विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
२१६ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
स्त्रीभिर्वर्षवरैश्चैव वक्तव्यं न तु कारणम् ॥ ५ ॥
मेरे हितैषी सेवक रात-दिन सावधान रहकर स्त्रियोंसे सनाथ अन्तःपुरमें वसुदेवजीकी भलीभाँति रक्षा (देखभाल) करें। स्त्रियाँ और हिंजड़े भी उनपर कड़ी दृष्टि रखें, परंतु इसका कारण उन्हें नहीं बताना चाहिये ॥ ५ ॥
एष मानुष्यको यत्नो मानुषैरेव साध्यते ।
श्रूयतां येन दैवं हि मद्graph/मद्विधैः प्रतिहन्यते ॥ ६ ॥
मनुष्योंद्वारा किया जानेवाला यह उपाय उन्हींसे साध्य हो सकता है, परंतु मेरे-जैसे शक्तिशाली पुरुष जिस उपायसे दैवको भी प्रतिहत (निष्फल) कर देते हैं, उसे सुनो ॥ ६॥
मन्त्रग्रामैः सुविहितैरौषधैश्च सुयोजितैः ।
यत्नेन चानुकूलेन दैवमप्यनुल pass/दैवमप्यनुलोम्यते ॥ ७ ॥
भलीभाँति किये हुए मन्त्रसमूहोंके जप, अच्छी तरह उपयोगमें लाये हुए औषधोंके सेवन तथा अनुकूल प्रयत्नसे दैवको भी अपने अनुकूल बना लिया जाता है ॥ ७ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवं स यत्नवान् कंसो देवकीगर्भकृन्तने ।
भयेन मन्त्रयामास श्रुतार्थो नारदात् स वै ॥ ८ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन् ! इस प्रकार कंस देवकीके गर्भका विनाश करनेके यत्नमें लग गया। नारदजीसे सारी बातें वह सुन चुका था, इसलिये भयसे प्रेरित होकर अपनी रक्षाके लिये मन्त्रियोंके साथ मन्त्रणा करने लगा ॥ ८ ॥
एवं श्रुत्वा प्रयत्नं वै कंसस्यारिष्टसंज्ञितम् ।
अन्तर्धानं गतो विष्णुश्चिन्तयामास वीर्यवान् ॥ ९ ॥
कंसका सारा प्रयत्न जगत्के लिये उत्पातरूप ही था, उसे सुनकर अदृश्य भावसे वहाँ स्थित हुए परम पराक्रमी भगवान् विष्णुने इस प्रकार विचार किया—॥ ९ ॥
सप्तेमान् देवकीगर्भान् भोजपुत्रो वधिष्यति ।
अष्टमे च मया गर्भे कार्यमाधानमात्मनः ॥ १० ॥
'भोजकुमार कंस देवकीके इन सात गर्भोको मार डालेगा। अथवा आठवें गर्भमें मुझे अपने स्वरूपका आधान करना चाहिये' ॥ १० ॥
तस्य चिन्तयतस्त्वेवं पातालमगमन्मनः ।
यत्र ते गर्भशयनाः षड्गर्भा नाम दानवाः ॥ ११ ॥
इस प्रकार सोचते हुए भगवान्का मन सहसा पातालकी ओर गया, जहाँ वे गर्भमें शयन करनेवाले षडगर्भ नामक दानव विद्यमान थे ॥ ११ ॥
विक्रान्तवपुषो दीप्तास्तेऽमृतप्राशनोपमाः ।
अमरप्रतिमा युद्धे पुत्रा वै कालनेमिनः ॥ १२ ॥
उनके शरीर बल-विक्रमसे सम्पन्न थे। वे अमृतभोजी देवताओंके समान तेजस्वी थे और युद्धमें देवताओंके तुल्य पराक्रम प्रकट करते थे। वे सब-के-सब कालनेमि नामक दैत्यके पुत्र थे ॥ १२ ॥
ते ताततातं संत्यज्य हिरण्यकशिपुं पुरा ।
उपासांचक्रिरे दैत्याः पुरा लोकपितामहम् ॥ १३ ॥
पहलेकी बात है, वे दैत्य अपने पिताके भी पिता हिरण्यकशिपुको छोड़कर लोकपितामह ब्रह्माजीकी उपासना करने लगे ॥ १३ ॥
तप्यमानास्तपस्तीव्रं जटामण्डलधारिणः ।
तेषां प्रीतोऽभवद् ब्रह्मा षड्गर्भाणां वरं ददौ ॥ १४ ॥
सिरपर जटाका भार धारण किये वे तीव्र तपस्यामें लग गये। तब ब्रह्माजी उन 'षडगर्भ' नामक दैत्योंपर प्रसन्न हो गये और उन्हें वर देने लगे ॥ १४ ॥
ब्रह्मोवाच
भो भो दानवशार्दूलास्तपसाहं सुतोषिताः ।
ब्रूत वो यस्य यः कामस्तस्य तं तं करोम्यहम् ॥ १५ ॥
ब्रह्माजीने कहा—दानवकुलमें सिंहके समान पराक्रमी वीरो ! मैं तुम्हारी तपस्यासे बहुत संतुष्ट हूँ। तुममेंसे जिसे जिस वस्तुकी इच्छा हो, उसे बताओ; मैं वह सब पूर्ण करूँगा ॥
ते तु सर्वे समानार्था दैत्या ब्रह्माणमब्रुवन् ।
यदि नो भगवान् प्रीतो दीयतां नो वरो वरः ॥ १६ ॥
उन सब दैत्योंका प्रयोजन या मनोरथ एक-सा ही था। वे ब्रह्माजीसे बोले—'भगवन् ! यदि आप हमपर प्रसन्न हों तो हमें यह श्रेष्ठ वर दीजिये ॥ १६ ॥
अवध्याः स्याम भगवन् दैवतैः समहोरगैः ।
शापप्रहरणैश्चैव स्वस्ति नोऽस्तु महर्षिभिः ॥ १७ ॥
'भगवन् ! हम देवताओं तथा बड़े-बड़े नागोंसे भी अवध्य हों। जो शापद्वारा प्रहार करनेवाले हैं, उन महर्षियोंसे भी हमारा सदा कल्याण ही हो ॥ १७ ॥
यक्षगन्धर्वपतिभिः सिद्धचारणमानवैः ।
मा भूद् वधो नो भगवन् ददासि यदि नो वरम् ॥ १८ ॥
'भगवन् ! यदि आप हमें वर दे रहे हैं, तो यक्ष, गन्धर्व-पति, सिद्ध, चारण तथा मनुष्योंद्वारा हमारा वध न हो' ॥
तानुवाच ततो ब्रह्मा सुप्रीतेनान्तरात्मना ।
भवद्भिर्यदिदं प्रोक्तं सर्वमेतद् भविष्यति ॥ १९ ॥
तब ब्रह्माजीने उनके प्रति अत्यन्त प्रसन्नचित्तसे कहा—'तुमलोगोंने यह जो कुछ कहा है, वह सब पूरा होगा' ॥१९॥
षड्गर्भाणां वरं दत्त्वा स्वयम्भूस्त्रिदिवं गतः ।
ततो हिरण्यकशिपुः सरोषो वाक्यमब्रवीत् ॥ २० ॥
[विष्णुपर्व ] द्वितीयोऽध्यायः २१७
‘उन ‘षड्गर्भ’ नामवाले दैत्योंको इस प्रकार वर देकर स्वयम्भू ब्रह्माजी ब्रह्मलोकको चले गये। उधर हिरण्यकशिपुने रोषमें भरकर उनसे कहा—॥ २० ॥
मामुत्सृज्य वरो यस्माद् वृतो वः पद्मसंभवात्।
तस्माद् वस्त्याजितः स्नेहः शत्रुभूतांस्त्यजाम्यहम् ॥ २१ ॥
‘अरे ! तुमने मुझे छोड़कर कमलयोनि ब्रह्माजीसे वर ग्रहण किया है; अतः अपने प्रति मेरे स्नेहका त्याग करा दिया। अब तुमलोग मेरे शत्रुभूत हो, इसलिये तुम्हें त्याग देता हूँ ॥ २१ ॥
षड्गर्भा इति योऽयं वः शब्दः पित्राभिवर्धितः ।
स एव वो गर्भगतान पिता सर्वान् वधिष्यति ॥ २२ ॥
‘जिस पिताने तुम्हें ‘षड्गर्भ’ नाम दिया और पाल-पोस-कर बड़ा किया है, वही गर्भमें स्थित होनेपर तुम सब लोगोंका वध कर डालेगा ॥ २२ ॥
षडेव देवकीगर्भे षड्गर्भा वै महासुराः।
भविष्यथ ततः कंसो गर्भस्थान् वो वधिष्यति ॥ २३ ॥
‘तुम छहों ‘षड्गर्भ’ नामक महान् असुर देवकीके गर्भमें स्थित होओगे। तब कंस (जो तुम्हारे पिता कालनेमिका ही स्वरूप होगा) तुम गर्भस्थ बालकोंका वध कर डालेगा’ ॥
वैशम्पायन उवाच
जगामाथ ततो विष्णुः पातालँ यत्र तेऽसुराः ।
षड्गर्भाः संयताः सन्ति जले गर्भगृहेशयाः ॥ २४ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! उनकी याद आते ही भगवान् विष्णु पाताललोकमें गये, जहाँ वे ‘षड्गर्भ’ नामक असुर संयमनिष्ठ होकर जलके भीतर गर्भगृहमें शयन करते थे ॥
संददर्श जले सुप्तान् षड्गर्भान् गर्भसंस्थितान् ।
निद्रया कालरूपिण्या सर्वानन्तर्हितान् स वै ॥ २५ ॥
उन्होंने देखा, सब ‘षड्गर्भ’ नामक दैत्य कालरूपिणी निद्रासे तिरोहित होकर जलके भीतर गर्भगृहमें सो रहे हैं ॥
स्वप्नरूपेण तेषां वै विष्णुर्देहानथाविशत् ।
प्राणेश्वरांश्च निष्कृष्य निद्रायै प्रददौ तदा ॥ २६ ॥
तब भगवान् विष्णु स्वप्नरूपसे उनके शरीरोंमें प्रविष्ट हुए और उनके जीवोंको खींचकर उन्होंने निद्राकी अधिष्ठात्री देवीके हाथमें दे दिया ॥ २६ ॥
तां चोवाच ततो निद्रां विष्णुः सत्यपराक्रमः ।
गच्छ निद्रे मयोत्सृष्टा देवकीभवनान्तिकम् ॥ २७ ॥
इमान् प्राणेश्वरान् गृह्य षड्गर्भान् दानवोत्तमान् ।
षड्गर्भान् देवकीगर्भे योजयस्व यथाक्रमम् ॥ २८ ॥
तत्पश्चात् सत्यपराक्रमी भगवान् विष्णु उस निद्रासे बोले—‘निद्रे ! तुम मेरी प्रेरणासे इन जीवोंको लेकर देवकीके घरके निकट जाओ। ये सब-के-सब ‘षड्गर्भ’ नामवाले श्रेष्ठ दानव हैं। इन सब षड्गर्भोको क्रमशः देवकीके गर्भमें स्थापित करती रहो ॥ २७-२८ ॥
जातेष्वेतेषु गर्भेषु नीतेषु च यमक्षयम् ।
कंसस्य विफले यत्ने देवक्याः सफले श्रमे ॥ २९ ॥
प्रसादं ते करिष्यामि मत्प्रभावसमं भुवि ।
येन सर्वस्य लोकस्य देवि देवी भविष्यसि ॥ ३० ॥
‘जब ये गर्भ जन्म लेकर कंसद्वारा यमलोक पहुँचा दिये जायेंगे, जब कंसका प्रयत्न निष्फल और देवकीका परिश्रम सफल हो जायगा, तब मैं तुमपर विशेष कृपा करूँगा। देवि ! उस समयसे भूतलपर तुम्हारा प्रभाव मेरे प्रभावके समान ही हो जायगा, जिससे तुम सम्पूर्ण जगत्की आराध्य देवी बन जाओगी ॥ २९-३० ॥
सप्तमो देवकीगर्भो योऽशः सौम्यो ममाग्रजः ।
स संक्रामयितव्यस्ते सप्तमे मासि रोहिणीम् ॥ ३१ ॥
‘देवकीका जो सातवाँ गर्भ होगा, वह मेरा ही सौम्य अंश होगा और मुझसे पहले अवतीर्ण होनेके कारण मेरा बड़ा भाई होगा। वह गर्भ जब सात महीनेका हो जाय, तब उस सातवें मासमें ही तुम उसे खींचकर रोहिणीदेवीके गर्भमें स्थापित कर देना ॥ ३१ ॥
संकर्षणात्तु गर्भस्य स तु संकर्षणो युवा ।
भविष्यत्यग्रजो भ्राता मम शीतांशुदर्शनः ॥ ३२ ॥
‘गर्भका संकर्षण होनेसे वह तरुण वीर ‘संकर्षण’ नामसे प्रसिद्ध होगा, चन्द्रमाके समान गौर वर्णसे सुशोभित दिखायी देगा तथा वह मेरा बड़ा भाई होगा ॥ ३२ ॥
पतितो देवकीगर्भः सप्तमोऽयं भयादिति ।
अष्टमे मयि गर्भस्थे कंसो यत्नं करिष्यति ॥ ३३ ॥
‘उस समय लोग यही कहेंगे कि ‘देवकीका सातवाँ गर्भ कंसके भयसे गिर गया।’¹ आठवें शिशुके रूपमें जब मैं गर्भमें आऊँगा, तब कंस मुझे भी मारनेका प्रयास करेगा ॥ ३३ ॥
या तु सा नन्दगोपस्य दयिता भुवि विश्रुता।
यशोदा नाम भद्रं ते भार्या गोपकुलोद्वहा ॥ ३४ ॥
‘देवि ! तुम्हारा भला हो, इस समय भूतलपर ‘यशोदा’ नामसे विख्यात जो नन्दगोपकी प्यारी पत्नी हैं, वे गोपकुलकी स्वामिनी हैं ॥ ३४ ॥
तस्यास्त्वं नवमो गर्भः कुलेऽस्माकं भविष्यसि ।
नवम्यामेव संजाता कृष्णपक्षस्य वै तिथौ ॥ ३५ ॥
‘तुम उन्हींके नवमें गर्भके रूपमें हमारे कुलमें उत्पन्न
¹ १. यह नवम संख्या देवकीके आठ पुत्रोंकी अपेक्षासे कही गयी है। जान पड़ता है, श्रीकृष्णके बाद कुछ कालके लिये योगनिद्राका भी देवकीके उदरमें प्रवेश हुआ था।
| २१८ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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होओगी। भाद्रपद कृष्णपक्षकी नवमी तिथिको ही तुम्हारा जन्म होगा॥ ३५॥
अहं त्वभिजितो योगे निशायां यौवने स्थिते।
अर्धरात्रे करिष्यामि गर्भमोक्षं यथासुखम्॥ ३६॥
'जब रात्रि युवावस्थामें स्थित होगी, उस आधी रातके समय अभिजित् मुहूर्तके योगमें मैं सुखपूर्वक गर्भवासका त्याग करूँगा (अर्थात् माताके उदरसे बाहर निकल आऊँगा)॥
अष्टमस्य तु मासस्य जातावावां ततः समम्।
प्राप्स्यावो गर्भव्यत्यासं प्राप्ते कंसस्य नाशने॥ ३७॥
'हम दोनों भाई-बहिन गर्भके आठवें महीनेमें जन्म लेंगे। फिर कंसके भावी विनाशका कारण प्राप्त होनेपर हम दोनों साथ ही गर्भव्यत्यासको प्राप्त होंगे (बदल दिये जायेंगे)॥ ३७॥
अहं यशोदां यास्यामि त्वं देवि भज देवकीम्।
आवयोर्गर्भसंयोगे कंसो गच्छतु मूढताम्॥ ३८॥
'देवि ! मैं तो यशोदा माताके पास पहुँच जाऊँगा और तुम देवकीका आश्रय लेना। हम दोनोंके परिवर्तित गर्भसंयोग-के विषयमें कंस मूढभावको ही प्राप्त हो (वह इस अदला बदली-के रहस्यसे अनभिज्ञ ही रहे)॥ ३८॥
ततस्त्वां गृह्य चरणे शिलायां पातयिष्यति।
निरस्यमाना गगने स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्॥ ३९॥
'तदनन्तर कंस तुम्हारे पैर पकड़कर तुम्हें शिलापर पटक देगा, परंतु तुम उसके हाथसे निकलकर आकाशमे शाश्वत स्थान प्राप्त कर लोगी॥ ३९॥
मच्छवीसदृशी कृष्णा संकर्षणसमानना।
बिभ्रती विपुलौ बाहू मम बाहूपमौ दिवि॥ ४०॥
'तुम्हारी अङ्ग-कान्ति मेरी ही छविके समान श्याम होगी, परंतु मुख भैया संकर्षणके समान गौर होगा। तुम आकाश-में मेरी ही भुजाओंके समान दोनों ओर दो-दो हृष्ट-पुष्ट विशाल बाहें धारण करोगी॥ ४०॥
त्रिशिखं शूलमुद्यम्य खड्गं च कनकत्सरुम्।
पात्रीं च पूर्णां मधुना पङ्कजं च सुनिर्मलम्॥ ४१॥
'चार भुजाओंमें तीन शिखाओंसे युक्त शूल (त्रिशूल), सोनेकी मूठ लगी हुई तलवार, मधुसे भरा हुआ पात्र तथा अत्यन्त निर्मल कमल धारण करके सुशोभित होओगी॥४१॥
नीलकौशेयसंवीता पीतेनोत्तरवाससा।
शशिरश्मिप्रकाशेन हारेणोरसि राजता॥ ४२॥
'तुम्हारे श्रीअङ्गमें नीले रंगकी रेशमी साड़ी शोभा पायेगी और तुम रेशमी पीताम्बरकी चादर ओढ़े रहोगी। तुम्हारे वक्षःस्थलमें चन्द्रमाकी किरणोंके समान प्रकाशमान श्वेत हार शोभा दे रहा होगा॥ ४२॥
दिव्यकुण्डलपूर्णाभ्यां श्रवणाभ्यां विभूषिता।
चन्द्रसापत्नभूतेन मुखेन त्वं विराजिता॥ ४३॥
'दिव्य कुण्डलोंसे मण्डित कर्णयुगल तुम्हें विभूषित करेंगे और चन्द्रमाकी भी शोभाको छीन लेनेवाले अपने मनोरम मुखसे तुम अत्यन्त शोभायमान होओगी॥ ४३॥
मुकुटेन विचित्रेण केशवन्धेन शोभिना।
भुजङ्गाभैर्भुजैर्भीमैर्भूषयन्ती दिशो दश॥ ४४॥
'तुम्हारे मस्तकपर विचित्र मुकुट और शोभाशाली केश-बन्ध फबते होंगे। भुजङ्गोंकी-सी आभावाली अपनी भयानक भुजाओंसे तुम दसों दिशाओंकी शोभा बढ़ाओगी॥४४॥
ध्वजेन शिखिबर्हेण उच्छ्रितेन विराजत।
अङ्गेन मयूराणामङ्गेन च भास्वता॥ ४५॥
'मोरपंखसे विभूषित ऊँचे ध्वज तथा मयूरपिच्छके ही बने हुए प्रकाशमान अङ्गद (भुजबंद) से तुम प्रकाशित हओगी॥ ४५॥
कीर्णा भूतगणैर्घोरैर्मन्नियोगानुवर्तिनी।
कौमारं व्रतमास्थाय त्रिदिवं त्वं गमिष्यसि॥ ४६॥
'भयंकर भूतगणोंसे घिरकर मेरी आज्ञाके अधीन रहती हुई तुम सदा कुमारी रहनेका व्रत लेकर स्वर्गलोकको चली जाओगी॥ ४६॥
तत्र त्वां शतदृक्छक्रो मत्प्रदिष्टेन कर्मणा।
अभिषेकेण दिव्येन दैवतैः सह योक्ष्यसे॥ ४७॥
'वहाँ देवताओंसहित सहस्र नेत्रधारी इन्द्र मेरी आज्ञाके अनुसार सब कार्योंका सम्पादन करनेके कारण (अथवा मेरी बतायी हुई पद्धतिके अनुसार) तुम्हारा दिव्य विधिसे अभिषेक करेंगे॥ ४७॥
तत्रैव त्वां भगिन्यर्थे ग्रहीष्यति स वासवः।
कुशिकस्य तु गोत्रेण कौशिकी त्वं भविष्यसि॥ ४८॥
'वहीं इन्द्र अपनी बहिन बनानेके लिये तुम्हें सादर ग्रहण करेंगे। कुशिकके गोत्रसे सम्बन्ध होनेके कारण तुम 'कौशिकी' नामसे प्रसिद्ध होओगी॥ ४८॥
स ते विन्ध्ये नगश्रेष्ठे स्थानं दास्यति शाश्वतम्।
ततः स्थानसहस्रैस्त्वं पृथिवीं शोभयिष्यसि॥ ४९॥
'वे देवराज इन्द्र पर्वतोंमें श्रेष्ठ विन्ध्यगिरिपर तुम्हें शाश्वत स्थान प्रदान करेंगे। तत्पश्चात् तुम अपने सहस्रों स्थानोंद्वारा सारी पृथ्वीको सुशोभित करोगी॥ ४९॥
त्रैलोक्यचारिणी सा त्वं भुवि सत्योपयाचना।
चरिष्यसि महाभागे वरदा कामरूपिणी॥ ५०॥
१. एक ही रातमें अष्टमीके बाद नवमी लग जानेपर देवीका यशोदाके गर्भसे प्राकट्य हुआ था—ऐसा समझना चाहिये।
| विष्णुपर्व ] | तृतीयोऽध्यायः | २१९ |
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'महाभागे ! तुम इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली और वरदायिनी होकर तीनों लोकोंमें विचरोगी तथा तुमसे की हुई उपयाचना (मनौती) अवश्य सफल होगी ॥ ५० ॥
तत्र शुम्भनिशुम्भौ द्वौ दानवौ नगचारिणौ ।
तौ च कृत्वा मनसि मां सानुगौ नाशयिष्यसि ॥ ५१ ॥
'वहाँ मुझे मनमें स्थान देकर तुम विन्ध्यपर्वतपर विचरने-वाले शुम्भ और निशुम्भ नामक दानवोंको उनके अनुयायियों-सहित नष्ट कर डालोगी ॥ ५१ ॥
कृत्वानुयात्रां भूतैस्त्वं सुरामांसबलिप्रिया ।
तिथौ नवम्यां पूजां त्वं प्राप्स्यसे सपशुक्रियाम् ॥ ५२ ॥
'वहाँ तुम्हें मधुयुक्त एवं मांससहित बलि (उपहार-सामग्री) प्रिय होगी और सब लोग बारंबार तुम्हारे तीर्थकी यात्रा करके नवमी तिथिको पशुपूजन कर्मके साथ तुम्हें पूजा देंगे, जिसे तुम प्रसन्नतापूर्वक ग्रहण करोगी ॥ ५२ ॥
ये च त्वां मत्प्रभावज्ञाः प्रणमिष्यन्ति मानवाः ।
तेषां न दुर्लभं किञ्चित् पुत्रतो धनतोऽपि वा ॥ ५३ ॥
'मेरे प्रभावको जाननेवाले जो मनुष्य तुम्हें प्रणाम करेंगे, उनके लिये पुत्र अथवा धन आदि कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं होगी ॥ ५३ ॥
कान्तारेष्ववसन्नानां मग्नानां च महार्णवे ।
दस्युभिर्वा निरुद्धानां त्वं गतिः परमा नृणाम् ॥ ५४ ॥
'कोई दुर्गम स्थानमें फँस जायँ, महासागरमें डूबने लगें अथवा लुटेरों या डाकुओंके द्वारा कैद कर लिये जायँ, उन सभी संकटग्रस्त मनुष्योंके लिये तुम सबसे बड़ा सहारा होओगी ॥ ५४ ॥
त्वां तु स्तोष्यन्ति ये भक्त्या स्तवेनानेन वै शुभे ।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥ ५५ ॥
'शुभे ! जो लोग भक्तिपूर्वक इस (आगे बताये जाने-वाले) स्तोत्रसे तुम्हारी स्तुति करेंगे, उनके लिये न तो मैं अदृश्य रहूँगा और न वे ही मेरी दृष्टिसे ओझल रहेंगे' ॥ ५५ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि भारावतरणे निद्रासंविज्ञाने द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें पृथ्वीके भारको उतारनेके प्रसंगमें भगवान्द्वारा निद्राको कर्तव्यका ज्ञापनविषयक दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥
तृतीयोऽध्यायः
आर्याकी स्तुति
वैशम्पायन उवाच
आर्यास्तवं प्रवक्ष्यामि यथोक्तमृषिभिः पुरा ।
नारायणीं नमस्यामि देवीं त्रिभुवनेश्वरीम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! पूर्वकालमें जैसा ऋषियोंने बताया है, उसके अनुसार मैं आर्या देवीकी स्तुतिका वर्णन करता हूँ । मैं तीनों लोकोंकी अधीश्वरी नारायणी देवीको नमस्कार करता हूँ ॥ १ ॥
त्वं हि सिद्धिर्धृतिः कीर्तिः श्रीर्विद्या संततिर्मतिः ।
संध्या रात्रिः प्रभा निद्रा कालरात्रिस्तथैव च ॥ २ ॥
देवि ! तुम्हीं सिद्धि, धृति, कीर्ति, श्री, विद्या, संतति, मति, संध्या, रात्रि, प्रभा, निद्रा और कालरात्रि हो ॥ २ ॥
आर्या कात्यायनी देवी कौशिकी ब्रह्मचारिणी ।
जननी सिद्धसेनस्य उग्रचारी महाबला ॥ ३ ॥
आर्या, कात्यायनी, देवी, कौशिकी, ब्रह्मचारिणी, सिद्धसेन (कुमार कार्तिकेय) की जननी, उग्रचारिणी तथा महान् बलसे सम्पन्न हो ॥ ३ ॥
जया च विजया चैव पुष्टिस्तुष्टिः क्षमा दया ।
ज्येष्ठा यमस्य भगिनी नीलकौशेयवासिनी ॥ ४ ॥
जया, विजया, पुष्टि, तुष्टि, क्षमा, दया, यमकी ज्येष्ठ बहिन तथा नीले रंगकी रेशमी साड़ी पहननेवाली हो ॥ ४ ॥
बहुरूपा विरूपा च अनेकविधिचारिणी ।
विरूपाक्षी विशालाक्षी भक्तानां परिरक्षिणी ॥ ५ ॥
तुम्हारे बहुत-से रूप हैं, इसलिये तुम बहुरूपा हो । विकराल रूप धारण करनेके कारण तुम विरूपा हो। अनेक प्रकारकी विधियोंको आचरणमें लानेवाली हो । तीन होनेके कारण तुम्हारे नेत्र विरूप प्रतीत होते हैं, इसलिये तुम विरूपाक्षी हो । तुम्हारे नेत्र बड़े-बड़े हैं, इस कारण विशालाक्षी हो । तुम सदा अपने भक्तोंकी रक्षा करनेवाली हो ॥ ५ ॥
पर्वताग्रेषु घोरेषु नदीषु च गुहासु च ।
वासस्ते च महादेवि वनेषूपवनेषु च ॥ ६ ॥
महादेवि ! पर्वतोंके घोर शिखरोंपर, नदियोंमें, गुफाओंमें तथा वनों और उपवनोंमें भी तुम्हारा निवास है ॥ ६ ॥
शबरैर्बर्बरैश्चैव पुलिन्दैश्च सुपूजिता ।
मयूरपिच्छध्वजिनी लोकान् भ्रमसि सर्वशः ॥ ७ ॥
शबरों, बर्बरों और पुलिन्दोंने भी तुम्हारा अच्छी तरहसे पूजन किया है । तुम मोरपंखकी ध्वजासे सुशोभित हो और क्रमशः सभी लोकोंमें विचरती रहती हो ॥ ७ ॥
२२० श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
कुक्कुटैश्छागलैर्मेषैः सिंहैर्व्याघ्रैः समाकुला । घण्टानिनादबहुला विन्ध्यवासिन्यभिश्रुता ॥ ८ ॥
मुर्गे, बकरे, भेंड़, सिंह तथा व्याघ्र आदि पशु-पक्षी तुम्हें सदा घेरे रहते हैं । तुम्हारे पास घण्टाकी ध्वनि अधिक होती है । तुम 'विन्ध्यवासिनी' नामसे विख्यात हो ॥ ८ ॥
त्रिशूलपट्टिशधरा सूर्यचन्द्रपताकिनी । नवमी कृष्णपक्षस्य शुक्लस्यैकादशी तथा ॥ ९ ॥
देवि ! तुम त्रिशूल और पट्टिश धारण करनेवाली हो । तुम्हारी पताकापर सूर्य और चन्द्रके चिह्न हैं । तुम प्रत्येक मासके कृष्णपक्षकी नवमी और शुक्लपक्षकी एकादशी हो ॥
भगिनी बलदेवस्य रजनी कलहप्रिया । आवासः सर्वभूतानां निष्ठा च परमा गतिः ॥ १० ॥
बलदेवजीकी बहिन हो । रात्रि तुम्हारा स्वरूप है । कलह तुम्हें प्रिय लगता है । तुम सम्पूर्ण भूतोंका आवासस्थान, मृत्यु तथा परम गति हो ॥ १० ॥
नन्दगोपसुता चैव देवानां विजयावहा । चीरवासाः सुवासाश्च रौद्री संध्याचरी निशा ॥ ११ ॥
तुम नन्दगोपकी पुत्री, देवताओंको विजय दिलानेवाली, चीर वस्त्रधारिणी, सुवासिनी, रौद्री, संध्याकालमें विचरने-वाली और रात्रि हो ॥ ११ ॥
प्रकीर्णकेशी मृत्युश्च सुरामांसबलिप्रिया । लक्ष्मीरलक्ष्मीरूपेण दानवानां वधाय च ॥ १२ ॥
तुम्हारे केश बिखरे हुए हैं । तुम्हीं प्राणियोंकी मृत्यु हो । मधुसे युक्त तथा मांससे रहित बलि तुम्हें प्रिय है । तुम्हीं लक्ष्मी हो तथा तुम्हीं दानवोंका वध करनेके लिये अलक्ष्मी बन जाती हो ॥ १२ ॥
सावित्री चापि देवानां माता भूतगणस्य च । कन्यानां ब्रह्मचर्यं त्वं सौभाग्यं प्रमदासु च ॥ १३ ॥
तुम्हीं सावित्री, देवमाता अदिति तथा समस्त भूतोंकी जननी हो । कन्याओंका ब्रह्मचर्य तुम्हीं हो और विवाहिता युवतियोंका सौभाग्य भी तुम्हीं हो ॥ १३ ॥
अन्तर्वेदी च यज्ञानामृत्विजां चैव दक्षिणा । कर्षकाणां च सीतेति भूतानां धरणीति च ॥ १४ ॥
तुम्हीं यज्ञोंकी अन्तर्वेदी तथा ऋत्विजोंकी दक्षिणा हो । किसानोंकी सीता (हल जोतनेसे उभरी हुई रेखा) तथा समस्त प्राणियोंको धारण करनेवाली धरणी भी तुम्हीं हो ॥
सिद्धिः सांयात्रिकाणां तु वेला त्वं सागरस्य च । यक्षाणां प्रथमा यक्षी नागानां सुरसेति च ॥ १५ ॥
नौका या जहाजसे यात्रा करनेवाले व्यापारियोंको प्राप्त होनेवाली सिद्धि भी तुम्हीं हो । तुम्हीं समुद्रकी तट-भूमि, यक्षोंकी प्रथम यक्षी (कुबेरकी माता) तथा नागोंकी जननी सुरसा हो ॥ १५ ॥
ब्रह्मवादिन्यथो दीक्षा शोभा च परमा तथा । ज्योतिषां त्वं प्रभा देवि नक्षत्राणां च रोहिणी ॥ १६ ॥
देवि ! तुम ब्रह्मवादिनी दीक्षा तथा परम शोभा हो । ज्योतिर्मय ग्रहों एवं तारिकाओंकी प्रभा हो तथा नक्षत्रोंमें रोहिणी हो ॥ १६ ॥
राजद्वारेषु तीर्थेषु नदीनां सङ्गमेषु च । पूर्णा च पूर्णिमा चन्द्रे कृत्तिवासा इति स्मृता ॥ १७ ॥
राजद्वारों, तीर्थों तथा नदियोंके संगमोंमें तुम पूर्ण लक्ष्मी-रूपसे स्थित हो । तुम्हीं चन्द्रमामें पूर्णिमा रूपसे विराजमान होती हो तथा तुम्हीं कृत्तिवासा हो ॥ १७ ॥
सरस्वती च वाल्मीके स्मृतिद्वैपायने तथा । ऋषीणां धर्मबुद्धिस्तु देवानां मानसी तथा ॥ १८ ॥
तुम महर्षि वाल्मीकिमें सरस्वती-रूपसे, श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासमें स्मृतिरूपसे तथा ऋषि-मुनियोंमें धर्म-बुद्धिरूपसे स्थित हो । देवताओंमें सत्यसंकल्पात्मक चित्तवृत्ति भी तुम्हीं हो ॥ १८ ॥
सुरा देवी तु भूतेषु स्तूयसे त्वं स्वकर्मभिः । इन्द्रस्य चारुदृष्टिस्त्वं सहस्रनयनेति च ॥ १९ ॥
तुम समस्त भूतोंमें सुरा देवी हो और अपने कर्मोंद्वारा सदा प्रशंसित होती हो । इन्द्रकी मनोहर दृष्टि भी तुम्हीं हो; सहस्रों नेत्रोंसे युक्त होनेके कारण 'सहस्रनयना' नामसे तुम्हारी ख्याति है ॥ १९ ॥
तापसानां च देवी त्वमरणी चाग्निहोत्रिणाम् । क्षुधा च सर्वभूतानां तृप्तिस्त्वं दैवतेषु च ॥ २० ॥
तुम तपस्वी मुनियोंकी देवी हो । अग्निहोत्र करनेवाले ब्राह्मणोंकी अरणी हो । समस्त प्राणियोंकी क्षुधा तथा देवताओंमें सदा बनी रहनेवाली तृप्ति हो ॥ २० ॥
स्वाहा तृप्तिर्धृतिर्मेधा वसूनां त्वं वसुमती । आशा त्वं मानुषाणां च पुष्टिंश्च कृतकर्मणाम् ॥ २१ ॥
तुम्हीं स्वाहा, तृप्ति, धृति और मेधा हो । वसुओंकी बसुमती भी तुम्हीं हो । तुम्हीं मनुष्योंकी आशा तथा कृतकृत्य पुरुषोंकी पुष्टि हो ॥ २१ ॥
दिशश्च विदिशश्चैव तथा ह्यग्निशिखा प्रभा । शकुनी पूतना त्वं च रेवती च सुदारुणा ॥ २२ ॥
तुम्हीं दिशा, विदिशा, अग्निशिखा, प्रभा, शकुनी, पूतना तथा अत्यन्त दारुण रेवती हो ॥ २२ ॥
निद्रापि सर्वभूतानां मोहिनी क्षत्रिया तथा । विद्यानां ब्रह्मविद्या त्वमोङ्कारोऽथ वषट् तथा ॥ २३ ॥
[ विष्णुपर्व ] तृतीयोऽध्यायः २२१
समस्त प्राणियोंको मोहमें डालनेवाली निद्रा भी तुम्हीं हो। तुम क्षत्रिया हो, विद्याओंमें ब्रह्मविद्या हो तथा तुम्हीं ॐकार एवं वषट्कार हो ॥ २३ ॥
नारीणां पार्वतीं च त्वां पौराणीमृषयो विदुः ।
अरुन्धती च साध्वीनां प्रजापतिवचो यथा ॥ २४ ॥
ऋषि तुम्हें नारियोंमें पुराण-प्रसिद्ध पार्वती देवीके रूपमें जानते हैं। तुम साध्वी स्त्रियोंमें अरुन्धती हो, जैसा कि प्रजापतिको कथन है ॥ २४ ॥
पर्यायनामभिर्दिव्यैरन्द्राणी चेति विश्रुता ।
त्वया व्याप्तमिदं सर्वं जगत् स्थावरजङ्गमम् ॥ २५ ॥
तुम अपने पर्यायवाची दिव्य नामोंद्वारा इन्द्राणीके रूपमें विख्यात हो। तुमने इस समस्त चराचर जगत्को व्याप्त कर रखा है ॥ २५ ॥
संग्रामेषु च सर्वेषु अग्निप्रज्वलितेषु च ।
नदीतीरेषु चौरेषु कान्तारेषु भयेषु च ॥ २६ ॥
प्रवासे राजबन्धे च शत्रूणां च प्रमर्दने ।
प्राणात्ययेषु सर्वेषु त्वं हि रक्षा न संशयः ॥ २७ ॥
समस्त संग्रामोंमें, आगसे जलते हुए घरोंमें, नदीके तटों-पर, चोरों और लुटेरोंके दलोंमें, दुर्गम स्थानोंमें, भयके सभी अवसरोंमें, परदेशमें, राजाके द्वारा बन्धन प्राप्त होनेपर, शत्रुओंका मर्दन करते समय एवं सभी प्राणसंकटकी घड़ियोंमें तुम्हीं सबकी रक्षा करनेवाली हो, इसमें संशय नहीं है ॥
त्वयि मे हृदयं देवि त्वयि चित्तं मनस्त्वयि ।
रक्ष मां सर्वपापेभ्यः प्रसादं कर्तुमर्हसि ॥ २८ ॥
देवि ! मेरा हृदय तुममें लगा हुआ है। मेरा चित्त और मन भी तुम्हारे ही चिन्तन एवं मननमें तत्पर है। तुम समस्त पापोंसे मेरी रक्षा करो। तुम्हें मुझपर कृपा करनी चाहिये ॥
इमं यः सुस्तवं दिव्यमिति व्यासप्रकल्पितम् ।
यः पठेत् प्रातरुत्थाय शुचिः प्रयतमानसः ॥ २९ ॥
त्रिभिर्मासैः काङ्क्षितं च फलं वै सम्प्रयच्छसि ।
षड्भिर्मासैर्वरिष्ठं तु वरमेकं प्रयच्छसि ॥ ३० ॥
जो मनुष्य मेरे (विष्णु) द्वारा किये गये तथा व्यास-जीके द्वारा पद्यमें आबद्ध किये हुए इस सुन्दर दिव्य स्तोत्रका प्रातःकाल उठकर शुद्धभावसे संयतचित्त होकर पाठ करता है, उसे तुम तीन ही महीनोंमें मनोवाञ्छित फल प्रदान कर देती हो तथा जो छः महीनोंतक लगातार पाठ करता रहे, उसे कोई एक विशिष्ट वर देती हो ॥ २९-३० ॥
अर्चिता तु त्रिभिर्मासैर्दिव्यं चक्षुः प्रयच्छसि ।
संवत्सरेण सिद्धिं तु यथाकामं प्रयच्छसि ॥ ३१ ॥
तीन महीनोंतक पूजित होनेपर तुम उपासकको दिव्य दृष्टि प्रदान करती हो और एक वर्षतक आराधना करनेपर उसे उसकी इच्छाके अनुसार सिद्धि देती हो ॥ ३१ ॥
सत्यं ब्रह्म च दिव्यं च द्वैपायनवचो यथा ।
नृणां बन्धं वधं घोरं पुत्रनाशं धनक्षयम् ॥ ३२ ॥
व्याधिमृत्युभयं चैव पूजिता शमयिष्यसि ।
भविष्यसि महाभागे वरदा कामरूपिणी ॥ ३३ ॥
श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासजीने जैसा बताया है, उसके अनुसार तुम्हीं सत्य एवं दिव्य ब्रह्म हो। महाभागे ! तुम पूजित होनेपर मनुष्योंके बन्धन, भयानक वध, पुत्र और धनके नाश तथा रोग और मृत्युका भय दूर कर दोगी और इच्छानुसार रूप धारण करके उपासकोंके लिये वरदायिनी होओगी ॥ ३२-३३॥
मोहयित्वा च तं कंसमेका त्वं भोक्ष्यसे जगत् ।
अहमप्यात्मनो वृत्तिं विधास्ये गोषु गोपवत् ॥ ३४ ॥
इतना ही नहीं, तुम उस कंसको मोहमें डालकर अकेली ही सम्पूर्ण जगत्का उपभोग करोगी। मैं भी व्रजमें गौओंके बीचमें रहकर गोपके समान ही अपना व्यवहार बनाऊँगा ॥
स्ववृद्ध्यर्थमहं चैव करिष्ये कंसगोपताम् ।
एवं तां स समादिश्य गतोऽन्तर्धानमीश्वरः ॥ ३५ ॥
मैं अपनी वृद्धिके लिये कंसके गौओंकी चरवाही करूँगा। योगनिद्राको ऐसा आदेश देकर भगवान् विष्णु अन्तर्धान हो गये ॥ ३५ ॥
सा चापि तं नमस्कृत्य तथास्त्विति च निश्चिता ॥ ३६ ॥
उस समय उस देवीने भी उन्हें नमस्कार करके 'बहुत अच्छा' कहकर उनकी आज्ञाके पालन करनेका निश्चित विचार कर लिया ॥ ३६ ॥
यश्चैतत् पठते स्तोत्रं शृणुयाद् वाप्यभीक्ष्णशः ।
सर्वार्थसिद्धिं लभते नरो नास्त्यत्र संशयः ॥ ३७ ॥
जो मनुष्य बारंबार इस स्तोत्रका पाठ अथवा श्रवण करता है, वह अपने सम्पूर्ण मनोरथोंकी सिद्धि प्राप्त कर लेता है, इसमें कोई संशय नहीं है ॥ ३७ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि स्वप्नगर्भविधाने आर्यास्तुतौ तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें स्वप्नगर्भ-विधान तथा आर्यादेवीकी स्तुतिविषयक तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ ३ ॥
२२२ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे
चतुर्थोऽध्यायः
कंसद्वारा देवकीके नवजात शिशुओंकी हत्या, योगमायाद्वारा सातवें गर्भका संकर्षण, श्रीकृष्णका प्राकट्य और नन्दभवनमें प्रवेश, कंसद्वारा नन्दकन्याको मारनेका प्रयत्न और उसका दिव्य रूपमें दर्शन देना, कंसद्वारा क्षमाप्रार्थना और देवकीद्वारा उसे क्षमा-दान
वैशम्पायन उवाच
कृते गर्भविधाने तु देवकी देवतोपमा।
जग्राह सप्त तान् गर्भान् यथावत् समुदाहृतान् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर पतिद्वारा गर्भाधान किये जानेपर देवताके समान तेजस्विनी देवकीने पहले बताये हुए सात गर्भोँको क्रमशः यथोचितरूपसे ग्रहण किया ॥ १ ॥
षड्गर्भान् निस्सृतान् कंसस्ताञ्जघान शिलातले।
आपन्नं सप्तमं गर्भं सा निनायाथ रोहिणीम् ॥ २ ॥
पहले जो छः गर्भ क्रमशः प्रकट हुए, उन सबको कंसने पत्थरपर पटककर मार डाला। जब सातवाँ गर्भ प्राप्त हुआ, तब योगमायाने उसे रोहिणीके उदरमें स्थापित कर दिया ॥ २ ॥
अर्धरात्रे स्थितं गर्भं पातयन्ती रजस्वला।
निद्रया सहसाऽऽविष्टा पपात धरणीतले ॥ ३ ॥
रजस्वला रोहिणी आधी रातके समय अपने भीतर स्थापित हुए उस गर्भको गिरानेकी चेष्टा करने लगी; परंतु सहसा निद्रासे आविष्ट होकर वह स्वयं पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ ३ ॥
सा स्वप्नमिव तं दृष्ट्वा गर्भं निःसृतमात्मनः।
अपश्यन्ती च तं गर्भं मुहूर्तं व्यथिताभवत् ॥ ४ ॥
उसने अपने पेटसे निकले हुए उस गर्भको स्वप्नकी भाँति देखकर फिर नहीं देखा (क्योंकि योगमायाने उसे अदृश्य कर दिया था); इससे दो घड़ीतक उसके मनमें बड़ी व्यथा हुई ॥ ४ ॥
तामाह निद्रा संविग्नां नैशे तमसि रोहिणीम्।
रोहिणीमिव सोमस्य वसुदेवस्य धीमतः ॥ ५ ॥
रात्रिके अन्धकारमें बुद्धिमान् वसुदेवकी पत्नी रोहिणी चन्द्रमाकी प्यारी भार्या रोहिणीके समान दिखायी देती थी। वह उस गर्भके लिये उद्विग्न हो रही थी। उस समय निद्राने उससे कहा—॥ ५ ॥
कर्षणेनास्य गर्भस्य स्वगर्भे चाहितस्य वै।
संकर्षणो नाम सुतः शुभे तव भविष्यति ॥ ६ ॥
‘शुभे ! तुम्हारे उदरमें स्थापित हुआ जो यह गर्भ है, इसका आकर्षण हुआ है; इस कारण तुम्हारा यह पुत्र संकर्षण नाममें प्रसिद्ध होगा’ ॥ ६ ॥
सा तं पुत्रमवाप्यैवं हृष्टा किञ्चिदवाङ्मुखी।
विवेश रोहिणी वेश्म सुप्रभा रोहिणी यथा ॥ ७ ॥
इस प्रकार उस पुत्रको पाकर रोहिणी मन-ही-मन प्रसन्न हुई; किंतु लज्जासे उसका मुख कुछ नीचेको झुक गया। फिर तो वह उत्तम प्रभासे युक्त रोहिणीके समान अपने भवनके भीतर चली गयी ॥ ७ ॥
तस्य गर्भस्य मार्गेण गर्भमाधत्त देवकी।
यदर्थं सप्त ते गर्भाः कंसेन विनिपातिताः ॥ ८ ॥
उधर देवकीके उस सातवें गर्भकी खोज होने लगी; इतनेहीमें उसने आठवाँ गर्भ धारण किया; जिसके लिये कंसने उसके पहलेके सात गर्भ मार गिराये थे ॥ ८ ॥
तं तु गर्भं प्रयत्नेन ररक्षुस्तस्य मन्त्रिणः।
सोऽप्यत्र गर्भंवसतौ वस्त्यात्मेच्छया हरिः ॥ ९ ॥
कंसके मन्त्री उस आठवें गर्भकी रक्षामें यत्नपूर्वक लग गये। इधर भगवान् विष्णु भी स्वेच्छासे ही उस गर्भमें निवास करने लगे ॥ ९ ॥
यशोदापि समाधत्त गर्भं तदहरेव तु।
विष्णोः शरीरजां निद्रां विष्णोर्निर्देशकारिणीम् ॥ १० ॥
उसी दिन (गोकुलमें) यशोदाने भी भगवान् विष्णुकी आज्ञाका पालन करनेवाली तथा उन्हींके शरीरसे प्रकट हुई योगनिद्राको अपने गर्भमें धारण किया ॥ १० ॥
गर्भकाले त्वसम्पूर्णे अष्टमे मासि ते स्त्रियौ।
देवकी च यशोदा च सुपुवाते समं तदा ॥ ११ ॥
गर्भका समय पूर्ण होनेसे पहले ही आठवें मासमें, उन दोनों स्त्रियों—यशोदा और रोहिणीने प्रायः एक ही साथ प्रसव किया ॥ ११ ॥
यामेव रजनीं कृष्णो जज्ञे वृष्णिकुलोद्वहः।
तामेव रजनीं कन्यां यशोदापि व्यजायत ॥ १२ ॥
वृष्णिकुलका भार वहन करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण जिस रातमें प्रकट हुए, उसी रातमें यशोदाने भी एक कन्याको जन्म दिया ॥ १२ ॥
नन्दगोपस्य भार्यैका वसुदेवस्य चापरा।
तुल्यकालं च गर्भिण्यौ यशोदा देवकी तथा ॥ १३ ॥
एक यशोदा नन्दगोपकी भार्या थी और दूसरी देवकी वसुदेवकी। वे दोनों प्रायः एक ही समयमें गर्भवती हुईं ॥ १३ ॥
देवक्यजनयद् विष्णुं यशोदा तां तु दारिकाम्।
मुहूर्तेऽभिजिति प्राप्ते सार्धरात्रे विभूषिते ॥ १४ ॥
विष्णुपर्व ] चतुर्थोऽध्यायः २२३
( आठवें मासमें ) आधी रातके समय सुन्दर अभिजित् मुहूर्तका योग प्राप्त होनेपर देवकीने भगवान् विष्णुको पुत्र-रूपसे जन्म दिया और यशोदाने उस कन्याको ॥ १४ ॥
सागराः समकम्पन्त चेलुश्च धरणीधराः।
जज्वलुश्चाग्नयः शान्ता जायमाने जनार्दने ॥ १५ ॥
भगवान् श्रीकृष्णके जन्म ( अवतार ) ग्रहण करते समय समुद्रोंमें ज्वार सा उठने लगा। पृथ्वीको धारण करनेवाले शेष आदि विचलित हो उठे और बुझी हुई अग्नियों अपने-आप प्रज्वलित हो गयीं ॥ १५ ॥
शिवाश्च प्रववुर्वाताः प्रशान्तमभवद् रजः।
ज्योतींष्यतिव्यकाशन्त जायमाने जनार्दने ॥ १६ ॥
श्रीकृष्णके अवतार लेते समय शीतल मन्द सुखदायिनी हवा चलने लगी। उड़ती हुई धूल शान्त हो गयी तथा ग्रह और नक्षत्र अत्यन्त प्रकाशित होने लगे ॥ १६ ॥
अभिजिन्नम नक्षत्रं जयन्ती नाम शर्वरी।
मुहूर्तो विजयो नाम यत्र जातो जनार्दनः ॥ १७ ॥
जब भगवान् श्रीकृष्ण प्रकट हुए, उस समय अभिजित् नामक मुहूर्त था, रोहिणी नक्षत्रका योग होनेसे अष्टमीकी वह रात जयन्ती कहलाती थी और विजय नामक विशिष्ट मुहूर्त व्यतीत हो रहा था ॥ १७ ॥
अव्यक्तः शाश्वतः सूक्ष्मो हरिनारायणः प्रभुः।
जायमानो हि भगवान्नैर्मोहयन् प्रभुः ॥ १८ ॥
अव्यक्त सनातन सूक्ष्मस्वरूप पापहारी तथा सर्वसमर्थ भगवान् नारायणने प्रकट होते ही अपने नेत्रोंसे सबका मन मोह लिया ॥ १८ ॥
अनाहता दुन्दुभयो देवानां प्राणदन् दिवि।
आकाशात् पुष्पवृष्टिं च ववर्ष त्रिदशेश्वरः ॥ १९ ॥
स्वर्गलोकमें बिना बजाये ही देवताओंकी दुन्दुभियाँ बज उठीं। देवेश्वर इन्द्र आकाशसे फूलोंकी वर्षा करने लगे ॥ १९ ॥
गीर्भिर्मङ्गलयुक्ताभिः स्तुवन्तो मधुसूदनम्।
महर्षयः सगन्धर्वा उपतस्थुः सहाप्सराः ॥ २० ॥
गन्धर्व और अप्सराओंसहित महर्षिगण अपने मङ्गलमय वचनोंद्वारा भगवान् मधुसूदनकी स्तुति करते हुए उनकी सेवामें उपस्थित हुए ॥ २० ॥
जायमाने हृषीकेशे प्रहृष्टमभवज्जगत्।
इन्द्रश्च त्रिदशैः सार्धं तुष्टाव मधुसूदनम् ॥ २१ ॥
भगवान् श्रीकृष्णका प्राकट्य होते ही सम्पूर्ण जगत्में हर्षोल्लास छा गया। देवताओंके साथ इन्द्रने उन भगवान् मधुसूदनकी स्तुति की ॥ २१ ॥
वसुदेवश्च तं रात्रौ जातं पुत्रमधोक्षजम्।
श्रीवत्सलक्षणं दृष्ट्वा युतं दिव्यैश्च लक्षणैः।
उवाच वसुदेवस्तु रूपं संहर वै प्रभो ॥ २२ ॥
वसुदेवने भी रात्रिमें प्रकट हुए अपने पुत्ररूप भगवान् अधोक्षजका स्तवन किया। उन्हें श्रीवत्सके चिह्न और दिव्य लक्षणोंसे सम्पन्न देखकर वसुदेवने कहा—'प्रभो! आप अपने स्वरूपको समेट लीजिये ॥ २२ ॥
भीतोऽहं देव कंसस्य तस्मादेवं ब्रवीम्यहम्।
मम पुत्रा हतास्तेन तव ज्येष्ठाम्बुजेक्षण ॥ २३ ॥
'देव ! मैं कंसके भयसे डरा हुआ हूँ, इसीलिये ऐसी बात कहता हूँ। कमलनयन ! उसने मेरे बहुत-से पुत्र मार डाले हैं, जो तुमसे जेठे थे' ॥ २३ ॥
वैशम्पायन उवाच
वसुदेववचः श्रुत्वा रूपं चाहरदच्युतः।
अनुज्ञाप्य पितृत्वेन नन्दगोपगृहं नय ॥ २४ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! वसुदेवका यह वचन सुनकर भगवान् अच्युतने पिता होनेके कारण उनकी आज्ञा स्वीकार कर ली और उनसे कहा, 'आप मुझे नन्दगोप-के घर पहुँचा दीजिये ( तथा उनकी नवजात कन्याको यहाँ उठा लाइये)।' ऐसा कहकर उन्होंने अपने चतुर्भुज रूपका उपसंहार कर लिया ॥ २४ ॥
वसुदेवस्तु संगृह्य दारकं क्षिप्रमेव च।
यशोदाया गृहं रात्रौ विवेश सुतवत्सलः ॥ २५ ॥
तब पुत्रवत्सल वसुदेव शीघ्र ही उस बालकको गोदमें लेकर रातके समय यशोदाके घरमें घुस गये ॥ २५ ॥
यशोदायास्त्वविज्ञातस्तत्र निक्षिप्य दारकम्।
प्रगृह्य दारिकां चैव देवकीशयने न्यसत् ॥ २६ ॥
यशोदाको उनके आनेका कुछ पता न चला। वहाँ उन्होंने अपने बालकको रख दिया और उस कन्याको लेकर अपने निवासस्थानमें आनेके बाद उसे देवकीकी शय्यापर सुला दिया ॥ २६ ॥
परिवर्ते कृते ताभ्यां गर्भाभ्यां भयविह्वलः।
वसुदेवः कृतार्थो वै निर्जगाम निवेशनात् ॥ २७ ॥
इस प्रकार उन दोनों नवजात बालकोंकी अदला-बदली करके कृतार्थ हुए वसुदेवजी भयसे व्याकुल हो उस घरसे बाहर निकल गये ॥ २७ ॥
उग्रसेनसुतायाथ कंसायानकदुन्दुभिः।
निवेदयामास तदा तां कन्यां वरवर्णिनीम् ॥ २८ ॥
आनकदुन्दुभि नामसे प्रसिद्ध वसुदेवने उग्रसेनपुत्र कंस-के पास जाकर उसे अपनी सुन्दरी कन्याके जन्मका समाचार निवेदन किया ॥ २८ ॥
२२६ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे इत्युक्तवन्तं कंसं सा देवकी वाक्यमब्रवीत् । प्रकार जीवकी सत्ता होनेपर भी जन्मसे पहले वह दृष्टिगोचर साश्रुपूर्णमुखा दीना भर्तारमुपवीक्षती । नहीं होता है ॥ ६१ ॥ उत्तिष्ठोत्तिष्ठ वत्सेति कंसं मातेव जल्पती ॥ ५७ ॥ जातोऽप्यजातां याति विधात्रा यत्र नीयते । जब कंसने ऐसी बात कही, तब देवकीके मुखपर तद् गच्छ पुत्र मा ते भून्मद्गतं मृत्युकारणम् ॥ ६२ ॥ आँसुओंकी धारा बह चली। वह पतिकी ओर देखती हुई जो जन्म ले चुका है, वह भी मृत्युके बाद अजात- अत्यन्त दीन होकर कंससे माताके समान कहने लगी-'बेटा ! भावको ही प्राप्त हो जाता है ( अर्थात् उसका भी दर्शन उठो ! उठो !' ॥ ५७ ॥ नहीं होता ) । विधाता उसे जहाँ ले जाते हैं, वहाँ वह चला देवक्युवाच जाता है; अतः पुत्र ! तुम जाओ। मुझे जो पुत्रोंकी मृत्युके ममाग्रतो हता गर्भा ये त्वया कामरूपिणा । कारण दुःख हो रहा है, उसके लिये तुम्हारे हृदयमें विचार कारणं त्वं न वै पुत्र कृतान्तोऽप्यत्र कारणम् ॥ ५८ ॥ न हो ॥ ६२ ॥ देवकीने फिर कहा-वत्स ! तुम तो इच्छानुसार मृत्युना प्रहृते पूर्वे शेषो हेतुः प्रवर्तते । रूप धारण करनेवाले हो । तुमने मेरे सामने ही जिन-जिन विधिना पूर्वदृष्टेन प्रजासर्गेण तत्त्वतः ॥ ६३ ॥ गर्भस्थ शिशुओंकी हत्या की है, उसमें केवल तुम्हीं कारण मातापित्रोस्तु कार्येण जन्मतस्तूपपद्यते । हो-ऐसी बात नहीं है, काल भी इसमें कारण है ॥ ५८ ॥ पहले मौत प्रहार करती है, उसके बाद मृत्युके शेष गर्भकर्तनमेतन्मे सहनीयं त्वया कृतम् । हेतुओंकी प्रवृत्ति होती है । विधि (संस्कार ), पूर्वदृष्ट कर्म पादयोः पतता मूर्ध्ना स्वं च कर्म जुगुप्सता ॥ ५९ ॥ (जन्मान्तरीय कर्म या प्रारब्ध ), प्रजाकी सृष्टि करनेवाले परंतु आज तुम अपने कर्मकी निन्दा करते हुए जो काल, वास्तवमें घटित हुए तात्कालिक कारण, माता-पिताके मेरे पैरोंपर सिर रखकर पड़ गये, इससे तुम्हारे द्वारा किये दूषित अन्न-भक्षण आदि कार्य तथा जातिगत स्वभावसे गये इस गर्भोच्छेदस्वरूप असह्य कष्टको भी मैं किसी तरह सह भी मृत्यु सम्भव होती है ( इन्हीं सब कारणोंसे मेरे बच्चे लूँगी ॥ ५९ ॥ मारे गये और तुम इसमें निमित्त बने, अतः इसमें तुम्हारा गर्भे च नियतो मृत्युर्बाल्येऽपि न निवर्तते । कोई दोष नहीं है ) ॥ ६३३ ॥ युवापि मृत्योर्वशगः स्थविरो मृत एव तु ॥ ६० ॥ वैशम्पायन उवाच गर्भमें भी मृत्यु निश्चित रूपसे होती है। बाल्यावस्थामें निशम्य देवकीवाक्यं स कंसः स्वं निवेशनम् ॥ ६४ ॥ भी वह टलती नहीं है। जवान मनुष्य भी मृत्युके अधीन प्रविवेश ससंरम्भो दह्यमानेन चेतसा । होता है और वृद्ध पुरुष तो मरा हुआ है ही ॥ ६० ॥ कृत्ये प्रतिहते दीनो जगाम विमना भृशम् ॥ ६५ ॥ कालपक्वमिदं सर्व हेतुभूतस्तु त्वद्विधः । वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय ! देवकीका अजाते दर्शनं नास्ति यथा वायुस्तथैव च ॥ ६१ ॥ यह वचन सुनकर कंस अपनी असफलतापर क्षुब्ध हो मन-ही-मन इस सम्पूर्ण जगत्को काल ही पका देता है (मार जलता हुआ अपने भवनमें चला गया। अपने किये प्रयत्नके डालता है ) । तुम्हारे-जैसे लोग तो केवल निमित्तमात्र होते हैं। प्रतिहत ( विफल ) हो जानेपर वह मनमें बहुत ही खिन्न जिसका जन्म नहीं हुआ है, उसका दर्शन नहीं होता । जैसे और दीन हो गया था, अतः वहाँसे चुपचाप चला वायुकी सत्ता होनेपर भी वह दिखायी नहीं देती, उसी गया ॥ ६४-६५ ॥ इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि श्रीकृष्णजन्मनि चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें श्रीकृष्णजन्मविषयक चौथा अध्याय पूरा हुआ ॥ ४ ॥ पञ्चमोऽध्यायः वसुदेवजीका नन्दको व्रजमें लौटनेकी सम्मति देना और नन्दजीका गोत्रजकी शोभा निहारते हुए वहाँ पधारना वैशम्पायन उवाच स नन्दगोपं त्वरितः प्रोवाच शुभया गिरा । प्रागेव वसुदेवस्तु व्रजे शुश्राव रोहिणीम् । गच्छानया सहैव त्वं व्रजमेव यशोदया ॥ २ ॥ प्रजातां पुत्रमेवाग्रे चन्द्रात् कान्ततराननम् ॥ १ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय ! वसुदेवजीने
विष्णुपर्व ] पञ्चमोऽध्यायः २२७
प्रसवसे पहले ही रोहिणीको ब्रजमें भेज दिया था । जब उन्होंने सुना कि रोहिणीने पहले ही एक ऐसे पुत्रको जन्म दिया है, जिसका मुख चन्द्रमासे भी अधिक कान्तिमान् है, तब वे तुरंत ही (कंसका कर चुकानेके लिये पत्नीसहित मथुरामें आये हुए) नन्दगोपके पास जाकर मङ्गलमयी वाणीमें बोले—'मित्र ! तुम इन यशोदाजीके साथ ही शीघ्र ब्रजको लौट जाओ ॥ १-२ ॥
तत्र तौ दारकौ गत्वा जातकमादिभिर्गुणैः । योजयित्वा व्रजे तात संवर्धय यथासुखम् ॥ ३ ॥
'तात ! वहाँ जाकर उन दोनों बालकोंको जातकर्म आदि संस्कारोंसे सम्पन्न करके ब्रजमें ही सुखपूर्वक उनका पालन-पोषण और संवर्धन करो ॥ ३ ॥
रौहिणेयं च पुत्रं मे परिरक्ष शिशुं व्रजे । अहं वाच्यो भविष्यामि पितृपक्षेषु पुत्रिणाम् ॥ ४ ॥ योऽहमेकस्य पुत्रस्य न पश्यामि शिशोर्मुखम् ।
'व्रजमें रोहिणीके गर्भसे उत्पन्न हुआ जो मेरा शिशु पुत्र है, उसकी भी रक्षा करना । भाई ! मैं तो पितृपक्षोंमें पुत्रवानोंके द्वारा निन्दनीय ही होऊँगा; क्योंकि मैं ऐसा भाग्यहीन हूँ कि अपने एकमात्र शिशुपुत्रका मुख नहीं देख पाता हूँ ॥
ह्रियते ह्यबलात् प्रज्ञा प्राज्ञस्यापि सतो मम ॥ ५ ॥ अस्माद्धि मे भयं कंसात्निर्घृणाद् वै शिशोर्वधे ।
'यद्यपि मुझे इस बातका ज्ञान है कि सुख-दुःख और संयोग-वियोग आदि प्रारब्धके ही अधीन हैं; तथापि निरन्तर बना रहनेवाला भय मुझ बुद्धिमानकी भी बुद्धिको बलपूर्वक हर लेता है । इस निर्दय कंससे मुझे सदा यह डर लगा रहता है कि कहीं यह मेरे इस शिशुका भी वध न कर डाले ॥ ५॥
तद्यथा रौहिणेयं त्वं नन्दगोप ममात्मजम् ॥ ६ ॥ गोपायसि यथा तात तत्त्वान्वेषी तथा कुरु । विघ्ना हि बहवो लोके बालानुत्रासयन्ति हि ॥ ७ ॥
'अतः तात ! नन्दगोप ! तुम मेरे पुत्र रोहिणीकुमारकी जिस उपायसे भी रक्षा कर सको, करो । बाल-द्रोहियोंके स्वरूपका यथावत्रूपसे विचार करके जैसे बने, उसके जीवनकी रक्षा करो; क्योंकि जगत्में बहुत-से ऐसे विघ्न खड़े हुए हैं, जो बालकोंको त्रास दे रहे हैं ॥ ६-७ ॥
स च पुत्रो मम ज्यायान् कनीयांश्च तवाप्ययम् । उभावपि समं नाम्ना निरीक्षस्व यथासुखम् ॥ ८ ॥
'मेरा वह पुत्र बड़ा है और तुम्हारा यह बालक छोटा । तुम इन दोनोंको ही सुखपूर्वक समान दृष्टिसे देखो । जैसे इनके नाम एक-से (एक अर्थवाले) हैं*, उसी तरह इनपर तुम्हारा वात्सल्य भी एक-सा ही होना चाहिये ॥ ८ ॥
* जैसे कृष्णका अर्थ है अपनी ओर खींचनेवाला, उसी तरह संकर्षणका भी है ।
वर्धमानावुभावेतौ समानवयसौ यथा । शोभेतां गोव्रजे तस्मिन् नन्दगोप तथा कुरु ॥ ९ ॥
'नन्दगोप ! इन दोनोंकी अवस्था प्रायः समान है । ये दोनों जिस तरह साथ-साथ तुम्हारे उस ब्रजमें बढ़ते हुए शोभा पा सकें, वैसा यत्न करो ॥ ९ ॥
बाल्ये केलिकिलः सर्वो बाल्ये मुह्यति मानवः । बाल्ये चण्डतमः सर्वस्तत्र यत्नपरो भव ॥ १० ॥
'बाल्यावस्था में सब लोग खेल-कूदसे मन बहलाते हैं । बालकपनमें प्रायः सभी मनुष्य मोहग्रस्त रहते हैं । उन्हें कर्तव्याकर्तव्यका बोध नहीं रहता तथा बचपनमें सभी बात-बातपर बहुत चिढ़ते और रूठते हैं; अतः बच्चोंको इन सभी दशाओंमें सँभालते हुए उनके लालन-पालनके लिये प्रयत्नशील रहो ॥ १० ॥
न च वृन्दावने कार्यो गवां घोषः कथंचन । भेतव्यं तत्र वसतः केशिनः पापदर्शिनः ॥ ११ ॥
'देखो, वृन्दावनमें किसी तरह भी गौओंके ठहरनेका स्थान न बनाना । वहाँ निवास करनेवाले पापदर्शी केशीसे तुम्हें सदा डरते रहना चाहिये ॥ ११ ॥
सरीसृपेभ्यः कीटेभ्यः शकुनिभ्यस्तथैव च । गोष्ठेषु गोभ्यो वत्सेभ्यो रक्ष्यौ ते द्वाविमौ शिशू ॥ १२ ॥
'वनमे साँप-बिच्छू, कीड़े-मकोड़े तथा पक्षियोंसे और गोव्रजमे गौओं तथा बछड़ोंसे इन दोनों शिशुओंकी तुम्हें सदा रक्षा करनी चाहिये ॥ १२ ॥
नन्दगोप गता रात्रिः शीघ्रयानो व्रजाशुगः । इमे त्वां व्याहरन्तीव पक्षिणः सव्यदक्षिणाः ॥ १३ ॥
'नन्दगोप ! रात बीत गयी । तुम तेज चलनेवाली सवारीपर बैठकर शीघ्रतापूर्वक यहाँसे पधारो । ये दायें-बायें उड़नेवाले पक्षी मानो तुम्हे जानेके लिये कह रहे हैं—विदा दे रहे हैं' ॥ १३ ॥
रहस्यं वसुदेवेन सोऽनुज्ञातो महात्मना । यानं यशोदया सार्धमारुरोह मुदान्वितः ॥ १४ ॥
महात्मा वसुदेवके द्वारा किसी गुप्त रहस्यका ज्ञान करा दिये जानेपर नन्दबाबा यशोदाजीके साथ प्रसन्नतापूर्वक सवारीपर बैठे ॥ १४ ॥
कुमारस्कन्धवाह्यायां शिविकायां समाहितः । संवेशयामास शिशुं शयनीयं महामतिः ॥ १५ ॥
तदनन्तर सदा सावधान रहनेवाले परम बुद्धिमान् नन्दजीने छोटे-छोटे बालक जिसे कंधेपर ढो सकें, ऐसी शिविका (डोली) में अपने शयन करने योग्य शिशुको सुला दिया ॥ १५ ॥
२२८ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे अगाम च विविक्तेन शीतलानिलसर्पिणा । शकटावर्तविपुलं कण्टकीवाटसंकुलम् । बहुदकेन मार्गेण यमुनातीरगामिना ॥ १६ ॥ पर्यन्तेष्वावृतं वन्यैर्वृहद्भिः पतितैर्दुमैः ॥ २३ ॥ फिर यमुनाजीके किनारे-किनारे जानेवाले ऐसे एकान्त छकड़ोंकी गोलाकार श्रेणियोंसे वहाँका भूभाग बहुत मार्गसे वे चले, जहाँ जलकी बहुतायत थी और ठंडी-ठंडी विशाल जान पड़ता था। वहाँ चारों ओर काँटोंके बाड़ हवा चल रही थी ॥ १६ ॥ लगे थे। सीमाओंपर जंगलके गिरे हुए बड़े-बड़े वृक्ष रखे स ददर्श शुभे देशे गोवर्धनसमीपगे । गये थे ॥ २३ ॥ यमुनातीरसम्बद्धं शीतमारुतसेवितम् ॥ १७॥ वत्सानां रोपितैः कीलैर्दामभिश्च विभूषितम् । गोवर्धनके निकटवर्ती शुभ प्रदेशमें पहुँचकर उन्होंने करीषाकीर्णवसुधं कटच्छन्नकुटीमठम् ॥ २४ ॥ गौओंका व्रज देखा, जो यमुनाजीके तटसे जुड़ा हुआ था और बछड़ोंके लिये गाड़े गये खूँटों और बाँधनेकी रस्सियोंसे शीतल वायु उसकी सेवा करती थी ॥ १७ ॥ उस व्रजकी बड़ी शोभा हो रही थी। वहाँ धरतीपर सब ओर विरुतश्वापदै रम्यं लतावल्लीमहाद्रुमम् । सूखे कंडे (या करसी) के ढेर पड़े थे। कुटी और मठ गोभिस्तृणविलग्नाभिः स्यन्दन्तीभिरलंकृतम् ॥ १८ ॥ चटाइयों अथवा तृण-समूहसे छाये गये थे ॥ २४ ॥ विशेष प्रकारकी बोली बोलनेवाले शिकारी जीवोंके रहनेसे क्षेमप्रचारबहुलं हृष्टपुष्टजनादृतम् । उस प्रदेशकी रमणीयता बढ़ गयी थी। वहाँ लता और वल्ल- दामनीपाशबहुलं गर्गरोद्गारनिःस्वनम् ॥ २५॥ रियोंसे लिपटे हुए बड़े-बड़े वृक्ष शोभा पा रहे थे । घास कुशलपूर्वक घूमने-फिरनेके लिये वहाँ बहुत-से स्थान थे चरती और थनोंसे दूध झरती हुई गौओंसे वह स्थान अलंकृत ( अथवा उत्तम लक्षणोंसे युक्त भटोंके प्रचारसे वह व्रज था ॥ १८ ॥ समृद्धिशाली प्रतीत होता था*) । वह भूभाग हृष्ट-पुष्ट मनुष्यों- समप्रचारं च गवां समतीर्थजलाशयम् । से भरा था। वहाँ मोटी और पतली रस्सियोंकी बहुतायत वृषाणां स्कन्धघातैश्च विषाणोद्घृष्टपादपम् ॥ १९॥ थी। दूध-दही मथनेके लिये जो बड़े-बड़े माट या घड़े होते वहाँ गौओंके चरने-फिरनेके लिये सम भूमि थी, विषम हैं, उनमेंसे मन्थनके समय जो शब्द प्रकट होता था, वह नहीं; जलाशयोंमें उतरनेके लिये जो मार्ग थे, वे भी सम ही वहाँ सब ओर फैला हुआ था ॥ २५ ॥ थे। बैलों या साँड़ोंके कंधोंकी टक्करसे तथा उनके सींगोंकी तक्रनिःस्रावबहुलं दधिमण्डाद्रमृत्तिकम् । रगड़से वहाँके कई वृक्ष घिसे हुए दिखायी देते थे ॥ १९ ॥ मन्थानवलयोद्वारैर्गोपीनां जनितस्वनम् ॥ २६ ॥ भासामिषादानुसृतैः श्येनैश्चामिषगृध्नुभिः । वहाँ तक्र (मट्ठा) बहानेके लिये बहुत-सी नालियाँ सृगालमृगसिंहैश्च वसा मेदाशिभिर्वृतम् ॥ २०॥ बनी थीं। दहीके ऊपरका जो सारभाग (मण्ड) होता है, वहाँ गीध और मांसभक्षी वनबिलाव आदिके पीछे उससे वहाँकी मिट्टी गीली हो रही थीं। मथानी चलानेके मांसकी इच्छा रखनेवाले बाज तथा वसा और मेदा खानेवाले समय गोपियोंके हाथोंके कंगन खन-खनाते रहते थे। उनकी गीदड़, चीते एवं बाघ-सिंह आदि लगे हुए थे। इन सबके द्वारा मधुर झनकार वहाँ सब ओर गूँजती रहती थी ॥ २६ ॥ वह प्रदेश घिरा हुआ था ॥ २० ॥ काकपक्षरैर्बालैर्गोपालक्रीडनाकुलम् । शार्दूलशब्दाभिरुतं नानापक्षिसमाकुलम् । सार्गलद्वारगोवाटं मध्ये गोस्थानसंकुलम् ॥ २७ ॥ स्वादुवृक्षफलं रम्यं पर्याप्ततृणवीरुधम् ॥ २१॥ उस व्रजमें काकपझ (पीछेकी ओर सिरपर बड़े-बड़े सिंहोंके दहाड़नेसे वहाँका वन-प्रान्त गूँजता रहता था । बाल) धारण करनेवाले बालक खेल रहे थे। ग्वालोंके नाना प्रकारके पक्षी वहाँ सब ओर व्याप्त थे। उस व्रजमें जो अखाड़ोंसे वहाँका भूभाग भरा था। गौओंके बाड़ों ( रहनेके वृक्षोंमें फल लगे थे, वे बड़े स्वादिष्ट थे। वहाँ घास-पात और स्थानों) के दरवाजोंपर काठके कुंडे लगे हुए थे। बीचमें लता-बेलोंकी बहुलता थी ॥ २१ ॥ गौओंके ठहरने, विश्राम करने आदिके लिये पर्याप्त स्थान गोव्रजं गोरुतं रम्यं गोपनारीभिरादृतम् । था। ऐसी गोशालाओंसे वह व्रज भरा हुआ था ॥ २७ ॥ हम्भारवैश्च वत्सानां सर्वतः कृतनिःस्वनम् ॥ २२ ॥ सर्पिषा पच्यमानेन सुरभीकृतमारुतम् । इस प्रकार वह गोव्रज गौओंके रँभानेके शब्दसे मुखरित नीलपीताम्बराभिश्च तरुणीभिरलंकृतम् ॥ २८ ॥ था। गोपाङ्गनाओंसे घिरा हुआ वह भूभाग बड़ा रमणीय आगपर खौलाये जाते हुए घृतकी मनोरम गंधसे वहाँकी दिखायी देता था । बछड़ोंके बोलनेसे वहाँका स्थान सब ओर- से गूँजता रहता था ॥ २२ ॥ * ऐसा अर्थ नीलकण्ठजीने किया है।
विष्णुपर्व ] पञ्चमोऽध्यायः २२९
वायु सुवासित हो रही थी। नीली-पीली साड़ियोंसे सुशोभित तरुणी स्त्रियाँ उस व्रजको अलंकृत किये हुए थीं॥ २८॥
वन्यपुष्पावतंसाभिर्गोपकन्याभिरावृतम् ।
शिरोभिर्धृतकुम्भाभिर्बद्धैरग्रस्तनाम्बरैः ॥ २९ ॥
यमुनातीरमार्गेण जलहारीभिरावृतम् ।
वनके फूलोंका कर्णभूषण धारण किये बहुत-सी गोपकन्याएँ वहाँ सिरपर घड़े लिये आती-जाती थीं। उनके स्तनोंके अग्रभाग चोलीसे बँधे थे और उनपर आँचल पड़ा हुआ था। यमुनाजीके तटपर गये हुए मार्गसे जल लानेवाली उन गोपकुमारियोंसे वह व्रज घिरा हुआ-सा जान पड़ता था ॥ २९ ॥
स तत्र प्रविशन् दृष्टो गोव्रजं गोपनादितम् ॥ ३० ॥
प्रत्युद्गतो गोपवृद्धैः स्त्रीभिर्वृद्धाभिरेव च।
निवेशं रोचयामास परिवृत्ते सुखाश्रये ॥ ३१ ॥
ग्वालोंके शब्दसे गूँजते हुए उस गोव्रजमें प्रवेश करते समय नन्दरायजीको बड़ा हर्ष हुआ। वृद्ध गोपों तथा बड़ी-बूढ़ी स्त्रियोंने आगे बढ़कर उनका स्वागत किया। तत्पश्चात् उन्होंने चारों ओरसे घिरे हुए उस सुखदायक आवासस्थानमें रहनेके लिये रुचि प्रकट की ॥ ३०-३१ ॥
सा यत्र रोहिणी देवी वसुदेवसुखावहा ।
तत्र तं बालसूर्याभं कृष्णं गूढं न्यवेशयत् ॥ ३२ ॥
वसुदेवजीको सुख देनेवाली रोहिणी देवी जहाँ रहती थीं, वहीं उन्होंने व्रजमें गुप्तरूपसे रहनेवाले बालसूर्यके समान तेजस्वी श्रीकृष्णको सुला दिया ॥ ३२ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि गोव्रजगमनं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें नन्दजीका गोव्रजमें गमनविषयक पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५ ॥
षष्ठोऽध्यायः
शकट-भञ्जन और पूतना-वध
वैशम्पायन उवाच
तत्र तस्यासतः कालः सुमहानत्यवर्तत ।
गोव्रजे नन्दगोपस्य वल्लवत्वं प्रकुर्वतः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! उस गोव्रजमें रहकर गोपकर्म करते हुए नन्दगोपके बहुत दिन बीत गये ॥ १ ॥
दारकौ कृतनामानौ ववृधाते सुखं च तौ ।
ज्येष्ठः संकर्षणो नाम कनीयान् कृष्ण एव तु ॥ २ ॥
वहाँ उन दोनों बालकोंका उन्होंने नामकरण-संस्कार कर दिया। तदनन्तर वे दोनों भाई वहाँ बड़े सुखसे रहने और दिनोंदिन बढ़ने लगे। उनमें बड़ेका नाम 'संकर्षण' था और छोटेका 'कृष्ण' ॥ २ ॥
मेघकृष्णस्तु कृष्णोऽभूद् देहान्तरगतो हरिः ।
व्यवधंत गवां मध्ये सागरस्य इवाम्बुदः ॥ ३ ॥
दूसरे शरीरमें आये हुए भगवान् श्रीहरि ही 'कृष्ण' नामसे विख्यात हुए। उनकी अङ्गकान्ति श्याम मेघकी भाँति साँवली थी। जैसे समुद्रमें मेघकी वृद्धि होती है, उसी प्रकार वे गौओंके बीचमे रहकर बढ़ने लगे ॥ ३ ॥
शकटस्य त्वधः सुप्तं कदाचित् पुत्रगृद्धिनी ।
यशोदा तं समुत्सृज्य जगाम यमुनां नदीम् ॥ ४ ॥
यशोदा अपने पुत्रको हृदयसे चाहनेवाली थी। एक दिनकी बात है, लाला कन्हैया छकड़ेके नीचे सोया था, उसे उसी अवस्थामें छोड़कर यशोदा मैया यमुनाजीमे नहानेके लिये चली गयीं ॥ ४ ॥
शिशुलीलां ततः कुर्वन् स हस्तचरणौ क्षिपन् ।
रुरोद मधुरं कृष्णः पादावूर्ध्वं प्रसारयन् ॥ ५ ॥
फिर तो लला कन्हैया बाललीला करता हुआ अपने दोनों हाथ-पैर फेंकने लगा। पैरोंको ऊँचेतक फैलाकर मधुर स्वरमें रोने लगा ॥ ५ ॥
स तत्रैकेन पादेन शकटं पर्यवर्तयत् ।
न्युब्जं पयोधराकाङ्क्षी चकार च रुरोद च ॥ ६ ॥
(अब उसके मनमें मैयाके दूध पीनेकी इच्छा जाग उठी, फिर तो) उसने वहाँ एक ही पैरके धक्केसे छकड़ेको औंधा उलट दिया। यह सब उसने स्तन-पानकी इच्छासे ही किया था। यह अद्भुत लीला करके वह रोने लगा ॥ ६ ॥
एतस्मिन्नन्तरे प्राप्ता यशोदा भयविह्वला ।
स्नाता प्रस्रवदिग्धाङ्गी बद्धवत्सेव सौरभी ॥ ७ ॥
इसी बीचमें भयसे व्याकुल हुई यशोदा मैया नहाकर लौट आयी। उसके स्तनोंसे दूध झर रहा था, जो उसके अन्य अङ्गोंमें भी फैलता जा रहा था। जिसका बछड़ा बँधा हुआ हो, उस गायकी भाँति वह अपने बच्चेको स्तन पिलानेके लिये उत्सुक थी ॥ ७ ॥
२३० श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे
सा ददर्श विपर्यस्तं शकटं वायुना विना ।
हाहेति कृत्वा त्वरिता दारकं जगृहे तदा ॥ ८ ॥
उसने देखा, विना आँधी-पानीके ही यह छकड़ा उलटा पड़ा है। फिर तो 'हाय ! हाय !' करके तुरंत ही लालको गोदमें उठा लिया ॥ ८ ॥
न सा बुबोध तत्त्वेन शकटं परिवर्तितम् ।
स्वस्ति मे दारकायेति प्रीता भीता च साभवत् ॥ ९ ॥
वह इस बातको न जान सकी कि छकड़ेके उलट जानेका वास्तवमें क्या कारण है ? 'भगवान् मेरे लालको सकुशल रक्खें'—ऐसा कहकर मैया पुत्र-प्रेममें मग्न हो गयी और 'बच्चेको कहीं चोट तो नहीं लगी'—इस आशङ्कासे उसको भय भी हुआ ॥ ९ ॥
किं तु वक्ष्यति ते पुत्र पिता परमकोपनः ।
त्वय्यधःशकटे सुप्ते अकस्माच्च विलोड़िते ॥ १० ॥
(वह बच्चेकी ओर देखकर बोली—) 'बेटा ! तुम्हारे पिता बड़े क्रोधी हैं। तुम छकड़ेके नीचे सोये थे और वह अकस्मात् उलट गया। यह सुनकर वे न जाने मुझे क्या-क्या कहेंगे ? ॥ १० ॥
किं मे स्नानेन दुःस्नानं किं च मे गमने नदीम् ।
पर्यस्ते शकटे पुत्र या त्वां पश्याम्यपावृतम् ॥ ११ ॥
'लाल ! मुझे नहानेसे क्या मिलता ? यदि तुम्हें कुछ हो जाता तो मेरा वह स्नान तो दुःस्नान ही था । मुझे नदी-तटपर जानेकी भी क्या आवश्यकता थी । वहाँसे लौटकर देखती हूँ तो छकड़ा उलटा पड़ा है और तुम खुले आकाशके नीचे सोये हो ! ( हाय ! हाय ! यह सब कैसे हुआ ? )' ॥ ११ ॥
एतस्मिन्नन्तरे गोभिरराजगाम वनेचरः ।
काषायवाससी बिभ्रन् नन्दगोपो व्रजान्तिकम् ॥ १२ ॥
इसी समय गौओंके साथ वनमें विचरकर नन्दजी व्रजके निकट आये। उन्होंने गेरुए रंगके दो वस्त्र धारण कर रखे थे ॥ १२ ॥
स ददर्श विपर्यस्तं भिन्नभाण्डघटीघटम् ।
अपास्तधूर्विभिन्नाक्षं शकटं चक्रमौलिनम् ॥ १३ ॥
उन्होंने देखा, छकड़ा औंधा पड़ा है। उसपर लदे हुए सारे बर्तन, घड़े, मोंट और मटके चकनाचूर हो गये हैं। जुआ निकलकर दूर जा पड़ा है। धुरा टूट गया है और पहिया मुकुटके समान ऊपरको उठ गया है ॥ १३ ॥
भीतस्त्वरितमागत्य सहसा साश्रुलोचनः ।
अपि मे स्वस्ति पुत्रायेत्यसकृद् वचनं वदन् ॥ १४ ॥
यह देखकर वे डर गये और जल्दी-जल्दी पैर बढ़ाते हुए सहसा घर आ पहुँचे । उस समय उनके नेत्रोंमें आँसू भरे हुए थे । वे बार-बार पूछने लगे, 'महर ! मेरा लाल कुशलसे तो है न ?' ॥ १४ ॥
पिबन्तं स्तनमालक्ष्य पुत्रं स्वस्थोऽब्रवीत्पुनः ।
वृषयुद्धं विना केन पर्यस्तं शकटं मम ॥ १५ ॥
फिर बेटेको स्तनपान करते देख उनके जीमें जी आया । उन्होंने पुनः पूछा, 'महर ! बैलोंमें लड़ाई तो हुई नहीं, फिर यह छकड़ा कैसे उलट गया ?' ॥ १५ ॥
प्रत्युवाच यशोदा तं भीता गद्गदभाषिणी ।
न विजानाम्यहं केन शकटं परिवर्तितम् ॥ १६ ॥
अहं नदीं गता सौम्य चैलप्रक्षालनार्थिनी ।
आगता च विपर्यस्तमपश्यं शकटं भुवि ॥ १७ ॥
यशोदाने भयभीत होकर गद्गद वाणीमें कहा—'नाथ ! मैं नहीं जानती कि किसने छकड़ा उलट दिया । सौम्य ! मैं तो कपड़े धोनेके लिये यमुनाजीके तटपर गयी थी । लौटकर देखती हूँ तो छकड़ा धरतीपर औंधा पड़ा है' ॥ १६-१७ ॥
तयोः कथयतोरेवमब्रुवंस्तत्र दारकाः ।
अनेन शिशुना यानेमेतत् पादेन लोड़ितम् ॥ १८ ॥
अस्माभिः सम्पतद्भिश्च दृष्टमेतद् यदृच्छया ।
वे दोनों जब इस प्रकार वार्तालाप कर रहे थे, उस समय वहाँ आये हुए व्रजके बालकों ने कहा—'बाबा ! तुम्हारे इस लालने ही अपने पैरसे मारकर यह गाड़ी लुढ़का दी है। हमलोग अकस्मात् यहाँ दौड़े हुए आये थे । हमने अपनी आँखों यह घटना देखी है' ॥ १८ ½ ॥
नन्दगोपस्तु तच्छ्रुत्वा विस्मयं परमं ययौ ॥ १९ ॥
प्रहृष्टश्चैव भीतश्च किमेतदिति चिन्तयन् ।
बालकोंकी वह बात सुनकर नन्दगोपको बड़ा विस्मय हुआ । वे पहले तो प्रसन्न हुए, परंतु ऐसा सोचते हुए कि यह क्या है, वे फिर डर गये ॥ १९ ½ ॥
न च ते श्रद्दधुर्गोपाः सर्वे मानुषबुद्धयः ॥ २० ॥
आश्चर्यमिति ते सर्वे विस्मयोत्फुल्ललोचनाः ।
स्वे स्थाने शकटं स्थाप्य चक्रबन्धमकारयन् ॥ २१ ॥
वहाँ जो बड़े-बड़े गोप थे, उन सबको इस बातपर विश्वास नहीं हुआ; क्योंकि वह उस बच्चेको साधारण मनुष्यका ही बालक समझते थे । फिर भी वे सब-के-सब इस घटनासे आश्चर्य करने लगे थे । उनके नेत्र विस्मयसे खिल उठे थे । वे छकड़ेको अपनी जगहपर खड़ा करके उसमें पहिये जोड़ने लगे ॥ २०-२१ ॥
वैशम्पायन उवाच
कस्यचित्त्वथ कालस्य शकुनी वेषधारिणी ।
धात्री कंसस्य भोजस्य पूतनेति परिश्रुता ॥ २२ ॥
सप्तमोऽध्यायः
विष्णुपर्व ] सप्तमोऽध्यायः २२१
पूतना नाम शकुनी घोरा प्राणिभयंकारी । भाजगामार्ड्ढरात्रे वै पक्षौ क्रोधाद् विधुन्वती ॥ २३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! कुछ कालके बाद ब्रजमें आधी रातके समय क्रोधपूर्वक अपने दोनों पंख हिलाती हुई पक्षिणीका वेष धारण किये एक राक्षसी आयी। वह भोजराज कंसकी धाय थी, उसका नाम पूतना था। पूतना नामवाली वह घोर पक्षिणी समस्त प्राणियोंके लिये भयंकर थी ॥ २२-२३ ॥
ततोऽर्धरात्रसमये पूतना प्रत्यदृश्यत । व्याघ्रगम्भीरनिर्घोषं व्याहरन्ती पुनः पुनः ॥ २४ ॥
आधी रातके समय जब पूतना दिखायी दी, उस समय वह व्याघ्रके दहाड़नेके-से गम्भीर घोषमें बारंबार गर्जना कर रही थी ॥ २४ ॥
निलिल्ये शकटस्याक्षे प्रस्रवोत्पीडवर्षिणी । ददौ स्तनं च कृष्णाय तस्मिन् सुप्ते जने निशि ॥ २५ ॥
वह मानवी स्त्रीका वेष धारण करके छकड़ेके धुरेके नीचे छिप गयी। उस समय उसके स्तनोंमें इतना दूध बढ़ आया था कि उनमें पीड़ा होने लगी थी, इसीलिये वह दूधकी वर्षा सी करने लगी। उस निशीथ-कालमें जब सब लोग सो गये थे, उसने कृष्णके मुखमें अपना स्तन दे दिया ॥ २५ ॥
तस्याः स्तनं पपौ कृष्णः प्राणैः सह विनद्य च । छिन्नस्तनी तु सहसा पपात शकुनी भुवि ॥ २६ ॥
लाल कन्हैया उस स्तनको उसके प्राणोंके साथ ही पी गया, उसका स्तन कट गया और वह पक्षिणी घोर चीत्कार करके सहसा पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ २६ ॥
तेन शब्देन वित्रस्तास्ततो बुबुधिरे भयात् । स नन्दगोपो गोपा वै यशोदा च सुविक्लवा ॥ २७ ॥
उसके उस शब्दसे संत्रस्त होकर नन्दगोप, दूसरे-दूसरे गोप तथा अत्यन्त व्याकुल हुई यशोदा—ये सब के-सब भयके मारे जाग उठे ॥ २७ ॥
ते तामपश्यन् पतितां विसंज्ञां विपयोधराम् । पूतनां पतितां भूमौ वज्रेणेव विदारिताम् ॥ २८ ॥
उन्होंने देखा, पूतना पृथ्वीपर अचेत होकर पड़ी है। उसका स्तन कट गया है और वह ऐसी प्रतीत होती है, मानो वज्रसे विदीर्ण कर दी गयी हो ॥ २८ ॥
इदं किं त्विति संत्रस्ताः कस्येदं कर्म चेत्यपि । नन्दगोपं पुरस्कृत्य गोपास्ते पर्यवारयन् ॥ २९ ॥
यह क्या है ? किसका यह कर्म है ? ऐसी बातें करते हुए वे गोप भयभीत हो गये और नन्दजीको आगे करके पूतनाको घेरकर खड़े हो गये ॥ २९ ॥
नाध्यगच्छन्त च तदा हेतुं तत्र कदाचन । आश्चर्यमाश्चर्यमिति ब्रुवन्तोऽनुययुर्गृहान् ॥ ३० ॥
वे उस समय उस घटनाके कारणका पता कदापि न लगा सके और आश्चर्य है ! आश्चर्य है !! ऐसा कहते हुए अपने-अपने घरोंको चले गये ॥ ३० ॥
गतेषु तेषु गोपेषु विस्मितेषु यथागृहम् । यशोदां नन्दगोपस्तु पप्रच्छ गतसम्भ्रमः ॥ ३१ ॥
उन विस्मित हुए गोपोंके अपने-अपने घर चले जानेपर सम्भ्रमरहित हुए नन्दगोपने यशोदासे पूछा—॥ ३१ ॥
कोऽयं विधिर्न जानामि विस्मयो मे महानयम् । पुत्रस्य मे भयं तीव्रं भीरुत्वं समुपागतम् ॥ ३२ ॥
'विधाताका यह कैसा विधान है, यह मेरी समझमें नहीं आता। इस घटनासे मुझे महान् विस्मय हो रहा है। यहाँ मेरे पुत्रके लिये तीव्र भय उपस्थित हुआ है, जिससे हमलोगोंमें भीरुता आ गयी है' ॥ ३२ ॥
यशोदा त्वब्रवीद् भीता नार्य जानामि किंत्विदम् । दारकेण सहानेन सुप्ता शब्देन बोधिता ॥ ३३ ॥
यह सुनकर यशोदाने भयभीत होकर कहा—'आर्य ! मैं भी नहीं जानती कि यह क्या है ? मैं तो इस बच्चेके साथ सोयी थी। इस राक्षसीके चीत्कारसे ही जग गयी हूँ' ॥
यशोदायामजानन्त्यां नन्दगोपः सबान्धवः । कंसाद् भयं चकारोग्रं विस्मयं च जगाम ह ॥ ३४ ॥
जब यशोदाने भी अपनी अनभिज्ञता प्रकट की, तब बन्धु-बान्धवोंसहित नन्दगोप कंससे अत्यन्त भय मानने लगे और मन-ही-मन विस्मयको प्राप्त हुए ॥ ३४ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि शिशुचर्यायां शकटभङ्गपूतनावधे षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें श्रीकृष्णकी बाललीलाके प्रसङ्गमें शकट-भङ्ग और पूतनाका वधविषयक छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ ६ ॥
सप्तमोऽध्यायः
श्रीकृष्ण और बलरामका ब्रजमें घुटनोंके बल चलना तथा श्रीकृष्णका उलूखलमें बँधकर यमलार्जुन-भङ्गकी लीला करना
वैशम्पायन उवाच
कृष्णसंकर्षणौ चोभौ रिङ्गिणौ समपद्यताम् ॥ १ ॥
काले गच्छति तौ सौम्यौ शास्तौ रूढतनामको ।
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! कुछ काल
२५२ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
बीतनेपर वे दोनों सौम्य बालक, जिनके नामकरण-संस्कार हो चुके थे और जो कृष्ण और संकर्षण नामसे प्रसिद्ध थे, घुटनों-के बल चलने-फिरने लगे ॥ १ ॥
तावन््योन्यगतौ बालौ बाल्यादेवैकतां गतौ।
एकमूर्तिधरौ कान्तौ बालचन्द्रार्कवर्चसौ ॥ २ ॥
बचपनसे ही वे दोनों बच्चे एक दूसरेमें अन्तर्भूत-से होकर एकताको प्राप्त हो गये थे। ऐसा जान पड़ता था कि ये दोनों एक ही शरीर धारण करते हैं। वे दोनों भाई बालचन्द्र और बालसूर्यके समान कान्तिमान् थे ॥ २ ॥
एकनिर्माणनिर्मुक्तावेकशय्यासनाशनौ ।
एकवेषधरावेकं पुष्यमाणौ शिशुव्रतम् ॥ ३ ॥
वे दोनों मानो एक ही साँचेके ढले थे (अथवा अभिन्न और जन्मरहित थे)। एक-सी शय्या, आसन और भोजन-का उपभोग करते थे। एक समान वेष धारण करते थे और एक ही शिशुव्रतका पालन करनेवाले थे ॥ ३ ॥
एककार्यान्तरगतावेकदेहौ द्विधाकृतौ ।
एकचर्यौ महावीर्यावेकस्य शिशुतां गतौ ॥ ४ ॥
वे एक ही कार्यमें संलग्न थे और एक ही शरीरके दो भागसे प्रतीत होते थे। उनकी दिनचर्या एक-सी थी। वे महा-पराक्रमी बालक एक ही पिताके शिशु थे ॥ ४ ॥
एकप्रमाणौ लोकानां देववृत्तान्तमानुषौ ।
कृत्स्नस्य जगतो गोपौ संवृत्तौ गोपदारकौ ॥ ५ ॥
लोगोंकी दृष्टिमें वे एक-जैसे कदके थे। उन्होंने देवताओं-के 'दुष्टदमन और धर्मस्थापन' रूप सिद्धान्तके पालनके लिये मानव-शरीर ग्रहण किया था। वे सम्पूर्ण जगत्के संरक्षक हो-कर भी गोपबालक बन गये थे ॥ ५ ॥
अन्योन्यव्यतिषक्ताभिः क्रीडाभिरभिशोभितौ ।
अन्योन्यकिरणग्रस्तौ चन्द्रसूर्याविवाम्बरे ॥ ६ ॥
वे दोनों भाई एक दूसरेसे मिली हुई क्रीड़ाओंद्वारा सुशोभित होते थे, जैसे आकाशमें चन्द्रमा और सूर्य एक दूसरेकी किरणोंसे बँधकर एक साथ हो गये हों ॥ ६ ॥
विसर्पन्तौ तु सर्वत्र सर्पभोगभुजावुभौ ।
रेजतुः पांसुदिग्धाङ्गौ दृप्तौ कलभकाविव ॥ ७ ॥
उन दोनोंकी भुजाएँ सर्पोंके शरीरके समान जान पड़ती थीं। वे उनके द्वारा सब ओर चलते-फिरते और सरकते थे। उस समय धूलसे भरे हुए शरीरवाले वे दोनों भाई दर्पभरे दो हस्ति-शावकोंके समान शोभा पाते थे ॥ ७ ॥
क्वचिद् भस्मप्रदीप्ताङ्गौ करीषप्रोक्षितौ क्वचित् ।
तौ तत्र पर्यधावेतां कुमाराविव पावकौ ॥ ८ ॥
कहीं तो उनके दीप्तिमान् अङ्गोंमें राख लिपट जाती और कहीं वे करसी (कंडोंके चूर्ण)से नहा उठते थे। वे वहाँ अग्नि-के दो कुमार शाख और विशाखके समान सुशोभित होते हुए सब ओर दौड़ लगाते थे ॥ ८ ॥
क्वचिज्जानुभिरुद्घृष्टैः सर्पमाणौ विरेजतुः ।
क्रीडन्तौ वत्सशालासु शकृद्दिग्धाङ्गमूर्धजौ ॥ ९ ॥
कभी घिसे हुए घुटनोंके बल सरकते हुए श्रीकृष्ण-बलराम बड़ी शोभा पाते थे। कभी वे बछड़ोंके स्थानोंमें जाकर खेलने लगते और सारे अङ्गों तथा सिरके बालोंमें गो-बर लपेट लेते थे ॥ ९ ॥
शुशुभाते श्रिया जुष्टावानन्दजननौ पितुः ।
जनं च विप्रकुर्वाणौ विहसन्तौ क्वचित् क्वचित् ॥ १० ॥
कान्तिरूपिणी श्रीसे सेवित होकर वे दोनों भाई अनुपम शोभा पाते और पिताको आनन्द प्रदान करते थे। कभी-कभी बालस्वभाववश किसी-किसीके विपरीत कार्य कर बैठते और जोर-जोरसे हँसने लगते थे ॥ १० ॥
तौ तत्र कौतूहलिनौ मूर्धजन्याकुलेक्षणौ ।
रेजतुश्चन्द्रवदनौ दारकौ सुकुमारकौ ॥ ११ ॥
वे सदा क्रीड़ा-कौतूहलमें ही लगे रहते थे। उनके सिरके घुँघराले बाल नेत्रोंपर लटककर उन्हें व्याकुल एवं चञ्चल कर देते थे। उन दोनोंके मुख चन्द्रमाके समान सुन्दर थे; अतः वे सुकुमार बालक बड़े सुहावने लगते थे ॥ ११ ॥
अतिप्रसक्तौ तौ दृष्ट्वा सर्वव्रजविचारिणौ ।
नाशकत् तौ वारयितुं नन्दगोपः सुदुर्मदौ ॥ १२ ॥
वे क्रीडामें ही आसक्त हो सारे व्रजमें विचरते रहते थे। उन दोनों अत्यन्त मतवाले बालकोंको सर्वत्र जाते देखकर भी नन्दगोप रोक नहीं पाते थे ॥ १२ ॥
ततो यशोदा संक्रुद्धा कृष्णं कमलोचनम् ।
आनाय्य शकटीमूले भर्त्सयन्ती पुनः पुनः ॥ १३ ॥
दाम्ना चैवोदरे बद्ध्वा प्रत्यबन्धदुलूखले ।
यदि शक्नोषि गच्छेति तमुक्त्वा कर्म साकरोत् ॥ १४ ॥
तत्र एक दिन यशोदा मैया अत्यन्त कुपित हो कमल-नयन श्रीकृष्णको एक गाड़ीके पास ले जाकर वारंवार डांटने-फटकारने लगी। इतना ही नहीं, उसने उनके पेट और कमर-में रस्सी बाँधकर उस रस्सीको ओखलीमें कस दिया और कहा—'अब जा सको तो जाओ।' इतना कहकर वह घरके काम-धंधोंमें लग गयी ॥ १३-१४ ॥
व्यग्रायां तु यशोदायां निर्जगाम ततोऽङ्कणात् ।
शिशुलीलां ततः कुर्वन् कृष्णो विस्मापयन् व्रजम् ।
सोऽङ्कणात्रिःसृतः कृष्णः कर्षमाण उलूखलम् ॥ १५ ॥
यमलाभ्यां प्रवृद्धाभ्यामर्जुनाभ्यां चरन् वने ।
मध्यान्निष्चक्राम तयोः कर्षमाण उलूखलम् ॥ १६ ॥
विष्णुपर्व ] सप्तमोऽध्यायः [ २३३
यशोदाके कार्यमें तत्पर होते ही लाला कन्हैया बाल-लीला करता और ब्रजके लोगोंको विस्मयमें डालता हुआ आँगनसे निकला। वह ओखलीको घसीटता हुआ वनकी ओर चला। मार्गमें एक साथ उत्पन्न हुए दो अर्जुनके वृक्ष थे, जो बहुत बड़े हो गये थे। कन्हैया अपनी ओखलीको खींचता हुआ उन्हीं दोनों वृक्षोंके बीचसे होकर निकला ॥ १५-१६ ॥
तत् तस्य कर्षतो बद्धं तिर्यग्गतमुलूखलम्।
लग्नं ताभ्यां समूलाभ्यामर्जुनाभ्यां चकर्ष च ॥ १७॥
खींचते हुए कन्हैयाके उदरसे बँधी हुई वह ओखली टेढ़ी होकर उन दोनों अर्जुन-वृक्षोंकी जड़में जा लगी और वहीं अटक गयी। फिर तो उसने उन वृक्षोंसहित ओखलीको जोर-से खींचा ॥ १७ ॥
तावर्जुनौ कृष्यमाणौ तेन बालेन रंहसा ।
समूलविटपौ भग्नौ स तु मध्ये जहास वै ॥ १८ ॥
निदर्शनार्थं गोपानां दिव्यं स्वबलमास्थितः ।
बालक कन्हैयाद्वारा वेगसे खींचे गये वे दोनों अर्जुनवृक्ष जड़ और शाखाओंसहित टूटकर गिर पड़े और वह अपने दिव्य बलका आश्रय ले गोपोंको दिखानेके लिये उन दोनों वृक्षोंके बीचमें खड़ा-खड़ा हँसने लगा ॥ १८३ ॥
तद्दाम तस्य बालस्य प्रभावादभवद् दृढम् ॥ १९ ॥
यमुनातीरमार्गस्था गोप्यस्तं ददृशुः शिशुम् ।
क्रन्दन्त्यो विस्मयन्त्यश्च यशोदां ययुरङ्गनाः ॥ २० ॥
उस बालकके प्रभावसे वह रस्सी और भी दृढ़ हो गयी। यमुनातीरके मार्गपर खड़ी हुई गोपियोंने जब बालकृष्णको उस अवस्थामें देखा, तब वे आश्चर्यचकित हो करुणक्रन्दन करती हुई यशोदाजीके पास गयीं ॥ १९-२० ॥
तास्तु सम्भ्रान्तवदना यशोदामूचुरङ्गनाः ।
एह्यागच्छ यशोदे त्वं सम्भ्रमात् किं विलम्बसे ॥ २१॥
यौ तावर्जुनवृक्षौ तु व्रजे सत्योपयाचनौ ।
पुत्रस्योपरि तावेतौ पतितौ ते महीरुहौ ॥ २२ ॥
उन सबके मुखपर घबराहट छायी हुई थी। उन गोपाङ्गनाओंने यशोदासे कहा—'यशोदाजी ! वेगसे आओ ! आओ !! सम्भ्रमके कारण तुम विलम्ब क्यों करती हो। ब्रजमें वे जो दोनों अर्जुनवृक्ष थे, जहाँ हमारी प्रत्येक याचना और मनौती सफल होती थी, वे दोनों वृक्ष तुम्हारे पुत्रके ऊपर गिर पड़े ॥ २१-२२ ॥
दृढेन दाम्ना तत्रैव बद्धो वत्स इवोदरे ।
जहास वृक्षयोर्मध्ये तव पुत्रः स बालकः ॥ २३ ॥
'जैसे बँधा हुआ बछड़ा हो, उसी प्रकार उदरमें मजबूत रस्सीसे बँधा हुआ तुम्हारा वह बालक उन वृक्षोंके बीचमें खड़ा-खड़ा हँस रहा था ॥ २३ ॥
उत्तिष्ठ गच्छ दुर्मेधे मूढे पण्डितमानिनि ।
पुत्रमानय जीवन्तं मुक्तं मृत्युमुखादिव ॥ २४ ॥
'अपनेको पण्डित माननेवाली मूढ़ दुर्बुद्धि यशोदे ! उठो। चलो हमारे साथ और अपने जीवित पुत्रको, जो मानो मौतके मुखसे बचकर निकला है, घर ले आओ' ॥ २४ ॥
सा भीता सहसोत्थाय हाहाकारं प्रकुर्वती ।
तं देशमगमद् यत्र पतितौ तावुभौ द्रुमौ ॥ २५ ॥
यशोदा भयभीत हो सहसा उठी और हाहाकार करती हुई उस स्थानपर गयी, जहाँ उसके लालाने उन दोनों वृक्षोंको धराशायी कर दिया था ॥ २५ ॥
सा ददर्श तयोर्मध्ये द्रुमयोरात्मजं शिशुम् ।
दाम्ना निबद्धमुदरे कर्षमाणमुलूखलम् ॥ २६ ॥
उसने अपने पुत्रको उन दोनों वृक्षोंके बीचमें खड़ा देखा, जो रस्सीसे पेटमें बँधी हुई ओखलीको अपनी ओर खींच रहा था ॥ २६ ॥
सगोपीगोपवृद्धश्च समुवाच व्रजस्तदा ।
पर्यागच्छन्त ते द्रष्टुं गोषेषु महदद्भुतम् ॥ २७ ॥
गोपियों और बड़े-बूढ़े गोपोंसहित सारे ब्रजमें उस समय इसी घटनाकी चर्चा होने लगी। गोपोंके यहाँ जो यह महान् और अद्भुत घटना घटित हुई थी, इसे देखनेके लिये चारों ओरसे लोग आने लगे ॥ २७ ॥
जजल्पुस्ते यथाकामं गोपा वनविचारिणः ।
केनेमौ पातितौ वृक्षौ घोषस्यायतनोपमौ ॥ २८ ॥
वनमें विचरनेवाले वे गोप अपनी इच्छाके अनुसार वहाँ आकर कहने लगे—'अहो ! ब्रजके ये दोनों वृक्ष देवमन्दिरके समान थे, इनको किसने गिरा दिया ॥ २८ ॥
विना वातं विना वर्षं विद्युत्प्रपतनं विना ।
विना हस्तिकृतं दोषं केनेमौ पातितौ द्रुमौ ॥ २९ ॥
'न आँधी चली, न वर्षा हुई, न बिजली गिरी और न किसी हाथीने ही आकर टक्कर मारी, इन सब दोषोंके बिना ही ये दोनों वृक्ष किसके द्वारा गिराये गये ॥ २९ ॥
अहो बत न शोभेतां विमूलवार्जुनद्विमौ ।
भूमौ निपतितौ वृक्षौ वितोयौ जलदाविव ॥ ३० ॥
'अहो ! जड़से अलग हो जानेके कारण पृथ्वीपर गिरे हुए ये दोनों अर्जुन वृक्ष जलहीन बादलोंके समान शोभारहित हो गये हैं ॥ ३० ॥
यदीमौ घोषरचितौ घोषकल्याणकारिणौ ।
नन्दगोप प्रसङ्गो ते द्रुमावेवं गतावपि ।
यच्च ते दारको मुक्तो विपुलाभ्यामपि क्षितौ ॥ ३१ ॥
'नन्दगोप ! यदि ये दोनों वृक्ष इस गोष्ठमें लगाये गये थे और समस्त घोषवासियोंका कल्याण करते थे तो आज
| २३४ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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इस अवस्था में पहुँचकर भी ये दोनों आपपर प्रसन्न ही हैं, जिससे विशाल होनेपर भी इन वृक्षोंने पृथ्वीपर गिरते समय तुम्हारे बालकको जीवित छोड़ दिया है ॥ ३१ ॥
औत्पातिकमिदं घोषे तृतीयं वर्तते त्विह ।
पूतनाया विनाशश्च द्रुमयोः शकटस्य च ॥ ३२ ॥
'इस व्रजमें यह तीसरी बार औत्पातिक घटना हुई है। पूतनाका विनाश, छकड़ेका उलटना और वृक्षोंका धराशायी होना—ये तीन उपद्रव यहाँ हो चुके ॥ ३२ ॥
अस्मिन् स्थाने च वासोऽयं घोषस्यास्य न युज्यते ।
उत्पाता ह्यत्र दृश्यन्ते कथयन्तो न शोभनम् ॥ ३३ ॥
'इस स्थानपर हमारे इस व्रजका रहना अब उचित नहीं जान पड़ता; क्योंकि यहाँ अशुभ परिणामकी सूचना देनेवाले उत्पात दिखायी देने लगे हैं' ॥ ३३ ॥
नन्दगोपस्तु सहसा मुक्त्वा कृष्णमुलूखलात् ।
निवेश्य चाङ्के सुचिरं मृतं पुनरिवागतम् ॥ ३४ ॥
नातृप्यत् प्रेक्षमाणो वै कृष्णं कमलोचनम् ।
इतनेहीमें नन्दगोपने सहसा बन्धन खोलकर श्रीकृष्णको ओखलीसे मुक्त कर दिया और मानो वह बालक मरकर पुनः जी उठा हो, ऐसा मानते हुए वे देरतक उसे अपनी गोदमें चिपकाये रहे । उस समय वे कमलनयन श्रीकृष्णकी ओर देखते-देखते तृप्त नहीं होते थे ॥ ३४ १/२ ॥
ततो यशोदां गर्हन् वै नन्दगोपो विवेश ह ॥ ३५ ॥
स च गोपजनः सर्वो व्रजमेव जगाम ह ।
तदनन्तर नन्दगोप यशोदाकी निन्दा करते हुए घरमें गये, साथ ही अन्य सब गोप भी व्रजमें ही पधारे ॥ ३५ १/२ ॥
स च तेनैव नाम्ना तु कृष्णो वैदामबन्धनात् ।
गोष्ठे दामोदर इति गोपीभिः परिगीयते ॥ ३६ ॥
उस दाम अर्थात् रस्सीसे उदरमें बाँधे जानेके कारण श्रीकृष्णका नाम दामोदर हो गया । व्रजमें गोपियाँ उसी नामसे उनकी लीलाओंका गान करने लगीं ॥ ३६ ॥
एतदाश्चर्यभूतं हि बालस्यासीद् विचेष्टितम् ।
कृष्णस्य भरतश्रेष्ठ घोषे निवसतस्तदा ॥ ३७ ॥
भरतश्रेष्ठ ! व्रजमें निवास करते समय बालक कृष्णकी ऐसी ही आश्चर्यमयी लीलाएँ होती रहती थीं ॥ ३७ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि शिशुचर्यायां यमलार्जुनभङ्गो नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें बाललीलाके प्रसङ्गमें यमलार्जुनभङ्गविषयक सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७ ॥
अष्टमोऽध्यायः
श्रीकृष्ण-बलरामकी बालचर्या, श्रीकृष्णके द्वारा व्रजको अन्यत्र ले जानेकी चेष्टा और अपने शरीरसे भेड़ियोंको उत्पन्न करके उनका समूचे व्रजको डराना
वैशम्पायन उवाच
एवं तौ बाल्यमुत्तीर्णौ कृष्णसंकर्षणावुभौ ।
तस्मिन्नेव व्रजस्थाने सप्तवर्षौ बभूवतुः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! इस प्रकार श्रीकृष्ण और संकर्षण दोनों भाई उसी व्रजमें बाल्यावस्थाको पार करके सात वर्षके हो गये ॥ १ ॥
नीलपीताम्बरधरौ पीतश्वेतानुलेपनौ ।
बभूवतुर्वत्सपालौ काकपक्षाधरावुभौ ॥ २ ॥
इनमेंसे एक (बलराम) तो नील वस्त्र धारण करते थे और दूसरे (श्रीकृष्ण) पीत वस्त्र । दोनोंके चन्दन और अङ्गराग भी क्रमशः पीले और श्वेत थे । दोनों ही काकपक्ष धारण करते थे। अब वे दोनों भाई बछड़े चराने लगे ॥ २ ॥
पर्णवाद्यं श्रुतिसुखं वादयन्तौ वराननौ ।
शुशुभाते वनगतौ त्रिशीर्षाविव पन्नगौ ॥ ३ ॥
उन दोनोंके मुख बड़े सुन्दर थे। वे वनमें जाकर कानोंको सुख देनेवाले पत्तोंके बाजे (पिपीहरी या सीटी)* बजाते हुए तीन सिरवाले सर्पोंके समान शोभा पाते थे* ॥ ३ ॥
मयूराङ्गदकर्णौ तु पल्लवापीडधारिणौ ।
वनमालाकुलोरस्कौ द्रुमपोताविवोद्गतौ ॥ ४ ॥
मोरपङ्खके ही बाजूबंद और कर्णभूषण पहने तथा पत्तोंके ही मुकुट धारण किये वे दोनों भाई वृक्षके निकले
* ताड़ आदिके पत्तेको मोड़कर उसके सिरेपर छोटा-सा छेद रखकर उसे दोनों हाथसे पकड़े हुए बच्चे मुँहमें डालकर फूँकते हैं, उसमेंसे सीटी, बिगुल या बाँसुरी-जैसी आवाज निकलती है। उसे बजाते समय दोनों हाथ और सिर ऊँचाईपर रहते हैं। इसीकी सर्पके तीन सिरोंसे उपमा दी गयी है।
B. K. Mitra
श्रीकृष्ण और बलरामका वन-विहार (पृष्ठ-संख्या २३४)
अष्टमोऽध्यायः
विष्णुपर्व ] अष्टमोऽध्यायः २३५
हुए-नये पौधोंके समान दिखायी देते थे। उनका वक्षःस्थल वनमालासे व्याप्त था ॥ ४ ॥
अरविन्दकृतापीडौ रज्जुयज्ञोपवीतिनौ ।
सशिक्यतुम्बकरकौ गोपवेणुप्रवादकौ ॥ ५ ॥
कमलपुष्पोंके शिरोभूषण और रस्सीके यज्ञोपवीत धारण करके ये दोनों ग्वालबालोंके समान मुरली बजाया करते थे। उनके साथ छींका, तुम्बी और करक (करुआ या पुरवा) भी थे ॥ ५ ॥
क्वचिद्धसन्तावन्योन्यं क्रीडमानौ क्वचित् क्वचित् ।
पर्णशय्यासु संसुप्तौ क्वचिन्निद्रान्तरेक्षणौ ॥ ६ ॥
कहीं एक दूसरेकी ओर देखकर हँसते-हँसते, कहीं भाँति-भाँतिके खेल खेलते और कहीं पत्तोंके बिछौनोंपर सोकर आँखोंमें नींद भर लेते थे ॥ ६ ॥
एवं वत्सान् पालयन्तौ शोभयन्तौ महावनम् ।
चञ्चूर्यन्तौ रमन्तौ स्म किशोराविव चञ्चलौ ॥ ७ ॥
इस प्रकार बछड़े चराते, महावनकी शोभा बढ़ाते, वारंबार सब ओर चक्कर लगाते और चञ्चल गतिवाले अश्वशावकोंके समान वनमें विहार करते थे ॥ ७ ॥
अथ दामोदरः श्रीमान् संकर्षणमुवाच ह ।
आर्य नास्मिन् वने शक्यं गोपालैः सह क्रीडितुम् ॥ ८॥
अवगीतमिदं सर्वमवाप्ताभ्यां भुक्तकाननम् ।
प्रक्षीणतृणकाष्ठं च गोपैर्मथितपादपम् ॥ ९ ॥
तदनन्तर एक दिन शोभासम्पन्न दामोदर श्रीकृष्णने अपने भाई संकर्षणसे कहा—'आर्य ! अब इस वनमें ग्वाल-बालोंके साथ खेलना सम्भव नहीं है। हमलोगोंने इस सारे वनको अपने उपभोगमें लाकर इसकी शोभा-सम्पत्ति नष्ट कर दी है। यहाँकी घास चर ली गयी और काठ भी तोड़ लिये गये हैं। गोपोंने यहाँके एक-एक वृक्षको मथ डाला है ॥ ८-९ ॥
घनीभूतानि यान्यासन् काननानि वनानि च ।
तान्याकाशनिकाशानि दृश्यन्तेऽद्य यथाऽसुखम् ॥ १०॥
'जो वन और कानन सघन थे, वे अब आकाशके समान सूने दिखायी देते हैं। इन्हें देखकर अब सुख नहीं मिलता ॥
गोवाटेष्वाप ये वृक्षाः परिवृत्तार्गलेषु च ।
सर्वे गोष्ठाग्निषु गताः क्षयमक्षयवर्चसः ॥ ११ ॥
'जिनके फाटकोंमें गोलाकार कुंडे लगे हैं, उन गो-शालाओंमें भी अमित शोभावाले जो वृक्ष थे, वे सब गोष्ठकी आगमें जलकर नष्ट हो गये ॥ ११ ॥
संनिकृष्टानि यान्यासन् काष्ठानि च तृणानि च ।
तानि दूरावकृष्टानि मार्गितव्यानि भूमिषु ॥ १२ ॥
'जो तृण और काष्ठ बहुत निकट थे, वे दूरतककी जोती हुई भूमियोंमें अब ढूँढ़नेके योग्य रह गये हैं ॥ १२ ॥
अरण्यमिदमल्पोदमल्पकक्षं निराश्रयम् ।
अन्वेषितव्यविश्रामं दारुणं विरलद्रुमम् ॥ १३ ॥
'इस वनमें जल बहुत थोड़ा है, सूखे काठ और तृण भी बहुत कम हैं, यहाँ आश्रय लेनेयोग्य कोई स्थान नहीं है, यहाँ विश्रामके लिये भूमि खोजनी पड़ती है, विरले ही वृक्ष बच गये हैं, अतः इसकी बड़ी दारुण अवस्था हो गयी है ॥
अकर्मण्येषु वृक्षेषु स्थितविप्रस्थितद्विजम् ।
संवासस्यास्य महतो जनेनोत्सादिद्रुमम् ॥ १४ ॥
'यहाँके वृक्ष अब कामके नहीं रहे (इनमें फल-फूलका अभाव हो गया है)। इनपर जो पक्षी रहते थे, वे अब अन्यत्र प्रस्थान कर चुके हैं। इस विशाल बस्तीके लोगोंने यहाँके वृक्षोंको उजाड़ कर दिया है ॥ १४ ॥'
निरानन्दं निरास्वादं निष्प्रयोजनमारुतम् ।
निर्विहङ्गममिदं शून्यं निर्व्यञ्जनमिवाशनम् ॥ १५ ॥
'यहाँ कोई आनन्द नहीं रहा, फलोंका आस्वाद दुर्लभ हो गया। यहाँ वायुका चलना भी निष्फल है (क्योंकि न तो वह सुगन्ध देती है और न फल ही गिराती है—इन दोनों वस्तुओंका यहाँ सर्वथा अभाव है)। पक्षियोंसे रहित यह सूना वन बिना व्यञ्जनके भोजनकी भाँति अच्छा नहीं लगता ॥
विक्रीयमाणैः काष्ठैश्च शाकैश्च वनसम्भवैः ।
उच्छिन्नसंचयतृणैर्घोषोऽयं नगरायते ॥ १६ ॥
'यहाँके सूखे काठ और इस वनमें होनेवाले शाक प्रति-दिन बेचे जा रहे हैं। यहाँ जो ढेर-के-ढेर तृण थे, उनका उच्छेद हो गया; इससे यह घोष (ब्रज) नगरके समान जान पड़ता है ॥ १६ ॥
शैलानां भूषणं घोषो घोषाणां भूषणं वनम् ।
वनानां भूषणं गावस्तास्वास्माकं परा गतिः ॥ १७ ॥
'पर्वतोंका भूषण है घोष (गोष्ठ), घोषोंका भूषण है वन और वनोंका आभूषण हैं गौएँ। वे गौएँ ही हमलोगोंकी परम गति (सबसे बड़ा सहारा) हैं ॥ १७ ॥
तस्मादन्यद् वनं यामः प्रत्यग्रतृणसेन्धनम् ।
इच्छन्त्यनुपभुक्तानि गावो भोक्तुं तृणानि च ॥ १८ ॥
'अतः अब हम दूसरे वनमें चलें, जहाँ नयी-नयी घास और ईंधनकी अधिकता हो। हमारी गौएँ उन नयी-नयी घासोंको चरना चाहती हैं, जो अबतक चरी नहीं गयी हैं ॥ १८ ॥
तस्माद् वनं नवतृणं गच्छन्तु धनिनो व्रजाः ।
न द्वारबन्धावरणा न गृहक्षेत्रिणस्तथा ।
प्रशस्ता वै व्रजा लोके यथा वै चक्रचारिणः ॥ १९ ॥
'अतः जो व्रज धनसे सम्पन्न हों, वे उस वनमें चलें जहाँ नयी-नयी घास उपलब्ध हो। जिनमें दरवाजे बँध गये हैं
५३६ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे.
और चारों ओरसे बाड़ लग गये हैं, जहाँ स्थायी घर बन गये और खेत कर लिये गये; ऐसे व्रज लोकमें अच्छे नहीं माने जाते । उन्मुक्त विचरनेवाले हंसोंके समान बन्धनरहित होकर विभिन्न स्थानोंमें घूमते रहनेवाले व्रज ही श्रेष्ठ हैं ॥ १९ ॥
शकृन्मूत्रेषु तेष्वेव जातक्षाररसायनम्।
न तृणं भुञ्जते गावो नापि तत् पयसे हितम् ॥ २० ॥
'उन्हीं गोबर-मूत्रोंके ढेरपर जो तृण पैदा होते हैं अथवा अन्यत्र पैदा हुए तृणोंपर जब गोबर-गोमूत्र पड़ जाते हैं, तब उनमें क्षार एवं रसायनके गुण आ जाते हैं; अतः गौएँ उन घासोंको चाहसे नहीं खाती हैं तथा वे तृण दूधके लिये भी हितकारी नहीं होते हैं ॥ २० ॥
स्थलीप्रायासु रथ्यासु नवांसु वनराजिषु ।
चरावः सहितौ गोभिः क्षिप्रं संवाह्यतां व्रजः ॥ २१ ॥
'आजकल इस वनकी सारी गलियाँ स्थल-सी हो गयी हैं। उनमें घास-फूँसका नाम भी नहीं रह गया है; अतः चलिये, हम दोनों गौओंके साथ नूतन वन-श्रेणियोंमें विचरें। अब शीघ्र ही यहाँसे व्रजको अन्यत्र ले जाना चाहिये ॥ २१ ॥
श्रूयते हि वनं रम्यं पर्याप्ततृणसंस्तरम्।
नाम्ना वृन्दावनं नाम स्वादुवृक्षफलोदकम् ॥ २२ ॥
'सुना जाता है कि वृन्दावन नामक वन बड़ा ही रमणीय है। वहाँ पर्याप्त घास फैली हुई है। वहाँके वृक्षोंमें स्वादिष्ट फल लगे हैं और वहाँका जल भी स्वादु है ॥ २२ ॥
अझिल्लिकण्टकवनं सर्वैर्वनगुणैर्युतम् ।
कदम्बपादपप्रायं यमुनातीरसंश्रितम् ॥ २३ ॥
'उस वनमें न झिल्लियाँ (झींगुर) हैं, न काँटे । उसमें सभी वनसम्बन्धी गुणोंका संयोग है । वहाँ अधिकतर कदम्बके वृक्ष हैं तथा वह वन यमुनाके तटपर ही स्थित है ॥
स्निग्धशीतानिलवनं सर्वर्तुनिलयं शुभम् ।
गोपीनां सुखसंचारं चारुचित्रवनान्तरम् ॥ २४ ॥
'उसमें सदा स्निग्ध एवं शीतल वायु चलती रहती है। वहाँ सभी ऋतुओंका निवास है। वह वन बड़ा सुन्दर एवं सुखद है। वहाँ गोपियाँ बड़े सुखसे सब ओर विचर सकती हैं । वृन्दावनके भीतरी भागमें और भी बहुत-से विचित्र एवं मनोहर वन हैं ॥ २४ ॥
तत्र गोवर्धनो नाम नातिदूरे गिरिर्महान् ।
भ्राजते दीर्घशिखरो नन्दनस्येव मन्दरः ॥ २५ ॥
'वहाँ गोवर्धन नामक महान् पर्वत है, जो उस वनसे अधिक दूर नहीं है। उसके बड़े-बड़े शिखर हैं। जैसे नन्दन-वनके पास मन्दराचलकी शोभा होती है, उसी प्रकार वृन्दावनके निकट गोवर्धन सुशोभित होता है ॥ २५ ॥
मध्ये चास्य महाशाखो न्यग्रोधो योजनोच्छ्रितः।
भाण्डीरो नाम शुशुभे नीलमेघ इवाम्बरे ॥ २६ ॥
'उस वनके मध्यभागमें विशाल शाखाओंसे सुशोभित एक बरगदका वृक्ष है, जो एक योजन ऊँचा है । उसका नाम है भाण्डीर वट । वह आकाशमें श्याम मेघके समान शोभा पाता है ॥ २६ ॥
मध्येन चास्य कालिन्दी सीमन्तमिव कुर्वती ।
प्रयाता नन्दनस्येव नलिनी सरितां वरा ॥ २७ ॥
'जैसे नन्दन वनके बीचमें सरिताओंमें श्रेष्ठ नलिनी प्रवाहित होती है, उसी प्रकार वृन्दावनके मध्यभागमें सीमन्त-सा बनाती हुई कालिन्दी बहती है ॥ २७ ॥
तत्र गोवर्धनं चैव भाण्डीरं च वनस्पतिम् ।
कालिन्दीं च नदीं रम्यां द्रक्ष्यावावश्चरतः सुखम् ॥ २८ ॥
'हमलोग वहाँ चलनेपर गोवर्धन पर्वत, भाण्डीर वट तथा रमणीय कालिन्दी नदीका सुखपूर्वक दर्शन करेंगे ॥ २८ ॥
तत्रायं कल्प्यतां घोषस्त्यज्यतां निर्गुणं वनम् ।
संत्रासयामो भद्रं ते किञ्चिदुत्पाद्य कारणम् ॥ २९ ॥
'वहीं चलकर इस व्रजको बसाया जाय और इस गुणहीन वनको छोड़ दिया जाय । मैया ! आपका भला हो, कोई नवीन कारण उत्पन्न करके हम इन व्रजवासियोंको डरावें' ॥
एवं कथयतस्तस्य वासुदेवस्य धीमतः ।
प्रादुर्बभूवुः शतशो रक्तमांसावसाशनाः ॥ ३० ॥
घोराश्चिन्तयतस्तस्य खतनूरूहजास्तदा ।
विनिष्पेतुर्भयकराः सर्वशः शतशो वृकाः ॥ ३१ ॥
बुद्धिमान् वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण ऐसा कह ही रहे थे कि उनके रोम-रोमसे सैकड़ों भयानक भेड़िये उत्पन्न होने लगे, जो रक्त, मांस और वसाका आहार करनेवाले थे । उनके चिन्तन करते ही सब ओर सैकड़ों भयंकर वृक निकल पड़े थे ॥ ३०-३१ ॥
निष्पतन्ति स्म बहवो व्रजस्योत्सादनाय वै ।
वृकान् निष्पतितान् दृष्ट्वा गोषु, वत्सेष्वथो नृषु ॥ ३२ ॥
गोपीषु च यथाकामं व्रजे त्रासोऽभवन्महान् ।
व्रजको वहाँसे उजाड़नेके लिये जब श्रीकृष्णकी इच्छाके अनुसार बहुत-से भेड़िये प्रकट होने लगे, तब उन्हें देखकर गौओं, बछड़ों, मनुष्यों तथा गोपाङ्गनाओंमें अथवा यौं कहिये सम्पूर्ण व्रजमें महान् त्रास छा गया ॥ ३२॥
ते वृकाः पञ्चबद्धाश्च दशबद्धास्तथा परे ॥ ३३ ॥
त्रिंशद्विंशतिबद्धाश्च शतबद्धास्तथा परे ।
निश्चेरुरस्तस्य गात्रेभ्यः श्रीवत्सकृतलक्षणाः ॥ ३४ ॥
ये भेड़िये पाँच, दस, बीस, तीस तथा सौ-सौके झुंड बनाकर श्रीकृष्णके अङ्गोंसे निकल रहे थे । ये सभी श्रीवत्सके चिह्नसे सुशोभित थे ॥ ३३-३४ ॥