विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 31, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ८ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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तपश्वरत्सु पृथिवीं प्रचेतःसु महीरुहाः।
अरक्ष्यमाणामवावृण्वन्बभूवाथ प्रजाक्षयः ॥ ३५ ॥
जब प्रचेतागण तप कर रहे थे, तब अरक्षित पड़ी हुई पृथ्वीको वृक्षोंने चारों ओरसे ढक दिया, इससे प्रजाओंका नाश होने लगा ॥ ३५ ॥
नाशकन्मारुतो वातुं वृतं खमभवद् द्रुमैः।
दशवर्षसहस्राणि न शेकुश्चेष्टितुं प्रजाः ॥ ३६ ॥
दस हजार वर्षोंमें वृक्षोंने आकाशतकको घेर लिया, तब वायुका चलना बंद हो गया और प्रजाओंका चेष्टा करना (हाथ-पैर हिलाना) भी बंद होने लगा ॥ ३६ ॥
तदुपश्रुत्य तपसा युक्ताः सर्वे प्रचेतसः।
मुखेभ्यो वायुमग्निं च तेऽसृजञ्जातमन्यवः ॥ ३७ ॥
अपनी तपस्या (ज्ञानदृष्टि) से इन सब बातोंको जानकर सब प्रचेता इसका उपाय करनेके लिये उद्यत हो गये और उन्होंने क्रोधमें भरकर अपने मुखोंसे वायु और अग्निको प्रकट किया ॥ ३७ ॥
उन्मूलानथ तान् कृत्वा वृक्षान् वायुरशोषयत्।
तानग्निरदहद्धोरं एवमासीद् द्रुमक्षयः ॥ ३८ ॥
वायुने वृक्षोंको जड़से उखाड़कर उनको सुखा दिया, तब अग्नि प्रचण्ड होकर उन वृक्षोंको जलाने लगी, इस प्रकार वृक्षोंका नाश होने लगा ॥ ३८ ॥
द्रुमक्षयमथो बुद्ध्वा किंचिच्छिष्टेषु शाखिषु।
उपगम्याब्रवीदेतान् राजा सोमः प्रजापतीन् ॥ ३९ ॥
इस प्रकार जलते-जलते जब कुछ ही वृक्ष बाकी बचे, तब वृक्षोंके संहारकी बातको जानकर इन वृक्षोंके राजा सोम प्रजापति प्रचेताओंके पास जाकर बोले— ॥ ३९ ॥
कोपं यच्छत राजानः सर्वे प्राचीनबर्हिषः।
वृक्षशून्या कृता पृथिवी शाम्यतामग्निमारुतौ ॥ ४० ॥
'प्राचीनबर्हिके पुत्र प्रचेताओ! तुमने तो पृथ्वीको वृक्षोंसे शून्य ही कर डाला। राजाओ! अब अपने क्रोधको रोको तथा इन अग्नि और पवनको शान्त करो ॥ ४० ॥
रत्नभूता च कन्येयं वृक्षाणां वरवर्णिनी।
भविष्यं जानता तत्त्वं धृता गर्भेण वै मया ॥ ४१ ॥
'यह वृक्षोंकी रत्नस्वरूपा सुन्दरी कन्या है। मैंने भविष्यके तत्त्वको जानकर इसे अपने गर्भमें स्थापित कर लिया था * ॥ ४१ ॥
मारिषा नाम कन्येयं वृक्षाणामिति निर्मिता।
भार्या वोऽस्तु महाभागाः सोमवंशविवर्द्धिनी ॥ ४२ ॥
'यह मारिषा नामवाली कन्या वृक्षोंके वीर्य अर्थात् सारांशसे रची गयी है। महाभाग! इस सोमवंशकी वृद्धि करनेवाली वृक्षोंकी कन्याको तुम भार्यारूपमें ग्रहण करो ॥ ४२ ॥
युष्माकं तेजसोऽर्द्धेन मम चार्द्धेन तेजसः।
अस्यामुत्पत्स्यते पुत्रो दक्षो नाम प्रजापतिः ॥ ४३ ॥
'तुम्हारे और मेरे दोनोंके तेजके आधे-आधे भागके द्वारा इस कन्याके गर्भसे एक पुत्र उत्पन्न होगा, जिसका नाम होगा—दक्ष प्रजापति ॥ ४३ ॥
य इमां दग्धभूयिष्ठां युष्मत्तेजोमयेन वै।
अग्निनाग्निसमो भूयः प्रजाः संवर्धयिष्यति ॥ ४४ ॥
'तुम्हारे तपरूपी अग्निसे अग्निके समान ही प्रतापी वह दक्ष अधिकांश जली हुई इस पृथ्वीपर फिर प्रजाओंकी वृद्धि करेगा' ॥ ४४ ॥
ततः सोमस्य वचनाज्जगृहुस्ते प्रचेतसः।
संहृत्य कोपं वृक्षेभ्यः पत्नीं धर्मेण मारिषाम् ॥ ४५ ॥
चन्द्रमाके इस प्रकार कहनेपर उन प्रचेताओंने वृक्षोंकी ओरसे अपने क्रोधको समेट लिया और मारिषाको विवाहरूपी धर्मके द्वारा पत्नीरूपमें ग्रहण कर लिया ॥ ४५ ॥
मारिषायां ततस्ते वै मनसा गर्भमादधुः।
दशभ्यस्तु प्रचेतोभ्यो मारिषायां प्रजापतिः।
दक्षो जज्ञे महातेजाः सोमस्यांशेन भारत ॥ ४६ ॥
तदनन्तर उन प्रचेताओंने अपने मनसे मारिषामें गर्भ स्थापित किया। भरतवंशी राजन्! इस प्रकार चन्द्रमाके अंशसे दस प्रचेताओंके द्वारा मारिषाके गर्भसे महातेजस्वी दक्ष प्रजापति उत्पन्न हुए ॥ ४६ ॥
पुत्रानुत्पादयामास सोमवंशविवर्धनान्।
अचरांश्च चरांश्चैव द्विपदोऽथ चतुष्पदः।
स दृष्ट्वा मनसा दक्षः पश्चादप्यसृजत् स्त्रियः ॥ ४७ ॥
तब उन दक्षप्रजापतिने चन्द्रमाके वंशको बढ़ानेवाले पुत्र उत्पन्न किये और स्थावर, जङ्गम, दो पैरवाले, चार पैरवाले रचनेयोग्य प्राणियोंकी सृष्टिके लिये मनमें विचारकर पीछे स्त्रियोंकी भी रचना की ॥ ४७ ॥
* वायुने वृक्षोंको सुखाते समय उनका जलीय सारांश जलके कारण सूर्यमें पहुँचा दिया, इसी प्रकार पृथ्वीका सारभूत अंश जलमय चन्द्रमामें पहुँचा दिया। इस प्रकार कन्यारूप वृक्षोंका वीर्य सोमने अपने गर्भमें धारण कर लिया, यह बात ठीक ही है।
'वृष्टिर्वै वृष्टा चन्द्रमसमनु प्रविशति—वृष्टि बरसकर चन्द्रमामें प्रविष्ट हो जाती है' इस श्रुतिसे भी ओषधियोंके साररूपसे वृष्टिका चन्द्रमामें प्रवेश करना सिद्ध होता है। इस प्रकार चन्द्रमाका यह वचन ठीक ही है कि 'मैंने इस वृक्षोंकी कन्याको अपने गर्भमें धारण कर लिया था।'