भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 244, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 244

[ विष्णुपर्व ] तृतीयोऽध्यायः २२१

समस्त प्राणियोंको मोहमें डालनेवाली निद्रा भी तुम्हीं हो। तुम क्षत्रिया हो, विद्याओंमें ब्रह्मविद्या हो तथा तुम्हीं ॐकार एवं वषट्कार हो ॥ २३ ॥

नारीणां पार्वतीं च त्वां पौराणीमृषयो विदुः ।
अरुन्धती च साध्वीनां प्रजापतिवचो यथा ॥ २४ ॥

ऋषि तुम्हें नारियोंमें पुराण-प्रसिद्ध पार्वती देवीके रूपमें जानते हैं। तुम साध्वी स्त्रियोंमें अरुन्धती हो, जैसा कि प्रजापतिको कथन है ॥ २४ ॥

पर्यायनामभिर्दिव्यैरन्द्राणी चेति विश्रुता ।
त्वया व्याप्तमिदं सर्वं जगत् स्थावरजङ्गमम् ॥ २५ ॥

तुम अपने पर्यायवाची दिव्य नामोंद्वारा इन्द्राणीके रूपमें विख्यात हो। तुमने इस समस्त चराचर जगत्को व्याप्त कर रखा है ॥ २५ ॥

संग्रामेषु च सर्वेषु अग्निप्रज्वलितेषु च ।
नदीतीरेषु चौरेषु कान्तारेषु भयेषु च ॥ २६ ॥
प्रवासे राजबन्धे च शत्रूणां च प्रमर्दने ।
प्राणात्ययेषु सर्वेषु त्वं हि रक्षा न संशयः ॥ २७ ॥

समस्त संग्रामोंमें, आगसे जलते हुए घरोंमें, नदीके तटों-पर, चोरों और लुटेरोंके दलोंमें, दुर्गम स्थानोंमें, भयके सभी अवसरोंमें, परदेशमें, राजाके द्वारा बन्धन प्राप्त होनेपर, शत्रुओंका मर्दन करते समय एवं सभी प्राणसंकटकी घड़ियोंमें तुम्हीं सबकी रक्षा करनेवाली हो, इसमें संशय नहीं है ॥

त्वयि मे हृदयं देवि त्वयि चित्तं मनस्त्वयि ।
रक्ष मां सर्वपापेभ्यः प्रसादं कर्तुमर्हसि ॥ २८ ॥

देवि ! मेरा हृदय तुममें लगा हुआ है। मेरा चित्त और मन भी तुम्हारे ही चिन्तन एवं मननमें तत्पर है। तुम समस्त पापोंसे मेरी रक्षा करो। तुम्हें मुझपर कृपा करनी चाहिये ॥

इमं यः सुस्तवं दिव्यमिति व्यासप्रकल्पितम् ।
यः पठेत् प्रातरुत्थाय शुचिः प्रयतमानसः ॥ २९ ॥
त्रिभिर्मासैः काङ्क्षितं च फलं वै सम्प्रयच्छसि ।
षड्भिर्मासैर्वरिष्ठं तु वरमेकं प्रयच्छसि ॥ ३० ॥

जो मनुष्य मेरे (विष्णु) द्वारा किये गये तथा व्यास-जीके द्वारा पद्यमें आबद्ध किये हुए इस सुन्दर दिव्य स्तोत्रका प्रातःकाल उठकर शुद्धभावसे संयतचित्त होकर पाठ करता है, उसे तुम तीन ही महीनोंमें मनोवाञ्छित फल प्रदान कर देती हो तथा जो छः महीनोंतक लगातार पाठ करता रहे, उसे कोई एक विशिष्ट वर देती हो ॥ २९-३० ॥

अर्चिता तु त्रिभिर्मासैर्दिव्यं चक्षुः प्रयच्छसि ।
संवत्सरेण सिद्धिं तु यथाकामं प्रयच्छसि ॥ ३१ ॥

तीन महीनोंतक पूजित होनेपर तुम उपासकको दिव्य दृष्टि प्रदान करती हो और एक वर्षतक आराधना करनेपर उसे उसकी इच्छाके अनुसार सिद्धि देती हो ॥ ३१ ॥

सत्यं ब्रह्म च दिव्यं च द्वैपायनवचो यथा ।
नृणां बन्धं वधं घोरं पुत्रनाशं धनक्षयम् ॥ ३२ ॥
व्याधिमृत्युभयं चैव पूजिता शमयिष्यसि ।
भविष्यसि महाभागे वरदा कामरूपिणी ॥ ३३ ॥

श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासजीने जैसा बताया है, उसके अनुसार तुम्हीं सत्य एवं दिव्य ब्रह्म हो। महाभागे ! तुम पूजित होनेपर मनुष्योंके बन्धन, भयानक वध, पुत्र और धनके नाश तथा रोग और मृत्युका भय दूर कर दोगी और इच्छानुसार रूप धारण करके उपासकोंके लिये वरदायिनी होओगी ॥ ३२-३३॥

मोहयित्वा च तं कंसमेका त्वं भोक्ष्यसे जगत् ।
अहमप्यात्मनो वृत्तिं विधास्ये गोषु गोपवत् ॥ ३४ ॥

इतना ही नहीं, तुम उस कंसको मोहमें डालकर अकेली ही सम्पूर्ण जगत्का उपभोग करोगी। मैं भी व्रजमें गौओंके बीचमें रहकर गोपके समान ही अपना व्यवहार बनाऊँगा ॥

स्ववृद्ध्यर्थमहं चैव करिष्ये कंसगोपताम् ।
एवं तां स समादिश्य गतोऽन्तर्धानमीश्वरः ॥ ३५ ॥

मैं अपनी वृद्धिके लिये कंसके गौओंकी चरवाही करूँगा। योगनिद्राको ऐसा आदेश देकर भगवान् विष्णु अन्तर्धान हो गये ॥ ३५ ॥

सा चापि तं नमस्कृत्य तथास्त्विति च निश्चिता ॥ ३६ ॥

उस समय उस देवीने भी उन्हें नमस्कार करके 'बहुत अच्छा' कहकर उनकी आज्ञाके पालन करनेका निश्चित विचार कर लिया ॥ ३६ ॥

यश्चैतत् पठते स्तोत्रं शृणुयाद् वाप्यभीक्ष्णशः ।
सर्वार्थसिद्धिं लभते नरो नास्त्यत्र संशयः ॥ ३७ ॥

जो मनुष्य बारंबार इस स्तोत्रका पाठ अथवा श्रवण करता है, वह अपने सम्पूर्ण मनोरथोंकी सिद्धि प्राप्त कर लेता है, इसमें कोई संशय नहीं है ॥ ३७ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि स्वप्नगर्भविधाने आर्यास्तुतौ तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें स्वप्नगर्भ-विधान तथा आर्यादेवीकी स्तुतिविषयक तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ ३ ॥

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