विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 240, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें[विष्णुपर्व ] द्वितीयोऽध्यायः २१७
‘उन ‘षड्गर्भ’ नामवाले दैत्योंको इस प्रकार वर देकर स्वयम्भू ब्रह्माजी ब्रह्मलोकको चले गये। उधर हिरण्यकशिपुने रोषमें भरकर उनसे कहा—॥ २० ॥
मामुत्सृज्य वरो यस्माद् वृतो वः पद्मसंभवात्।
तस्माद् वस्त्याजितः स्नेहः शत्रुभूतांस्त्यजाम्यहम् ॥ २१ ॥
‘अरे ! तुमने मुझे छोड़कर कमलयोनि ब्रह्माजीसे वर ग्रहण किया है; अतः अपने प्रति मेरे स्नेहका त्याग करा दिया। अब तुमलोग मेरे शत्रुभूत हो, इसलिये तुम्हें त्याग देता हूँ ॥ २१ ॥
षड्गर्भा इति योऽयं वः शब्दः पित्राभिवर्धितः ।
स एव वो गर्भगतान पिता सर्वान् वधिष्यति ॥ २२ ॥
‘जिस पिताने तुम्हें ‘षड्गर्भ’ नाम दिया और पाल-पोस-कर बड़ा किया है, वही गर्भमें स्थित होनेपर तुम सब लोगोंका वध कर डालेगा ॥ २२ ॥
षडेव देवकीगर्भे षड्गर्भा वै महासुराः।
भविष्यथ ततः कंसो गर्भस्थान् वो वधिष्यति ॥ २३ ॥
‘तुम छहों ‘षड्गर्भ’ नामक महान् असुर देवकीके गर्भमें स्थित होओगे। तब कंस (जो तुम्हारे पिता कालनेमिका ही स्वरूप होगा) तुम गर्भस्थ बालकोंका वध कर डालेगा’ ॥
वैशम्पायन उवाच
जगामाथ ततो विष्णुः पातालँ यत्र तेऽसुराः ।
षड्गर्भाः संयताः सन्ति जले गर्भगृहेशयाः ॥ २४ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! उनकी याद आते ही भगवान् विष्णु पाताललोकमें गये, जहाँ वे ‘षड्गर्भ’ नामक असुर संयमनिष्ठ होकर जलके भीतर गर्भगृहमें शयन करते थे ॥
संददर्श जले सुप्तान् षड्गर्भान् गर्भसंस्थितान् ।
निद्रया कालरूपिण्या सर्वानन्तर्हितान् स वै ॥ २५ ॥
उन्होंने देखा, सब ‘षड्गर्भ’ नामक दैत्य कालरूपिणी निद्रासे तिरोहित होकर जलके भीतर गर्भगृहमें सो रहे हैं ॥
स्वप्नरूपेण तेषां वै विष्णुर्देहानथाविशत् ।
प्राणेश्वरांश्च निष्कृष्य निद्रायै प्रददौ तदा ॥ २६ ॥
तब भगवान् विष्णु स्वप्नरूपसे उनके शरीरोंमें प्रविष्ट हुए और उनके जीवोंको खींचकर उन्होंने निद्राकी अधिष्ठात्री देवीके हाथमें दे दिया ॥ २६ ॥
तां चोवाच ततो निद्रां विष्णुः सत्यपराक्रमः ।
गच्छ निद्रे मयोत्सृष्टा देवकीभवनान्तिकम् ॥ २७ ॥
इमान् प्राणेश्वरान् गृह्य षड्गर्भान् दानवोत्तमान् ।
षड्गर्भान् देवकीगर्भे योजयस्व यथाक्रमम् ॥ २८ ॥
तत्पश्चात् सत्यपराक्रमी भगवान् विष्णु उस निद्रासे बोले—‘निद्रे ! तुम मेरी प्रेरणासे इन जीवोंको लेकर देवकीके घरके निकट जाओ। ये सब-के-सब ‘षड्गर्भ’ नामवाले श्रेष्ठ दानव हैं। इन सब षड्गर्भोको क्रमशः देवकीके गर्भमें स्थापित करती रहो ॥ २७-२८ ॥
जातेष्वेतेषु गर्भेषु नीतेषु च यमक्षयम् ।
कंसस्य विफले यत्ने देवक्याः सफले श्रमे ॥ २९ ॥
प्रसादं ते करिष्यामि मत्प्रभावसमं भुवि ।
येन सर्वस्य लोकस्य देवि देवी भविष्यसि ॥ ३० ॥
‘जब ये गर्भ जन्म लेकर कंसद्वारा यमलोक पहुँचा दिये जायेंगे, जब कंसका प्रयत्न निष्फल और देवकीका परिश्रम सफल हो जायगा, तब मैं तुमपर विशेष कृपा करूँगा। देवि ! उस समयसे भूतलपर तुम्हारा प्रभाव मेरे प्रभावके समान ही हो जायगा, जिससे तुम सम्पूर्ण जगत्की आराध्य देवी बन जाओगी ॥ २९-३० ॥
सप्तमो देवकीगर्भो योऽशः सौम्यो ममाग्रजः ।
स संक्रामयितव्यस्ते सप्तमे मासि रोहिणीम् ॥ ३१ ॥
‘देवकीका जो सातवाँ गर्भ होगा, वह मेरा ही सौम्य अंश होगा और मुझसे पहले अवतीर्ण होनेके कारण मेरा बड़ा भाई होगा। वह गर्भ जब सात महीनेका हो जाय, तब उस सातवें मासमें ही तुम उसे खींचकर रोहिणीदेवीके गर्भमें स्थापित कर देना ॥ ३१ ॥
संकर्षणात्तु गर्भस्य स तु संकर्षणो युवा ।
भविष्यत्यग्रजो भ्राता मम शीतांशुदर्शनः ॥ ३२ ॥
‘गर्भका संकर्षण होनेसे वह तरुण वीर ‘संकर्षण’ नामसे प्रसिद्ध होगा, चन्द्रमाके समान गौर वर्णसे सुशोभित दिखायी देगा तथा वह मेरा बड़ा भाई होगा ॥ ३२ ॥
पतितो देवकीगर्भः सप्तमोऽयं भयादिति ।
अष्टमे मयि गर्भस्थे कंसो यत्नं करिष्यति ॥ ३३ ॥
‘उस समय लोग यही कहेंगे कि ‘देवकीका सातवाँ गर्भ कंसके भयसे गिर गया।’¹ आठवें शिशुके रूपमें जब मैं गर्भमें आऊँगा, तब कंस मुझे भी मारनेका प्रयास करेगा ॥ ३३ ॥
या तु सा नन्दगोपस्य दयिता भुवि विश्रुता।
यशोदा नाम भद्रं ते भार्या गोपकुलोद्वहा ॥ ३४ ॥
‘देवि ! तुम्हारा भला हो, इस समय भूतलपर ‘यशोदा’ नामसे विख्यात जो नन्दगोपकी प्यारी पत्नी हैं, वे गोपकुलकी स्वामिनी हैं ॥ ३४ ॥
तस्यास्त्वं नवमो गर्भः कुलेऽस्माकं भविष्यसि ।
नवम्यामेव संजाता कृष्णपक्षस्य वै तिथौ ॥ ३५ ॥
‘तुम उन्हींके नवमें गर्भके रूपमें हमारे कुलमें उत्पन्न
¹ १. यह नवम संख्या देवकीके आठ पुत्रोंकी अपेक्षासे कही गयी है। जान पड़ता है, श्रीकृष्णके बाद कुछ कालके लिये योगनिद्राका भी देवकीके उदरमें प्रवेश हुआ था।