विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 27, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें४ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
रखा है, उसके अनुसार मैं भूतसर्गका विस्तारपूर्वक वर्णन आरम्भ करता हूँ, सुनो। यह प्रसंग पूर्वजोंकी कीर्तिका विस्तार करनेवाला है ॥ ३२ ॥
धन्यं यशस्यं शत्रुघ्नं स्वर्ग्यमायुःप्रवर्धनम्।
कीर्तनं स्थिरकीर्तीनां सर्वेषां पुण्यकर्मणाम् ॥ ३३॥
स्थिर कीर्तिवाले उन समस्त पुण्यकर्मा पूर्वजोंके यशका कीर्तन धन और यशकी वृद्धि करनेवाला, शत्रुओंका नाशक, स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला तथा आयु बढ़ानेवाला है ॥ ३३ ॥
तस्मात् कल्पाय ते कल्पः समग्रं शुचये शुचिः।
आ वृष्णिवंशाद् वक्ष्यामि भूतसर्गमनुत्तमम् ॥ ३४ ॥
तुम इस विषयको हृदयंगम करनेमें समर्थ और शुद्ध हो और मैं इसका वर्णन करनेमें समर्थ हूँ। अतः पवित्र होकर आरम्भसे वृष्णिवंशपर्यन्त परम उत्तम भूतसर्गका वर्णन करूँगा ॥ ३४ ॥
ततः स्वयम्भूर्भगवान् सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः ।
अप एव ससर्जादौ तासु वीर्यमवासृजत् ॥ ३५॥
तदनन्तर स्वयम्भू भगवान् नारायणने नाना प्रकारकी प्रजा उत्पन्न करनेकी इच्छासे सबसे पहले जलकी ही सृष्टि की। फिर उस जलमें अपनी शक्तिका आधान किया ॥ ३५॥
आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः ।
अयनं तस्य ताः पूर्वं तेन नारायणः स्मृतः ॥ ३६ ॥
जलका दूसरा नाम है नार, क्योंकि उसकी उत्पत्ति भगवान् नरसे हुई है। वह जल पूर्वकालमें भगवान्का अयन हुआ, इसलिये वे 'नारायण' कहलाते हैं ॥ ३६ ॥
हिरण्यवर्णमभवत् तदण्डमुदकेशयम् ।
तत्र जज्ञे स्वयं ब्रह्मा स्वयम्भूरिति नः श्रुतम् ॥ ३७॥
भगवान्ने जलमें जो अपनी शक्तिका आधान किया था, उससे एक बहुत विशाल सुवर्णमय अण्ड प्रकट हुआ, वह दीर्घकालतक जलमें ही स्थित था। उसीमें स्वयम्भू ब्रह्माजी उत्पन्न हुए—ऐसा हमने सुना है ॥ ३७॥
हिरण्यगर्भो भगवानुषित्वा परिवत्सरम् ।
तदण्डमकरोद् द्वैधं दिवं भुवमथापि च ॥ ३८ ॥
भगवान् हिरण्यगर्भने उस अण्डमें एक वर्षतक निवास करके उसके दो टुकड़े कर दिये। फिर एक टुकड़ेसे द्युलोक बनाया और दूसरेसे भूलोक ॥ ३८ ॥
तयोः शकलयोर्मध्ये आकाशमसृजत् प्रभुः ।
अप्सु पारिप्लवां पृथ्वीं दिशश्च दशधा दधे ॥ ३९ ॥
उन दोनों टुकड़ोंके बीचमें भगवान् ब्रह्माने आकाश (अवकाश) की सृष्टि की। जलके ऊपर तैरती हुई पृथ्वीको स्थापित किया। फिर दसों दिशाएँ निश्चित कीं ॥ ३९ ॥
तत्र कालं मनो वाचं कामं क्रोधमथो रतिम् ।
ससर्ज सृष्टिं तद्रूपां स्रष्टुमिच्छन् प्रजापतीन् ॥ ४० ॥
उस ब्रह्माण्डके भीतर ही उन्होंने काल, मन, वाणी, काम, क्रोध तथा रति आदि भावोंकी सृष्टि की। फिर इन भावोंके अनुरूप सृष्टिकारनेकी इच्छावाले ब्रह्माजीने निम्नाङ्कित (सात) प्रजापतियोंको उत्पन्न किया ॥ ४० ॥
मरीचिमत्र्यङ्गिरसं पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम् ।
वसिष्ठं च महातेजाः सोऽसृजत् सप्त मानसान्॥ ४१ ॥
उनके नाम इस प्रकार हैं—मरीचि, अत्रि, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और वसिष्ठ। महातेजस्वी ब्रह्माने इन सातोंकी अपने मन (संकल्प) से सृष्टि की (अतः ये उनके मानस पुत्र हैं) ॥ ४१ ॥
सप्त ब्रह्माण इत्येते पुराणे निश्चयं गताः ।
नारायणात्मकानां वै सप्तानां ब्रह्मजन्मनाम् ॥ ४२ ॥
ततोऽसृजत् पुनर्ब्रह्मा रुद्रं रोषात्समुद्भवम् ।
सनत्कुमारं च विभुं पूर्वेषामपि पूर्वजम् ॥ ४३ ॥
पुराणोंमें ये सात ब्रह्मा निश्चित किये गये हैं। भगवान् नारायणमें मन लगाये रहनेवाले इन सात ब्राह्मणोंकी सृष्टिके अनन्तर ब्रह्माजीने अपने रोषसे रुद्रको प्रकट किया। फिर पूर्वजोंके भी पूर्वज भगवान् सनत्कुमारजीको उत्पन्न किया ॥ ४२-४३ ॥
सप्तैते जनयन्ति स्म प्रजा रुद्रश्च भारत ।
स्कन्दः सनत्कुमारश्च तेजः संक्षिप्य तिष्ठतः ॥ ४४ ॥
भरतनन्दन ! ये मरीचि आदि सात ऋषि तथा रुद्रदेव प्रजाकी सृष्टि करने लगे। स्कन्द और सनत्कुमार—ये दोनों अपने तेजका संवरण करके रहते हैं ॥ ४४ ॥
तेषां सप्त महावंशा दिव्या देवगणान्विताः ।
क्रियावन्तः प्रजावन्तो महर्षिभिरलंकृताः ॥ ४५ ॥
उक्त सात महर्षियोंके सात बड़े-बड़े दिव्य वंश हैं। देवता भी इन्हीं वंशोंके अन्तर्गत हैं। उन सातों वंशोंके लोग कर्मनिष्ठ एवं सन्तानवान् हैं। उन वंशोंको बड़े-बड़े ऋषियोंने सुशोभित किया है ॥ ४५ ॥
विद्युतोऽशनिमेघांश्च रोहितेन्द्रधनूंषि च ।
वयांसि च ससर्जादौ पर्जन्यं च ससर्ज ह ॥ ४६ ॥
इसके बाद ब्रह्माजीने पहले विद्युत्, वज्र, मेघ, रोहित (सीधा) इन्द्र-धनुष, पक्षिसमुदाय तथा पर्जन्यकी सृष्टि की ॥ ४६॥
ऋचो यजूंषि सामानि निर्ममे यज्ञसिद्धये ।
मुखाद् देवानजनयत् पितॄंश्चेशोऽपि वक्षसः॥ ४७ ॥
फिर ब्रह्माजीने यज्ञकी सिद्धिके लिये (नित्यसिद्ध) ऋक्, यजुः और सामका आविष्कार किया । फिर