विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 321, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] षड्विंशोऽध्यायः २९९
श्रीकृष्णके साथ बातचीत करनेमें अक्रूरकी वह सारी रात जागते ही बीती। उनके साथ तीसरे व्यक्ति रोहिणीनन्दन बलरामजी थे ॥ ३१ ॥
ततः प्रभाते विमले पक्षिव्याहारसंकुले ।
नैशाकरे रश्मिजाले क्षणदाक्षयसंहृते ॥ ३२ ॥
नभस्यरुणसंस्तीर्णे पर्यस्ते ज्योतिषां गणे ।
प्रत्यूषपवनासारैः क्लेदिते धरणीतले ॥ ३३ ॥
क्षीणाकारासु तारासु सुप्तनिष्प्रतिभासु च ।
नैशमन्तर्दधे रूपमुद्गच्छति दिवाकरे ॥ ३४ ॥
तदनन्तर पक्षियोंके कलरवोंसे व्याप्त निर्मल प्रभातकाल उपस्थित हुआ। रात्रिकी समाप्तिके साथ ही चन्द्रदेवने अपने किरण-जालको समेट लिया। आकाशमें अरुणोदयकी लाली छा गयी। नक्षत्रोंका समुदाय अस्त हो गया। प्रातःकालकी वायुके साथ मिले हुए ओस-कणोंसे पृथ्वी गीली-सी हो गयी। तारिकाएँ क्षीण हो गयीं। वे सोयी हुईकी भाँति अपनी प्रभा खो बैठीं। सूर्योदय होनेके साथ ही निशाका रूप अदृश्य हो गया ॥ ३२-३४ ॥
शीतांशुः शान्तकिरणो निष्प्रभः समपद्यत ।
एको नाशयते रूपमेको वर्धयते वपुः ॥ ३५ ॥
शीतरश्मि चन्द्रमाकी किरणें शान्त हो जानेके कारण वे प्रभाहीन हो गये। एक (चन्द्रमा) अपने रूपको अदृश्य करने लगा और दूसरा (सूर्य) अपने तेजको बढ़ाने लगा ॥
गोभिश्च समकीर्णासु व्रजनिर्याणभूमिषु ।
मन्थानावर्तपूर्णेषु गर्जरेषु नदत्सु च ॥ ३६ ॥
दामभिर्दम्यमानेषु वत्सेषु तरुणेषु च ।
गोपैरापूर्यमाणासु घोषरथ्यासु सर्वशः ॥ ३७ ॥
तत्रैव गुरुकं भाण्डं शकटारोपितं बहु ।
त्वरिताः पृष्ठतः कृत्वा जग्मुः स्यन्दनवाहनाः ॥ ३८ ॥
व्रजसे बाहर जानेके मार्गोंकी भूमिपर गौएँ सब ओर फैल गयीं। मथानी घुमानेसे दहीके भरे मटकोंमें घर-घर ध्वनि होने लगी। नौजवान बछड़े रस्सियोंसे बाँधकर सधाये जाने लगे। व्रजकी गलियाँ सब ओरसे गोपोंद्वारा भर गयी थीं। ऐसे समयमें छकड़ेपर रखे गये दही-दूधके भारी-भारी भाण्डोंको पीछे करके गाड़ी हाँकनेवाले गोप तीव्र गतिसे चल दिये ॥ ३६-३८ ॥
कृष्णोऽथ रौहिणेयश्च स चैवामितदक्षिणः ।
त्रयो रथगता जग्मुस्त्रिलोकपतयो यथा ॥ ३९ ॥
श्रीकृष्ण, बलराम और अमित दक्षिणा देनेवाले दानपति अक्रूर—ये तीनों त्रिलोकपतियोंके समान रथपर बैठकर चल रहे थे ॥ ३९ ॥
अथाह कृष्णमक्रूरो यमुनातीरमाश्रितः ।
स्यन्दनं चात्र रक्षस्व यत्नं च कुरु वाजिषु ॥ ४० ॥
यमुनाजीके तटपर पहुँचकर अक्रूरने श्रीकृष्णसे कहा—'भैया ! रथको यहीं खड़ा रखो और घोड़ोंको काबूमें रखनेका प्रयत्न करो ॥ ४० ॥
हयेभ्यो यवसं दत्त्वा ह्यभाण्डे रथे तथा ।
प्रगाढं यत्नमास्थाय क्षणं तात प्रतीक्ष्यताम् ॥ ४१ ॥
'तात ! घोड़ोंको दान-घास देकर, इनके आभूषण और रथकी विशेष यत्नपूर्वक देख-भाल करते हुए एक क्षणतक मेरी प्रतीक्षा करो ॥ ४१ ॥
यमुनाया हृदे ह्यस्मिन् स्तोष्यामि भुजंगेश्वरम् ।
दिव्यैर्भागवतैर्मन्त्रैः सर्वलोकप्रभुं यतः ॥ ४२ ॥
'तबतक मैं यमुनाजीके इस कुण्डमें प्रवेश करके दिव्य भागवत मन्त्रोंद्वारा सम्पूर्ण जगत्के स्वामी नागराज अनन्तकी स्तुति कर लूँ ॥ ४२ ॥
गुह्यं भागवतं देवं सर्वलोकस्य भावनम् ।
श्रीमत्स्वस्तिकमूर्द्धानं प्रणमिष्यामि भोगिनम् ।
सहस्रशिरसं देवमनन्तं नीलवाससम् ॥ ४३ ॥
'वे गुह्यरूप भागवत देवता हैं, सम्पूर्ण लोकोंके उत्पादक एवं उन्नायक हैं। उनका मस्तक कान्तिमान् स्वस्तिक चिह्नसे अलंकृत है। वे सर्प-विग्रहधारी भगवान् अनन्त देव सहस्र सिरोंसे सुशोभित तथा नील वस्त्र धारण करनेवाले हैं। मैं उन्हें प्रणाम करूँगा ॥ ४३ ॥
धर्मदेवस्य तस्याथ यद् विषं प्रभविष्यति ।
सर्वं तदमृतप्रख्यमशिष्याम्यमरो यथा ॥ ४४ ॥
स्वस्तिकायतनं दृष्ट्वा द्विजिह्वं श्रीविभूषितम् ।
समाजस्तत्र सर्पाणां शान्त्यर्थं वै भविष्यति ॥ ४५ ॥
'स्वस्तिकके आश्रयभूत श्रीविभूषित नागराज शेषका दर्शन करके मैं उन धर्मदेवका जो विष होगा, उसे अमृतके समान मानकर पी जाऊँगा। ठीक उसी तरह, जैसे देवतालोग अमृत पीते हैं। वहाँ भगवान् शेषके समीप सर्पोंका समुदाय शान्तिके लिये उपस्थित होगा ॥ ४४-४५ ॥
आस्तां मां समुदीक्षन्तौ भवन्तौ सङ्गतावुभौ ।
निवृत्तो भुजगेन्द्रस्य यावदस्मि हृदोत्तमात् ॥ ४६ ॥
'मैं नागराजके इस उत्तम हृदसे लौटकर जबतक आ न जाऊँ, तबतक तुम दोनों भाई एक साथ मेरी राह देखते रहो '॥ ४६ ॥
तमाह कृष्णः संहृष्टो गच्छ धर्मिष्ठ मा चिरम् ।
आवां खलु न शक्तौ स्वस्त्वया हीनावुपासितुम् ॥४७॥
तब श्रीकृष्णने हर्षमें भरकर उनसे कहा—'धर्मिष्ठ महापुरुष ! जल्दी जाओ और लौटो। हम दोनों तुम्हारे बिना यहाँ (देरतक) नहीं बैठे रह सकेंगे' ॥ ४७ ॥