भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 245, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 245

२२२ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे

चतुर्थोऽध्यायः

कंसद्वारा देवकीके नवजात शिशुओंकी हत्या, योगमायाद्वारा सातवें गर्भका संकर्षण, श्रीकृष्णका प्राकट्य और नन्दभवनमें प्रवेश, कंसद्वारा नन्दकन्याको मारनेका प्रयत्न और उसका दिव्य रूपमें दर्शन देना, कंसद्वारा क्षमाप्रार्थना और देवकीद्वारा उसे क्षमा-दान

वैशम्पायन उवाच

कृते गर्भविधाने तु देवकी देवतोपमा।
जग्राह सप्त तान् गर्भान् यथावत् समुदाहृतान् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर पतिद्वारा गर्भाधान किये जानेपर देवताके समान तेजस्विनी देवकीने पहले बताये हुए सात गर्भोँको क्रमशः यथोचितरूपसे ग्रहण किया ॥ १ ॥

षड्गर्भान् निस्सृतान् कंसस्ताञ्जघान शिलातले।
आपन्नं सप्तमं गर्भं सा निनायाथ रोहिणीम् ॥ २ ॥

पहले जो छः गर्भ क्रमशः प्रकट हुए, उन सबको कंसने पत्थरपर पटककर मार डाला। जब सातवाँ गर्भ प्राप्त हुआ, तब योगमायाने उसे रोहिणीके उदरमें स्थापित कर दिया ॥ २ ॥

अर्धरात्रे स्थितं गर्भं पातयन्ती रजस्वला।
निद्रया सहसाऽऽविष्टा पपात धरणीतले ॥ ३ ॥

रजस्वला रोहिणी आधी रातके समय अपने भीतर स्थापित हुए उस गर्भको गिरानेकी चेष्टा करने लगी; परंतु सहसा निद्रासे आविष्ट होकर वह स्वयं पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ ३ ॥

सा स्वप्नमिव तं दृष्ट्वा गर्भं निःसृतमात्मनः।
अपश्यन्ती च तं गर्भं मुहूर्तं व्यथिताभवत् ॥ ४ ॥

उसने अपने पेटसे निकले हुए उस गर्भको स्वप्नकी भाँति देखकर फिर नहीं देखा (क्योंकि योगमायाने उसे अदृश्य कर दिया था); इससे दो घड़ीतक उसके मनमें बड़ी व्यथा हुई ॥ ४ ॥

तामाह निद्रा संविग्नां नैशे तमसि रोहिणीम्।
रोहिणीमिव सोमस्य वसुदेवस्य धीमतः ॥ ५ ॥

रात्रिके अन्धकारमें बुद्धिमान् वसुदेवकी पत्नी रोहिणी चन्द्रमाकी प्यारी भार्या रोहिणीके समान दिखायी देती थी। वह उस गर्भके लिये उद्विग्न हो रही थी। उस समय निद्राने उससे कहा—॥ ५ ॥

कर्षणेनास्य गर्भस्य स्वगर्भे चाहितस्य वै।
संकर्षणो नाम सुतः शुभे तव भविष्यति ॥ ६ ॥

‘शुभे ! तुम्हारे उदरमें स्थापित हुआ जो यह गर्भ है, इसका आकर्षण हुआ है; इस कारण तुम्हारा यह पुत्र संकर्षण नाममें प्रसिद्ध होगा’ ॥ ६ ॥

सा तं पुत्रमवाप्यैवं हृष्टा किञ्चिदवाङ्मुखी।
विवेश रोहिणी वेश्म सुप्रभा रोहिणी यथा ॥ ७ ॥

इस प्रकार उस पुत्रको पाकर रोहिणी मन-ही-मन प्रसन्न हुई; किंतु लज्जासे उसका मुख कुछ नीचेको झुक गया। फिर तो वह उत्तम प्रभासे युक्त रोहिणीके समान अपने भवनके भीतर चली गयी ॥ ७ ॥

तस्य गर्भस्य मार्गेण गर्भमाधत्त देवकी।
यदर्थं सप्त ते गर्भाः कंसेन विनिपातिताः ॥ ८ ॥

उधर देवकीके उस सातवें गर्भकी खोज होने लगी; इतनेहीमें उसने आठवाँ गर्भ धारण किया; जिसके लिये कंसने उसके पहलेके सात गर्भ मार गिराये थे ॥ ८ ॥

तं तु गर्भं प्रयत्नेन ररक्षुस्तस्य मन्त्रिणः।
सोऽप्यत्र गर्भंवसतौ वस्त्यात्मेच्छया हरिः ॥ ९ ॥

कंसके मन्त्री उस आठवें गर्भकी रक्षामें यत्नपूर्वक लग गये। इधर भगवान् विष्णु भी स्वेच्छासे ही उस गर्भमें निवास करने लगे ॥ ९ ॥

यशोदापि समाधत्त गर्भं तदहरेव तु।
विष्णोः शरीरजां निद्रां विष्णोर्निर्देशकारिणीम् ॥ १० ॥

उसी दिन (गोकुलमें) यशोदाने भी भगवान् विष्णुकी आज्ञाका पालन करनेवाली तथा उन्हींके शरीरसे प्रकट हुई योगनिद्राको अपने गर्भमें धारण किया ॥ १० ॥

गर्भकाले त्वसम्पूर्णे अष्टमे मासि ते स्त्रियौ।
देवकी च यशोदा च सुपुवाते समं तदा ॥ ११ ॥

गर्भका समय पूर्ण होनेसे पहले ही आठवें मासमें, उन दोनों स्त्रियों—यशोदा और रोहिणीने प्रायः एक ही साथ प्रसव किया ॥ ११ ॥

यामेव रजनीं कृष्णो जज्ञे वृष्णिकुलोद्वहः।
तामेव रजनीं कन्यां यशोदापि व्यजायत ॥ १२ ॥

वृष्णिकुलका भार वहन करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण जिस रातमें प्रकट हुए, उसी रातमें यशोदाने भी एक कन्याको जन्म दिया ॥ १२ ॥

नन्दगोपस्य भार्यैका वसुदेवस्य चापरा।
तुल्यकालं च गर्भिण्यौ यशोदा देवकी तथा ॥ १३ ॥

एक यशोदा नन्दगोपकी भार्या थी और दूसरी देवकी वसुदेवकी। वे दोनों प्रायः एक ही समयमें गर्भवती हुईं ॥ १३ ॥

देवक्यजनयद् विष्णुं यशोदा तां तु दारिकाम्।
मुहूर्तेऽभिजिति प्राप्ते सार्धरात्रे विभूषिते ॥ १४ ॥

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