भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 251, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 251

२३० श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे


सा ददर्श विपर्यस्तं शकटं वायुना विना ।
हाहेति कृत्वा त्वरिता दारकं जगृहे तदा ॥ ८ ॥

उसने देखा, विना आँधी-पानीके ही यह छकड़ा उलटा पड़ा है। फिर तो 'हाय ! हाय !' करके तुरंत ही लालको गोदमें उठा लिया ॥ ८ ॥

न सा बुबोध तत्त्वेन शकटं परिवर्तितम् ।
स्वस्ति मे दारकायेति प्रीता भीता च साभवत् ॥ ९ ॥

वह इस बातको न जान सकी कि छकड़ेके उलट जानेका वास्तवमें क्या कारण है ? 'भगवान् मेरे लालको सकुशल रक्खें'—ऐसा कहकर मैया पुत्र-प्रेममें मग्न हो गयी और 'बच्चेको कहीं चोट तो नहीं लगी'—इस आशङ्कासे उसको भय भी हुआ ॥ ९ ॥

किं तु वक्ष्यति ते पुत्र पिता परमकोपनः ।
त्वय्यधःशकटे सुप्ते अकस्माच्च विलोड़िते ॥ १० ॥

(वह बच्चेकी ओर देखकर बोली—) 'बेटा ! तुम्हारे पिता बड़े क्रोधी हैं। तुम छकड़ेके नीचे सोये थे और वह अकस्मात् उलट गया। यह सुनकर वे न जाने मुझे क्या-क्या कहेंगे ? ॥ १० ॥

किं मे स्नानेन दुःस्नानं किं च मे गमने नदीम् ।
पर्यस्ते शकटे पुत्र या त्वां पश्याम्यपावृतम् ॥ ११ ॥

'लाल ! मुझे नहानेसे क्या मिलता ? यदि तुम्हें कुछ हो जाता तो मेरा वह स्नान तो दुःस्नान ही था । मुझे नदी-तटपर जानेकी भी क्या आवश्यकता थी । वहाँसे लौटकर देखती हूँ तो छकड़ा उलटा पड़ा है और तुम खुले आकाशके नीचे सोये हो ! ( हाय ! हाय ! यह सब कैसे हुआ ? )' ॥ ११ ॥

एतस्मिन्नन्तरे गोभिरराजगाम वनेचरः ।
काषायवाससी बिभ्रन् नन्दगोपो व्रजान्तिकम् ॥ १२ ॥

इसी समय गौओंके साथ वनमें विचरकर नन्दजी व्रजके निकट आये। उन्होंने गेरुए रंगके दो वस्त्र धारण कर रखे थे ॥ १२ ॥

स ददर्श विपर्यस्तं भिन्नभाण्डघटीघटम् ।
अपास्तधूर्विभिन्नाक्षं शकटं चक्रमौलिनम् ॥ १३ ॥

उन्होंने देखा, छकड़ा औंधा पड़ा है। उसपर लदे हुए सारे बर्तन, घड़े, मोंट और मटके चकनाचूर हो गये हैं। जुआ निकलकर दूर जा पड़ा है। धुरा टूट गया है और पहिया मुकुटके समान ऊपरको उठ गया है ॥ १३ ॥

भीतस्त्वरितमागत्य सहसा साश्रुलोचनः ।
अपि मे स्वस्ति पुत्रायेत्यसकृद् वचनं वदन् ॥ १४ ॥

यह देखकर वे डर गये और जल्दी-जल्दी पैर बढ़ाते हुए सहसा घर आ पहुँचे । उस समय उनके नेत्रोंमें आँसू भरे हुए थे । वे बार-बार पूछने लगे, 'महर ! मेरा लाल कुशलसे तो है न ?' ॥ १४ ॥

पिबन्तं स्तनमालक्ष्य पुत्रं स्वस्थोऽब्रवीत्पुनः ।
वृषयुद्धं विना केन पर्यस्तं शकटं मम ॥ १५ ॥

फिर बेटेको स्तनपान करते देख उनके जीमें जी आया । उन्होंने पुनः पूछा, 'महर ! बैलोंमें लड़ाई तो हुई नहीं, फिर यह छकड़ा कैसे उलट गया ?' ॥ १५ ॥

प्रत्युवाच यशोदा तं भीता गद्गदभाषिणी ।
न विजानाम्यहं केन शकटं परिवर्तितम् ॥ १६ ॥
अहं नदीं गता सौम्य चैलप्रक्षालनार्थिनी ।
आगता च विपर्यस्तमपश्यं शकटं भुवि ॥ १७ ॥

यशोदाने भयभीत होकर गद्गद वाणीमें कहा—'नाथ ! मैं नहीं जानती कि किसने छकड़ा उलट दिया । सौम्य ! मैं तो कपड़े धोनेके लिये यमुनाजीके तटपर गयी थी । लौटकर देखती हूँ तो छकड़ा धरतीपर औंधा पड़ा है' ॥ १६-१७ ॥

तयोः कथयतोरेवमब्रुवंस्तत्र दारकाः ।
अनेन शिशुना यानेमेतत् पादेन लोड़ितम् ॥ १८ ॥
अस्माभिः सम्पतद्भिश्च दृष्टमेतद् यदृच्छया ।

वे दोनों जब इस प्रकार वार्तालाप कर रहे थे, उस समय वहाँ आये हुए व्रजके बालकों ने कहा—'बाबा ! तुम्हारे इस लालने ही अपने पैरसे मारकर यह गाड़ी लुढ़का दी है। हमलोग अकस्मात् यहाँ दौड़े हुए आये थे । हमने अपनी आँखों यह घटना देखी है' ॥ १८ ½ ॥

नन्दगोपस्तु तच्छ्रुत्वा विस्मयं परमं ययौ ॥ १९ ॥
प्रहृष्टश्चैव भीतश्च किमेतदिति चिन्तयन् ।

बालकोंकी वह बात सुनकर नन्दगोपको बड़ा विस्मय हुआ । वे पहले तो प्रसन्न हुए, परंतु ऐसा सोचते हुए कि यह क्या है, वे फिर डर गये ॥ १९ ½ ॥

न च ते श्रद्दधुर्गोपाः सर्वे मानुषबुद्धयः ॥ २० ॥
आश्चर्यमिति ते सर्वे विस्मयोत्फुल्ललोचनाः ।
स्वे स्थाने शकटं स्थाप्य चक्रबन्धमकारयन् ॥ २१ ॥

वहाँ जो बड़े-बड़े गोप थे, उन सबको इस बातपर विश्वास नहीं हुआ; क्योंकि वह उस बच्चेको साधारण मनुष्यका ही बालक समझते थे । फिर भी वे सब-के-सब इस घटनासे आश्चर्य करने लगे थे । उनके नेत्र विस्मयसे खिल उठे थे । वे छकड़ेको अपनी जगहपर खड़ा करके उसमें पहिये जोड़ने लगे ॥ २०-२१ ॥

वैशम्पायन उवाच

कस्यचित्त्वथ कालस्य शकुनी वेषधारिणी ।
धात्री कंसस्य भोजस्य पूतनेति परिश्रुता ॥ २२ ॥

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