विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 239, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें२१६ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
स्त्रीभिर्वर्षवरैश्चैव वक्तव्यं न तु कारणम् ॥ ५ ॥
मेरे हितैषी सेवक रात-दिन सावधान रहकर स्त्रियोंसे सनाथ अन्तःपुरमें वसुदेवजीकी भलीभाँति रक्षा (देखभाल) करें। स्त्रियाँ और हिंजड़े भी उनपर कड़ी दृष्टि रखें, परंतु इसका कारण उन्हें नहीं बताना चाहिये ॥ ५ ॥
एष मानुष्यको यत्नो मानुषैरेव साध्यते ।
श्रूयतां येन दैवं हि मद्graph/मद्विधैः प्रतिहन्यते ॥ ६ ॥
मनुष्योंद्वारा किया जानेवाला यह उपाय उन्हींसे साध्य हो सकता है, परंतु मेरे-जैसे शक्तिशाली पुरुष जिस उपायसे दैवको भी प्रतिहत (निष्फल) कर देते हैं, उसे सुनो ॥ ६॥
मन्त्रग्रामैः सुविहितैरौषधैश्च सुयोजितैः ।
यत्नेन चानुकूलेन दैवमप्यनुल pass/दैवमप्यनुलोम्यते ॥ ७ ॥
भलीभाँति किये हुए मन्त्रसमूहोंके जप, अच्छी तरह उपयोगमें लाये हुए औषधोंके सेवन तथा अनुकूल प्रयत्नसे दैवको भी अपने अनुकूल बना लिया जाता है ॥ ७ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवं स यत्नवान् कंसो देवकीगर्भकृन्तने ।
भयेन मन्त्रयामास श्रुतार्थो नारदात् स वै ॥ ८ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन् ! इस प्रकार कंस देवकीके गर्भका विनाश करनेके यत्नमें लग गया। नारदजीसे सारी बातें वह सुन चुका था, इसलिये भयसे प्रेरित होकर अपनी रक्षाके लिये मन्त्रियोंके साथ मन्त्रणा करने लगा ॥ ८ ॥
एवं श्रुत्वा प्रयत्नं वै कंसस्यारिष्टसंज्ञितम् ।
अन्तर्धानं गतो विष्णुश्चिन्तयामास वीर्यवान् ॥ ९ ॥
कंसका सारा प्रयत्न जगत्के लिये उत्पातरूप ही था, उसे सुनकर अदृश्य भावसे वहाँ स्थित हुए परम पराक्रमी भगवान् विष्णुने इस प्रकार विचार किया—॥ ९ ॥
सप्तेमान् देवकीगर्भान् भोजपुत्रो वधिष्यति ।
अष्टमे च मया गर्भे कार्यमाधानमात्मनः ॥ १० ॥
'भोजकुमार कंस देवकीके इन सात गर्भोको मार डालेगा। अथवा आठवें गर्भमें मुझे अपने स्वरूपका आधान करना चाहिये' ॥ १० ॥
तस्य चिन्तयतस्त्वेवं पातालमगमन्मनः ।
यत्र ते गर्भशयनाः षड्गर्भा नाम दानवाः ॥ ११ ॥
इस प्रकार सोचते हुए भगवान्का मन सहसा पातालकी ओर गया, जहाँ वे गर्भमें शयन करनेवाले षडगर्भ नामक दानव विद्यमान थे ॥ ११ ॥
विक्रान्तवपुषो दीप्तास्तेऽमृतप्राशनोपमाः ।
अमरप्रतिमा युद्धे पुत्रा वै कालनेमिनः ॥ १२ ॥
उनके शरीर बल-विक्रमसे सम्पन्न थे। वे अमृतभोजी देवताओंके समान तेजस्वी थे और युद्धमें देवताओंके तुल्य पराक्रम प्रकट करते थे। वे सब-के-सब कालनेमि नामक दैत्यके पुत्र थे ॥ १२ ॥
ते ताततातं संत्यज्य हिरण्यकशिपुं पुरा ।
उपासांचक्रिरे दैत्याः पुरा लोकपितामहम् ॥ १३ ॥
पहलेकी बात है, वे दैत्य अपने पिताके भी पिता हिरण्यकशिपुको छोड़कर लोकपितामह ब्रह्माजीकी उपासना करने लगे ॥ १३ ॥
तप्यमानास्तपस्तीव्रं जटामण्डलधारिणः ।
तेषां प्रीतोऽभवद् ब्रह्मा षड्गर्भाणां वरं ददौ ॥ १४ ॥
सिरपर जटाका भार धारण किये वे तीव्र तपस्यामें लग गये। तब ब्रह्माजी उन 'षडगर्भ' नामक दैत्योंपर प्रसन्न हो गये और उन्हें वर देने लगे ॥ १४ ॥
ब्रह्मोवाच
भो भो दानवशार्दूलास्तपसाहं सुतोषिताः ।
ब्रूत वो यस्य यः कामस्तस्य तं तं करोम्यहम् ॥ १५ ॥
ब्रह्माजीने कहा—दानवकुलमें सिंहके समान पराक्रमी वीरो ! मैं तुम्हारी तपस्यासे बहुत संतुष्ट हूँ। तुममेंसे जिसे जिस वस्तुकी इच्छा हो, उसे बताओ; मैं वह सब पूर्ण करूँगा ॥
ते तु सर्वे समानार्था दैत्या ब्रह्माणमब्रुवन् ।
यदि नो भगवान् प्रीतो दीयतां नो वरो वरः ॥ १६ ॥
उन सब दैत्योंका प्रयोजन या मनोरथ एक-सा ही था। वे ब्रह्माजीसे बोले—'भगवन् ! यदि आप हमपर प्रसन्न हों तो हमें यह श्रेष्ठ वर दीजिये ॥ १६ ॥
अवध्याः स्याम भगवन् दैवतैः समहोरगैः ।
शापप्रहरणैश्चैव स्वस्ति नोऽस्तु महर्षिभिः ॥ १७ ॥
'भगवन् ! हम देवताओं तथा बड़े-बड़े नागोंसे भी अवध्य हों। जो शापद्वारा प्रहार करनेवाले हैं, उन महर्षियोंसे भी हमारा सदा कल्याण ही हो ॥ १७ ॥
यक्षगन्धर्वपतिभिः सिद्धचारणमानवैः ।
मा भूद् वधो नो भगवन् ददासि यदि नो वरम् ॥ १८ ॥
'भगवन् ! यदि आप हमें वर दे रहे हैं, तो यक्ष, गन्धर्व-पति, सिद्ध, चारण तथा मनुष्योंद्वारा हमारा वध न हो' ॥
तानुवाच ततो ब्रह्मा सुप्रीतेनान्तरात्मना ।
भवद्भिर्यदिदं प्रोक्तं सर्वमेतद् भविष्यति ॥ १९ ॥
तब ब्रह्माजीने उनके प्रति अत्यन्त प्रसन्नचित्तसे कहा—'तुमलोगोंने यह जो कुछ कहा है, वह सब पूरा होगा' ॥१९॥
षड्गर्भाणां वरं दत्त्वा स्वयम्भूस्त्रिदिवं गतः ।
ततो हिरण्यकशिपुः सरोषो वाक्यमब्रवीत् ॥ २० ॥