भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 247

२२६ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे इत्युक्तवन्तं कंसं सा देवकी वाक्यमब्रवीत् । प्रकार जीवकी सत्ता होनेपर भी जन्मसे पहले वह दृष्टिगोचर साश्रुपूर्णमुखा दीना भर्तारमुपवीक्षती । नहीं होता है ॥ ६१ ॥ उत्तिष्ठोत्तिष्ठ वत्सेति कंसं मातेव जल्पती ॥ ५७ ॥ जातोऽप्यजातां याति विधात्रा यत्र नीयते । जब कंसने ऐसी बात कही, तब देवकीके मुखपर तद् गच्छ पुत्र मा ते भून्मद्गतं मृत्युकारणम् ॥ ६२ ॥ आँसुओंकी धारा बह चली। वह पतिकी ओर देखती हुई जो जन्म ले चुका है, वह भी मृत्युके बाद अजात- अत्यन्त दीन होकर कंससे माताके समान कहने लगी-'बेटा ! भावको ही प्राप्त हो जाता है ( अर्थात् उसका भी दर्शन उठो ! उठो !' ॥ ५७ ॥ नहीं होता ) । विधाता उसे जहाँ ले जाते हैं, वहाँ वह चला देवक्युवाच जाता है; अतः पुत्र ! तुम जाओ। मुझे जो पुत्रोंकी मृत्युके ममाग्रतो हता गर्भा ये त्वया कामरूपिणा । कारण दुःख हो रहा है, उसके लिये तुम्हारे हृदयमें विचार कारणं त्वं न वै पुत्र कृतान्तोऽप्यत्र कारणम् ॥ ५८ ॥ न हो ॥ ६२ ॥ देवकीने फिर कहा-वत्स ! तुम तो इच्छानुसार मृत्युना प्रहृते पूर्वे शेषो हेतुः प्रवर्तते । रूप धारण करनेवाले हो । तुमने मेरे सामने ही जिन-जिन विधिना पूर्वदृष्टेन प्रजासर्गेण तत्त्वतः ॥ ६३ ॥ गर्भस्थ शिशुओंकी हत्या की है, उसमें केवल तुम्हीं कारण मातापित्रोस्तु कार्येण जन्मतस्तूपपद्यते । हो-ऐसी बात नहीं है, काल भी इसमें कारण है ॥ ५८ ॥ पहले मौत प्रहार करती है, उसके बाद मृत्युके शेष गर्भकर्तनमेतन्मे सहनीयं त्वया कृतम् । हेतुओंकी प्रवृत्ति होती है । विधि (संस्कार ), पूर्वदृष्ट कर्म पादयोः पतता मूर्ध्ना स्वं च कर्म जुगुप्सता ॥ ५९ ॥ (जन्मान्तरीय कर्म या प्रारब्ध ), प्रजाकी सृष्टि करनेवाले परंतु आज तुम अपने कर्मकी निन्दा करते हुए जो काल, वास्तवमें घटित हुए तात्कालिक कारण, माता-पिताके मेरे पैरोंपर सिर रखकर पड़ गये, इससे तुम्हारे द्वारा किये दूषित अन्न-भक्षण आदि कार्य तथा जातिगत स्वभावसे गये इस गर्भोच्छेदस्वरूप असह्य कष्टको भी मैं किसी तरह सह भी मृत्यु सम्भव होती है ( इन्हीं सब कारणोंसे मेरे बच्चे लूँगी ॥ ५९ ॥ मारे गये और तुम इसमें निमित्त बने, अतः इसमें तुम्हारा गर्भे च नियतो मृत्युर्बाल्येऽपि न निवर्तते । कोई दोष नहीं है ) ॥ ६३३ ॥ युवापि मृत्योर्वशगः स्थविरो मृत एव तु ॥ ६० ॥ वैशम्पायन उवाच गर्भमें भी मृत्यु निश्चित रूपसे होती है। बाल्यावस्थामें निशम्य देवकीवाक्यं स कंसः स्वं निवेशनम् ॥ ६४ ॥ भी वह टलती नहीं है। जवान मनुष्य भी मृत्युके अधीन प्रविवेश ससंरम्भो दह्यमानेन चेतसा । होता है और वृद्ध पुरुष तो मरा हुआ है ही ॥ ६० ॥ कृत्ये प्रतिहते दीनो जगाम विमना भृशम् ॥ ६५ ॥ कालपक्वमिदं सर्व हेतुभूतस्तु त्वद्विधः । वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय ! देवकीका अजाते दर्शनं नास्ति यथा वायुस्तथैव च ॥ ६१ ॥ यह वचन सुनकर कंस अपनी असफलतापर क्षुब्ध हो मन-ही-मन इस सम्पूर्ण जगत्‌को काल ही पका देता है (मार जलता हुआ अपने भवनमें चला गया। अपने किये प्रयत्नके डालता है ) । तुम्हारे-जैसे लोग तो केवल निमित्तमात्र होते हैं। प्रतिहत ( विफल ) हो जानेपर वह मनमें बहुत ही खिन्न जिसका जन्म नहीं हुआ है, उसका दर्शन नहीं होता । जैसे और दीन हो गया था, अतः वहाँसे चुपचाप चला वायुकी सत्ता होनेपर भी वह दिखायी नहीं देती, उसी गया ॥ ६४-६५ ॥ इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि श्रीकृष्णजन्मनि चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें श्रीकृष्णजन्मविषयक चौथा अध्याय पूरा हुआ ॥ ४ ॥ पञ्चमोऽध्यायः वसुदेवजीका नन्दको व्रजमें लौटनेकी सम्मति देना और नन्दजीका गोत्रजकी शोभा निहारते हुए वहाँ पधारना वैशम्पायन उवाच स नन्दगोपं त्वरितः प्रोवाच शुभया गिरा । प्रागेव वसुदेवस्तु व्रजे शुश्राव रोहिणीम् । गच्छानया सहैव त्वं व्रजमेव यशोदया ॥ २ ॥ प्रजातां पुत्रमेवाग्रे चन्द्रात् कान्ततराननम् ॥ १ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय ! वसुदेवजीने