विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 250, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] पञ्चमोऽध्यायः २२९
वायु सुवासित हो रही थी। नीली-पीली साड़ियोंसे सुशोभित तरुणी स्त्रियाँ उस व्रजको अलंकृत किये हुए थीं॥ २८॥
वन्यपुष्पावतंसाभिर्गोपकन्याभिरावृतम् ।
शिरोभिर्धृतकुम्भाभिर्बद्धैरग्रस्तनाम्बरैः ॥ २९ ॥
यमुनातीरमार्गेण जलहारीभिरावृतम् ।
वनके फूलोंका कर्णभूषण धारण किये बहुत-सी गोपकन्याएँ वहाँ सिरपर घड़े लिये आती-जाती थीं। उनके स्तनोंके अग्रभाग चोलीसे बँधे थे और उनपर आँचल पड़ा हुआ था। यमुनाजीके तटपर गये हुए मार्गसे जल लानेवाली उन गोपकुमारियोंसे वह व्रज घिरा हुआ-सा जान पड़ता था ॥ २९ ॥
स तत्र प्रविशन् दृष्टो गोव्रजं गोपनादितम् ॥ ३० ॥
प्रत्युद्गतो गोपवृद्धैः स्त्रीभिर्वृद्धाभिरेव च।
निवेशं रोचयामास परिवृत्ते सुखाश्रये ॥ ३१ ॥
ग्वालोंके शब्दसे गूँजते हुए उस गोव्रजमें प्रवेश करते समय नन्दरायजीको बड़ा हर्ष हुआ। वृद्ध गोपों तथा बड़ी-बूढ़ी स्त्रियोंने आगे बढ़कर उनका स्वागत किया। तत्पश्चात् उन्होंने चारों ओरसे घिरे हुए उस सुखदायक आवासस्थानमें रहनेके लिये रुचि प्रकट की ॥ ३०-३१ ॥
सा यत्र रोहिणी देवी वसुदेवसुखावहा ।
तत्र तं बालसूर्याभं कृष्णं गूढं न्यवेशयत् ॥ ३२ ॥
वसुदेवजीको सुख देनेवाली रोहिणी देवी जहाँ रहती थीं, वहीं उन्होंने व्रजमें गुप्तरूपसे रहनेवाले बालसूर्यके समान तेजस्वी श्रीकृष्णको सुला दिया ॥ ३२ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि गोव्रजगमनं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें नन्दजीका गोव्रजमें गमनविषयक पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५ ॥
षष्ठोऽध्यायः
शकट-भञ्जन और पूतना-वध
वैशम्पायन उवाच
तत्र तस्यासतः कालः सुमहानत्यवर्तत ।
गोव्रजे नन्दगोपस्य वल्लवत्वं प्रकुर्वतः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! उस गोव्रजमें रहकर गोपकर्म करते हुए नन्दगोपके बहुत दिन बीत गये ॥ १ ॥
दारकौ कृतनामानौ ववृधाते सुखं च तौ ।
ज्येष्ठः संकर्षणो नाम कनीयान् कृष्ण एव तु ॥ २ ॥
वहाँ उन दोनों बालकोंका उन्होंने नामकरण-संस्कार कर दिया। तदनन्तर वे दोनों भाई वहाँ बड़े सुखसे रहने और दिनोंदिन बढ़ने लगे। उनमें बड़ेका नाम 'संकर्षण' था और छोटेका 'कृष्ण' ॥ २ ॥
मेघकृष्णस्तु कृष्णोऽभूद् देहान्तरगतो हरिः ।
व्यवधंत गवां मध्ये सागरस्य इवाम्बुदः ॥ ३ ॥
दूसरे शरीरमें आये हुए भगवान् श्रीहरि ही 'कृष्ण' नामसे विख्यात हुए। उनकी अङ्गकान्ति श्याम मेघकी भाँति साँवली थी। जैसे समुद्रमें मेघकी वृद्धि होती है, उसी प्रकार वे गौओंके बीचमे रहकर बढ़ने लगे ॥ ३ ॥
शकटस्य त्वधः सुप्तं कदाचित् पुत्रगृद्धिनी ।
यशोदा तं समुत्सृज्य जगाम यमुनां नदीम् ॥ ४ ॥
यशोदा अपने पुत्रको हृदयसे चाहनेवाली थी। एक दिनकी बात है, लाला कन्हैया छकड़ेके नीचे सोया था, उसे उसी अवस्थामें छोड़कर यशोदा मैया यमुनाजीमे नहानेके लिये चली गयीं ॥ ४ ॥
शिशुलीलां ततः कुर्वन् स हस्तचरणौ क्षिपन् ।
रुरोद मधुरं कृष्णः पादावूर्ध्वं प्रसारयन् ॥ ५ ॥
फिर तो लला कन्हैया बाललीला करता हुआ अपने दोनों हाथ-पैर फेंकने लगा। पैरोंको ऊँचेतक फैलाकर मधुर स्वरमें रोने लगा ॥ ५ ॥
स तत्रैकेन पादेन शकटं पर्यवर्तयत् ।
न्युब्जं पयोधराकाङ्क्षी चकार च रुरोद च ॥ ६ ॥
(अब उसके मनमें मैयाके दूध पीनेकी इच्छा जाग उठी, फिर तो) उसने वहाँ एक ही पैरके धक्केसे छकड़ेको औंधा उलट दिया। यह सब उसने स्तन-पानकी इच्छासे ही किया था। यह अद्भुत लीला करके वह रोने लगा ॥ ६ ॥
एतस्मिन्नन्तरे प्राप्ता यशोदा भयविह्वला ।
स्नाता प्रस्रवदिग्धाङ्गी बद्धवत्सेव सौरभी ॥ ७ ॥
इसी बीचमें भयसे व्याकुल हुई यशोदा मैया नहाकर लौट आयी। उसके स्तनोंसे दूध झर रहा था, जो उसके अन्य अङ्गोंमें भी फैलता जा रहा था। जिसका बछड़ा बँधा हुआ हो, उस गायकी भाँति वह अपने बच्चेको स्तन पिलानेके लिये उत्सुक थी ॥ ७ ॥