भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 243

२२० श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

कुक्कुटैश्छागलैर्मेषैः सिंहैर्व्याघ्रैः समाकुला । घण्टानिनादबहुला विन्ध्यवासिन्यभिश्रुता ॥ ८ ॥

मुर्गे, बकरे, भेंड़, सिंह तथा व्याघ्र आदि पशु-पक्षी तुम्हें सदा घेरे रहते हैं । तुम्हारे पास घण्टाकी ध्वनि अधिक होती है । तुम 'विन्ध्यवासिनी' नामसे विख्यात हो ॥ ८ ॥

त्रिशूलपट्टिशधरा सूर्यचन्द्रपताकिनी । नवमी कृष्णपक्षस्य शुक्लस्यैकादशी तथा ॥ ९ ॥

देवि ! तुम त्रिशूल और पट्टिश धारण करनेवाली हो । तुम्हारी पताकापर सूर्य और चन्द्रके चिह्न हैं । तुम प्रत्येक मासके कृष्णपक्षकी नवमी और शुक्लपक्षकी एकादशी हो ॥

भगिनी बलदेवस्य रजनी कलहप्रिया । आवासः सर्वभूतानां निष्ठा च परमा गतिः ॥ १० ॥

बलदेवजीकी बहिन हो । रात्रि तुम्हारा स्वरूप है । कलह तुम्हें प्रिय लगता है । तुम सम्पूर्ण भूतोंका आवासस्थान, मृत्यु तथा परम गति हो ॥ १० ॥

नन्दगोपसुता चैव देवानां विजयावहा । चीरवासाः सुवासाश्च रौद्री संध्याचरी निशा ॥ ११ ॥

तुम नन्दगोपकी पुत्री, देवताओंको विजय दिलानेवाली, चीर वस्त्रधारिणी, सुवासिनी, रौद्री, संध्याकालमें विचरने-वाली और रात्रि हो ॥ ११ ॥

प्रकीर्णकेशी मृत्युश्च सुरामांसबलिप्रिया । लक्ष्मीरलक्ष्मीरूपेण दानवानां वधाय च ॥ १२ ॥

तुम्हारे केश बिखरे हुए हैं । तुम्हीं प्राणियोंकी मृत्यु हो । मधुसे युक्त तथा मांससे रहित बलि तुम्हें प्रिय है । तुम्हीं लक्ष्मी हो तथा तुम्हीं दानवोंका वध करनेके लिये अलक्ष्मी बन जाती हो ॥ १२ ॥

सावित्री चापि देवानां माता भूतगणस्य च । कन्यानां ब्रह्मचर्यं त्वं सौभाग्यं प्रमदासु च ॥ १३ ॥

तुम्हीं सावित्री, देवमाता अदिति तथा समस्त भूतोंकी जननी हो । कन्याओंका ब्रह्मचर्य तुम्हीं हो और विवाहिता युवतियोंका सौभाग्य भी तुम्हीं हो ॥ १३ ॥

अन्तर्वेदी च यज्ञानामृत्विजां चैव दक्षिणा । कर्षकाणां च सीतेति भूतानां धरणीति च ॥ १४ ॥

तुम्हीं यज्ञोंकी अन्तर्वेदी तथा ऋत्विजोंकी दक्षिणा हो । किसानोंकी सीता (हल जोतनेसे उभरी हुई रेखा) तथा समस्त प्राणियोंको धारण करनेवाली धरणी भी तुम्हीं हो ॥

सिद्धिः सांयात्रिकाणां तु वेला त्वं सागरस्य च । यक्षाणां प्रथमा यक्षी नागानां सुरसेति च ॥ १५ ॥

नौका या जहाजसे यात्रा करनेवाले व्यापारियोंको प्राप्त होनेवाली सिद्धि भी तुम्हीं हो । तुम्हीं समुद्रकी तट-भूमि, यक्षोंकी प्रथम यक्षी (कुबेरकी माता) तथा नागोंकी जननी सुरसा हो ॥ १५ ॥

ब्रह्मवादिन्यथो दीक्षा शोभा च परमा तथा । ज्योतिषां त्वं प्रभा देवि नक्षत्राणां च रोहिणी ॥ १६ ॥

देवि ! तुम ब्रह्मवादिनी दीक्षा तथा परम शोभा हो । ज्योतिर्मय ग्रहों एवं तारिकाओंकी प्रभा हो तथा नक्षत्रोंमें रोहिणी हो ॥ १६ ॥

राजद्वारेषु तीर्थेषु नदीनां सङ्गमेषु च । पूर्णा च पूर्णिमा चन्द्रे कृत्तिवासा इति स्मृता ॥ १७ ॥

राजद्वारों, तीर्थों तथा नदियोंके संगमोंमें तुम पूर्ण लक्ष्मी-रूपसे स्थित हो । तुम्हीं चन्द्रमामें पूर्णिमा रूपसे विराजमान होती हो तथा तुम्हीं कृत्तिवासा हो ॥ १७ ॥

सरस्वती च वाल्मीके स्मृतिद्वैपायने तथा । ऋषीणां धर्मबुद्धिस्तु देवानां मानसी तथा ॥ १८ ॥

तुम महर्षि वाल्मीकिमें सरस्वती-रूपसे, श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासमें स्मृतिरूपसे तथा ऋषि-मुनियोंमें धर्म-बुद्धिरूपसे स्थित हो । देवताओंमें सत्यसंकल्पात्मक चित्तवृत्ति भी तुम्हीं हो ॥ १८ ॥

सुरा देवी तु भूतेषु स्तूयसे त्वं स्वकर्मभिः । इन्द्रस्य चारुदृष्टिस्त्वं सहस्रनयनेति च ॥ १९ ॥

तुम समस्त भूतोंमें सुरा देवी हो और अपने कर्मोंद्वारा सदा प्रशंसित होती हो । इन्द्रकी मनोहर दृष्टि भी तुम्हीं हो; सहस्रों नेत्रोंसे युक्त होनेके कारण 'सहस्रनयना' नामसे तुम्हारी ख्याति है ॥ १९ ॥

तापसानां च देवी त्वमरणी चाग्निहोत्रिणाम् । क्षुधा च सर्वभूतानां तृप्तिस्त्वं दैवतेषु च ॥ २० ॥

तुम तपस्वी मुनियोंकी देवी हो । अग्निहोत्र करनेवाले ब्राह्मणोंकी अरणी हो । समस्त प्राणियोंकी क्षुधा तथा देवताओंमें सदा बनी रहनेवाली तृप्ति हो ॥ २० ॥

स्वाहा तृप्तिर्धृतिर्मेधा वसूनां त्वं वसुमती । आशा त्वं मानुषाणां च पुष्टिंश्च कृतकर्मणाम् ॥ २१ ॥

तुम्हीं स्वाहा, तृप्ति, धृति और मेधा हो । वसुओंकी बसुमती भी तुम्हीं हो । तुम्हीं मनुष्योंकी आशा तथा कृतकृत्य पुरुषोंकी पुष्टि हो ॥ २१ ॥

दिशश्च विदिशश्चैव तथा ह्यग्निशिखा प्रभा । शकुनी पूतना त्वं च रेवती च सुदारुणा ॥ २२ ॥

तुम्हीं दिशा, विदिशा, अग्निशिखा, प्रभा, शकुनी, पूतना तथा अत्यन्त दारुण रेवती हो ॥ २२ ॥

निद्रापि सर्वभूतानां मोहिनी क्षत्रिया तथा । विद्यानां ब्रह्मविद्या त्वमोङ्कारोऽथ वषट् तथा ॥ २३ ॥