम्भव था, उस अयोध्यापुरीमें जब राक्षसोंको भय देनेवाले धर्मज्ञ दशरथनन्दन श्रीराम राज्य-शासन करते थे, उस समय अपने बलकी प्रशंसा करनेवाले उस लवण नामक दानवने घोर मधुवनका सहारा ले श्रीरामचन्द्रजीके पास एक कटुभाषी दूत भेजा ॥ २६-२७ ॥

विषयासन्नभूतोऽस्मि तव राम रिपुश्च ह ।
न च सामन्तमिच्छन्ति राजानो बलदर्पितम् ॥ २८ ॥
‘(उसके उस दूतने भगवान् श्रीरामसे इस प्रकार कहा—) राम ! मैं तुम्हारे राज्यके निकट रहता हूँ और तुम्हारा शत्रु भी हूँ। प्रायः राजा लोग ऐसे सामन्तको जीवित रखना नहीं चाहते, जो बलके घमंडमें भरा रहता हो ॥ २८ ॥

राज्ञा राज्यव्रतस्थेन प्रजानां हितकाम्यया ।
जेतव्या रिपवः सर्वे स्फीतं विषयमिच्छता ॥ २९ ॥
‘राजोचित व्रतमें स्थित रहकर अपने राज्यको समृद्धिशाली बनानेकी इच्छा रखनेवाले राजाको उचित है कि वह प्रजाके हितकी कामनासे अपने समस्त शत्रुओंको जीतकर काबूमे कर ले ॥ २९ ॥

अभिषेकार्द्रकेशेन राज्ञा रञ्जनकाम्यया ।
जेतव्यानीन्द्रियाण्यादौ तज्जये हि ध्रुवो जयः ॥ ३० ॥
‘जिसके मस्तकके केश राज्याभिषेकसे आर्द्र हुए हों तथा जो प्रजाको प्रसन्न रखना चाहता हो, उस राजाका कर्तव्य है कि वह सबसे पहले अपनी इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त करे; क्योंकि उनको जीत लेनेके बाद शत्रुओंपर विजय पाना निश्चित है ॥ ३० ॥

सम्यग् वर्तितुकामस्य विशेषेण महीपतेः ।
नयानामुपदेशेन नास्ति लोकसमो गुरुः ॥ ३१ ॥
‘जो उत्तम बर्तावकी इच्छा रखता हो, ऐसे पुरुष विशेषतः पृथ्वीपालक नरेशको नीतिका उपदेश करनेके लिये लोकके समान दूसरा कोई गुरु नहीं है ॥ ३१ ॥

व्यसनेषु जघन्यस्य धर्ममध्यस्य धीमतः ।
बलज्येष्ठस्य नृपतेर्नास्ति सामन्तजं भयम् ॥ ३२ ॥
‘जो द्यूत और मृगया आदि दुर्व्यसनोंमें दूसरोंकी अपेक्षा निकृष्ट है (अर्थात् जो व्यसनोंसे दूर रहता है), धर्ममें जिसकी मध्यम कोटिकी स्थिति है; परंतु जो बलमे दूसरोंकी अपेक्षा बढ़-चढ़कर है, उस बुद्धिमान् नरेशको कभी सामन्तोंसे भय नहीं प्राप्त होता है ॥ ३२ ॥

सहजैर्बाध्यते सर्वः प्रवृद्धैरिन्द्रियादिभिः ।
अमित्राणां प्रियकरैर्मोहैरधृतिरीश्वरः ॥ ३३ ॥
‘अपने शरीरके साथ ही उत्पन्न हुए ये इन्द्रियरूपी शत्रु जब बढ़ जाते हैं, तब मोह उत्पन्न करनेवाले हो जाते हैं और शत्रुओंका प्रिय साधन करने लगते हैं; उस दशामे उनके द्वारा सभी धैर्यहीन पुरुषों अथवा राजाओको सदा ही बाधा प्राप्त होती है ॥ ३३ ॥

यत् त्वया स्त्रीकृते मोहात् सगणे रावणो हतः ।
नैतदौपयिकं मन्ये महद् वै कर्म कुत्सितम् ॥ ३४ ॥
‘तुमने जो मोहवश एक नारीके लिये दल-बलसहित रावणका वध कर डाला है, इसे मैं न्यायसंगत नहीं मानता । यद्यपि पराक्रमकी दृष्टिसे वह महान् कर्म है तो भी वास्तवमें वह निन्दित ही है ॥ ३४ ॥

वनवासप्रवृत्तेन यत् त्वया व्रतशालिना ।
प्रहृतं राक्षशानीके नैव दृष्टः सतां विधिः ॥ ३५ ॥
‘तुम वनवासमे प्रवृत्त हुए थे । वनवासी मुनियोंके नियमोंका पालन करनेमें ही तुम्हारी शोभा थी। फिर भी तुमने जो राक्षसोंकी सेनापर प्रहार किया, ऐसा बर्ताव कभी किन्हीं सत्पुरुषोंने किया हो—यह कभी नहीं देखा गया है ॥ ३५॥

सतामक्रोधजो धर्मः शुभां नयति सद्गतिम् ।
यत् त्वया निहता मोहाद् दूषिताश्चाश्रमौकसः॥ ३६॥
‘क्रोधका परित्याग करके साधुपुरुष जिस धर्मका पालन करते हैं, वह उन्हें शुभ सद्गतिकी प्राप्ति कराता है। तुमने जो मोहवश राक्षसोंका वध किया है, इससे सभी आश्रमवासी कलंकित हो गये (तुम्हारे द्वारा व्रत नियमका उल्लङ्घन देखकर दूसरे भी ऐसा ही करने लगेंगे; अतः तुम दुराचारके प्रवर्तक हो गये) ॥ ३६ ॥

स एव रावणो धन्यो यस्त्वया व्रतचारिणा ।
स्त्रीनिमित्ते हतो युद्धे ग्राम्यान् धर्मानवेक्षता ॥ ३७ ॥
‘वह रावण धन्य था, जो युद्धमें ग्राम्य धर्मपर ही दृष्टि

२०६श्रीमद्भारते खिलभागे[ हरिवंशे

रखनेवाले तुझ-जैसे व्रतधारीके हाथसे एक स्त्रीके कारण मारा गया ॥ ३७ ॥

यदि ते निहतः संख्ये दुर्बुद्धिरजितेन्द्रियः ।
युध्यस्वाद्य मया सार्धं मृधे यद्यसि वीर्यवान् ॥ ३८ ॥
'यदि तुमने खोटी बुद्धिवाले उस अजितेन्द्रिय रावणको युद्धमें मारा है और ऐसा करके तुम पराक्रमी बन रहे हो तो आओ, आज रणक्षेत्रमें मेरे साथ युद्ध करो ॥ ३८ ॥

तस्य दूतस्य तच्छ्रुत्वा भाषितं रूक्षवादिनः ।
धैर्यादसम्भ्रान्तवपुः सस्मितं राघवोऽब्रवीत् ॥ ३९ ॥
'उस कटुवादी दूतका वह भाषण सुनकर रघुनन्दन श्रीराम अपने स्वाभाविक धैर्यके कारण विचलित नहीं हुए, अपितु मुसकराते हुए बोले-॥३९॥

असदैतत् त्वया दूत भाषितं तस्य गौरवात् ।
यन्मां क्षिपसि दोषेण वेदात्मानं च सुस्थिरम् ॥ ४० ॥
'दूत ! तूने उस दानवके प्रति गौरव-बुद्धिके कारण जो कुछ कहा है, वह सब ओछी बात है; क्योंकि तू मुझपर तो दोषारोपण करके आक्षेप करता है और अपनेको न्यायमार्गमें भलीभाँति स्थित समझता है ॥ ४० ॥

यद्यहं सत्पथे मूढो यदि वा रावणो हतः ।
यदि वा मे हृता भार्या का तत्र परिदेवना ॥ ४१ ॥
'यदि मैं सन्मार्गपर चलनेका विवेक खो बैठा था, यदि मेरे द्वारा रावण मारा गया था अथवा यदि मेरी स्त्रीका अपहरण हुआ था तो तू क्यों इन सब बातोंका रोना रो रहा है ? ॥ ४१ ॥

न वाङ्मात्रेण दुष्यन्ति साधवः सत्पथे स्थिताः ।
जागर्ति च यथा देवः सदा सत्स्वितरेषु च ॥ ४२ ॥
'सन्मार्गपर स्थित रहनेवाले साधुपुरुष किसीके कहनेमात्र-से कलङ्कित नहीं होते हैं । सत् और असत् पुरुषोंके भीतर बैठे हुए भगवान् सदा जागते रहते हैं (कौन बुरा है और कौन भला—यह उनकी दृष्टिसे छिपा हुआ नहीं है) ॥४२॥

कृतं दूतेन यत् कार्यं गच्छ त्वं दूत मा चिरम् ।
नात्मश्लाघिषु नीचेषु प्रहरन्तीह मद्विधाः ॥ ४३ ॥
'दूत ! तुझ-जैसे दूतको जो कुछ करना चाहिये, वह कार्य तूने कर लिया । अब यहाँसे चला जा, विलम्ब न कर । मेरे-जैसे पुरुष यहाँ अपनी झूठी प्रशंसा करनेवाले नीच जनों-पर प्रहार नहीं करते ॥ ४३ ॥

अयं ममानुजो भ्राता शत्रुघ्नः शत्रुतापनः ।
तस्य दैत्यस्य दुर्बुद्धेर्मृधे प्रतिकरिष्यति ॥ ४४ ॥
'यह मेरा छोटा भाई शत्रुघ्न, जो शत्रुओंको पूर्ण संताप देनेवाला है, युद्धमें उस दुर्बुद्धि दैत्यको उसके कुकृत्योंका भरपूर बदला देगा' ॥ ४४ ॥

एवमुक्तः सः दूतस्तु ययौ सौमित्रिणा सह ।
अनुज्ञातो नरेन्द्रेण राघवेण महात्मना ॥ ४५ ॥
'महात्मा राजा रघुकुलनन्दन श्रीरामने ऐसा कहकर जब उसे जानेकी आज्ञा दी, तब वह दूत सुमित्राकुमार शत्रुघ्नके साथ चला गया ॥ ४५ ॥

स शीघ्रयानः सम्प्राप्तस्तद् दानवपुरं महत् ।
चक्रे निवेशं सौमित्रिर्बनान्ते युद्धलालसः ॥ ४६ ॥
'सुमित्रानन्दन शत्रुघ्न शीघ्रतापूर्वक रथ हाँकते हुए लवणासुरके उस विशाल नगरमें जा पहुँचे । वहाँ युद्धकी लालसा लेकर उन्होंने उसके वनके समीप ही पड़ाव डाल दिया ॥ ४६ ॥

ततो दूतस्य वचनात् स दैत्यः क्रोधमूर्च्छितः ।
पृष्ठतस्तद् वनं कृत्वा युद्धायाभिमुखः स्थितः ॥ ४७ ॥
'तदनन्तर दूतकी बातोंसे सब कुछ जानकर वह दैत्य क्रोधसे अचेत-सा हो गया और उस वनको पीछे करके युद्धके लिये शत्रुघ्नके सामने आकर खड़ा हो गया ॥ ४७ ॥

तद् युद्धमभवद् घोरं सौमित्रेर्दानवस्य च ।
उभयोरेव बलिनोः शूरयो रणमूर्धनि ॥ ४८ ॥
'सुमित्राकुमार शत्रुघ्न तथा दानव लवणासुर दोनों ही बड़े बलवान् और शूरवीर थे । युद्धके मुहानेपर उन दोनोंमें घोर संग्राम हुआ ॥ ४८ ॥

तौ शरैः साधु निशितैरन्योन्यमभिजघ्नतुः ।
न च तौ युद्धवैमुख्यं श्रमं वाप्युपजग्मतुः ॥ ४९ ॥
'वे तीखे बाणोंद्वारा एक दूसरेको भलीभाँति चोट पहुँचाने लगे । दोनों ही न तो युद्धसे विमुख हुए और न उन्हें थकावट ही हुई ॥ ४९ ॥

अथ सौमित्रिणा वाणैः पीडितो दानवो युधि ।
ततः स शूलरहितः पर्यहीयत दानवः ॥ ५० ॥
'तदनन्तर उस युद्धस्थलमें सुमित्राकुमारने दानव लवण-को बाणोंद्वारा अधिक पीड़ित किया, इससे उसका शूल हाथसे छूटकर गिर पड़ा । अब वह सर्वथा कमजोर पड़ने लगा ॥

स गृहीत्वाङ्कुशं चैव देवैर्दत्तवरं रणे ।
कर्षणं सर्वभूतानां लवणो विररास ह ॥ ५१ ॥
'तब उसने युद्धमें अङ्कुश उठाया, जिसके लिये उसको देवताओंसे वर प्राप्त हो चुका था । वह अङ्कुश समस्त प्राणियों-को आकर्षित करनेवाला था । उसे लेकर लवणासुर जोर-जोर-से गर्जना करने लगा ॥ ५१ ॥

शिरोधरायां जग्राह सोऽङ्कुशेन चकर्ष ह ।
प्रवेशयितुमारब्धो लवणो राघवानुजम् ॥ ५२ ॥
'उसने वह अङ्कुश श्रीरामके छोटे भाई शत्रुघ्नके गलेमें फँसा दिया और खींचकर उसे उनके कण्ठमें घुसाना आरम्भ किया ॥ ५२ ॥

स रुक्मत्सरुमुद्यम्य शत्रुघ्नः खड्गमुत्तमम् ।
शिरश्शिच्छेद खड्गेन लवणस्य महामृधे ॥ ५३ ॥

हरिवंशपर्व ] चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः [ २०७


'यह देख उस महासमरमें शत्रुघ्नने सोनेकी मूठवाली अच्छी तलवार उठा ली और उसके द्वारा उस दानवका मस्तक काट गिराया ॥ ५३ ॥

स हत्वा दानवं संख्ये सौमित्रिर्मित्रवत्सलः ।
तद् वनं तस्य दैत्यस्य चिच्छेदास्त्रेण बुद्धिमान् ॥ ५४ ॥

'मित्रोंपर स्नेह रखनेवाले बुद्धिमान् शत्रुघ्नने युद्धस्थलमें उस दानवका वध करके उसके उस वनको भी अपने अस्त्रों-द्वारा काट डाला ॥ ५४ ॥

छित्त्वा वनं तत् सौमित्रिनिवेशं सोऽभ्यरोचयत् ।
भवाय तस्य देशस्य पुर्याः परमधर्मवित् ॥ ५५ ॥

'वनको काटकर परम धर्मज्ञ सुमित्राकुमारने उस देशके अभ्युदयके लिये वहाँ एक नगर बसानेकी इच्छा की ॥ ५५॥

तस्मिन् मधुवनस्थाने मथुरा नाम सा पुरी ।
शत्रुघ्नेन पुरा सृष्टा हत्वा तं दानवं रणे ॥ ५६ ॥

'रणभूमिमें उस दानवका वध करके शत्रुघ्नने पूर्वकालमें उसी मधुवनकी जगह उस पुरीका निर्माण किया, जिसका नाम मथुरा है ॥ ५६ ॥

सा पुरी परमोदारा साट्टप्राकारतोरणा ।
स्फीता राष्ट्रसमाकीर्णा समृद्धबलवाहना ॥ ५७ ॥

'वह मथुरापुरी बहुत बड़ी है। उसमें ऊँची अट्टालिकाएँ, चहारदीवारी तथा फाटक यथास्थान बने हुए हैं। वह समृद्धि-शालिनीपुरी समूचे राष्ट्रके लोगोंसे भरी रहती है तथा सेना और सवारियोंसे सम्पन्न है ॥ ५७ ॥

उद्यानवनसम्पन्ना सुसीमा सुप्रतिष्ठिता ।
प्रांशुप्राकारवसना परिखाकुलमेखला ॥ ५८॥

'नाना प्रकारके उद्यान और वन उसकी शोभा बढ़ाते हैं। उसकी सीमा सुन्दर है। वह अच्छी तरहसे बसायी तथा दृढ़तापूर्वक स्थापित की गयी है। (वह नगरी एक नारीके समान जान पड़ती है) ऊँची-ऊँची चहारदीवारी उसके लिये साड़ीका काम देती है। चारों ओरसे खुदी हुई खाई मेखला (करधनी) के समान जान पड़ती है ॥ ५८ ॥

चयाट्टालककेयूरा प्रासादवरकुण्डला ।
सुसंवृतद्वारमुखी चत्वरोद्गारहासिनी ॥ ५९ ॥

'नगरद्वार और अट्टालिकाएँ उसके केयूर (भुजबंद)-सी प्रतीत होती हैं। श्रेष्ठ प्रासाद सुन्दर कुण्डलके समान शोभा देते हैं। किवाड़रूपी अञ्चलसे अच्छी तरह ढका हुआ प्रधान द्वार मानो उसका मुख है तथा भीतरके आँगनका उद्घाटन उसकी हँसीका प्रकाश है ॥ ५९ ॥

अरोगवीरपुरुषा हस्त्यश्वरथसंकुला ।
अर्धचन्द्रप्रतीकाशा यमुनातीरशोभिता ॥ ६० ॥

'उस पुरीमें नीरोग वीर पुरुषोंका निवास है । हाथी, घोड़े तथा रथ आदि वाहनोंसे वह भरी रहती है । यमुनाजीके तटपर बसी हुई वह शोभाशालिनी पुरी अर्धचन्द्राकार प्रतीत होती है ॥ ६० ॥

पुण्यापणवती दुर्गा रत्नसंचयगर्विता ।
क्षेत्राणि सस्यवन्त्यस्याः काले देवश्च वर्षति ॥ ६१ ॥

'इसके भीतर सुन्दर एवं पवित्र हाट हैं । इसमें प्रवेश करना दूसरोंके लिये कठिन है तथा इसे अपने रत्नराशि-संग्रह-पर गर्व है । इसके पार्श्ववर्ती जनपदके खेत अनाजके हरे-भरे पौधोंसे शोभा पाते हैं और वहाँ पर्जन्यदेव समयपर वर्षा करते हैं ॥ ६१ ॥

नरनारीप्रमुदिता सा पुरी स्म प्रकाशते ।
निविष्टविषयश्चैव शूरसेनस्ततोऽभवत् ॥ ६२ ॥

'नर-नारियोंके आमोद-प्रमोदसे पूर्ण मथुरापुरी सदा अपनी शोभासे प्रकाशित होती रहती है । इस पुरी और प्रदेशमें किसी समय राजा शूरसेन निवास करते थे ॥ ६२ ॥

तस्य पुर्यां महावीर्यो राजा भोजकुलोद्वहः ।
उग्रसेन इति ख्यातो महासेनपराक्रमः ॥ ६३ ॥

'उसी पुरीमें इस समय महाबली राजा उग्रसेन हैं, जो भोजवंशका भार वहन करते हैं। उनका पराक्रम कुमार कार्तिकेयके समान है ॥ ६३ ॥

तस्य पुत्रत्वमापन्नो योऽसौ विष्णो त्वया हतः ।
कालनेमिर्महादैत्यः संग्रामे तारकामये ॥ ६४ ॥

'विष्णो ! आपने तारकामय संग्राममें जिस कालनेमि नामक महादैत्यका वध किया था, वह अब उन्हीं राजा उग्रसेनका पुत्र होकर प्रकट हुआ है ॥ ६४ ॥

कंसो नाम विशालाक्षो भोजवंशविवर्धनः ।
राजा पृथिव्यां विख्यातः सिंहविस्पष्टविक्रमः ॥ ६५ ॥

'उसका नाम है कंस । उसके नेत्र बड़े-बड़े हैं। वह भोजवंशकी वृद्धि करनेवाला है । उसकी चाल-ढाल और पराक्रम सिंहके समान है। राजा कंस भूतलपर सर्वत्र विख्यात है ॥ ६५ ॥

राज्ञां भयंकरो घोरः शङ्कनीयो महीक्षिताम् ।
भयदः सर्वभूतानां सत्पथाद् बाह्यतां गतः ॥ ६६ ॥

'वह राजाओंके लिये अत्यन्त भयंकर है । भूमिपालोंके लिये शङ्कनीय हो गया है। समस्त प्राणियोंको भय देनेवाला कंस सदाचारसे गिर गया है ॥ ६६ ॥

दारुणाभिनिवेशेन दारुणेनान्तरात्मना ।
युक्तस्तेनैव दर्पेण प्रजानां रोमहर्षणः ॥ ६७ ॥

'दारुण प्रकृति और क्रूर अन्तरात्मासे युक्त हो वह कंस अपने पूर्वजन्मके दर्पसे ही उन्मत्त हो इस समय प्रजावर्ग-के लिये रोमाञ्चकारी बन गया है ॥ ६७ ॥

२०८श्रीमद्भारते खिलभागे[ हरिवंशे

न राजधर्माभिरतो नात्मपक्षसुखावहः।
नात्मराज्ये प्रियकरश्चण्डः कररुचिः सदा ॥ ६८॥
'वह न तो राजधर्ममें अनुराग रखता है, न अपने पक्षके लोगोंको ही सुख देता है और न अपने राज्यमें ही किसीका प्रिय करता है। सदा ही अत्यन्त क्रोधमें भरा रहता है और केवल प्रजासे कर वसूल करनेकी ही रुचि रखता है॥ ६८॥

स कंसस्तत्र सम्भूतस्त्वया युद्धे पराजितः।
क्रव्यादो बाधते लोकानासुरेणान्तरात्मना ॥ ६९॥
'आपने जिसे युद्धमें पराजित किया था, वह कालनेमि ही वहाँ 'कंस' बनकर प्रकट हुआ है। उसकी अन्तरात्मा आसुरभावसे युक्त है, जिसके द्वारा वह मांसभक्षी राक्षस समस्त लोकोंको पीड़ा देता है ॥ ६९॥

योऽप्यसौ हयविक्रान्तो हयग्रीव इति स्मृतः।
केशी नाम हयो जातः स तस्यैव जघन्यजः ॥ ७०॥
'पहले जो घोड़ेके समान चलनेवाला अथवा पराक्रमी हयग्रीव नामसे विख्यात दैत्य था, वही 'केशी' नामक अश्वके रूपमें भूतलपर उत्पन्न हुआ है। इस समय केशी मानो कंसका छोटा भाई बना हुआ है ॥ ७० ॥

स दुष्टो हेषितपटुः केसरी निरवग्रहः।
वृन्दावने वसत्येको नृणां मांसानि भक्षयन् ॥ ७१॥
'वह दुष्ट केशी हींसने या हिनहिनानेमें बड़ा पटु है। उसकी गर्दनपर बड़े-बड़े बाल हैं। वह सर्वथा उच्छृङ्खल है। वह मनुष्योंके मांसका ही आहार करता हुआ वृन्दावनमें अकेला ही निवास करता है ॥ ७१ ॥

अरिष्टो बलिपुत्रश्च ककुद्मी वृषरूपधृक्।
गवामरित्वमापन्नः कामरूपी महासुरः ॥ ७२ ॥
'बलिको पुत्र अरिष्ट ऊँचे पुट्ठोंसे युक्त बैलका रूप धारण करके प्रकट हुआ है। वह कामरूपी महान् असुर गौओंका शत्रु बन गया है ॥ ७२ ॥

रिष्टो नाम दितेः पुत्रो वरिष्ठो दानवेषु यः।
स कुञ्जरत्वमापन्नो दैत्यः कंसस्य वाहनः ॥ ७३॥
'दानवोंमें श्रेष्ठ दितिपुत्र रिष्ट नामक दैत्य हाथीके रूपमें उत्पन्न होकर इस समय कंसका वाहन बना हुआ है ॥ ७३ ॥

लम्बो नामेति विख्यातो योऽसौ दैत्येषु दर्पितः।
प्रलम्बो नाम दैत्योऽसौ वटं भाण्डीरमाश्रितः ॥ ७४॥
'दैत्योंमें अभिमानी जो लम्बो नामसे विख्यात दैत्य था, वह इस समय प्रलम्ब नामसे प्रसिद्ध हो भाण्डीर वटका आश्रय लेकर रहता है ॥ ७४ ॥

खर इत्युच्यते दैत्यो धेनुकः सोऽसुरोत्तमः।
घोरं तालवनं दैत्यश्चरत्युद्वासयन् प्रजाः ॥ ७५॥
'जो खर नामक दैत्य कहा जाता था, वही इस समय असुरोंमें श्रेष्ठ धेनुक बना हुआ है। वह दैत्य प्रजाजनोंको उजाड़ता हुआ भयानक तालवनमें विचरता रहता है ॥ ७५॥

वाराहश्च किशोरश्च दानवौ यौ महाबलौ।
मल्लौ रङ्गगतौ तौ तु जातौ चाणूरमुष्टिकौ ॥ ७६ ॥
'पूर्वकालमें वाराह और किशोर नामवाले जो दो महाबली दानव थे,वे ही चाणूर और मुष्टिकके नामसे उत्पन्न हुए हैं। वे दोनों इस समय कंसके अखाड़ेके प्रमुख मल्ल (पहलवान) हैं ॥ ७६ ॥

यौ तौ मयश्च तारश्च दानवौ दानवान्तक।
प्राग्ज्योतिषे तौ भौमस्य नरकस्य पुरे रतौ ॥ ७७ ॥
'दानव-विनाशक नारायण ! मय और तार नामसे प्रसिद्ध जो दो दानव थे, वे इस समय प्राग्ज्योतिषपुरमें, जो भूमिपुत्र नरकासुरका नगर है, निवास करते हैं ॥ ७७ ॥

एते दैत्या विनिहतास्त्वया विष्णो निराकृताः।
मानुषं वपुरास्थाय बाधन्ते भुवि मानुषान् ॥ ७८॥
'विष्णो ! आपके द्वारा पराजित और निहत हुए ये दैत्य मानव-शरीर धारण करके भूतलपर मनुष्योंको पीड़ा दे रहे हैं ॥ ७८ ॥

त्वत्कथाद्वेषिणः सर्वे त्वद्भक्तान् घ्नन्ति मानुषान्।
तव प्रसादात् तेषां वै दानवानां क्षयो भवेत् ॥ ७९ ॥
'ये सब-के-सब आपकी कथावार्तासे द्वेष रखते हैं और आपमें भक्ति रखनेवाले मनुष्योंको मार डालते हैं। आपके कृपा-प्रसादसे ही इन दानवोंका संहार हो सकता है ॥ ७९ ॥

त्वत्तस्ते बिभ्यति दिवि त्वत्तो बिभ्यति सागरे।
पृथिव्यां तव बिभ्यन्ति नान्यतस्तु कदाचन ॥ ८० ॥
'वे आकाश या स्वर्गमें रहें तो भी आपसे डरते हैं। समुद्रमे रहें तो भी आपसे ही भयभीत होते हैं और पृथ्वीपर रहकर भी केवल आपसे ही भय खाते हैं, दूसरे किसीसे कदापि नहीं डरते हैं ॥ ८० ॥

दुर्वृत्तस्य हतस्यापि त्वया नान्येन श्रीधर।
दिवश्च्युतस्य दैत्यस्य गतिर्भवति मेदिनी ॥ ८१ ॥
'श्रीधर ! जो आपके ही द्वारा मारा जाता है, दूसरेके द्वारा नहीं, उस दैत्यकी, वह दुराचारी ही क्यों न रहा हो, आप ही प्राप्त होते हैं। परंतु जो दूसरेके द्वारा मारा गया है, वह दैत्य स्वर्गसे भ्रष्ट होनेपर पृथ्वीपर ही जन्म लेता है !

व्युत्थितस्य च मेदिन्यां हतस्य नृशरीरिणः।
दुर्लभं स्वर्गगमनं त्वयि जाग्रति केशव ॥ ८२ ॥
'केशव ! जबतक यमराजसे आप पापियोंको नरकमें गिरानेके लिये जागरूक है, तबतक पृथ्वीपर जो दूसरेके हाथसे मारा जाता है, उसे स्वर्गकी प्राप्ति भी दुर्लभ रहती है;

हरिवंशपर्व ] पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः २०५


(फिर आपकी प्राप्ति तो दूरकी बात है। अतः आप दया करके दैत्योंको मारकर उन्हें सद्गति प्रदान करनेके लिये ही भूतलपर अवतार ग्रहण करें) ॥ ८२ ॥

तदागच्छ स्वयं विष्णो गच्छामः पृथिवीतलम् ।
दानवानां विनाशाय विसृजात्मानमात्मना ॥ ८३॥
'अतः विष्णो ! आप स्वयं आइये। चलिये पृथ्वीपर चलें। वहाँ दानवोंके विनाशके लिये आप स्वयं ही अपने-आपको प्रकट करें ॥ ८३ ॥

मूर्तयो हि तवाव्यक्ता दृश्याऽदृश्याः सुरोत्तमैः ।
तासु सृष्टास्त्वया देवाः सम्भविष्यन्ति भूतले ॥ ८४ ॥
'आपकी बहुत-सी मूर्तियाँ हैं, जो व्यक्त नहीं होती हैं। श्रेष्ठ देवता भी आपकी कुछ मूर्तियोंको देख पाते हैं और कुछको नहीं देख पाते हैं। आपके द्वारा रचे गये देवता उन्हीं मूर्तियोंमे भूतलपर प्रकट होंगे ॥ ८४ ॥

तवावतरणे विष्णो कंसः स विनशिष्यति ।
सेत्स्यते च स कार्यार्थो यस्यार्थे भूमिरागता ॥ ८५ ॥
'विष्णो ! आपके अवतार लेनेपर ही कंसका विनाश होगा और जिसके लिये पृथ्वी यहाँ आयी थी, वह सारा प्रयोजन सिद्ध हो सकेगा ॥ ८५ ॥

त्वं भारते कार्यगुरुस्त्वं चक्षुस्त्वं परायणम् ।
तदागच्छ हृषीकेश क्षितौ ताञ्जहि दानवान् ॥ ८६ ॥
'हृषीकेश ! आपको भारतवर्षमें महान् कार्य करना है। आप ही सबके नेत्र हैं (नेत्रोंकी भाँति सन्मार्गका दर्शन कराते हैं) और आप ही सबके परम आश्रय हैं; अतः आइये, भूतलपर अवतार लेकर उन दानवोंका वध कीजिये' ॥ ८६ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि नारदवाक्ये चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें नारदका वाक्यविषयक चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५४ ॥


पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

भगवान् विष्णुके द्वारा नारदजीके कथनका उत्तर तथा ब्रह्माजीका भगवान्‌से उनके अवतार लेने योग्य स्थान और पिता-माता आदिका परिचय देना

वैशम्पायन उवाच
नारदस्य वचः श्रुत्वा सस्मितं मधुसूदनः ।
प्रत्युवाच शुभं वाक्यं वरेण्यः प्रभुरीश्वरः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! भोग और मोक्षकी अभिलाषा रखनेवाले पुरुषोंके द्वारा जो एकमात्र वरण करने योग्य हैं, वे सर्वशक्तिमान् परमेश्वर मधुसूदन श्रीहरि नारदजीकी पूर्वोक्त बात सुनकर मुस्कराये और अपनी कल्याणमयी वाणीद्वारा उन्हें उत्तर देते हुए बोले—॥ १ ॥

त्रैलोक्यस्य हितार्थाय यन्मां वदसि नारद ।
तस्य सम्यक्प्रवृत्तस्य श्रूयतामुत्तरं वचः ॥ २ ॥
'नारद ! तुम तीनों लोकोंके हितके लिये मुझसे जो कुछ कह रहे हो, तुम्हारी वह बात उत्तम प्रवृत्तिके लिये प्रेरणा देनेवाली है, अब तुम उसका उत्तर सुनो ॥ २ ॥

विदिता देहिनो जाता मयैते भुवि दानवाः ।
यां च यस्तनुमादाय दैत्यः पुष्यति विग्रहम् ॥ ३ ॥
'अब मुझे भलीभाँति विदित है कि ये दानव भूतलपर मानव-शरीर धारण करके उत्पन्न हो गये हैं। मैं यह भी जानता हूँ कि कौन-कौन दैत्य किस-किस शरीरको ग्रहण करके वैरभावकी पुष्टि कर रहा है ॥ ३ ॥

जानामि कंसं सम्भूतमुग्रसेनसुतं भुवि ।
केशिनं चापि जानामि दैत्यं तुरगविग्रहम् ॥ ४ ॥
'मुझे यह भी ज्ञात है कि कालनेमि उग्रसेनपुत्र कंसके रूपमें इस पृथ्वीपर उत्पन्न हुआ है। घोड़ेका शरीर धारण करनेवाले केशी नामक दैत्यसे भी मै अपरिचित नहीं हूँ ॥ ४ ॥

नागं कुवलयापीडं मल्लौ चाणूरमुष्टिकौ ।
अरिष्टं चापि जानामि दैत्यं वृषभरूपिणम् ॥ ५ ॥
'कुवलयापीड़ हाथी, चाणूर और मुष्टिक नामक मल्ल तथा वृषभरूपधारी दैत्य अरिष्टासुरको भी मैं अच्छी तरह जानता हूँ ॥ ५ ॥

विदितो मे खरश्चैव प्रलम्बश्च महासुरः ।
सा च मे विदिता विप्र पूतना दुहिता बलेः ॥ ६ ॥
'विप्रवर ! खर और प्रलम्ब नामक महान् असुर भी मुझसे अज्ञात नहीं हैं। राजा बलिकी पुत्री पूतनाको भी मैं जानता हूँ ॥ ६ ॥

कालियं चापि जानामि यमुनाह्रदगोचरम् ।
वैनतेयभयाद् यस्तु यमुनाह्रदमाविशत् ॥ ७ ॥
'यमुनाके कुण्डमे रहनेवाले कालियानागको भी मैं जानता हूँ, जो गरुड़के भयसे उस कुण्डमें जा घुसा है ॥ ७ ॥

विदितो मे जरासंधः स्थितो मूर्ध्नि महीक्षिताम् ।
प्राग्ज्योतिषपुरे चापि नरकं साधु तर्कये ॥ ८ ॥
'मैं उस जरासंधसे भी परिचित हूँ, जो इस समय समस्त भूमिपालोंके मस्तकपर खड़ा है। प्राग्ज्योतिषपुरमें रहनेवाले नरकासुरको भी मैं भलीभाँति जानता हूँ ॥ ८ ॥

३१०श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

मानुषे पार्थिवे लोके मानुषत्वमुपागतम्।
बाणं च शोणितपुरे गुहप्रतिमतेजसम् ॥ ९ ॥
दृप्तं बाहुसहस्रेण देवैरपि सुदुर्जयम्।
मय्यासक्तां च जानामि भारतीं महतीं धुरम् ॥ १० ॥

'भूतलके मानवलोकमें जो मनुष्यरूप धारण करके उत्पन्न हुआ है, जिसका तेज कुमार कार्तिकेयके समान है, जो शोणितपुरमें निवास करता है और अपनी सहस्र भुजाओंके कारण देवताओंके लिये भी अत्यन्त दुर्जय हो रहा है, उस बलाभिमानी दैत्य बाणासुरको भी मैं जानता हूँ तथा यह भी समझता हूँ कि पृथ्वीपर जो भारती सेनाका महान् भार बढ़ा हुआ है, उसे उतारनेका कार्य मुझपर ही अवलम्बित है ॥ ९-१० ॥

सर्वं तच्च विजानामि यथा योत्स्यन्ति ते नृपाः।
क्षयो भुवि मया दृष्टः शक्रलोके च सत्क्रिया।
एषां पुरुषदेहानामपरावृत्तदेहिनाम् ॥ ११ ॥

'मैं उन सारी बातोंसे परिचित हूँ कि किस प्रकार वे राजालोग आपसमें युद्ध करेंगे, भूतलपर उनका किस तरह संहार होगा और पुनर्जन्मसे रहित दिव्य पुरुष-देह धारण करनेवाले इन नरेशोंको इन्द्रलोकमें किस प्रकार सत्कार प्राप्त होगा—यह सब कुछ मेरी आँखोंके सामने है ॥ ११ ॥

सम्प्रेवेक्ष्याम्यहं योगमात्मनश्च परस्य च।
सम्प्राप्य पार्थिवं लोकं मानुषत्वमुपागतः ॥ १२ ॥

'मैं भूलोकमें पहुँचकर मानवशरीर धारण करके स्वयं तो उद्योगका आश्रय लूँगा ही, दूसरोंको भी इसके लिये प्रेरित करूँगा ॥ १२ ॥

कंसादींश्चापि तान् सर्वान् वधिष्यामि महासुरान्।
तेन तेन विधानेन येन यः शान्तिमेष्यति ॥ १३ ॥

'जिस-जिस विधिसे जो-जो असुर मर सकेगा, उस-उस उपायसे ही मैं उन सभी कंस आदि बड़े-बड़े असुरोंका वध करूँगा ॥ १३ ॥

अनुप्रविश्य योगेन तास्ता हि गतयो मया।
अमीषां हि सुरेन्द्राणां हन्तव्या रिपवो युधि ॥ १४ ॥

'मैं योगसे इनके भीतर प्रवेश करके इनकी अन्तर्धान आदि गतियोंको नष्ट कर दूँगा और इस प्रकार युद्धमें इन देवेश्वरोंके शत्रुओंका संहार कर डालूँगा ॥ १४ ॥

जगत्यर्थे कृतो योऽयमंशोत्सर्गो दिवौकसैः।
सुरदेवर्षिगन्धर्वैरितश्चानुमते मम ॥ १५ ॥
विनिश्चयो प्रागेव नारदाय कृतो मया।

'नारद ! पृथ्वीके हितके लिये स्वर्गवासी देवताओं, देवर्षियों तथा गन्धर्वोंने यहाँसे जो अपने-अपने अंशका उत्सर्ग किया है, यह सब मेरी अनुमतिसे हुआ है; क्योंकि मैंने पहलेसे ही ऐसा निश्चय कर लिया था ॥ १५½ ॥

निवासं ननु मे ब्रह्मन् विदधातु पितामहः ॥ १६ ॥
यत्र देशे यथा जातो येन वेषेण वा वसन्।
तानहं समरे हन्यां तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १७ ॥

'ब्रह्मन् ! अब वह ब्रह्माजी मेरे लिये निवासस्थानकी व्यवस्था करें। पितामह ! अब आप ही मुझे बताइये कि मैं किस प्रदेशमें कैसे प्रकट होकर अथवा किस वेशमें रहकर उन सब असुरोंका समरभूमिमे संहार करूँगा ?'॥ १६-१७ ॥--

ब्रह्मोवाच

नारायणेमं सिद्धार्थमुपायं शृणु मे विभो।
भुवि यस्ते जनयिता जननी च भविष्यति ॥ १८ ॥
यत्र त्वं च महाबाहो जातः कुलकरो भुवि।
यादवानां महद् वंशमखिलं धारयिष्यसि ॥ १९ ॥
तांश्चासुरान् समुत्पाट्य वंशं कृत्वाऽऽत्मनो महत्।
स्थापयिष्यसि मर्यादां नृणां तन्मे निशामय ॥ २० ॥

ब्रह्माजीने कहा—सर्वव्यापी नारायण ! आप मुझसे इस उपायको सुनिये, जिसके द्वारा सारा प्रयोजन सिद्ध हो जायगा। महाबाहो ! भूतलपर जो आपके पिता होंगे, जो माता होंगी और जहाँ जन्म लेकर आप अपने कुलकी वृद्धि करते हुए यादवोंके सम्पूर्ण विशाल वंशको धारण करेंगे तथा उन समस्त असुरोंका संहार करके अपने वंशका महान् विस्तार करते हुए जिस प्रकार मनुष्योंके लिये धर्मकी मर्यादा स्थापित करेंगे, वह सब बताता हूँ; सुनिये ॥ १८–२० ॥

पुरा हि कश्यपो विष्णो वरुणस्य महात्मनः।
जहार यज्ञिया गा वै पयोदास्तु महामखे ॥ २१ ॥

विष्णो ! पहलेकी बात है, महर्षि कश्यप अपने महान् यज्ञके अवसरपर महात्मा वरुणके यहाँसे कुछ दुधारू गौएँ माँग लाये थे, जो अपने दूध आदिके द्वारा यज्ञकार्यमें बहुत ही उपयोगिनी थीं ॥ २१ ॥

अदितिः सुरभिश्चैते द्वे भार्ये कश्यपस्य तु।
प्रदीयमाना गास्तास्तु नैच्छतां वरुणस्य वै ॥ २२ ॥

यज्ञ-कार्य पूर्ण हो जानेपर भी कश्यपकी दो पत्नी अदिति और सुरभिने वरुणको उनकी गौएँ लौटा देनेकी इच्छा नहीं की ॥ २२ ॥

ततो मां वरुणोऽभ्येत्य प्रणम्य शिरसा ततः।
उवाच भगवन् गावो गुरुणा मे हृता इति ॥ २३ ॥

तब वरुणदेव मेरे पास आये और मस्तक झुकाकर मुझे प्रणाम करनेके पश्चात् बोले—'भगवन् ! पिताजीने मेरी गौएँ लाकर रख ली हैं ॥ २३ ॥

कृतकार्यो हि गास्तास्तु नानुजानाति मे गुरुः।
अन्ववर्तत भार्ये द्वे अदितिं सुरभिं तथा ॥ २४ ॥

'यद्यपि उन गौओंसे जो कार्य लेना था, वह पूरा हो गया

हरिवंशपर्व ] पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः २११


है, तो भी पिताजी मुझे उन्हें वापस ले जानेकी आज्ञा नहीं देते हैं। इस विषयमे उन्होंने अपनी दो पत्नियों अदिति और सुरभिके मतका अनुसरण किया है ॥ २४ ॥

मम ता ह्यक्षया गावो दिव्याः कामदुहः प्रभो ।
चरन्ति सागरान् सर्वान् रक्षिताः स्वेन तेजसा ॥ २५ ॥

'प्रभो ! मेरी वे गौएँ दिव्य, अक्षय एवं कामधेनु है तथा अपने ही तेजसे सुरक्षित रहकर समस्त समुद्रोंमें विचरण करती हैं ॥ २५ ॥

कस्ता धर्षयितुं शक्तो मम गाः कश्यपादृते ।
अक्षयं वा क्षरन्त्यम्यं पयो देवामृतोपमम् ॥ २६ ॥

'देव ! जो अमृतके समान उत्तम दूधको अविच्छिन्न रूपसे देती रहती हैं, मेरी उन गौओंको पिता कश्यपजीके सिवा दूसरा कौन बलपूर्वक रोक सकता है ? ॥ २६ ॥

प्रभुर्वा व्युत्थितो ब्रह्मन् गुरुर्वा यदि वेतरः ।
त्वया नियम्याः सर्वे वै त्वं हि नः परमा गतिः ॥ २७ ॥

'ब्रह्मन् ! कोई कितना ही शक्तिशाली हो, गुरुजन हो अथवा और कोई हो, यदि वह मर्यादाका त्याग करता है तो आप ही ऐसे सब लोगोंपर नियन्त्रण कर सकते हैं; क्योंकि आप हम सब लोगोंके परम आश्रय हैं ॥ २७ ॥

यदि प्रभवतां दण्डो लोके कार्यमजानताम् ।
न विद्यते लोकगुरो न स्युर्वै लोकसेतवः ॥ २८ ॥

'लोकगुरो ! यदि संसारमे अपने कर्तव्यसे अनभिज्ञ रहनेवाले शक्तिशाली पुरुषोंके लिये दण्डकी व्यवस्था न हो तो जगत्‌की सारी मर्यादाएँ नष्ट हो जायँगी ॥ २८ ॥

यथा वास्तु तथा वास्तु कर्तव्ये भगवान् प्रभुः ।
मम गावः प्रदीयन्तां ततो गन्तास्मि सागरम् ॥ २९ ॥

'इस कार्यका जैसा परिणाम होनेवाला हो वैसा ही कर्तव्यका पालन करने या करानेमें आप ही हमारे प्रभु हैं। मुझे मेरी गौएँ दिलवा दीजिये, तभी मै समुद्रको जाऊँगा ॥ २९ ॥

या आत्मदेवता गावो या गावः सत्त्वमव्ययम् ।
लोकानां त्वत्प्रवृत्तानामेकं गोब्राह्मणं स्मृतम्॥ ३० ॥

'इन गौओंके देवता साक्षात् परब्रह्म परमात्मा हैं तथा ये अविनाशी सत्त्वगुणका साकाररूप हैं । आपसे प्रकट हुए जो-जो लोक है, उन सबकी दृष्टिमे गौ तथा ब्राह्मण एक समान माने गये हैं ॥ ३० ॥

त्रातव्याः प्रथमं गावस्त्रातास्त्रायन्ति ता द्विजान् ।
गोब्राह्मणपरित्राणे परित्रातं जगद् भवेत् ॥ ३१ ॥

'पहले गौओंकी रक्षा करनी चाहिये। फिर सुरक्षित हुई गौएँ ब्राह्मणोंकी रक्षा करती हैं । गौओ और ब्राह्मणोंकी रक्षा होनेपर सम्पूर्ण जगत्‌की रक्षा हो जाती है' ॥ ३१ ॥


इत्येवम्वुपतिना प्रोक्तो वरुणेनाहमच्युत ।
गवां कारणतत्त्वज्ञः कश्यपे शापमुत्सृजम् ॥ ३२ ॥

अच्युत ! जलके स्वामी वरुणके ऐसा कहनेपर गौओंके कारण-तत्त्वको जाननेवाले मैने कश्यपको शाप देते हुए कहा—॥ ३२ ॥

येनांशेन हृता गावः कश्यपेन महर्षिणा ।
स तेनांशेन जगतीं गत्वा गोपत्वमेष्यति ॥ ३३ ॥

'महर्षि कश्यपने अपने जिस अंशसे गौओंका अपहरण किया है, उस अंशसे वे पृथ्वीपर जाकर गोप होंगे ॥ ३३ ॥

या च सा सुरभिर्नाम अदितिंश्च सुरारणिः ।
तेऽप्युभे तस्य भार्ये वै तेनैव सह यास्यतः ॥ ३४ ॥

'वे जो सुरभि नामवाली देवी हैं तथा देवतारूपी अग्नि-को प्रकट करनेवाली अरणीके समान जो अदिति देवी हैं, वे दोनों पत्नियाँ कश्यपके साथ ही भूलोकमें जायँगी ॥ ३४ ॥

ताभ्यां च सह गोपत्वे कश्यपो भुवि रंस्यते ।
स तस्य कश्यपस्यांशस्तेजसा कश्यपोपमः ॥ ३५ ॥
वसुदेव इति ख्यातो गोषु तिष्ठति भूतले ।

'गोपयोनिमे प्रकट हुए कश्यप भूतलपर अपनी उन दोनों पत्नियोंके साथ सुखपूर्वक रहेगे । कश्यपका जो दूसरा अंश कश्यपके समान ही तेजस्वी है, वह भूतलपर वसुदेव नामसे विख्यात हो गौओ और गोपोंके अधिपति रूपसे निवास करेगे ॥ ३५१/२ ॥

गिरिर्गोवर्धनो नाम मथुरायास्त्वदूरतः ॥ ३६ ॥
तत्रासौ गोषु निरतः कंसस्य करदायकः ।
तस्य भार्याद्वयं जातमदितिः सुरभिश्च ते ॥ ३७ ॥
देवकी रोहिणी चेमे वसुदेवस्य धीमतः ।
सुरभी रोहिणी देवी चादितिर्देवकी त्वभूत् ॥ ३८ ॥

'मथुरासे थोडी दूरपर गोवर्धन नामक पर्वत है, जहाँ वे गौओंकी रक्षामे तत्पर रहेंगे और कंसको कर देनेवाले होंगे। वहाँ अदिति और सुरभि नामक इनकी दोनो पत्नियाँ बुद्धिमान् वसुदेवकी देवकी और रोहिणी नामक ही दो भार्याएँ होंगी; उनमे सुरभि तो रोहिणीदेवी कहलायेगी और अदिति देवकी ॥ ३६-३८ ॥

तत्र त्वं शिशुरेवादौ गोपालकृतलक्षणः ।
वर्धयस्व महाबाहो पुरा त्रैविक्रमे यथा ॥ ३९ ॥

'महाबाहो ! वहाँ आप पहले शिशुरूपमे ही रहकर गोप-बालकका चिह्न धारण करके क्रमशः बड़े होइये । ठीक वैसे ही, जैसे त्रिविक्रमावतारके समय आप वामनसे बढ़कर विराट् हो गये थे ॥ ३९ ॥

छादयित्वाऽऽत्मनाऽऽत्मानं मायया योगरूपया ।
तत्रावतर लोकानां भवाय मधुसूदन ॥ ४० ॥

२१२श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंश

'मधुसूदन ! योगमायाके द्वारा स्वयं ही अपने स्वरूपको आच्छादित करके आप लोकहितके लिये वहाँ अवतार लीजिये॥
जयाशीर्वचनैस्त्वेते वर्धयन्ति दिवौकसः।
आत्मानमात्मना हि त्वमवतार्य महीतले ॥ ४१ ॥
देवकीं रोहिणीं चैव गर्भाभ्यां परितोषय।
गोपकन्यासहस्राणि रमयंश्चर मेदिनीम् ॥ ४२ ॥
'ये देवतालोग विजयसूचक आशीर्वाद देकर आपके अभ्युदयकी कामना करते हैं। आप पृथ्वीपर स्वयं अपने-आप-को उतारकर दो गर्भोके रूपमें प्रकट हो माता देवकी तथा रोहिणीको संतुष्ट कीजिये। साथ ही यथासमय सहस्रों गोप-कन्याओंको आनन्द प्रदान करते हुए व्रजभूमिमें विचरण कीजिये ॥ ४१-४२ ॥
गाश्च ते रक्षतो विष्णो वनानि परिधावतः।
वनमालापरिक्षिप्तं धन्या द्रक्ष्यन्ति ते वपुः ॥ ४३ ॥
'विष्णो ! वहाँ गौओंकी रक्षा करते हुए जब आप वन-वनमें दौड़ते फिरेंगे, उस समय आपके वनमालाविभूषित मनोहर रूपका जो लोग दर्शन करेंगे, वे धन्य हो जायँगे ॥ ४३ ॥
विष्णौ पद्मपलाशाक्षे गोपालवसतिं गते।
बाले त्वयि महाबाहो लोको बालत्वमेष्यति ॥ ४४ ॥
'महाबाहो ! विकसित कमलदलके समान नेत्रवाले आप सर्वव्यापी परमेश्वर जब ग्वालबालके रूपमें व्रजमें निवास करेंगे, उस समय सब लोग आपके बालरूपकी झाँकी करके स्वयं भी बालक बन जायँगे (बाललीलाके रसास्वादनमें मग्न हो जायँगे) ॥ ४४ ॥
त्वद्भक्ताः पुण्डरीकाक्ष तव चित्तवशानुगाः।
गोषु गोपा भविष्यन्ति सहायाः सततं तव ॥ ४५ ॥
'कमलनयन ! आपके चित्तके अनुकूल चलनेवाले आप-के भक्तजन वहाँ गौओंकी सेवाके लिये गोप बनकर प्रकट होंगे और सदा आपके साथ-साथ रहेंगे ॥ ४५ ॥
वने चारयतो गाश्च गोष्ठेषु परिधावतः।
मज्जतो यमुनायां च रतिं प्राप्स्यन्ति ते त्वयि ॥ ४६ ॥
'जब आप वनमें गौएँ चराते होंगे, व्रजमे इधर-उधर दौड़ते होंगे तथा यमुनाजीके जलमे गोते लगाते होंगे, उन सभी अवसरोंपर आपका दर्शन करके वे भक्तजन आपमें उत्तरोत्तर अनुराग प्राप्त करेंगे ॥ ४६ ॥
जीवितं वसुदेवस्य भविष्यति सुजीवितम्।
यस्त्वया तात इत्युक्तः स पुत्र इति वक्ष्यति ॥ ४७ ॥
'वसुदेवका जीवन वास्तवमें उत्तम जीवन होगा, जो आपके द्वारा 'तात' कहकर पुकारे जानेपर आपसे 'बेटा' कहकर बोलेंगे ॥ ४७ ॥
अथवा कस्य पुत्रत्वं गच्छेथाः कश्यपादृते।
का च धारयितुं शक्ता त्वां विष्णो अदितिं विना ॥ ४८ ॥
'विष्णो ! अथवा आप कश्यपके सिवा दूसरे किसके पुत्र होंगे? देवी अदितिके बिना दूसरी कौन-सी स्त्री आपको गर्भमें धारण कर सकेगी ॥ ४८ ॥
योगेनात्मसमुत्थेन गच्छ त्वं विजयाय वै।
वयम्प्याल्यान् खान् खान् गच्छामो मधुसूदन ॥ ४९ ॥
'मधुसूदन ! आप अपने स्वाभाविक योगबलसे असुरों-पर विजय पानेके लिये यहाँसे प्रस्थान कीजिये और अब हम-लोग भी अपने-अपने निवासस्थानको जा रहे हैं' ॥ ४९ ॥

वैशम्पायन उवाच
स देवानभ्यनुज्ञाय विविक्ते त्रिदिवालये।
जगाम विष्णुः स्वं देशं क्षीरोदस्योत्तरां दिशम् ॥ ५० ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! देवलोकके उस पुण्यप्रदेशमें बैठे हुए भगवान् विष्णु देवताओंको जाने-की आज्ञा देकर क्षीरसागरसे उत्तर दिशामें स्थित अपने निवासस्थानको चले गये ॥ ५० ॥
तत्र वै पार्वती नाम गुहा मेरोः सुदुर्गमा।
त्रिभिस्तस्यैव विक्रान्तैर्नित्यं पर्वसु पूजिता ॥ ५१ ॥
वहाँ मेरुपर्वतकी पार्वती नामसे प्रसिद्ध एक अत्यन्त दुर्गम गुफा है, जो भगवान् विष्णुके तीन चरणचिह्नोंसे उपलक्षित होती है; इसलिये पर्वके अवसरोंपर सदा उसकी पूजा की जाती है ॥ ५१ ॥
पुराणं तत्र विन्यस्य देहं हरिरुदारधीः।
आत्मानं योजयामास वसुदेवगृहे प्रभुः ॥ ५२ ॥
उदारबुद्धिवाले भगवान् श्रीहरिने अपने पुरातन विग्रह-को वहीं स्थापित करके अपने-आपको वसुदेवजीके घरमें अवतीर्ण होनेके कार्यमें लगा दिया ॥ ५२ ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि पितामहवाक्ये पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५५ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें ब्रह्माजीका वचनविषयक पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५५ ॥

हरिवंशपर्व सम्पूर्ण।

श्रीपरमात्मने नमः

श्रीमद्महाभारतम्


तस्य खिलभागो हरिवंशः

( तत्र विष्णुपर्व )

प्रथमोऽध्यायः

मङ्गलाचरण, नारदजीका मथुरामें आकर कंसको आनेवाले भयकी सूचना देना और कंसका अपने सेवकोंके सामने बढ़-चढ़कर बातें बनाना

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥

बदरिकाश्रमनिवासी प्रसिद्ध ऋषि श्रीनारायण ( अथवा अन्तर्यामी नारायण ), नर ( नारायणसखा अर्जुन अथवा आदि जीव हिरण्यगर्भ ) तथा नरोत्तम ( इन हिरण्यगर्भ एवं अन्तर्यामीसे भी श्रेष्ठ शुद्ध सच्चिदानन्दघन पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण) को और ( इन नर-नारायण तथा नरोत्तमके तत्त्वको प्रकट करनेवाली ) देवी सरस्वतीको एवं ( देवी सरस्वतीने संसारपर अनुग्रह करनेके लिये जिनके शरीरमें प्रवेश किया है, उन ) व्यासजीको प्रणाम करके अविद्यारूपी अज्ञानान्धकारको जीतनेवाले इतिहास-पुराण आदि ग्रन्थोंका पाठ आरम्भ करे ॥

वैशम्पायन उवाच
ज्ञात्वा विष्णुं क्षितिगतं भागांश्च त्रिदिवौकसाम्।
विनाशशंसी कंसस्य नारदो मथुरां ययौ ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! भगवान् विष्णु और देवताओंके अंश भूतलपर अवतीर्ण हो चुके हैं, यह जानकर देवर्षि नारद कंसको उसके निकटवर्ती विनाशकी सूचना देनेके लिये मथुराको गये ॥ १ ॥

त्रिविष्टपादपातितो मथुरोपवने स्थितः।
प्रेषयामास कंसस्य दूतं स मुनिपुङ्गवः ॥ २ ॥

स्वर्गसे उतरकर वे मथुराके उपवनमें खड़े हो गये और वहींसे उन मुनिश्रेष्ठने कंसके पास एक दूत भेजा ॥ २ ॥

स दूतः कथयामास मुनेरागमनं वने ।
स नारदस्यागमनं श्रुत्वा त्वरितविक्रमः ॥ ३ ॥
निर्जगामासुरः कंसः स्वपुर्याः पद्मलोचनः।

उस दूतने कंसके पास जाकर बताया कि नगरके उपवनमें देवर्षि नारद पधारे हैं। नारदजीके आगमनका समाचार सुनकर कमलोचन असुर कंस जल्दी-जल्दी पैर बढ़ाता हुआ अपनी पुरीसे बाहर निकला ॥ ३ ॥

स ददर्शातिथिं श्लाघ्यं देवर्षि वीतकल्मषम् ॥ ४ ॥
तेजसा ज्वलनाकारं वपुषा सूर्यवर्चसम् ।
सोऽभिवाद्यार्चये तस्मै पूजां चक्रे यथाविधि ॥ ५ ॥

उपवनमें पहुँचकर उसने वहाँ अपने स्पृहणीय अतिथि देवर्षि नारदका दर्शन किया, जो पाप-तापसे रहित थे। उनका तेज प्रज्वलित अग्निके समान जान पड़ता था, वे शरीरसे सूर्यके समान दीप्तिमान् दिखायी देते थे। कंसने देवर्षिको प्रणाम करके उनका विधिपूर्वक पूजन किया ॥ ४-५ ॥

आसनं चाग्निवर्णाभं विसृज्योपजहार सः।
निषसादासने तस्मिन् स वै शक्रसखो मुनिः ॥ ६ ॥

उसने उनके लिये अग्निके समान कान्तिमान् सुवर्णमय आसन देकर क्रमशः अर्घ्य, पाद्य आदि उपहार प्रस्तुत किये। तत्पश्चात् इन्द्रके सखा नारद मुनि उस आसनपर बैठे ॥ ६ ॥

उवाच चोग्रसेनस्य सुतं परमकोपनम् ।
पूजितोऽहं त्वया वीर विधिदृष्टेन कर्मणा ॥ ७ ॥
गते त्वेवं मम वचः श्रूयतां गृह्यतां त्वया ।

बैठनेके बाद वे परम क्रोधी उग्रसेनपुत्र कंससे बोले— 'वीर ! तुमने मेरा शास्त्रीय विधिसे पूजन किया है, इसलिये मैं तुम्हें एक आवश्यक बात बताता हूँ, तुम मेरे उस वचनको सुनो और ग्रहण करो ॥ ७ ॥

अनुसृत्य दिवोलोकानहं ब्रह्मपुरोगमान् ॥ ८ ॥
गतः सूर्यसखं तात विपुलं मेरुपर्वतम् ।
सनन्दनवनं चैव दृष्ट्वा चैत्ररथं वनम् ॥ ९ ॥

२१४ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे


आप्लुतं सर्वतीर्थेषु सरित्सु सह दैवतैः ।
दिव्या त्रिधारा दृष्टा मे पुण्या त्रिपथगा नदी ॥ १० ॥
स्मरणादेव सर्वेषामंहसां या विभेदिनी ।
'तात ! मैं ब्रह्मलोक आदि सभी स्वर्गीय लोकोंमें घूमता हुआ उस विशाल मेरुपर्वतपर जा पहुँचा, जो सूर्यदेवका सखा है। फिर नन्दनवन और चैत्ररथवनका दर्शन करके मैंने देवताओंके साथ सम्पूर्ण तीर्थों और सरिताओंमें स्नान किया। उसके बाद तीन धाराओंमें बँटी हुई दिव्य त्रिपथगा नदी पुण्यसलिला गङ्गाका दर्शन किया, जो स्मरणमात्रसे ही समस्त पापोंका विनाश कर देनेवाली हैं ॥ ८–१०॥'

उपस्पृष्टं च तीर्थेषु दिव्येषु च यथाक्रमम् ॥ ११ ॥
दृष्टं मे ब्रह्मसदनं ब्रह्मर्षिगणसेवितम् ।
देवगन्धर्वनिर्घोषैरप्सरोभिश्च नादितम् ॥ १२ ॥
'तत्पश्चात् क्रमशः दिव्य तीर्थोंमें स्नान एवं आचमन करके मैंने ब्रह्मर्षियोंसे सेवित ब्रह्माजीके भवनका दर्शन किया, जो देवगन्धर्वोंके वाद्यघोषमे गूँजता और अप्सराओंके मधुर गीतों-से निनादित होता रहता है ॥ ११-१२ ॥'

सोऽहं कदाचिद् देवानां समाजे मेरुमूर्धनि ।
संगृह्य वीणां संसकामगच्छं ब्रह्मणः सभाम् ॥ १३ ॥
'वहाँसे होकर मैं किसी समय हाथमें वीणा लिये मेरुके शिखरपर विराजमान ब्रह्माजीकी सभामें गया, जहाँ देवताओं-का समाज जुटा हुआ था ॥ १३ ॥'

सोऽहं तत्र सितोष्णीषान् नानारत्नविभूषितान् ।
दिव्यासनगतान् देवानपश्यं सपितामहान् ॥ १४ ॥
'वहाँ देखा कि श्वेत पगड़ी धारण किये नाना रत्नोंसे विभूषित ब्रह्मा आदि सभी देवता दिव्य सिंहासनपर बैठे हुए हैं ॥ १४ ॥'

तत्र मन्त्रयतामेवं देवतानां मया श्रुतः ।
भवतः सानुगस्यैव वधोपायः सुदारुणः ॥ १५ ॥
'उस सभामें देवताओंकी जो गुप्त मन्त्रणा हो रही थी, उसमें मैंने सुना कि सेवकोंसहित तुम्हारे वधके अत्यन्त दारुण उपायका ही विचार हो रहा है ॥ १५ ॥'

तत्रैषा देवकी या ते मथुरायां लघुस्वसा ।
योऽस्यां गर्भोऽष्टमः कंस स ते मृत्युर्भविष्यति ॥ १६ ॥
'कंस ! वहाँ जो कुछ मैंने सुना है, उसके अनुसार मथुरामें जो तुम्हारी यह छोटी बहिन देवकी है, इसका आठवाँ गर्भ तुम्हारे लिये मृत्युरूप होगा ॥ १६ ॥'

देवानां स तु सर्वस्वं त्रिदिवस्य गतिश्च सः ।
परं रहस्यं देवानां स ते मृत्युर्भविष्यति ॥ १७ ॥
'वह गर्भ देवताओंका सर्वस्व तथा स्वर्गलोकका आश्रय होगा। वह देवताओंका परम गोपनीय रहस्य है। वही तुम्हारी मृत्युका कारण होगा ॥ १७ ॥'

परश्चैवापरस्तेषां स्वयम्भूश्च दिवौकसाम् ।
ततस्ते तन्महद्भूतं दिव्यं च कथयाम्यहम् ॥ १८ ॥
'वही देवताओंका पर और अपर (मोक्ष और स्वर्ग) है। वही उन स्वर्गवासियोंका स्वयम्भू ब्रह्मा है। इसीलिये मैं तुमसे कहता हूँ कि वह महान् दिव्य भूत है ॥ १८ ॥'

श्लाघ्यश्च स हि ते मृत्युर्भूतपूर्वश्च तं स्मर ।
यत्नश्च क्रियतां कंस देवक्या गर्भकृन्तने ॥ १९ ॥
'कंस ! वही पहले भी तुम्हारी मृत्यु रहा है और इस समय भी तुम्हारे लिये प्रशंसनीय मृत्युरूप होगा, अतः तुम देवकीके गर्भका उच्छेद करनेके लिये प्रयत्न करो ॥ १९ ॥'

एषा मे त्वयता प्रीतिर्यदर्थं चाहमागतः ।
भुज्यतां सर्वकामार्थाः स्वस्ति तेऽस्तु व्रजाम्यहम् ॥ २० ॥
'यह मेरा तुम्हारे ऊपर प्रेम है, जिसके लिये मैं यहाँतक आया हूँ। अच्छा, अब तुम सम्पूर्ण मनोवाञ्छित भोगोंका उपभोग करो, तुम्हारा कल्याण हो, मैं जाता हूँ' ॥ २० ॥

इत्युक्त्वा नारदे याते तस्य वाक्यं विचिन्तयन् ।
जहासोच्चैस्ततः कंसः प्रकाशदशनश्चिरम् ॥ २१ ॥
ऐसा कहकर जब नारदजी चले गये, तब कंस बहुत देरतक उनकी बातों पर विचार करता रहा; फिर वह दाँत दिखाकर जोर-जोरसे अट्टहास करने लगा ॥ २१ ॥

प्रोवाच सस्मितं चैव भृत्यानामग्रतः स्थितः ।
हास्यः खलु स सर्वेषु नारदो न विशारदः ॥ २२ ॥
और अपने सेवकोंके सामने खड़ा हो मुसकराकर बोला— 'यह नारद मुनि सर्वसाधारणमें उपहासके ही पात्र हैं, विशेष चतुर नहीं हैं ॥ २२ ॥'

नाहं भीषयितुं शक्यो देवैरपि सवासवैः ।
आसनस्थः शयानो वा प्रमत्तो मत्त एव च ॥ २३ ॥
'मैं बैठा अथवा सोया रहूँ, असावधान या मतवाला होऊँ, किसी भी दशामें इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता भी मुझे डरा नहीं सकते ॥ २३ ॥'

योऽहं दोर्भ्यामुदाराभ्यां क्षोभयेयं धरामिमाम् ।
कोऽस्ति मां मानुषे लोके यः क्षोभयितुमुत्सहेत् ॥ २४ ॥
'मैं अपनी दोनों विशाल भुजाओंसे इस धरातलको क्षुब्ध कर सकता हूँ। मनुष्यलोकमे कौन ऐसा पुरुष है, जो मुझे क्षोभमें डालनेका साहस कर सके ॥ २४ ॥'

अद्यप्रभृति देवानामेष देवानुवर्तिनाम् ।
नृपक्षिपशुसंघानां करोमि कदनं महत् ॥ २५ ॥
'यह लो, आजसे मैं देवताओं तथा उनका अनुसरण

[ विष्णुपर्व १ ] द्वितीयोऽध्यायः २१५

करनेवाले मनुष्यों, पक्षियों और पशुसमूहोंका महान् संहार करूँगा ॥ २५ ॥

आज्ञाप्यतां हयः केशी प्रलम्बो धेनुकस्तथा ।
अरिष्टो वृषभश्चैव पूतना कालियस्तथा ॥ २६ ॥
अटध्वं पृथिवीं कृत्स्नां यथेष्टं कामरूपिणः ।
प्रहरध्वं च सर्वेषु येऽस्माकं पक्षदूषकाः ॥ २७ ॥

'अश्वरूपधारी केशी, प्रलम्ब, धेनुक, वृषभरूपधारी अरिष्ट, पूतना और कालियनागको आज्ञा दे दो कि तुम सब लोग इच्छानुसार रूप धारण करके सारी पृथ्वीपर अपनी मौजसे घूमो और जो हमारे पक्ष की निन्दा करनेवाले हों, उन सबपर प्रहार करो ॥ २६-२७ ॥

गर्भस्थानामपि गतिर्विज्ञेया चैव देहिनाम् ।
नारदेन हि गर्भेभ्यो भयं नः समुदाहृतम् ॥ २८ ॥

'जो प्राणी गर्भमें निवास करते हों, उनका भी पता लगा लेना चाहिये; क्योंकि नारदजीने मेरे लिये गर्भोंसे ही भय बताया है ॥ २८ ॥

भवन्तो हि यथाकामं मोदन्तां विगतज्वराः ।
मां च वो नाथमाश्रित्य नास्ति देवकृतं भयम् ॥ २९ ॥

'तुमलोग निश्चिन्त होकर इच्छानुसार आनन्द भोगो। मैं तुम्हारा स्वामी और संरक्षक हूँ। मेरा आश्रय लेकर तुम्हें देवताओंकी ओरसे कोई भय नहीं है ॥ २९ ॥

स तु केलिकिलो विप्रो भेदशीलश्च नारदः ।
सुश्लिष्टानपि लोकेऽस्मिन् भेदयँल्लभते रतिम् ॥ ३० ॥

'नारद बाबा तो युद्ध करानेका ही खेल खेलते हैं। लोगोंमें फूट डाल देना उनका स्वभाव है। इस संसारमें जो लोग बड़े स्नेहसे भलीभाँति मिल-जुलकर रहते हैं, उनमें भी फूट डालनेमें इन्हें आनन्द आता है ॥ ३० ॥

कण्डूयमानः सततं लोकानटति चञ्चलः ।
घटमानो नरेन्द्राणां तन्त्रैर्वैराणि चैव हि ॥ ३१ ॥

'ये बड़े चञ्चल हैं और लोगोंमें सदा संघर्ष पैदा करते हुए घूमते रहते हैं। विभिन्न उपायोंद्वारा राजाओंमें वैर बढ़ा देनेके लिये ये सर्वदा सचेष्ट रहते हैं' ॥ ३१ ॥

एवं स विलपन्नेव वाङ्मात्रेणैव केवलम् ।
विवेश कंसो भवनं दह्यमानेन चेतसा ॥ ३२ ॥

इस प्रकार केवल वाणीमात्रसे प्रलाप करता हुआ कंस अपने भवनमें चला गया। उस समय उसका चित्त चिन्ताकी आगमें जल रहा था ॥ ३२ ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि नारदागमने कंसवाक्ये प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें नारदजीका आगमन तथा कंसका वाक्यविषयक पहला अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ॥


द्वितीयोऽध्यायः

कंसद्वारा देवकीके गर्भके विनाशका प्रयत्न, भगवान् विष्णुका पाताललोकमें स्थित 'षड्गर्भ' नामक दैत्योंके जीवोंका आकर्षण करके उन्हें निद्रा देवीके हाथमें देना और देवकीके गर्भमें क्रमशः स्थापित करनेका आदेश देकर अन्य कर्तव्य बताना तथा कार्यसाधनके अनन्तर बढ़नेवाली उस देवीकी महिमाका उल्लेख

वैशम्पायन उवाच
सोऽज्ञापयत संरब्धः सचिवानात्मनो हि तान् ।
यत्ता भवत सर्वे वै देवक्या गर्भकृन्तने ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! क्रोधमें भरे हुए कंसने अपने हितैषी मन्त्रियोंको आज्ञा दी कि तुम सब लोग देवकीके गर्भका उच्छेद करनेके लिये उद्यत हो जाओ ॥ १ ॥

प्रथमादेव हन्तव्या गर्भास्ते सप्त एव हि ।
मूलादेव तु हन्तव्यः सोऽनर्थो यत्र संशयः ॥ २ ॥

पहले गर्भसे ही आरम्भ करके वे सातों गर्भ नष्ट कर देने चाहिये। जहाँ संशय हो, उस अनर्थका मूलसे ही उच्छेद कर देना आवश्यक है ॥ २ ॥

देवकी च गृहे गुप्ता प्रच्छन्नैरभिरक्षिता ।
स्वैरं चरतु विश्रब्धा गर्भकाले तु रक्ष्यत्ताम् ॥ ३ ॥

देवकी अपने भवनमें गुप्त रक्षकोंद्वारा सुरक्षित रहकर अपनी इच्छाके अनुसार निर्भय विचरे; परंतु जब वह गर्भवती हो जाय, उस समय उसे विशेष नियन्त्रणमें रखना चाहिये ॥ ३ ॥

मासान् वै पुष्पमासादीन् गणयन्तु मम स्त्रियः ।
परिणामे तु गर्भस्य शेषं ज्ञास्यामहे वयम् ॥ ४ ॥

मेरी स्त्रियाँ रजस्वलावस्थासे ही आरम्भ करके उसके गर्भ-धारणके मासोंकी गणना करती रहें। जब गर्भके परिपक्व होकर प्रकट होनेका समय आ जाय, तबके जो शेष कृत्य है, उसे हमलोग स्वयं ही समझ लेंगे ॥ ४ ॥

वसुदेवस्तु संरक्ष्यः स्त्रीसनाथासु भूमिषु ।
अप्रमत्तैर्मम हितै रात्रावहनि चैव हि ।

२१६ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


स्त्रीभिर्वर्षवरैश्चैव वक्तव्यं न तु कारणम् ॥ ५ ॥

मेरे हितैषी सेवक रात-दिन सावधान रहकर स्त्रियोंसे सनाथ अन्तःपुरमें वसुदेवजीकी भलीभाँति रक्षा (देखभाल) करें। स्त्रियाँ और हिंजड़े भी उनपर कड़ी दृष्टि रखें, परंतु इसका कारण उन्हें नहीं बताना चाहिये ॥ ५ ॥

एष मानुष्यको यत्नो मानुषैरेव साध्यते ।
श्रूयतां येन दैवं हि मद्graph/मद्विधैः प्रतिहन्यते ॥ ६ ॥

मनुष्योंद्वारा किया जानेवाला यह उपाय उन्हींसे साध्य हो सकता है, परंतु मेरे-जैसे शक्तिशाली पुरुष जिस उपायसे दैवको भी प्रतिहत (निष्फल) कर देते हैं, उसे सुनो ॥ ६॥

मन्त्रग्रामैः सुविहितैरौषधैश्च सुयोजितैः ।
यत्नेन चानुकूलेन दैवमप्यनुल pass/दैवमप्यनुलोम्यते ॥ ७ ॥

भलीभाँति किये हुए मन्त्रसमूहोंके जप, अच्छी तरह उपयोगमें लाये हुए औषधोंके सेवन तथा अनुकूल प्रयत्नसे दैवको भी अपने अनुकूल बना लिया जाता है ॥ ७ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवं स यत्नवान् कंसो देवकीगर्भकृन्तने ।
भयेन मन्त्रयामास श्रुतार्थो नारदात् स वै ॥ ८ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन् ! इस प्रकार कंस देवकीके गर्भका विनाश करनेके यत्नमें लग गया। नारदजीसे सारी बातें वह सुन चुका था, इसलिये भयसे प्रेरित होकर अपनी रक्षाके लिये मन्त्रियोंके साथ मन्त्रणा करने लगा ॥ ८ ॥

एवं श्रुत्वा प्रयत्नं वै कंसस्यारिष्टसंज्ञितम् ।
अन्तर्धानं गतो विष्णुश्चिन्तयामास वीर्यवान् ॥ ९ ॥

कंसका सारा प्रयत्न जगत्‌के लिये उत्पातरूप ही था, उसे सुनकर अदृश्य भावसे वहाँ स्थित हुए परम पराक्रमी भगवान् विष्णुने इस प्रकार विचार किया—॥ ९ ॥

सप्तेमान् देवकीगर्भान् भोजपुत्रो वधिष्यति ।
अष्टमे च मया गर्भे कार्यमाधानमात्मनः ॥ १० ॥

'भोजकुमार कंस देवकीके इन सात गर्भोको मार डालेगा। अथवा आठवें गर्भमें मुझे अपने स्वरूपका आधान करना चाहिये' ॥ १० ॥

तस्य चिन्तयतस्त्वेवं पातालमगमन्मनः ।
यत्र ते गर्भशयनाः षड्गर्भा नाम दानवाः ॥ ११ ॥

इस प्रकार सोचते हुए भगवान्‌का मन सहसा पातालकी ओर गया, जहाँ वे गर्भमें शयन करनेवाले षडगर्भ नामक दानव विद्यमान थे ॥ ११ ॥

विक्रान्तवपुषो दीप्तास्तेऽमृतप्राशनोपमाः ।
अमरप्रतिमा युद्धे पुत्रा वै कालनेमिनः ॥ १२ ॥

उनके शरीर बल-विक्रमसे सम्पन्न थे। वे अमृतभोजी देवताओंके समान तेजस्वी थे और युद्धमें देवताओंके तुल्य पराक्रम प्रकट करते थे। वे सब-के-सब कालनेमि नामक दैत्यके पुत्र थे ॥ १२ ॥

ते ताततातं संत्यज्य हिरण्यकशिपुं पुरा ।
उपासांचक्रिरे दैत्याः पुरा लोकपितामहम् ॥ १३ ॥

पहलेकी बात है, वे दैत्य अपने पिताके भी पिता हिरण्यकशिपुको छोड़कर लोकपितामह ब्रह्माजीकी उपासना करने लगे ॥ १३ ॥

तप्यमानास्तपस्तीव्रं जटामण्डलधारिणः ।
तेषां प्रीतोऽभवद् ब्रह्मा षड्गर्भाणां वरं ददौ ॥ १४ ॥

सिरपर जटाका भार धारण किये वे तीव्र तपस्यामें लग गये। तब ब्रह्माजी उन 'षडगर्भ' नामक दैत्योंपर प्रसन्न हो गये और उन्हें वर देने लगे ॥ १४ ॥

ब्रह्मोवाच

भो भो दानवशार्दूलास्तपसाहं सुतोषिताः ।
ब्रूत वो यस्य यः कामस्तस्य तं तं करोम्यहम् ॥ १५ ॥

ब्रह्माजीने कहा—दानवकुलमें सिंहके समान पराक्रमी वीरो ! मैं तुम्हारी तपस्यासे बहुत संतुष्ट हूँ। तुममेंसे जिसे जिस वस्तुकी इच्छा हो, उसे बताओ; मैं वह सब पूर्ण करूँगा ॥

ते तु सर्वे समानार्था दैत्या ब्रह्माणमब्रुवन् ।
यदि नो भगवान् प्रीतो दीयतां नो वरो वरः ॥ १६ ॥

उन सब दैत्योंका प्रयोजन या मनोरथ एक-सा ही था। वे ब्रह्माजीसे बोले—'भगवन् ! यदि आप हमपर प्रसन्न हों तो हमें यह श्रेष्ठ वर दीजिये ॥ १६ ॥

अवध्याः स्याम भगवन् दैवतैः समहोरगैः ।
शापप्रहरणैश्चैव स्वस्ति नोऽस्तु महर्षिभिः ॥ १७ ॥

'भगवन् ! हम देवताओं तथा बड़े-बड़े नागोंसे भी अवध्य हों। जो शापद्वारा प्रहार करनेवाले हैं, उन महर्षियोंसे भी हमारा सदा कल्याण ही हो ॥ १७ ॥

यक्षगन्धर्वपतिभिः सिद्धचारणमानवैः ।
मा भूद् वधो नो भगवन् ददासि यदि नो वरम् ॥ १८ ॥

'भगवन् ! यदि आप हमें वर दे रहे हैं, तो यक्ष, गन्धर्व-पति, सिद्ध, चारण तथा मनुष्योंद्वारा हमारा वध न हो' ॥

तानुवाच ततो ब्रह्मा सुप्रीतेनान्तरात्मना ।
भवद्भिर्यदिदं प्रोक्तं सर्वमेतद् भविष्यति ॥ १९ ॥

तब ब्रह्माजीने उनके प्रति अत्यन्त प्रसन्नचित्तसे कहा—'तुमलोगोंने यह जो कुछ कहा है, वह सब पूरा होगा' ॥१९॥

षड्गर्भाणां वरं दत्त्वा स्वयम्भूस्त्रिदिवं गतः ।
ततो हिरण्यकशिपुः सरोषो वाक्यमब्रवीत् ॥ २० ॥

[विष्णुपर्व ] द्वितीयोऽध्यायः २१७


‘उन ‘षड्गर्भ’ नामवाले दैत्योंको इस प्रकार वर देकर स्वयम्भू ब्रह्माजी ब्रह्मलोकको चले गये। उधर हिरण्यकशिपुने रोषमें भरकर उनसे कहा—॥ २० ॥

मामुत्सृज्य वरो यस्माद् वृतो वः पद्मसंभवात्।
तस्माद् वस्त्याजितः स्नेहः शत्रुभूतांस्त्यजाम्यहम् ॥ २१ ॥

‘अरे ! तुमने मुझे छोड़कर कमलयोनि ब्रह्माजीसे वर ग्रहण किया है; अतः अपने प्रति मेरे स्नेहका त्याग करा दिया। अब तुमलोग मेरे शत्रुभूत हो, इसलिये तुम्हें त्याग देता हूँ ॥ २१ ॥

षड्गर्भा इति योऽयं वः शब्दः पित्राभिवर्धितः ।
स एव वो गर्भगतान पिता सर्वान् वधिष्यति ॥ २२ ॥

‘जिस पिताने तुम्हें ‘षड्गर्भ’ नाम दिया और पाल-पोस-कर बड़ा किया है, वही गर्भमें स्थित होनेपर तुम सब लोगोंका वध कर डालेगा ॥ २२ ॥

षडेव देवकीगर्भे षड्गर्भा वै महासुराः।
भविष्यथ ततः कंसो गर्भस्थान् वो वधिष्यति ॥ २३ ॥

‘तुम छहों ‘षड्गर्भ’ नामक महान् असुर देवकीके गर्भमें स्थित होओगे। तब कंस (जो तुम्हारे पिता कालनेमिका ही स्वरूप होगा) तुम गर्भस्थ बालकोंका वध कर डालेगा’ ॥

वैशम्पायन उवाच
जगामाथ ततो विष्णुः पातालँ यत्र तेऽसुराः ।
षड्गर्भाः संयताः सन्ति जले गर्भगृहेशयाः ॥ २४ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! उनकी याद आते ही भगवान् विष्णु पाताललोकमें गये, जहाँ वे ‘षड्गर्भ’ नामक असुर संयमनिष्ठ होकर जलके भीतर गर्भगृहमें शयन करते थे ॥

संददर्श जले सुप्तान् षड्गर्भान् गर्भसंस्थितान् ।
निद्रया कालरूपिण्या सर्वानन्तर्हितान् स वै ॥ २५ ॥

उन्होंने देखा, सब ‘षड्गर्भ’ नामक दैत्य कालरूपिणी निद्रासे तिरोहित होकर जलके भीतर गर्भगृहमें सो रहे हैं ॥

स्वप्नरूपेण तेषां वै विष्णुर्देहानथाविशत् ।
प्राणेश्वरांश्च निष्कृष्य निद्रायै प्रददौ तदा ॥ २६ ॥

तब भगवान् विष्णु स्वप्नरूपसे उनके शरीरोंमें प्रविष्ट हुए और उनके जीवोंको खींचकर उन्होंने निद्राकी अधिष्ठात्री देवीके हाथमें दे दिया ॥ २६ ॥

तां चोवाच ततो निद्रां विष्णुः सत्यपराक्रमः ।
गच्छ निद्रे मयोत्सृष्टा देवकीभवनान्तिकम् ॥ २७ ॥
इमान् प्राणेश्वरान् गृह्य षड्गर्भान् दानवोत्तमान् ।
षड्गर्भान् देवकीगर्भे योजयस्व यथाक्रमम् ॥ २८ ॥

तत्पश्चात् सत्यपराक्रमी भगवान् विष्णु उस निद्रासे बोले—‘निद्रे ! तुम मेरी प्रेरणासे इन जीवोंको लेकर देवकीके घरके निकट जाओ। ये सब-के-सब ‘षड्गर्भ’ नामवाले श्रेष्ठ दानव हैं। इन सब षड्गर्भोको क्रमशः देवकीके गर्भमें स्थापित करती रहो ॥ २७-२८ ॥

जातेष्वेतेषु गर्भेषु नीतेषु च यमक्षयम् ।
कंसस्य विफले यत्ने देवक्याः सफले श्रमे ॥ २९ ॥
प्रसादं ते करिष्यामि मत्प्रभावसमं भुवि ।
येन सर्वस्य लोकस्य देवि देवी भविष्यसि ॥ ३० ॥

‘जब ये गर्भ जन्म लेकर कंसद्वारा यमलोक पहुँचा दिये जायेंगे, जब कंसका प्रयत्न निष्फल और देवकीका परिश्रम सफल हो जायगा, तब मैं तुमपर विशेष कृपा करूँगा। देवि ! उस समयसे भूतलपर तुम्हारा प्रभाव मेरे प्रभावके समान ही हो जायगा, जिससे तुम सम्पूर्ण जगत्की आराध्य देवी बन जाओगी ॥ २९-३० ॥

सप्तमो देवकीगर्भो योऽशः सौम्यो ममाग्रजः ।
स संक्रामयितव्यस्ते सप्तमे मासि रोहिणीम् ॥ ३१ ॥

‘देवकीका जो सातवाँ गर्भ होगा, वह मेरा ही सौम्य अंश होगा और मुझसे पहले अवतीर्ण होनेके कारण मेरा बड़ा भाई होगा। वह गर्भ जब सात महीनेका हो जाय, तब उस सातवें मासमें ही तुम उसे खींचकर रोहिणीदेवीके गर्भमें स्थापित कर देना ॥ ३१ ॥

संकर्षणात्तु गर्भस्य स तु संकर्षणो युवा ।
भविष्यत्यग्रजो भ्राता मम शीतांशुदर्शनः ॥ ३२ ॥

‘गर्भका संकर्षण होनेसे वह तरुण वीर ‘संकर्षण’ नामसे प्रसिद्ध होगा, चन्द्रमाके समान गौर वर्णसे सुशोभित दिखायी देगा तथा वह मेरा बड़ा भाई होगा ॥ ३२ ॥

पतितो देवकीगर्भः सप्तमोऽयं भयादिति ।
अष्टमे मयि गर्भस्थे कंसो यत्नं करिष्यति ॥ ३३ ॥

‘उस समय लोग यही कहेंगे कि ‘देवकीका सातवाँ गर्भ कंसके भयसे गिर गया।’¹ आठवें शिशुके रूपमें जब मैं गर्भमें आऊँगा, तब कंस मुझे भी मारनेका प्रयास करेगा ॥ ३३ ॥

या तु सा नन्दगोपस्य दयिता भुवि विश्रुता।
यशोदा नाम भद्रं ते भार्या गोपकुलोद्वहा ॥ ३४ ॥

‘देवि ! तुम्हारा भला हो, इस समय भूतलपर ‘यशोदा’ नामसे विख्यात जो नन्दगोपकी प्यारी पत्नी हैं, वे गोपकुलकी स्वामिनी हैं ॥ ३४ ॥

तस्यास्त्वं नवमो गर्भः कुलेऽस्माकं भविष्यसि ।
नवम्यामेव संजाता कृष्णपक्षस्य वै तिथौ ॥ ३५ ॥

‘तुम उन्हींके नवमें गर्भके रूपमें हमारे कुलमें उत्पन्न


¹ १. यह नवम संख्या देवकीके आठ पुत्रोंकी अपेक्षासे कही गयी है। जान पड़ता है, श्रीकृष्णके बाद कुछ कालके लिये योगनिद्राका भी देवकीके उदरमें प्रवेश हुआ था।

२१८श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

होओगी। भाद्रपद कृष्णपक्षकी नवमी तिथिको ही तुम्हारा जन्म होगा॥ ३५॥

अहं त्वभिजितो योगे निशायां यौवने स्थिते।
अर्धरात्रे करिष्यामि गर्भमोक्षं यथासुखम्॥ ३६॥

'जब रात्रि युवावस्थामें स्थित होगी, उस आधी रातके समय अभिजित् मुहूर्तके योगमें मैं सुखपूर्वक गर्भवासका त्याग करूँगा (अर्थात् माताके उदरसे बाहर निकल आऊँगा)॥

अष्टमस्य तु मासस्य जातावावां ततः समम्।
प्राप्स्यावो गर्भव्यत्यासं प्राप्ते कंसस्य नाशने॥ ३७॥

'हम दोनों भाई-बहिन गर्भके आठवें महीनेमें जन्म लेंगे। फिर कंसके भावी विनाशका कारण प्राप्त होनेपर हम दोनों साथ ही गर्भव्यत्यासको प्राप्त होंगे (बदल दिये जायेंगे)॥ ३७॥

अहं यशोदां यास्यामि त्वं देवि भज देवकीम्।
आवयोर्गर्भसंयोगे कंसो गच्छतु मूढताम्॥ ३८॥

'देवि ! मैं तो यशोदा माताके पास पहुँच जाऊँगा और तुम देवकीका आश्रय लेना। हम दोनोंके परिवर्तित गर्भसंयोग-के विषयमें कंस मूढभावको ही प्राप्त हो (वह इस अदला बदली-के रहस्यसे अनभिज्ञ ही रहे)॥ ३८॥

ततस्त्वां गृह्य चरणे शिलायां पातयिष्यति।
निरस्यमाना गगने स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्॥ ३९॥

'तदनन्तर कंस तुम्हारे पैर पकड़कर तुम्हें शिलापर पटक देगा, परंतु तुम उसके हाथसे निकलकर आकाशमे शाश्वत स्थान प्राप्त कर लोगी॥ ३९॥

मच्छवीसदृशी कृष्णा संकर्षणसमानना।
बिभ्रती विपुलौ बाहू मम बाहूपमौ दिवि॥ ४०॥

'तुम्हारी अङ्ग-कान्ति मेरी ही छविके समान श्याम होगी, परंतु मुख भैया संकर्षणके समान गौर होगा। तुम आकाश-में मेरी ही भुजाओंके समान दोनों ओर दो-दो हृष्ट-पुष्ट विशाल बाहें धारण करोगी॥ ४०॥

त्रिशिखं शूलमुद्यम्य खड्गं च कनकत्सरुम्।
पात्रीं च पूर्णां मधुना पङ्कजं च सुनिर्मलम्॥ ४१॥

'चार भुजाओंमें तीन शिखाओंसे युक्त शूल (त्रिशूल), सोनेकी मूठ लगी हुई तलवार, मधुसे भरा हुआ पात्र तथा अत्यन्त निर्मल कमल धारण करके सुशोभित होओगी॥४१॥

नीलकौशेयसंवीता पीतेनोत्तरवाससा।
शशिरश्मिप्रकाशेन हारेणोरसि राजता॥ ४२॥

'तुम्हारे श्रीअङ्गमें नीले रंगकी रेशमी साड़ी शोभा पायेगी और तुम रेशमी पीताम्बरकी चादर ओढ़े रहोगी। तुम्हारे वक्षःस्थलमें चन्द्रमाकी किरणोंके समान प्रकाशमान श्वेत हार शोभा दे रहा होगा॥ ४२॥

दिव्यकुण्डलपूर्णाभ्यां श्रवणाभ्यां विभूषिता।
चन्द्रसापत्नभूतेन मुखेन त्वं विराजिता॥ ४३॥

'दिव्य कुण्डलोंसे मण्डित कर्णयुगल तुम्हें विभूषित करेंगे और चन्द्रमाकी भी शोभाको छीन लेनेवाले अपने मनोरम मुखसे तुम अत्यन्त शोभायमान होओगी॥ ४३॥

मुकुटेन विचित्रेण केशवन्धेन शोभिना।
भुजङ्गाभैर्भुजैर्भीमैर्भूषयन्ती दिशो दश॥ ४४॥

'तुम्हारे मस्तकपर विचित्र मुकुट और शोभाशाली केश-बन्ध फबते होंगे। भुजङ्गोंकी-सी आभावाली अपनी भयानक भुजाओंसे तुम दसों दिशाओंकी शोभा बढ़ाओगी॥४४॥

ध्वजेन शिखिबर्हेण उच्छ्रितेन विराजत।
अङ्गेन मयूराणामङ्गेन च भास्वता॥ ४५॥

'मोरपंखसे विभूषित ऊँचे ध्वज तथा मयूरपिच्छके ही बने हुए प्रकाशमान अङ्गद (भुजबंद) से तुम प्रकाशित हओगी॥ ४५॥

कीर्णा भूतगणैर्घोरैर्मन्नियोगानुवर्तिनी।
कौमारं व्रतमास्थाय त्रिदिवं त्वं गमिष्यसि॥ ४६॥

'भयंकर भूतगणोंसे घिरकर मेरी आज्ञाके अधीन रहती हुई तुम सदा कुमारी रहनेका व्रत लेकर स्वर्गलोकको चली जाओगी॥ ४६॥

तत्र त्वां शतदृक्छक्रो मत्प्रदिष्टेन कर्मणा।
अभिषेकेण दिव्येन दैवतैः सह योक्ष्यसे॥ ४७॥

'वहाँ देवताओंसहित सहस्र नेत्रधारी इन्द्र मेरी आज्ञाके अनुसार सब कार्योंका सम्पादन करनेके कारण (अथवा मेरी बतायी हुई पद्धतिके अनुसार) तुम्हारा दिव्य विधिसे अभिषेक करेंगे॥ ४७॥

तत्रैव त्वां भगिन्यर्थे ग्रहीष्यति स वासवः।
कुशिकस्य तु गोत्रेण कौशिकी त्वं भविष्यसि॥ ४८॥

'वहीं इन्द्र अपनी बहिन बनानेके लिये तुम्हें सादर ग्रहण करेंगे। कुशिकके गोत्रसे सम्बन्ध होनेके कारण तुम 'कौशिकी' नामसे प्रसिद्ध होओगी॥ ४८॥

स ते विन्ध्ये नगश्रेष्ठे स्थानं दास्यति शाश्वतम्।
ततः स्थानसहस्रैस्त्वं पृथिवीं शोभयिष्यसि॥ ४९॥

'वे देवराज इन्द्र पर्वतोंमें श्रेष्ठ विन्ध्यगिरिपर तुम्हें शाश्वत स्थान प्रदान करेंगे। तत्पश्चात् तुम अपने सहस्रों स्थानोंद्वारा सारी पृथ्वीको सुशोभित करोगी॥ ४९॥

त्रैलोक्यचारिणी सा त्वं भुवि सत्योपयाचना।
चरिष्यसि महाभागे वरदा कामरूपिणी॥ ५०॥


१. एक ही रातमें अष्टमीके बाद नवमी लग जानेपर देवीका यशोदाके गर्भसे प्राकट्य हुआ था—ऐसा समझना चाहिये।

विष्णुपर्व ]तृतीयोऽध्यायः२१९

'महाभागे ! तुम इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली और वरदायिनी होकर तीनों लोकोंमें विचरोगी तथा तुमसे की हुई उपयाचना (मनौती) अवश्य सफल होगी ॥ ५० ॥

तत्र शुम्भनिशुम्भौ द्वौ दानवौ नगचारिणौ ।
तौ च कृत्वा मनसि मां सानुगौ नाशयिष्यसि ॥ ५१ ॥

'वहाँ मुझे मनमें स्थान देकर तुम विन्ध्यपर्वतपर विचरने-वाले शुम्भ और निशुम्भ नामक दानवोंको उनके अनुयायियों-सहित नष्ट कर डालोगी ॥ ५१ ॥

कृत्वानुयात्रां भूतैस्त्वं सुरामांसबलिप्रिया ।
तिथौ नवम्यां पूजां त्वं प्राप्स्यसे सपशुक्रियाम् ॥ ५२ ॥

'वहाँ तुम्हें मधुयुक्त एवं मांससहित बलि (उपहार-सामग्री) प्रिय होगी और सब लोग बारंबार तुम्हारे तीर्थकी यात्रा करके नवमी तिथिको पशुपूजन कर्मके साथ तुम्हें पूजा देंगे, जिसे तुम प्रसन्नतापूर्वक ग्रहण करोगी ॥ ५२ ॥

ये च त्वां मत्प्रभावज्ञाः प्रणमिष्यन्ति मानवाः ।
तेषां न दुर्लभं किञ्चित् पुत्रतो धनतोऽपि वा ॥ ५३ ॥

'मेरे प्रभावको जाननेवाले जो मनुष्य तुम्हें प्रणाम करेंगे, उनके लिये पुत्र अथवा धन आदि कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं होगी ॥ ५३ ॥

कान्तारेष्ववसन्नानां मग्नानां च महार्णवे ।
दस्युभिर्वा निरुद्धानां त्वं गतिः परमा नृणाम् ॥ ५४ ॥

'कोई दुर्गम स्थानमें फँस जायँ, महासागरमें डूबने लगें अथवा लुटेरों या डाकुओंके द्वारा कैद कर लिये जायँ, उन सभी संकटग्रस्त मनुष्योंके लिये तुम सबसे बड़ा सहारा होओगी ॥ ५४ ॥

त्वां तु स्तोष्यन्ति ये भक्त्या स्तवेनानेन वै शुभे ।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥ ५५ ॥

'शुभे ! जो लोग भक्तिपूर्वक इस (आगे बताये जाने-वाले) स्तोत्रसे तुम्हारी स्तुति करेंगे, उनके लिये न तो मैं अदृश्य रहूँगा और न वे ही मेरी दृष्टिसे ओझल रहेंगे' ॥ ५५ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि भारावतरणे निद्रासंविज्ञाने द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें पृथ्वीके भारको उतारनेके प्रसंगमें भगवान्द्वारा निद्राको कर्तव्यका ज्ञापनविषयक दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥


तृतीयोऽध्यायः

आर्याकी स्तुति

वैशम्पायन उवाच

आर्यास्तवं प्रवक्ष्यामि यथोक्तमृषिभिः पुरा ।
नारायणीं नमस्यामि देवीं त्रिभुवनेश्वरीम् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! पूर्वकालमें जैसा ऋषियोंने बताया है, उसके अनुसार मैं आर्या देवीकी स्तुतिका वर्णन करता हूँ । मैं तीनों लोकोंकी अधीश्वरी नारायणी देवीको नमस्कार करता हूँ ॥ १ ॥

त्वं हि सिद्धिर्धृतिः कीर्तिः श्रीर्विद्या संततिर्मतिः ।
संध्या रात्रिः प्रभा निद्रा कालरात्रिस्तथैव च ॥ २ ॥

देवि ! तुम्हीं सिद्धि, धृति, कीर्ति, श्री, विद्या, संतति, मति, संध्या, रात्रि, प्रभा, निद्रा और कालरात्रि हो ॥ २ ॥

आर्या कात्यायनी देवी कौशिकी ब्रह्मचारिणी ।
जननी सिद्धसेनस्य उग्रचारी महाबला ॥ ३ ॥

आर्या, कात्यायनी, देवी, कौशिकी, ब्रह्मचारिणी, सिद्धसेन (कुमार कार्तिकेय) की जननी, उग्रचारिणी तथा महान् बलसे सम्पन्न हो ॥ ३ ॥

जया च विजया चैव पुष्टिस्तुष्टिः क्षमा दया ।
ज्येष्ठा यमस्य भगिनी नीलकौशेयवासिनी ॥ ४ ॥

जया, विजया, पुष्टि, तुष्टि, क्षमा, दया, यमकी ज्येष्ठ बहिन तथा नीले रंगकी रेशमी साड़ी पहननेवाली हो ॥ ४ ॥

बहुरूपा विरूपा च अनेकविधिचारिणी ।
विरूपाक्षी विशालाक्षी भक्तानां परिरक्षिणी ॥ ५ ॥

तुम्हारे बहुत-से रूप हैं, इसलिये तुम बहुरूपा हो । विकराल रूप धारण करनेके कारण तुम विरूपा हो। अनेक प्रकारकी विधियोंको आचरणमें लानेवाली हो । तीन होनेके कारण तुम्हारे नेत्र विरूप प्रतीत होते हैं, इसलिये तुम विरूपाक्षी हो । तुम्हारे नेत्र बड़े-बड़े हैं, इस कारण विशालाक्षी हो । तुम सदा अपने भक्तोंकी रक्षा करनेवाली हो ॥ ५ ॥

पर्वताग्रेषु घोरेषु नदीषु च गुहासु च ।
वासस्ते च महादेवि वनेषूपवनेषु च ॥ ६ ॥

महादेवि ! पर्वतोंके घोर शिखरोंपर, नदियोंमें, गुफाओंमें तथा वनों और उपवनोंमें भी तुम्हारा निवास है ॥ ६ ॥

शबरैर्बर्बरैश्चैव पुलिन्दैश्च सुपूजिता ।
मयूरपिच्छध्वजिनी लोकान् भ्रमसि सर्वशः ॥ ७ ॥

शबरों, बर्बरों और पुलिन्दोंने भी तुम्हारा अच्छी तरहसे पूजन किया है । तुम मोरपंखकी ध्वजासे सुशोभित हो और क्रमशः सभी लोकोंमें विचरती रहती हो ॥ ७ ॥

२२० श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

कुक्कुटैश्छागलैर्मेषैः सिंहैर्व्याघ्रैः समाकुला । घण्टानिनादबहुला विन्ध्यवासिन्यभिश्रुता ॥ ८ ॥

मुर्गे, बकरे, भेंड़, सिंह तथा व्याघ्र आदि पशु-पक्षी तुम्हें सदा घेरे रहते हैं । तुम्हारे पास घण्टाकी ध्वनि अधिक होती है । तुम 'विन्ध्यवासिनी' नामसे विख्यात हो ॥ ८ ॥

त्रिशूलपट्टिशधरा सूर्यचन्द्रपताकिनी । नवमी कृष्णपक्षस्य शुक्लस्यैकादशी तथा ॥ ९ ॥

देवि ! तुम त्रिशूल और पट्टिश धारण करनेवाली हो । तुम्हारी पताकापर सूर्य और चन्द्रके चिह्न हैं । तुम प्रत्येक मासके कृष्णपक्षकी नवमी और शुक्लपक्षकी एकादशी हो ॥

भगिनी बलदेवस्य रजनी कलहप्रिया । आवासः सर्वभूतानां निष्ठा च परमा गतिः ॥ १० ॥

बलदेवजीकी बहिन हो । रात्रि तुम्हारा स्वरूप है । कलह तुम्हें प्रिय लगता है । तुम सम्पूर्ण भूतोंका आवासस्थान, मृत्यु तथा परम गति हो ॥ १० ॥

नन्दगोपसुता चैव देवानां विजयावहा । चीरवासाः सुवासाश्च रौद्री संध्याचरी निशा ॥ ११ ॥

तुम नन्दगोपकी पुत्री, देवताओंको विजय दिलानेवाली, चीर वस्त्रधारिणी, सुवासिनी, रौद्री, संध्याकालमें विचरने-वाली और रात्रि हो ॥ ११ ॥

प्रकीर्णकेशी मृत्युश्च सुरामांसबलिप्रिया । लक्ष्मीरलक्ष्मीरूपेण दानवानां वधाय च ॥ १२ ॥

तुम्हारे केश बिखरे हुए हैं । तुम्हीं प्राणियोंकी मृत्यु हो । मधुसे युक्त तथा मांससे रहित बलि तुम्हें प्रिय है । तुम्हीं लक्ष्मी हो तथा तुम्हीं दानवोंका वध करनेके लिये अलक्ष्मी बन जाती हो ॥ १२ ॥

सावित्री चापि देवानां माता भूतगणस्य च । कन्यानां ब्रह्मचर्यं त्वं सौभाग्यं प्रमदासु च ॥ १३ ॥

तुम्हीं सावित्री, देवमाता अदिति तथा समस्त भूतोंकी जननी हो । कन्याओंका ब्रह्मचर्य तुम्हीं हो और विवाहिता युवतियोंका सौभाग्य भी तुम्हीं हो ॥ १३ ॥

अन्तर्वेदी च यज्ञानामृत्विजां चैव दक्षिणा । कर्षकाणां च सीतेति भूतानां धरणीति च ॥ १४ ॥

तुम्हीं यज्ञोंकी अन्तर्वेदी तथा ऋत्विजोंकी दक्षिणा हो । किसानोंकी सीता (हल जोतनेसे उभरी हुई रेखा) तथा समस्त प्राणियोंको धारण करनेवाली धरणी भी तुम्हीं हो ॥

सिद्धिः सांयात्रिकाणां तु वेला त्वं सागरस्य च । यक्षाणां प्रथमा यक्षी नागानां सुरसेति च ॥ १५ ॥

नौका या जहाजसे यात्रा करनेवाले व्यापारियोंको प्राप्त होनेवाली सिद्धि भी तुम्हीं हो । तुम्हीं समुद्रकी तट-भूमि, यक्षोंकी प्रथम यक्षी (कुबेरकी माता) तथा नागोंकी जननी सुरसा हो ॥ १५ ॥

ब्रह्मवादिन्यथो दीक्षा शोभा च परमा तथा । ज्योतिषां त्वं प्रभा देवि नक्षत्राणां च रोहिणी ॥ १६ ॥

देवि ! तुम ब्रह्मवादिनी दीक्षा तथा परम शोभा हो । ज्योतिर्मय ग्रहों एवं तारिकाओंकी प्रभा हो तथा नक्षत्रोंमें रोहिणी हो ॥ १६ ॥

राजद्वारेषु तीर्थेषु नदीनां सङ्गमेषु च । पूर्णा च पूर्णिमा चन्द्रे कृत्तिवासा इति स्मृता ॥ १७ ॥

राजद्वारों, तीर्थों तथा नदियोंके संगमोंमें तुम पूर्ण लक्ष्मी-रूपसे स्थित हो । तुम्हीं चन्द्रमामें पूर्णिमा रूपसे विराजमान होती हो तथा तुम्हीं कृत्तिवासा हो ॥ १७ ॥

सरस्वती च वाल्मीके स्मृतिद्वैपायने तथा । ऋषीणां धर्मबुद्धिस्तु देवानां मानसी तथा ॥ १८ ॥

तुम महर्षि वाल्मीकिमें सरस्वती-रूपसे, श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासमें स्मृतिरूपसे तथा ऋषि-मुनियोंमें धर्म-बुद्धिरूपसे स्थित हो । देवताओंमें सत्यसंकल्पात्मक चित्तवृत्ति भी तुम्हीं हो ॥ १८ ॥

सुरा देवी तु भूतेषु स्तूयसे त्वं स्वकर्मभिः । इन्द्रस्य चारुदृष्टिस्त्वं सहस्रनयनेति च ॥ १९ ॥

तुम समस्त भूतोंमें सुरा देवी हो और अपने कर्मोंद्वारा सदा प्रशंसित होती हो । इन्द्रकी मनोहर दृष्टि भी तुम्हीं हो; सहस्रों नेत्रोंसे युक्त होनेके कारण 'सहस्रनयना' नामसे तुम्हारी ख्याति है ॥ १९ ॥

तापसानां च देवी त्वमरणी चाग्निहोत्रिणाम् । क्षुधा च सर्वभूतानां तृप्तिस्त्वं दैवतेषु च ॥ २० ॥

तुम तपस्वी मुनियोंकी देवी हो । अग्निहोत्र करनेवाले ब्राह्मणोंकी अरणी हो । समस्त प्राणियोंकी क्षुधा तथा देवताओंमें सदा बनी रहनेवाली तृप्ति हो ॥ २० ॥

स्वाहा तृप्तिर्धृतिर्मेधा वसूनां त्वं वसुमती । आशा त्वं मानुषाणां च पुष्टिंश्च कृतकर्मणाम् ॥ २१ ॥

तुम्हीं स्वाहा, तृप्ति, धृति और मेधा हो । वसुओंकी बसुमती भी तुम्हीं हो । तुम्हीं मनुष्योंकी आशा तथा कृतकृत्य पुरुषोंकी पुष्टि हो ॥ २१ ॥

दिशश्च विदिशश्चैव तथा ह्यग्निशिखा प्रभा । शकुनी पूतना त्वं च रेवती च सुदारुणा ॥ २२ ॥

तुम्हीं दिशा, विदिशा, अग्निशिखा, प्रभा, शकुनी, पूतना तथा अत्यन्त दारुण रेवती हो ॥ २२ ॥

निद्रापि सर्वभूतानां मोहिनी क्षत्रिया तथा । विद्यानां ब्रह्मविद्या त्वमोङ्कारोऽथ वषट् तथा ॥ २३ ॥

[ विष्णुपर्व ] तृतीयोऽध्यायः २२१

समस्त प्राणियोंको मोहमें डालनेवाली निद्रा भी तुम्हीं हो। तुम क्षत्रिया हो, विद्याओंमें ब्रह्मविद्या हो तथा तुम्हीं ॐकार एवं वषट्कार हो ॥ २३ ॥

नारीणां पार्वतीं च त्वां पौराणीमृषयो विदुः ।
अरुन्धती च साध्वीनां प्रजापतिवचो यथा ॥ २४ ॥

ऋषि तुम्हें नारियोंमें पुराण-प्रसिद्ध पार्वती देवीके रूपमें जानते हैं। तुम साध्वी स्त्रियोंमें अरुन्धती हो, जैसा कि प्रजापतिको कथन है ॥ २४ ॥

पर्यायनामभिर्दिव्यैरन्द्राणी चेति विश्रुता ।
त्वया व्याप्तमिदं सर्वं जगत् स्थावरजङ्गमम् ॥ २५ ॥

तुम अपने पर्यायवाची दिव्य नामोंद्वारा इन्द्राणीके रूपमें विख्यात हो। तुमने इस समस्त चराचर जगत्को व्याप्त कर रखा है ॥ २५ ॥

संग्रामेषु च सर्वेषु अग्निप्रज्वलितेषु च ।
नदीतीरेषु चौरेषु कान्तारेषु भयेषु च ॥ २६ ॥
प्रवासे राजबन्धे च शत्रूणां च प्रमर्दने ।
प्राणात्ययेषु सर्वेषु त्वं हि रक्षा न संशयः ॥ २७ ॥

समस्त संग्रामोंमें, आगसे जलते हुए घरोंमें, नदीके तटों-पर, चोरों और लुटेरोंके दलोंमें, दुर्गम स्थानोंमें, भयके सभी अवसरोंमें, परदेशमें, राजाके द्वारा बन्धन प्राप्त होनेपर, शत्रुओंका मर्दन करते समय एवं सभी प्राणसंकटकी घड़ियोंमें तुम्हीं सबकी रक्षा करनेवाली हो, इसमें संशय नहीं है ॥

त्वयि मे हृदयं देवि त्वयि चित्तं मनस्त्वयि ।
रक्ष मां सर्वपापेभ्यः प्रसादं कर्तुमर्हसि ॥ २८ ॥

देवि ! मेरा हृदय तुममें लगा हुआ है। मेरा चित्त और मन भी तुम्हारे ही चिन्तन एवं मननमें तत्पर है। तुम समस्त पापोंसे मेरी रक्षा करो। तुम्हें मुझपर कृपा करनी चाहिये ॥

इमं यः सुस्तवं दिव्यमिति व्यासप्रकल्पितम् ।
यः पठेत् प्रातरुत्थाय शुचिः प्रयतमानसः ॥ २९ ॥
त्रिभिर्मासैः काङ्क्षितं च फलं वै सम्प्रयच्छसि ।
षड्भिर्मासैर्वरिष्ठं तु वरमेकं प्रयच्छसि ॥ ३० ॥

जो मनुष्य मेरे (विष्णु) द्वारा किये गये तथा व्यास-जीके द्वारा पद्यमें आबद्ध किये हुए इस सुन्दर दिव्य स्तोत्रका प्रातःकाल उठकर शुद्धभावसे संयतचित्त होकर पाठ करता है, उसे तुम तीन ही महीनोंमें मनोवाञ्छित फल प्रदान कर देती हो तथा जो छः महीनोंतक लगातार पाठ करता रहे, उसे कोई एक विशिष्ट वर देती हो ॥ २९-३० ॥

अर्चिता तु त्रिभिर्मासैर्दिव्यं चक्षुः प्रयच्छसि ।
संवत्सरेण सिद्धिं तु यथाकामं प्रयच्छसि ॥ ३१ ॥

तीन महीनोंतक पूजित होनेपर तुम उपासकको दिव्य दृष्टि प्रदान करती हो और एक वर्षतक आराधना करनेपर उसे उसकी इच्छाके अनुसार सिद्धि देती हो ॥ ३१ ॥

सत्यं ब्रह्म च दिव्यं च द्वैपायनवचो यथा ।
नृणां बन्धं वधं घोरं पुत्रनाशं धनक्षयम् ॥ ३२ ॥
व्याधिमृत्युभयं चैव पूजिता शमयिष्यसि ।
भविष्यसि महाभागे वरदा कामरूपिणी ॥ ३३ ॥

श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासजीने जैसा बताया है, उसके अनुसार तुम्हीं सत्य एवं दिव्य ब्रह्म हो। महाभागे ! तुम पूजित होनेपर मनुष्योंके बन्धन, भयानक वध, पुत्र और धनके नाश तथा रोग और मृत्युका भय दूर कर दोगी और इच्छानुसार रूप धारण करके उपासकोंके लिये वरदायिनी होओगी ॥ ३२-३३॥

मोहयित्वा च तं कंसमेका त्वं भोक्ष्यसे जगत् ।
अहमप्यात्मनो वृत्तिं विधास्ये गोषु गोपवत् ॥ ३४ ॥

इतना ही नहीं, तुम उस कंसको मोहमें डालकर अकेली ही सम्पूर्ण जगत्का उपभोग करोगी। मैं भी व्रजमें गौओंके बीचमें रहकर गोपके समान ही अपना व्यवहार बनाऊँगा ॥

स्ववृद्ध्यर्थमहं चैव करिष्ये कंसगोपताम् ।
एवं तां स समादिश्य गतोऽन्तर्धानमीश्वरः ॥ ३५ ॥

मैं अपनी वृद्धिके लिये कंसके गौओंकी चरवाही करूँगा। योगनिद्राको ऐसा आदेश देकर भगवान् विष्णु अन्तर्धान हो गये ॥ ३५ ॥

सा चापि तं नमस्कृत्य तथास्त्विति च निश्चिता ॥ ३६ ॥

उस समय उस देवीने भी उन्हें नमस्कार करके 'बहुत अच्छा' कहकर उनकी आज्ञाके पालन करनेका निश्चित विचार कर लिया ॥ ३६ ॥

यश्चैतत् पठते स्तोत्रं शृणुयाद् वाप्यभीक्ष्णशः ।
सर्वार्थसिद्धिं लभते नरो नास्त्यत्र संशयः ॥ ३७ ॥

जो मनुष्य बारंबार इस स्तोत्रका पाठ अथवा श्रवण करता है, वह अपने सम्पूर्ण मनोरथोंकी सिद्धि प्राप्त कर लेता है, इसमें कोई संशय नहीं है ॥ ३७ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि स्वप्नगर्भविधाने आर्यास्तुतौ तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें स्वप्नगर्भ-विधान तथा आर्यादेवीकी स्तुतिविषयक तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ ३ ॥

२२२ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे

चतुर्थोऽध्यायः

कंसद्वारा देवकीके नवजात शिशुओंकी हत्या, योगमायाद्वारा सातवें गर्भका संकर्षण, श्रीकृष्णका प्राकट्य और नन्दभवनमें प्रवेश, कंसद्वारा नन्दकन्याको मारनेका प्रयत्न और उसका दिव्य रूपमें दर्शन देना, कंसद्वारा क्षमाप्रार्थना और देवकीद्वारा उसे क्षमा-दान

वैशम्पायन उवाच

कृते गर्भविधाने तु देवकी देवतोपमा।
जग्राह सप्त तान् गर्भान् यथावत् समुदाहृतान् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर पतिद्वारा गर्भाधान किये जानेपर देवताके समान तेजस्विनी देवकीने पहले बताये हुए सात गर्भोँको क्रमशः यथोचितरूपसे ग्रहण किया ॥ १ ॥

षड्गर्भान् निस्सृतान् कंसस्ताञ्जघान शिलातले।
आपन्नं सप्तमं गर्भं सा निनायाथ रोहिणीम् ॥ २ ॥

पहले जो छः गर्भ क्रमशः प्रकट हुए, उन सबको कंसने पत्थरपर पटककर मार डाला। जब सातवाँ गर्भ प्राप्त हुआ, तब योगमायाने उसे रोहिणीके उदरमें स्थापित कर दिया ॥ २ ॥

अर्धरात्रे स्थितं गर्भं पातयन्ती रजस्वला।
निद्रया सहसाऽऽविष्टा पपात धरणीतले ॥ ३ ॥

रजस्वला रोहिणी आधी रातके समय अपने भीतर स्थापित हुए उस गर्भको गिरानेकी चेष्टा करने लगी; परंतु सहसा निद्रासे आविष्ट होकर वह स्वयं पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ ३ ॥

सा स्वप्नमिव तं दृष्ट्वा गर्भं निःसृतमात्मनः।
अपश्यन्ती च तं गर्भं मुहूर्तं व्यथिताभवत् ॥ ४ ॥

उसने अपने पेटसे निकले हुए उस गर्भको स्वप्नकी भाँति देखकर फिर नहीं देखा (क्योंकि योगमायाने उसे अदृश्य कर दिया था); इससे दो घड़ीतक उसके मनमें बड़ी व्यथा हुई ॥ ४ ॥

तामाह निद्रा संविग्नां नैशे तमसि रोहिणीम्।
रोहिणीमिव सोमस्य वसुदेवस्य धीमतः ॥ ५ ॥

रात्रिके अन्धकारमें बुद्धिमान् वसुदेवकी पत्नी रोहिणी चन्द्रमाकी प्यारी भार्या रोहिणीके समान दिखायी देती थी। वह उस गर्भके लिये उद्विग्न हो रही थी। उस समय निद्राने उससे कहा—॥ ५ ॥

कर्षणेनास्य गर्भस्य स्वगर्भे चाहितस्य वै।
संकर्षणो नाम सुतः शुभे तव भविष्यति ॥ ६ ॥

‘शुभे ! तुम्हारे उदरमें स्थापित हुआ जो यह गर्भ है, इसका आकर्षण हुआ है; इस कारण तुम्हारा यह पुत्र संकर्षण नाममें प्रसिद्ध होगा’ ॥ ६ ॥

सा तं पुत्रमवाप्यैवं हृष्टा किञ्चिदवाङ्मुखी।
विवेश रोहिणी वेश्म सुप्रभा रोहिणी यथा ॥ ७ ॥

इस प्रकार उस पुत्रको पाकर रोहिणी मन-ही-मन प्रसन्न हुई; किंतु लज्जासे उसका मुख कुछ नीचेको झुक गया। फिर तो वह उत्तम प्रभासे युक्त रोहिणीके समान अपने भवनके भीतर चली गयी ॥ ७ ॥

तस्य गर्भस्य मार्गेण गर्भमाधत्त देवकी।
यदर्थं सप्त ते गर्भाः कंसेन विनिपातिताः ॥ ८ ॥

उधर देवकीके उस सातवें गर्भकी खोज होने लगी; इतनेहीमें उसने आठवाँ गर्भ धारण किया; जिसके लिये कंसने उसके पहलेके सात गर्भ मार गिराये थे ॥ ८ ॥

तं तु गर्भं प्रयत्नेन ररक्षुस्तस्य मन्त्रिणः।
सोऽप्यत्र गर्भंवसतौ वस्त्यात्मेच्छया हरिः ॥ ९ ॥

कंसके मन्त्री उस आठवें गर्भकी रक्षामें यत्नपूर्वक लग गये। इधर भगवान् विष्णु भी स्वेच्छासे ही उस गर्भमें निवास करने लगे ॥ ९ ॥

यशोदापि समाधत्त गर्भं तदहरेव तु।
विष्णोः शरीरजां निद्रां विष्णोर्निर्देशकारिणीम् ॥ १० ॥

उसी दिन (गोकुलमें) यशोदाने भी भगवान् विष्णुकी आज्ञाका पालन करनेवाली तथा उन्हींके शरीरसे प्रकट हुई योगनिद्राको अपने गर्भमें धारण किया ॥ १० ॥

गर्भकाले त्वसम्पूर्णे अष्टमे मासि ते स्त्रियौ।
देवकी च यशोदा च सुपुवाते समं तदा ॥ ११ ॥

गर्भका समय पूर्ण होनेसे पहले ही आठवें मासमें, उन दोनों स्त्रियों—यशोदा और रोहिणीने प्रायः एक ही साथ प्रसव किया ॥ ११ ॥

यामेव रजनीं कृष्णो जज्ञे वृष्णिकुलोद्वहः।
तामेव रजनीं कन्यां यशोदापि व्यजायत ॥ १२ ॥

वृष्णिकुलका भार वहन करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण जिस रातमें प्रकट हुए, उसी रातमें यशोदाने भी एक कन्याको जन्म दिया ॥ १२ ॥

नन्दगोपस्य भार्यैका वसुदेवस्य चापरा।
तुल्यकालं च गर्भिण्यौ यशोदा देवकी तथा ॥ १३ ॥

एक यशोदा नन्दगोपकी भार्या थी और दूसरी देवकी वसुदेवकी। वे दोनों प्रायः एक ही समयमें गर्भवती हुईं ॥ १३ ॥

देवक्यजनयद् विष्णुं यशोदा तां तु दारिकाम्।
मुहूर्तेऽभिजिति प्राप्ते सार्धरात्रे विभूषिते ॥ १४ ॥

विष्णुपर्व ] चतुर्थोऽध्यायः २२३


( आठवें मासमें ) आधी रातके समय सुन्दर अभिजित् मुहूर्तका योग प्राप्त होनेपर देवकीने भगवान् विष्णुको पुत्र-रूपसे जन्म दिया और यशोदाने उस कन्याको ॥ १४ ॥

सागराः समकम्पन्त चेलुश्च धरणीधराः।
जज्वलुश्चाग्नयः शान्ता जायमाने जनार्दने ॥ १५ ॥
भगवान् श्रीकृष्णके जन्म ( अवतार ) ग्रहण करते समय समुद्रोंमें ज्वार सा उठने लगा। पृथ्वीको धारण करनेवाले शेष आदि विचलित हो उठे और बुझी हुई अग्नियों अपने-आप प्रज्वलित हो गयीं ॥ १५ ॥

शिवाश्च प्रववुर्वाताः प्रशान्तमभवद् रजः।
ज्योतींष्यतिव्यकाशन्त जायमाने जनार्दने ॥ १६ ॥
श्रीकृष्णके अवतार लेते समय शीतल मन्द सुखदायिनी हवा चलने लगी। उड़ती हुई धूल शान्त हो गयी तथा ग्रह और नक्षत्र अत्यन्त प्रकाशित होने लगे ॥ १६ ॥

अभिजिन्नम नक्षत्रं जयन्ती नाम शर्वरी।
मुहूर्तो विजयो नाम यत्र जातो जनार्दनः ॥ १७ ॥
जब भगवान् श्रीकृष्ण प्रकट हुए, उस समय अभिजित् नामक मुहूर्त था, रोहिणी नक्षत्रका योग होनेसे अष्टमीकी वह रात जयन्ती कहलाती थी और विजय नामक विशिष्ट मुहूर्त व्यतीत हो रहा था ॥ १७ ॥

अव्यक्तः शाश्वतः सूक्ष्मो हरिनारायणः प्रभुः।
जायमानो हि भगवान्नैर्मोहयन् प्रभुः ॥ १८ ॥
अव्यक्त सनातन सूक्ष्मस्वरूप पापहारी तथा सर्वसमर्थ भगवान् नारायणने प्रकट होते ही अपने नेत्रोंसे सबका मन मोह लिया ॥ १८ ॥

अनाहता दुन्दुभयो देवानां प्राणदन् दिवि।
आकाशात् पुष्पवृष्टिं च ववर्ष त्रिदशेश्वरः ॥ १९ ॥
स्वर्गलोकमें बिना बजाये ही देवताओंकी दुन्दुभियाँ बज उठीं। देवेश्वर इन्द्र आकाशसे फूलोंकी वर्षा करने लगे ॥ १९ ॥

गीर्भिर्मङ्गलयुक्ताभिः स्तुवन्तो मधुसूदनम्।
महर्षयः सगन्धर्वा उपतस्थुः सहाप्सराः ॥ २० ॥
गन्धर्व और अप्सराओंसहित महर्षिगण अपने मङ्गलमय वचनोंद्वारा भगवान् मधुसूदनकी स्तुति करते हुए उनकी सेवामें उपस्थित हुए ॥ २० ॥

जायमाने हृषीकेशे प्रहृष्टमभवज्जगत्।
इन्द्रश्च त्रिदशैः सार्धं तुष्टाव मधुसूदनम् ॥ २१ ॥
भगवान् श्रीकृष्णका प्राकट्य होते ही सम्पूर्ण जगत्में हर्षोल्लास छा गया। देवताओंके साथ इन्द्रने उन भगवान् मधुसूदनकी स्तुति की ॥ २१ ॥

वसुदेवश्च तं रात्रौ जातं पुत्रमधोक्षजम्।
श्रीवत्सलक्षणं दृष्ट्वा युतं दिव्यैश्च लक्षणैः।
उवाच वसुदेवस्तु रूपं संहर वै प्रभो ॥ २२ ॥
वसुदेवने भी रात्रिमें प्रकट हुए अपने पुत्ररूप भगवान् अधोक्षजका स्तवन किया। उन्हें श्रीवत्सके चिह्न और दिव्य लक्षणोंसे सम्पन्न देखकर वसुदेवने कहा—'प्रभो! आप अपने स्वरूपको समेट लीजिये ॥ २२ ॥

भीतोऽहं देव कंसस्य तस्मादेवं ब्रवीम्यहम्।
मम पुत्रा हतास्तेन तव ज्येष्ठाम्बुजेक्षण ॥ २३ ॥
'देव ! मैं कंसके भयसे डरा हुआ हूँ, इसीलिये ऐसी बात कहता हूँ। कमलनयन ! उसने मेरे बहुत-से पुत्र मार डाले हैं, जो तुमसे जेठे थे' ॥ २३ ॥

वैशम्पायन उवाच
वसुदेववचः श्रुत्वा रूपं चाहरदच्युतः।
अनुज्ञाप्य पितृत्वेन नन्दगोपगृहं नय ॥ २४ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! वसुदेवका यह वचन सुनकर भगवान् अच्युतने पिता होनेके कारण उनकी आज्ञा स्वीकार कर ली और उनसे कहा, 'आप मुझे नन्दगोप-के घर पहुँचा दीजिये ( तथा उनकी नवजात कन्याको यहाँ उठा लाइये)।' ऐसा कहकर उन्होंने अपने चतुर्भुज रूपका उपसंहार कर लिया ॥ २४ ॥

वसुदेवस्तु संगृह्य दारकं क्षिप्रमेव च।
यशोदाया गृहं रात्रौ विवेश सुतवत्सलः ॥ २५ ॥
तब पुत्रवत्सल वसुदेव शीघ्र ही उस बालकको गोदमें लेकर रातके समय यशोदाके घरमें घुस गये ॥ २५ ॥

यशोदायास्त्वविज्ञातस्तत्र निक्षिप्य दारकम्।
प्रगृह्य दारिकां चैव देवकीशयने न्यसत् ॥ २६ ॥
यशोदाको उनके आनेका कुछ पता न चला। वहाँ उन्होंने अपने बालकको रख दिया और उस कन्याको लेकर अपने निवासस्थानमें आनेके बाद उसे देवकीकी शय्यापर सुला दिया ॥ २६ ॥

परिवर्ते कृते ताभ्यां गर्भाभ्यां भयविह्वलः।
वसुदेवः कृतार्थो वै निर्जगाम निवेशनात् ॥ २७ ॥
इस प्रकार उन दोनों नवजात बालकोंकी अदला-बदली करके कृतार्थ हुए वसुदेवजी भयसे व्याकुल हो उस घरसे बाहर निकल गये ॥ २७ ॥

उग्रसेनसुतायाथ कंसायानकदुन्दुभिः।
निवेदयामास तदा तां कन्यां वरवर्णिनीम् ॥ २८ ॥
आनकदुन्दुभि नामसे प्रसिद्ध वसुदेवने उग्रसेनपुत्र कंस-के पास जाकर उसे अपनी सुन्दरी कन्याके जन्मका समाचार निवेदन किया ॥ २८ ॥

२२६ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे इत्युक्तवन्तं कंसं सा देवकी वाक्यमब्रवीत् । प्रकार जीवकी सत्ता होनेपर भी जन्मसे पहले वह दृष्टिगोचर साश्रुपूर्णमुखा दीना भर्तारमुपवीक्षती । नहीं होता है ॥ ६१ ॥ उत्तिष्ठोत्तिष्ठ वत्सेति कंसं मातेव जल्पती ॥ ५७ ॥ जातोऽप्यजातां याति विधात्रा यत्र नीयते । जब कंसने ऐसी बात कही, तब देवकीके मुखपर तद् गच्छ पुत्र मा ते भून्मद्गतं मृत्युकारणम् ॥ ६२ ॥ आँसुओंकी धारा बह चली। वह पतिकी ओर देखती हुई जो जन्म ले चुका है, वह भी मृत्युके बाद अजात- अत्यन्त दीन होकर कंससे माताके समान कहने लगी-'बेटा ! भावको ही प्राप्त हो जाता है ( अर्थात् उसका भी दर्शन उठो ! उठो !' ॥ ५७ ॥ नहीं होता ) । विधाता उसे जहाँ ले जाते हैं, वहाँ वह चला देवक्युवाच जाता है; अतः पुत्र ! तुम जाओ। मुझे जो पुत्रोंकी मृत्युके ममाग्रतो हता गर्भा ये त्वया कामरूपिणा । कारण दुःख हो रहा है, उसके लिये तुम्हारे हृदयमें विचार कारणं त्वं न वै पुत्र कृतान्तोऽप्यत्र कारणम् ॥ ५८ ॥ न हो ॥ ६२ ॥ देवकीने फिर कहा-वत्स ! तुम तो इच्छानुसार मृत्युना प्रहृते पूर्वे शेषो हेतुः प्रवर्तते । रूप धारण करनेवाले हो । तुमने मेरे सामने ही जिन-जिन विधिना पूर्वदृष्टेन प्रजासर्गेण तत्त्वतः ॥ ६३ ॥ गर्भस्थ शिशुओंकी हत्या की है, उसमें केवल तुम्हीं कारण मातापित्रोस्तु कार्येण जन्मतस्तूपपद्यते । हो-ऐसी बात नहीं है, काल भी इसमें कारण है ॥ ५८ ॥ पहले मौत प्रहार करती है, उसके बाद मृत्युके शेष गर्भकर्तनमेतन्मे सहनीयं त्वया कृतम् । हेतुओंकी प्रवृत्ति होती है । विधि (संस्कार ), पूर्वदृष्ट कर्म पादयोः पतता मूर्ध्ना स्वं च कर्म जुगुप्सता ॥ ५९ ॥ (जन्मान्तरीय कर्म या प्रारब्ध ), प्रजाकी सृष्टि करनेवाले परंतु आज तुम अपने कर्मकी निन्दा करते हुए जो काल, वास्तवमें घटित हुए तात्कालिक कारण, माता-पिताके मेरे पैरोंपर सिर रखकर पड़ गये, इससे तुम्हारे द्वारा किये दूषित अन्न-भक्षण आदि कार्य तथा जातिगत स्वभावसे गये इस गर्भोच्छेदस्वरूप असह्य कष्टको भी मैं किसी तरह सह भी मृत्यु सम्भव होती है ( इन्हीं सब कारणोंसे मेरे बच्चे लूँगी ॥ ५९ ॥ मारे गये और तुम इसमें निमित्त बने, अतः इसमें तुम्हारा गर्भे च नियतो मृत्युर्बाल्येऽपि न निवर्तते । कोई दोष नहीं है ) ॥ ६३३ ॥ युवापि मृत्योर्वशगः स्थविरो मृत एव तु ॥ ६० ॥ वैशम्पायन उवाच गर्भमें भी मृत्यु निश्चित रूपसे होती है। बाल्यावस्थामें निशम्य देवकीवाक्यं स कंसः स्वं निवेशनम् ॥ ६४ ॥ भी वह टलती नहीं है। जवान मनुष्य भी मृत्युके अधीन प्रविवेश ससंरम्भो दह्यमानेन चेतसा । होता है और वृद्ध पुरुष तो मरा हुआ है ही ॥ ६० ॥ कृत्ये प्रतिहते दीनो जगाम विमना भृशम् ॥ ६५ ॥ कालपक्वमिदं सर्व हेतुभूतस्तु त्वद्विधः । वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय ! देवकीका अजाते दर्शनं नास्ति यथा वायुस्तथैव च ॥ ६१ ॥ यह वचन सुनकर कंस अपनी असफलतापर क्षुब्ध हो मन-ही-मन इस सम्पूर्ण जगत्‌को काल ही पका देता है (मार जलता हुआ अपने भवनमें चला गया। अपने किये प्रयत्नके डालता है ) । तुम्हारे-जैसे लोग तो केवल निमित्तमात्र होते हैं। प्रतिहत ( विफल ) हो जानेपर वह मनमें बहुत ही खिन्न जिसका जन्म नहीं हुआ है, उसका दर्शन नहीं होता । जैसे और दीन हो गया था, अतः वहाँसे चुपचाप चला वायुकी सत्ता होनेपर भी वह दिखायी नहीं देती, उसी गया ॥ ६४-६५ ॥ इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि श्रीकृष्णजन्मनि चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें श्रीकृष्णजन्मविषयक चौथा अध्याय पूरा हुआ ॥ ४ ॥ पञ्चमोऽध्यायः वसुदेवजीका नन्दको व्रजमें लौटनेकी सम्मति देना और नन्दजीका गोत्रजकी शोभा निहारते हुए वहाँ पधारना वैशम्पायन उवाच स नन्दगोपं त्वरितः प्रोवाच शुभया गिरा । प्रागेव वसुदेवस्तु व्रजे शुश्राव रोहिणीम् । गच्छानया सहैव त्वं व्रजमेव यशोदया ॥ २ ॥ प्रजातां पुत्रमेवाग्रे चन्द्रात् कान्ततराननम् ॥ १ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय ! वसुदेवजीने