विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 32, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंहरिवंशपर्व ] तृतीयोऽध्यायः ९
ददौ स दश धर्माय कश्यपाय त्रयोदश।
शिष्टाः सोमाय राज्ञेऽथ नक्षत्राख्या ददौ प्रभुः॥ ४८॥
प्रभु दक्षने उनमेंसे दस कन्याएँ धर्मको, तेरह कन्याएँ कश्यपको और शेष बची हुई नक्षत्रसम्बन्धी नामवाली सत्ताईस कन्याएँ राजा चन्द्रमाको दे दीं ॥ ४८ ॥
तासु देवाः खगा नागा गावो दितिजदानवाः।
गन्धर्वाप्सरसश्चैव जज्ञिरेऽन्याश्च जातयः ॥ ४९ ॥
उन कन्याओंसे देवता, पक्षी, सर्प, गौएँ, दैत्य-दानव-गन्धर्व, अप्सराएँ तथा अन्य जातियोंके प्राणी उत्पन्न हुए ॥ ४९ ॥
ततः प्रभृति राजेन्द्र प्रजा मैथुनसम्भवाः।
संकल्पाद् दर्शनात् स्पर्शात् पूर्वेषां सृष्टिरुच्यते॥ ५० ॥
राजेन्द्र ! तभीसे प्रजाएँ मैथुनद्वारा उत्पन्न होने लगीं । इससे पहले प्राणियोंकी उत्पत्ति संकल्प,* दर्शन और स्पर्शसे होती थी—ऐसा कहा जाता है ॥ ५० ॥
जनमेजय उवाच
देवानां दानवानां च गन्धर्वोरगरक्षसाम् ।
सम्भवः कथितः पूर्वं दक्षस्य च महात्मनः ॥ ५१ ॥
जनमेजयने कहा--मुने ! आपने पहले भी देवता, दानव, गन्धर्व, सर्प और राक्षस तथा महात्मा दक्षकी उत्पत्तिका वर्णन किया है ॥ ५१ ॥
अङ्गुष्ठाद् ब्रह्मणो जातो दक्षः प्रोक्तस्त्वयानघ।
वामाङ्गुष्ठात् तथा चैव तस्य पत्नी व्यजायत ॥ ५२ ॥
निष्पाप महर्षे ! वहाँ आपने कहा है कि ब्रह्माजीके (दाहिने) अंगूठेसे दक्ष प्रजापति उत्पन्न हुए और ब्रह्माजीके बायें अंगूठेसे दक्षकी पत्नी उत्पन्न हुईं ॥ ५२ ॥
कथं प्राचेतसत्वं स पुनर्लेभे महातपाः।
एतन्मे संशयं विप्र सम्यगाख्यातुमर्हसि ।
दौहित्रश्चैव सोमस्य कथं श्वशुरतां गतः ॥ ५३ ॥
वे महातपस्वी दक्ष फिर प्रचेताओँके पुत्र कैसे हुए ? चन्द्रमाके नाती दक्ष फिर उनके श्वशुर कैसे बन गये ? विप्रवर ! मेरे इन संदेहोंको भली प्रकार व्याख्या करके आप दूर कर दीजिये ॥ ५३ ॥
वैशम्पायन उवाच
उत्पत्तिश्च निरोधश्च नित्यौ भूतेषु पार्थिव ।
ऋषयोऽत्र न मुह्यन्ति विद्वांसश्चैव ये जनाः ॥ ५४ ॥
वैशम्पायनजीने कहा—पृथ्वीनाथ ! जन्म और मृत्यु—ये समस्त प्राणियोंके लिये नित्य ( स्वाभाविक ) हैं। इस विषयमें ऋषियोंको कभी मोह नहीं होता । जो विद्वान् पुरुष हैं, वे भी इस विषयमें मोहित नहीं होते ॥ ५४ ॥
युगे युगे भवन्त्येते सर्वे दक्षादयो नृप ।
पुनश्चैव निरुध्यन्ते विद्वांस्तत्र न मुह्यति ॥ ५५ ॥
नरेश्वर ! ये दक्ष आदि सब लोग प्रत्येक युगमें उत्पन्न होते और मरते रहते हैं, अतः विद्वान् पुरुष इस विषयमें मोहको नहीं प्राप्त होते हैं ॥ ५५ ॥
ज्यैष्ठ्यं कनिष्ठत्वमप्येषां पूर्वं नासीज्जनाधिप।
तप एव गरीयोऽभूत् प्रभावश्चैव कारणम् ॥ ५६ ॥
राजन् ! पहले इनमें ज्येष्ठता और कनिष्ठताका अर्थात् पहले-पीछे उत्पन्न होनेका कोई विचार नहीं था, तप ही इनकी दृष्टिमें गरिष्ठ था और प्रभाव ही इनमें सम्बन्ध होनेका कारण होता था ॥ ५६ ॥
इमां विसृष्टिं दक्षस्य यो विद्यात् सचराचराम् ।
प्रजावानापदुत्तीर्णः स्वर्गलोके महीयते ॥ ५७ ॥
जो मनुष्य चर तथा अचर प्राणियोंसहित इस दक्ष प्रजापतिकी सृष्टिके तत्त्वको जानता है, वह संतानवान् होता है और आपत्तियोंके पार हो स्वर्गमें प्रतिष्ठा-पूर्वक रहता है ॥ ५७ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि प्रजासर्गे दक्षोत्पत्तिकथने द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें प्रजासर्गके प्रसंगमें दक्षकी उत्पत्तिका वर्णनविषयक दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥
तृतीयोऽध्यायः
दक्ष प्रजापतिद्वारा सृष्टि-विस्तार, नारदजीका दक्षके पुत्रोंको विरक्त कर देना, दक्षकी साठ कन्याओं और उनकी संततिका वर्णन
| जनमेजय उवाच <br> देवानां दानवानां च गन्धर्वोरगरक्षसाम् । <br> उत्पत्तिं विस्तरेणेमां वैशम्पायन कीर्तय ॥ १ ॥ | जनमेजयने कहा—वैशम्पायनजी ! आप इस देवता, दानव, गन्धर्व, सर्प और राक्षसोंकी उत्पत्तिको विस्तारपूर्वक कहिये ॥ १ ॥ |
* उन दस प्रचेताओँके एक ही औरस पुत्र कैसे हुआ ? इस शङ्काका उत्तर इस श्लोकके संकल्प शब्दसे मिलता है । अर्थात् उन दसोंका संकल्प एक-सा था, अतः उनके एक ही औरस पुत्र हुआ ।