भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 28

हरिवंशपर्व ] द्वितीयोऽध्यायः


ऐश्वर्यशील ब्रह्मा ने अपने मुखसे देवताओंको और वक्षःस्थलसे पितरोंको प्रकट किया ॥ ४७ ॥

प्रजानाच्च मनुष्यान् वै जघनान्निर्ममेऽसुरान् ।
साध्यानजनयद् देवानित्येवमनुशुश्रुम ॥ ४८ ॥

फिर उन्होंने उपस्थेन्द्रियसे मनुष्योंको और जंघाओंसे असुरोंको उत्पन्न किया। तदनन्तर उन्होंने साध्य नामक प्राचीन देवताओंको प्रकट किया, ऐसा हमने सुना है ॥ ४८ ॥

उचावचानि भूतानि गात्रेभ्यस्तस्य जज्ञिरे ।
आपवस्य प्रजासर्गे सृजतो हि प्रजापतेः ॥ ४९ ॥

इस प्रकार प्रजाकी सृष्टि रचते हुए उन आपव (अर्थात् जलमें प्रकट हुए) प्रजापति ब्रह्माके अङ्गोंमेंसे उच्च तथा साधारण श्रेणीके बहुत-से प्राणी प्रकट हुए ॥ ४९ ॥

सृज्यमानाः प्रजा नैव विवर्धन्ते यदा तदा ।
द्विधा कृत्वाऽऽत्मनो देहमर्धेन पुरुषोऽभवत् ॥ ५० ॥
अर्धेन नारी तस्यां स ससृजे विविधाः प्रजाः ।
दिवं च पृथिवीं चैव महिम्ना व्याप्य तिष्ठतः ॥ ५१ ॥

इस प्रकार वे आपव-प्रजापति (मानसिक) प्रजाओंको रच रहे थे; परंतु वे प्रजाएँ जब (अधिक) न बढ़ीं, तब वे अपने शरीरके दो भाग कर, एक भागसे पुरुष और दूसरे भागसे नारी हो गये और (उस नारीने गाय, घोड़ी आदि जिस-जिस रूपको धारण किया, पुरुषने उसी जातिके बैल, घोड़े आदिका रूप धारण किया, ) इस प्रकार उन्होंने उस नारीमें अनेक प्रकारकी मैथुनी-प्रजाओंको रचा। इस प्रकार वे पुरुष और नारी अपनी महिमासे स्वर्ग और पृथ्वीपर व्याप्त हो गये ॥ ५०-५१ ॥

विराजमसृजद् विष्णुः सोऽसृजत् पुरुषं विराट् ।
पुरुषं तं मनुं विद्धि तद् वै मन्वन्तरं स्मृतम् ॥ ५२ ॥

भगवान् विष्णुने विराट् पुरुष (आपव प्रजापति या ब्रह्मा) की सृष्टि की थी और विराट्ने पुरुषकी। उस वैराज पुरुषको तुम मनु समझो (और उनकी स्त्रीको शतरूपा)। मनुके समयको ही मन्वन्तरकाल कहा गया है ॥ ५२ ॥

द्वितीयमापवस्यैतन्मनोरन्तरमुच्यते ।
स वैराजः प्रजासर्गे ससर्ज पुरुषः प्रभुः ।
नारायणविसर्गः स प्रजास्तस्याप्ययोनिजाः ॥ ५३ ॥

आपवपुत्र मनुकी जो यह दूसरी योनिज सृष्टि है, यहीं- से मन्वन्तरका आरम्भ बताया जाता है। इस प्रकार शक्तिशाली वैराज पुरुष (मनु) ने प्रजासर्गकी सृष्टि की। आपव प्रजापतिको नारायणसर्ग कहा गया है (क्योंकि वे नारायण- से ही प्रकट हुए हैं)। उनकी अयौनिजा प्रजा प्रथम सर्ग है (और मनुकी योनिजा प्रजा द्वितीय सर्ग) ॥ ५३ ॥

आयुष्मान् कीर्तिमान् धन्यः प्रजावाञ्छ्रुतवांस्तथा ।
आदिसर्गे विदित्वेमं यथेष्टां गतिमाप्नुयात् ॥ ५४ ॥

जो इस आदि सृष्टिको इस प्रकार जान लेता है, वह आयुष्मान्, कीर्तिमान्, धन्यवादका पात्र, संतानवान् और विद्वान् होता है, उसे इच्छानुसार उत्तम गति प्राप्त होती है ॥ ५४ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि आदिसर्गकथने प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें आदिसृष्टिका वर्णनविषयक पहला अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ॥


द्वितीयोऽध्यायः

स्वायम्भुव मनुके वंश और दक्ष प्रजापतिकी-उत्पत्तिको वर्णन

वैशम्पायन उवाच

स सृष्ट्वासु प्रजास्वेवमापवो वै प्रजापतिः ।<br>लेभे वै पुरुषः पत्नीं शतरूपामयोनिजाम् ॥ १ ॥सा तु वर्षायुतं तप्त्वा तपः परमदुश्वरम् ।<br>भर्तारं दीप्ततपसं पुरुषं प्रत्यपद्यत ॥ ३ ॥
**वैशम्पायनजीने कहा—**जनमेजय ! इस प्रकार (अयोनिन-मानसिक) प्रजाओंकी रचना हो जानेपर वह आपव प्रजापति (ब्रह्मा) ही (अपनी देहके दो भाग करके एक भागसे मनु नामक) पुरुष बन गये और उन्होंने देहके दूसरे भागसे बनी हुई अयोनिया शतरूपाको पत्नीरूपमें स्वीकार किया ॥वह शतरूपा दस हजार वर्षोतक परम दुष्कर तप करके (संतानकी कामनासे) तपसे चमकते हुए अपने स्वामी वैराज पुरुषके पास आयीं ॥ ३ ॥
आपवस्य महिम्ना तु दिवमावृत्य तिष्ठतः ।<br>धर्मेणैव महाराज शतरूपा व्यजायत ॥ २ ॥स वै स्वायम्भुवस्तात पुरुषो मनुरुच्यते ।<br>तस्यैकसप्ततियुगं मन्वन्तरमिहोच्यते ॥ ४ ॥
महाराज ! अपनी महिमासे द्युलोकको व्याप्त करके स्थित हुए मनुके धर्मसे ही उनकी पत्नी शतरूपाकी उत्पत्ति हुई ॥ २ ॥तात ! वे पुरुष ही स्वायम्भुव मनु कहे जाते हैं। उन (के अधिकार) का (सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुगरूप) इकहत्तर चतुर्युगोंका समय इस संसारमें मन्वन्तर कहलाता है (यह मन्वन्तर संध्या और संध्यांशके कारण इकहत्तर चतुर्युगोंसे भी कुछ अधिक समयका होता है ।) ॥ ४ ॥