भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 248

विष्णुपर्व ] पञ्चमोऽध्यायः २२७

प्रसवसे पहले ही रोहिणीको ब्रजमें भेज दिया था । जब उन्होंने सुना कि रोहिणीने पहले ही एक ऐसे पुत्रको जन्म दिया है, जिसका मुख चन्द्रमासे भी अधिक कान्तिमान् है, तब वे तुरंत ही (कंसका कर चुकानेके लिये पत्नीसहित मथुरामें आये हुए) नन्दगोपके पास जाकर मङ्गलमयी वाणीमें बोले—'मित्र ! तुम इन यशोदाजीके साथ ही शीघ्र ब्रजको लौट जाओ ॥ १-२ ॥

तत्र तौ दारकौ गत्वा जातकमादिभिर्गुणैः । योजयित्वा व्रजे तात संवर्धय यथासुखम् ॥ ३ ॥

'तात ! वहाँ जाकर उन दोनों बालकोंको जातकर्म आदि संस्कारोंसे सम्पन्न करके ब्रजमें ही सुखपूर्वक उनका पालन-पोषण और संवर्धन करो ॥ ३ ॥

रौहिणेयं च पुत्रं मे परिरक्ष शिशुं व्रजे । अहं वाच्यो भविष्यामि पितृपक्षेषु पुत्रिणाम् ॥ ४ ॥ योऽहमेकस्य पुत्रस्य न पश्यामि शिशोर्मुखम् ।

'व्रजमें रोहिणीके गर्भसे उत्पन्न हुआ जो मेरा शिशु पुत्र है, उसकी भी रक्षा करना । भाई ! मैं तो पितृपक्षोंमें पुत्रवानोंके द्वारा निन्दनीय ही होऊँगा; क्योंकि मैं ऐसा भाग्यहीन हूँ कि अपने एकमात्र शिशुपुत्रका मुख नहीं देख पाता हूँ ॥

ह्रियते ह्यबलात् प्रज्ञा प्राज्ञस्यापि सतो मम ॥ ५ ॥ अस्माद्धि मे भयं कंसात्निर्घृणाद् वै शिशोर्वधे ।

'यद्यपि मुझे इस बातका ज्ञान है कि सुख-दुःख और संयोग-वियोग आदि प्रारब्धके ही अधीन हैं; तथापि निरन्तर बना रहनेवाला भय मुझ बुद्धिमानकी भी बुद्धिको बलपूर्वक हर लेता है । इस निर्दय कंससे मुझे सदा यह डर लगा रहता है कि कहीं यह मेरे इस शिशुका भी वध न कर डाले ॥ ५॥

तद्यथा रौहिणेयं त्वं नन्दगोप ममात्मजम् ॥ ६ ॥ गोपायसि यथा तात तत्त्वान्वेषी तथा कुरु । विघ्ना हि बहवो लोके बालानुत्रासयन्ति हि ॥ ७ ॥

'अतः तात ! नन्दगोप ! तुम मेरे पुत्र रोहिणीकुमारकी जिस उपायसे भी रक्षा कर सको, करो । बाल-द्रोहियोंके स्वरूपका यथावत्रूपसे विचार करके जैसे बने, उसके जीवनकी रक्षा करो; क्योंकि जगत्में बहुत-से ऐसे विघ्न खड़े हुए हैं, जो बालकोंको त्रास दे रहे हैं ॥ ६-७ ॥

स च पुत्रो मम ज्यायान् कनीयांश्च तवाप्ययम् । उभावपि समं नाम्ना निरीक्षस्व यथासुखम् ॥ ८ ॥

'मेरा वह पुत्र बड़ा है और तुम्हारा यह बालक छोटा । तुम इन दोनोंको ही सुखपूर्वक समान दृष्टिसे देखो । जैसे इनके नाम एक-से (एक अर्थवाले) हैं*, उसी तरह इनपर तुम्हारा वात्सल्य भी एक-सा ही होना चाहिये ॥ ८ ॥


* जैसे कृष्णका अर्थ है अपनी ओर खींचनेवाला, उसी तरह संकर्षणका भी है ।

वर्धमानावुभावेतौ समानवयसौ यथा । शोभेतां गोव्रजे तस्मिन् नन्दगोप तथा कुरु ॥ ९ ॥

'नन्दगोप ! इन दोनोंकी अवस्था प्रायः समान है । ये दोनों जिस तरह साथ-साथ तुम्हारे उस ब्रजमें बढ़ते हुए शोभा पा सकें, वैसा यत्न करो ॥ ९ ॥

बाल्ये केलिकिलः सर्वो बाल्ये मुह्यति मानवः । बाल्ये चण्डतमः सर्वस्तत्र यत्नपरो भव ॥ १० ॥

'बाल्यावस्था में सब लोग खेल-कूदसे मन बहलाते हैं । बालकपनमें प्रायः सभी मनुष्य मोहग्रस्त रहते हैं । उन्हें कर्तव्याकर्तव्यका बोध नहीं रहता तथा बचपनमें सभी बात-बातपर बहुत चिढ़ते और रूठते हैं; अतः बच्चोंको इन सभी दशाओंमें सँभालते हुए उनके लालन-पालनके लिये प्रयत्नशील रहो ॥ १० ॥

न च वृन्दावने कार्यो गवां घोषः कथंचन । भेतव्यं तत्र वसतः केशिनः पापदर्शिनः ॥ ११ ॥

'देखो, वृन्दावनमें किसी तरह भी गौओंके ठहरनेका स्थान न बनाना । वहाँ निवास करनेवाले पापदर्शी केशीसे तुम्हें सदा डरते रहना चाहिये ॥ ११ ॥

सरीसृपेभ्यः कीटेभ्यः शकुनिभ्यस्तथैव च । गोष्ठेषु गोभ्यो वत्सेभ्यो रक्ष्यौ ते द्वाविमौ शिशू ॥ १२ ॥

'वनमे साँप-बिच्छू, कीड़े-मकोड़े तथा पक्षियोंसे और गोव्रजमे गौओं तथा बछड़ोंसे इन दोनों शिशुओंकी तुम्हें सदा रक्षा करनी चाहिये ॥ १२ ॥

नन्दगोप गता रात्रिः शीघ्रयानो व्रजाशुगः । इमे त्वां व्याहरन्तीव पक्षिणः सव्यदक्षिणाः ॥ १३ ॥

'नन्दगोप ! रात बीत गयी । तुम तेज चलनेवाली सवारीपर बैठकर शीघ्रतापूर्वक यहाँसे पधारो । ये दायें-बायें उड़नेवाले पक्षी मानो तुम्हे जानेके लिये कह रहे हैं—विदा दे रहे हैं' ॥ १३ ॥

रहस्यं वसुदेवेन सोऽनुज्ञातो महात्मना । यानं यशोदया सार्धमारुरोह मुदान्वितः ॥ १४ ॥

महात्मा वसुदेवके द्वारा किसी गुप्त रहस्यका ज्ञान करा दिये जानेपर नन्दबाबा यशोदाजीके साथ प्रसन्नतापूर्वक सवारीपर बैठे ॥ १४ ॥

कुमारस्कन्धवाह्यायां शिविकायां समाहितः । संवेशयामास शिशुं शयनीयं महामतिः ॥ १५ ॥

तदनन्तर सदा सावधान रहनेवाले परम बुद्धिमान् नन्दजीने छोटे-छोटे बालक जिसे कंधेपर ढो सकें, ऐसी शिविका (डोली) में अपने शयन करने योग्य शिशुको सुला दिया ॥ १५ ॥