विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 320, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें२९८ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे
त्वं तु शक्रसमः पुत्रो यस्यास्त्वत्सदृशो गुणैः ।
परेषामप्यभयदो न सा शोचितुमर्हति ॥ १५ ॥
'जिसके तुम्हारे समान गुणवान्, इन्द्रतुल्य तेजस्वी तथा दूसरोंको भी अभयदान देनेवाला पुत्र हो, उस माताको शोककी भागिनी नहीं होना चाहिये ॥ १५ ॥
वृद्धौ तवाम्बापितरौ परभृत्यत्वमागतौ ।
भर्त्सितौ त्वत्कृते नित्यं कंसेनाशुभबुद्धिना ॥ १६ ॥
'भैया ! तुम्हारे बूढ़े माता-पिता दूसरेके दासभावको प्राप्त हो गये हैं। पापपूर्ण विचार रखनेवाला कंस उन्हें प्रति-दिन तुम्हारे कारण डाँटता-फटकारता रहता है ॥ १६ ॥
यदि ते देवकी मान्या पृथिवीवात्मधारिणी ।
तां शोकसलिले मग्नामुत्तारयितुमर्हसि ॥ १७ ॥
'तुम्हारे शरीरको अपने गर्भमें धारण करनेवाली माता देवकी यदि लोकधारिणी पृथ्वीके समान माननीय है तो तुमने जैसे पृथ्वीका जलसे उद्धार किया था, उसी प्रकार शोक-सागरके जलमें डूबी हुई उस देवकीका भी तुम्हें उद्धार करना चाहिये ॥ १७ ॥
तं च वृद्धं प्रियसुतं वसुदेवं सुखोचितम् ।
पुत्रयोगेन संयोज्य कृष्ण धर्ममवाप्स्यसि ॥ १८ ॥
'श्रीकृष्ण ! जिन्हें अपने पुत्र बहुत ही प्रिय हैं तथा जो सुख भोगनेके योग्य हैं, उन बूढ़े वसुदेवको पुत्र-संयोगका सुख देकर तुम धर्मके भागी होओगे ॥ १८ ॥
यथा नागः सुदुर्वृत्तो दमितो यमुनाह्रदे ।
विमूलः स कृतः शैलो यथा वै भूधरस्त्वया ॥ १९ ॥
दर्पोत्सिक्तश्च बलवानरिष्टो विनिपातितः ।
परप्राणहरः केशी दुष्टात्मा च हयो हतः ॥ २० ॥
एतेनैव प्रयत्नेन वृद्धावुद्धृत्य दुःखितौ ।
यथा धर्ममवाप्नोषि तत् कृष्ण परिचिन्त्यताम् ॥ २१ ॥
'श्रीकृष्ण ! जैसे तुमने यमुनाके कुण्डमे रहनेवाले उस दुराचारी नागका दमन किया, जैसे गोवर्धन पर्वतको जड़से उखाड़ दिया, जिस प्रकार बलवान् एवं मदमत्त अरिष्टासुरको मार गिराया तथा जिस तरह दूसरोंके प्राण लेनेवाले अश्वरूप-धारी दुष्टात्मा केशीका वध किया, वैसे ही प्रयत्नके द्वारा उन दुखी एवं वृद्ध माता-पिताका उद्धार करके तुम जैसे भी धर्मके भागी हो सको, उस उपायको सोचो ॥ १९-२१ ॥
निर्भर्त्स्यमानो यैर्दृष्टः पिता ते कंससंसदि ।
ते सर्वे चक्रुरश्रूणि नेत्रैर्दुःखान्विता भृशम् ॥ २२ ॥
'जिन लोगोंने कंसकी सभामें तुम्हारे पितापर डाँट पड़ती देखी थी, वे सब-के-सब अत्यन्त दुखी होकर नेत्रोंसे आँसू बहाने लगे थे ॥ २२ ॥
गर्भावकर्तनादीनि दुःखानि सुबहून्यपि ।
माता ते देवकी कृष्ण कंसस्य सहतेऽवशा ॥ २३ ॥
'कृष्ण ! तुम्हारी माता देवकी विवश होकर कंसके द्वारा दिये गये गर्भोच्छेद आदि बहुत-से दुःख सहती चली आ रही है ॥ २३ ॥
मातापितृभ्यां सर्वेण जातेन तनयेन वै ।
ऋणं वै प्रतिकर्तव्यं यथायोगमुदाहृतम् ॥ २४ ॥
'माता-पितासे उत्पन्न हुए सभी पुत्रोंको यथायोग्य सेवा करके उनके ऋणोंको उतार देना चाहिये, यह शास्त्रकी आज्ञा है ॥ २४ ॥
एवं ते कुर्वतः कृष्ण मातापित्रोरनुग्रहम् ।
परित्यजेतां तौ शोकं स्याच्च धर्मस्त्वानघ ॥ २५ ॥
'निष्पाप श्रीकृष्ण ! यदि इस प्रकार तुमने माता-पितापर अनुग्रह किया तो वे दोनों अपने बीते हुए शोकको त्याग देंगे और तुम्हें धर्मकी प्राप्ति होगी' ॥ २५ ॥
वैशम्पायन उवाच
कृष्णः सुविदितार्थो वै तमाहामितविक्रमम् ।
बाढमित्येव तेजस्वी न च क्रोधवशं गतः ॥ २६ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय ! इन सब बातों-को अच्छी तरह जान लेनेपर तेजस्वी श्रीकृष्णने अमित-पराक्रमी अक्रूरसे कहा - 'बहुत अच्छा ! हमलोग आपके साथ चलेंगे।' वे क्रोधके वशीभूत नहीं हुए ॥ २६ ॥
ते च गोपाः समागम्य नन्दगोपपुरःसराः ।
अक्रूरवचनं श्रुत्वा चेलुः कंसस्य शासनात् ॥ २७ ॥
नन्द आदि सभी गोप वहाँ एकत्र हो अक्रूरजीकी बात सुनकर कंसकी आज्ञासे मथुरा चलनेको उद्यत हो गये ॥ २७ ॥
गमनाय च ते सज्जा बभूवुर्व्रजवासिनः ।
सज्जं चोपायनं कृत्वा गोपवृद्धाः प्रतस्थिरे ॥ २८ ॥
वे ब्रजवासी गोप यात्राके लिये सुसज्जित हो गये। भेंटकी सामग्रीको सजाकर बड़े-बूढ़े गोप वहाँसे प्रस्थित हुए ॥ २८ ॥
करं चानडुहः सर्पिर्महिषांश्चोपनायिकान् ।
यथासारं यथायूथमुपानीय पयो दधि ॥ २९ ॥
तं सञ्जयित्वा कंसस्य करं चोपायनानि च ।
ते सर्वे गोपपतयो गमनायोपतस्थिरे ॥ ३० ॥
वार्षिक कर, गाड़ीका बोझ ढोनेवाले बैल, भैंसें, घी, दूध और दही आदि उपहार-सामग्रियोंको अपनी-अपनी शक्ति और यूथके अनुसार लेकर एकत्र किया, फिर कंसकी उस उपायन-सामग्री और वार्षिक करको छकड़ेमें सजाकर वे सभी गोप सरदार यात्रा करनेके लिये नन्दके द्वारपर उपस्थित हुए ॥
अक्रूरस्य कथाभिश्च सह कृष्णेन जाग्रतः ।
रौहिणेयतृतीयस्य सा निशा व्यत्यवर्तत ॥ ३१ ॥