विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 241, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| २१८ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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होओगी। भाद्रपद कृष्णपक्षकी नवमी तिथिको ही तुम्हारा जन्म होगा॥ ३५॥
अहं त्वभिजितो योगे निशायां यौवने स्थिते।
अर्धरात्रे करिष्यामि गर्भमोक्षं यथासुखम्॥ ३६॥
'जब रात्रि युवावस्थामें स्थित होगी, उस आधी रातके समय अभिजित् मुहूर्तके योगमें मैं सुखपूर्वक गर्भवासका त्याग करूँगा (अर्थात् माताके उदरसे बाहर निकल आऊँगा)॥
अष्टमस्य तु मासस्य जातावावां ततः समम्।
प्राप्स्यावो गर्भव्यत्यासं प्राप्ते कंसस्य नाशने॥ ३७॥
'हम दोनों भाई-बहिन गर्भके आठवें महीनेमें जन्म लेंगे। फिर कंसके भावी विनाशका कारण प्राप्त होनेपर हम दोनों साथ ही गर्भव्यत्यासको प्राप्त होंगे (बदल दिये जायेंगे)॥ ३७॥
अहं यशोदां यास्यामि त्वं देवि भज देवकीम्।
आवयोर्गर्भसंयोगे कंसो गच्छतु मूढताम्॥ ३८॥
'देवि ! मैं तो यशोदा माताके पास पहुँच जाऊँगा और तुम देवकीका आश्रय लेना। हम दोनोंके परिवर्तित गर्भसंयोग-के विषयमें कंस मूढभावको ही प्राप्त हो (वह इस अदला बदली-के रहस्यसे अनभिज्ञ ही रहे)॥ ३८॥
ततस्त्वां गृह्य चरणे शिलायां पातयिष्यति।
निरस्यमाना गगने स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्॥ ३९॥
'तदनन्तर कंस तुम्हारे पैर पकड़कर तुम्हें शिलापर पटक देगा, परंतु तुम उसके हाथसे निकलकर आकाशमे शाश्वत स्थान प्राप्त कर लोगी॥ ३९॥
मच्छवीसदृशी कृष्णा संकर्षणसमानना।
बिभ्रती विपुलौ बाहू मम बाहूपमौ दिवि॥ ४०॥
'तुम्हारी अङ्ग-कान्ति मेरी ही छविके समान श्याम होगी, परंतु मुख भैया संकर्षणके समान गौर होगा। तुम आकाश-में मेरी ही भुजाओंके समान दोनों ओर दो-दो हृष्ट-पुष्ट विशाल बाहें धारण करोगी॥ ४०॥
त्रिशिखं शूलमुद्यम्य खड्गं च कनकत्सरुम्।
पात्रीं च पूर्णां मधुना पङ्कजं च सुनिर्मलम्॥ ४१॥
'चार भुजाओंमें तीन शिखाओंसे युक्त शूल (त्रिशूल), सोनेकी मूठ लगी हुई तलवार, मधुसे भरा हुआ पात्र तथा अत्यन्त निर्मल कमल धारण करके सुशोभित होओगी॥४१॥
नीलकौशेयसंवीता पीतेनोत्तरवाससा।
शशिरश्मिप्रकाशेन हारेणोरसि राजता॥ ४२॥
'तुम्हारे श्रीअङ्गमें नीले रंगकी रेशमी साड़ी शोभा पायेगी और तुम रेशमी पीताम्बरकी चादर ओढ़े रहोगी। तुम्हारे वक्षःस्थलमें चन्द्रमाकी किरणोंके समान प्रकाशमान श्वेत हार शोभा दे रहा होगा॥ ४२॥
दिव्यकुण्डलपूर्णाभ्यां श्रवणाभ्यां विभूषिता।
चन्द्रसापत्नभूतेन मुखेन त्वं विराजिता॥ ४३॥
'दिव्य कुण्डलोंसे मण्डित कर्णयुगल तुम्हें विभूषित करेंगे और चन्द्रमाकी भी शोभाको छीन लेनेवाले अपने मनोरम मुखसे तुम अत्यन्त शोभायमान होओगी॥ ४३॥
मुकुटेन विचित्रेण केशवन्धेन शोभिना।
भुजङ्गाभैर्भुजैर्भीमैर्भूषयन्ती दिशो दश॥ ४४॥
'तुम्हारे मस्तकपर विचित्र मुकुट और शोभाशाली केश-बन्ध फबते होंगे। भुजङ्गोंकी-सी आभावाली अपनी भयानक भुजाओंसे तुम दसों दिशाओंकी शोभा बढ़ाओगी॥४४॥
ध्वजेन शिखिबर्हेण उच्छ्रितेन विराजत।
अङ्गेन मयूराणामङ्गेन च भास्वता॥ ४५॥
'मोरपंखसे विभूषित ऊँचे ध्वज तथा मयूरपिच्छके ही बने हुए प्रकाशमान अङ्गद (भुजबंद) से तुम प्रकाशित हओगी॥ ४५॥
कीर्णा भूतगणैर्घोरैर्मन्नियोगानुवर्तिनी।
कौमारं व्रतमास्थाय त्रिदिवं त्वं गमिष्यसि॥ ४६॥
'भयंकर भूतगणोंसे घिरकर मेरी आज्ञाके अधीन रहती हुई तुम सदा कुमारी रहनेका व्रत लेकर स्वर्गलोकको चली जाओगी॥ ४६॥
तत्र त्वां शतदृक्छक्रो मत्प्रदिष्टेन कर्मणा।
अभिषेकेण दिव्येन दैवतैः सह योक्ष्यसे॥ ४७॥
'वहाँ देवताओंसहित सहस्र नेत्रधारी इन्द्र मेरी आज्ञाके अनुसार सब कार्योंका सम्पादन करनेके कारण (अथवा मेरी बतायी हुई पद्धतिके अनुसार) तुम्हारा दिव्य विधिसे अभिषेक करेंगे॥ ४७॥
तत्रैव त्वां भगिन्यर्थे ग्रहीष्यति स वासवः।
कुशिकस्य तु गोत्रेण कौशिकी त्वं भविष्यसि॥ ४८॥
'वहीं इन्द्र अपनी बहिन बनानेके लिये तुम्हें सादर ग्रहण करेंगे। कुशिकके गोत्रसे सम्बन्ध होनेके कारण तुम 'कौशिकी' नामसे प्रसिद्ध होओगी॥ ४८॥
स ते विन्ध्ये नगश्रेष्ठे स्थानं दास्यति शाश्वतम्।
ततः स्थानसहस्रैस्त्वं पृथिवीं शोभयिष्यसि॥ ४९॥
'वे देवराज इन्द्र पर्वतोंमें श्रेष्ठ विन्ध्यगिरिपर तुम्हें शाश्वत स्थान प्रदान करेंगे। तत्पश्चात् तुम अपने सहस्रों स्थानोंद्वारा सारी पृथ्वीको सुशोभित करोगी॥ ४९॥
त्रैलोक्यचारिणी सा त्वं भुवि सत्योपयाचना।
चरिष्यसि महाभागे वरदा कामरूपिणी॥ ५०॥
१. एक ही रातमें अष्टमीके बाद नवमी लग जानेपर देवीका यशोदाके गर्भसे प्राकट्य हुआ था—ऐसा समझना चाहिये।