विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 322, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें३०० श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
स हृदे यमुनायास्तु ममज्जामितदक्षिणः।
रसातले स ददृशे नागलोकमिमं यथा ॥ ४८ ॥
तब अमित दक्षिणा देनेवाले अक्रूरने यमुनाजीके जलमें जाकर गोता लगाया । वहाँ उन्हें इसी लोककी भाँति रसातल-वर्ती नाग-लोकका स्पष्ट दर्शन होने लगा ॥ ४८ ॥
तस्य मध्ये सहस्रास्यं हेमतालोच्छ्रितध्वजम्।
लाङ्गलासक्तहस्ताग्रं मुसलोपाश्रितोदरम् ॥ ४९ ॥
उस लोकके मध्यभागमें सहस्र सिरोंसे सुशोभित शेषका दर्शन हुआ । उनके पास सुवर्णमय ताल-चिह्नसे युक्त ऊँची ध्वजा फहराती थी । उनके एक हाथका अग्रभाग हलसे सटा हुआ था और उदर मुसलसे टिका हुआ था ॥ ४९ ॥
असिताम्बरसंवीतं पाण्डुरं पाण्डुरासनम् ।
कुण्डलैकधरं मत्तं सुप्तमम्बुरुहेक्षणम् ॥ ५० ॥
उनका शरीर गौर और आसन श्वेत वर्णका था । उनके श्रीअङ्ग नील वस्त्रसे आवृत थे । उन्होंने एक ही कानमें एक कुण्डल धारण कर रखा था । वे मतवाले-से होकर सोये थे । उनके नेत्र विकसित कमल दलके समान मनोहर थे ॥ ५० ॥
भोगोत्करासने शुभ्रे स्वेन देहेन कल्पिते ।
स्वासीनं स्वस्तिकाभ्यां च वराहाभ्यां महीधरम् ॥ ५१ ॥
वे अपनी ही देहसे कल्पित सर्प-शरीरमय विस्तृत एवं शुभ्र आसनपर सुन्दर ढंगसे विराजमान थे । पृथ्वीको धारण करनेवाले भगवान् अनन्त दो स्वस्तिक एवं वराह-चिह्नसे विभूषित थे ॥ ५१ ॥
किंचित् सव्यापवृत्तेन मौलिना हेमचूलिना ।
जातरूपमयैः पद्मैर्मालयाच्छाद्यवक्षसम् ॥ ५२ ॥
उनके मस्तकपर सोनेकी कलँगीसे विभूषित मुकुट बायीं ओर कुछ झुका हुआ शोभा दे रहा था । वक्षःस्थल सुवर्णमय कमलोंकी मालासे आच्छादित था ॥ ५२ ॥
रक्तचन्दनदिग्धाङ्गं दीर्घबाहुमरिंदमम् ।
पद्मनाभसिताभ्राभं भाभिर्ज्वलिततेजसम् ॥ ५३ ॥
सारे अङ्गोंमें रक्त चन्दनका लेप लगा हुआ था । उनकी भुजाएँ बड़ी-बड़ी थीं । वे शत्रुओंका दमन करनेमें समर्थ थे । उनकी अङ्गकान्ति श्वेत वर्णवाले विष्णुकी शुक्ल प्रभा तथा श्वेत बादलोंकी आभाके समान थी । अपने ही प्रकाशसे उनका तेज प्रज्वलित हो रहा था ॥ ५३ ॥
ददर्श भोगिनां नाथं स्थितमेकार्णवेश्वरम् ।
पूज्यमानं द्विजहेन्द्रैर्वासुकिप्रमुखैः प्रभुम् ॥ ५४ ॥
अक्रूरने देखा, एकार्णवके स्वामी तथा सर्पोंके रक्षक भगवान् शेष विराज रहे हैं और वासुकि आदि नागराज उन प्रभुकी पूजा कर रहे हैं ॥ ५४ ॥
कम्बलाश्वतरौ नागौ तौ चामरकरावुभौ ।
अवीजयेतां तं देवं धर्मासनगतं प्रभुम् ॥ ५५ ॥
कम्बल और अश्वतर नाग हाथोंमें चँवर लेकर धर्मासन-पर विराजमान भगवान् अनन्तदेवको हवा कर रहे थे ॥ ५५ ॥
तस्याभ्याशगतो भाति वासुकिः पन्नगेश्वरः ।
वृतोऽन्यैः सचिवैः सर्वैः कर्कोटकपुरःसरैः ॥ ५६ ॥
उनके निकट कर्कोटक आदि अन्य सर्पजातीय मन्त्रियोंसे घिरे हुए नागराज वासुकि सुशोभित हो रहे हैं ॥ ५६ ॥
तं घटैः काञ्चनैर्दिव्यैः पङ्कजच्छन्नमस्तकैः ।
राजानं स्नापयामासुः स्नातमेकार्णवाम्बुभिः ॥ ५७ ॥
उन्हें क्रमशः यह दिखायी दिया किसेवकोंने कमलसे ढके हुए मुखवाले दिव्य सुवर्णमय घटोंद्वारा एकार्णवके जलसे नहाये हुए नागराज शेषको पुनः नहलाया है ॥ ५७ ॥
तस्योत्सङ्गे घनश्यामं श्रीवत्साच्छादितोरसम् ।
पीताम्बरधरं विष्णुं सूपविष्टं ददर्श ह ॥ ५८ ॥
उन शेषजीकी गोदमें उन्होंने पीताम्बरधारी भगवान् विष्णु (श्रीकृष्ण) को सुखपूर्वक विराजमान देखा । उनके श्रीअङ्गों-की कान्ति मेघके समान श्याम थी तथा उनका वक्षःस्थल श्रीवत्सचिह्नसे आच्छादित था ॥ ५८ ॥
अपरं चैव सोमेन तुल्यसंहननं प्रभुम् ।
संकर्षणमिवासीनं तं दिव्यं विष्टरं विना ॥ ५९ ॥
वहीं चन्द्रमाके समान गौर विग्रहवाले दूसरे प्रभावशाली देवता दिखायी दिये, जो संकर्षणसे मिलते-जुलते थे । वे उस दिव्य विस्तरके बिना ही वहाँ बैठे थे ॥ ५९ ॥
स कृष्णं तत्र सहसा व्याहर्तुमुपचक्रमे ।
तस्य संस्तम्भयामास वाक्यं कृष्णः स्वतेजसा ॥ ६० ॥
अक्रूरने सहसा वहाँ श्रीकृष्णसे बातचीत करनेकी चेष्टा की, परंतु श्रीकृष्णने अपने तेजसे उनकी वाणीको स्तम्भित कर दिया ॥ ६० ॥
सोऽनुभूय भुजङ्गानां तं भागवतमव्ययम् ।
उदतिष्ठत् पुनस्तोयाद् विस्मितोऽमितदक्षिणः ॥ ६१ ॥
सर्पोंके स्वामी उन अविनाशी भागवत देवकी महिमाका अनुभव करके अमित दक्षिणा देनेवाले दानपति अक्रूर आश्चर्य-चकित होकर पुनः जलसे ऊपर उठे ॥ ६१ ॥
स तौ रथस्थावासीनौ तत्रैव बलकेशवौ ।
निरीक्ष्यमाणावन्योन्यं ददर्शाद्भुतरूपिणौ ॥ ६२ ॥
उठकर उन्होंने देखा कि बलराम और श्रीकृष्ण दोनों वहीं रथपर बैठे हैं और एक दूसरेकी ओर देख रहे हैं; उन दोनोंके रूप अद्भुत हैं ॥ ६२ ॥
अथामज्जत् पुनस्तत्र तदाक्रूरः कुतूहलात् ।
दृश्यते यत्र देवोऽसौ नीलवासाः सिताननः ॥ ६३ ॥