भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 325

विष्णुपर्व ] सप्तविंशोऽध्यायः ३०३

रखी गयी थीं। वह धनवान् होनेके साथ ही देखनेमें सुन्दर भी था ॥ १९ ॥

तं कृष्णः श्लक्ष्णया वाचा माल्यार्थमभिसूद्रया । देहीत्युवाच तत्काले मालाकारमकातरम् ॥ २० ॥

उस समय श्रीकृष्णने मालके लिये ही मुखसे निकली हुई अपनी मधुर वाणीद्वारा उस निर्भय मालाकारसे कहा—'हम दोनोंके लिये मालाएँ दे दो' ॥ २० ॥

ताभ्यां प्रीतो ददौ माल्यं प्रभूतं माल्यजीवनः । भवतोः स्वमिदं चेति प्रोवाच प्रियदर्शनौ ॥ २१ ॥

मालासे ही जीवन-निर्वाह करनेवाले उस मालीने प्रसन्न होकर उन दोनों भाइयोंको बहुत-सी मालाएँ अर्पित कीं। वे दोनों देखनेमें बड़े प्रिय लगते थे। मालीने उनसे कहा—'यह सब आपकी ही सम्पत्ति है' ॥ २१ ॥

प्रीतः सुमनसा कृष्णो गुणकाय वरं ददौ । श्रीस्त्वां मत्सम्भवा सौम्य धनौघैरभिपत्स्यते ॥ २२ ॥

उसकी बात सुनकर श्रीकृष्ण बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने संतुष्ट-चित्तसे गुणकको यह वर दिया—'सौम्य ! मेरी प्रसन्नता-से प्रकट होनेवाली लक्ष्मी तुम्हें धन-राशिसे सम्पन्न कर देगी'॥

स लब्ध्वा वरमव्यग्रो माल्यवृत्तिरधोमुखः । कृष्णस्य पतितो मूर्ध्ना प्रतिजग्राह तं वरम् ॥ २३ ॥

माली उस वरको पाकर शान्त-भावसे नतमस्तक हो गया। उसने श्रीकृष्णके चरणोंमें मस्तक रख दिया और उस वरको सादर शिरोधार्य किया ॥ २३ ॥

यक्षाविमाविति तदा स मेने माल्यजीवकः । स भृशं भयसंविग्नो नोत्तरं प्रत्यपद्यत ॥ २४ ॥

उस समय मालीने यही समझा कि ये दोनों यक्ष हैं; उसने कंससे अत्यन्त भयभीत होकर उन्हें कुछ उत्तर नहीं दिया ॥ २४ ॥

वसुदेवसुतौ तौ च राजमार्गगतावुभौ । कुब्जां ददृशतुर्भूयः सानुलेपनभाजनाम् ॥ २५ ॥

तदनन्तर सड़कपर जाते हुए उन दोनों वसुदेव-पुत्रोंने कुब्जाको देखा, जो हाथोंमें अनुलेपन (अङ्गराग) का पात्र लिये हुए थी ॥ २५ ॥

तामाह कृष्णः कुब्जेति कस्येदमनुलेपनम् । नयस्यम्बुजपत्राक्षि क्षिप्राख्यातुमर्हसि ॥ २६ ॥

सस्मिता सम्मुखी भूत्वा प्रत्युवाचाम्बुजेक्षणम् । कृष्णं जलदगम्भीरं विद्युत्कुटिलगामिनी ॥ २७ ॥

उसे देखकर श्रीकृष्णने कहा—'कमलनयने कुब्जे ! तुम यह किसके लिये अनुलेपन लिये जा रही हो, शीघ्र बताओ !' यह सुनकर कुब्जा मुसकराती हुई उनके सामने हो गयी। वह बिजलीके समान कुटिल गतिसे चलनेवाली थी। उसने कमल-नयन श्रीकृष्णसे मेघके समान गम्भीर वाणीमें कहा—॥२६-२७॥

राज्ञः स्नानगृहं यामि तद् गृहाणानुलेपनम् । दृष्ट्वैव त्वारविन्दाक्ष विस्मितास्मि वरानन ॥ २८ ॥ यस्यमिच्छसि मे वीर त्वं गृहाणानुलेपनम् । स्थितास्म्यागच्छ भद्रं ते हृदयस्यासि मे प्रियः ॥ २९॥

'कमलनयन ! मनोहर मुखवाले वीर ! मैं तो राजाके स्नान-गृहको जा रही हूँ। तुम्हें अङ्गराग चाहिये तो ले लो। तुम्हें देखते ही मैं विस्मयसे विमुग्ध हो उठी हूँ। तुम्हें जैसा अङ्गराग चाहिये, वही ग्रहण करो। मैं तुम्हारे लिये ठहर गयी हूँ। तुम्हारा कल्याण हो, आओ मेरे घर। तुम मेरे हृदय-वल्लभ हो ॥ २८-२९ ॥

कुतश्चागम्यते सौम्य यन्मां त्वं नावबुध्यसे । महाराजस्य दयितां नियुक्तामनुलेपने ॥ ३० ॥

'सौम्य ! तुम कहाँसे आते हो कि मुझे नहीं जानते। मैं तो महाराज कंसकी प्यारी दासी हूँ। उन्होंने मुझे अङ्गरागके ही कार्यमे लगा रखा है' ॥ ३० ॥

तामुवाच हसन्तीं तु कृष्णः कुब्जामवस्थिताम् । आवयोर्गात्रसदृशं दीयतामनुलेपनम् ॥३१॥ वयं हि देशातिथयो मल्लाः प्राप्ता वरानने । द्रष्टुं धनुर्महद् दिव्यं राष्ट्रे चैव महर्द्धिमत् ॥ ३२ ॥

वहाँ खड़ी होकर हँसती हुई कुब्जासे श्रीकृष्णने कहा—'सुमुखि ! तुम हम दोनों भाइयोंके शरीरके अनुरूप अङ्गराग दे दो। हम पहलवान हैं और इस देशमें अतिथिके रूपमें आये हैं। इस राज्यमें जो अत्यन्त समृद्धिशाली, विशाल दिव्य धनुष है, उसे ही देखनेके लिये हमलोगोंका यहाँ आना हुआ है' ॥ ३१-३२ ॥

प्रत्युवाचाथ सा कृष्णं प्रियोऽसि मम दर्शने । राजार्हमिदमव्यग्रं तद् गृहाणानुलेपनम् ॥ ३३ ॥

तब कुब्जाने श्रीकृष्णसे कहा—'मेरी दृष्टिमें तुम परम प्रिय हो, अतः शान्तभावसे यह राजोचित अङ्गराग ग्रहण करो ॥

तावुभावन्गुलिप्ताङ्गौ चारुगात्रौ विरेजतुः । तीर्थगौ पङ्कदिग्धाङ्गौ यमुनायां यथा वृषौ ॥ ३४ ॥

अङ्गोंमें अङ्गराग लग जानेपर मनोहर शरीरवाले वे दोनों भाई बड़ी शोभा पाने लगे। उस समय वे ऐसे प्रतीत होते थे, जैसे दो साँड़ यमुनाजीके जलमें गोता लगाकर सारे अङ्गोंमें कीचड़ लपेटे आ रहे हों ॥ ३४ ॥

तां च कुब्जां स्थगोर्मध्ये द्व्यङ्गुलेनाग्रपाणिना । शनैः सम्पीडयामास कृष्णो लीलाविधानवित् ॥ ३५॥

तदनन्तर लीलाविधिको जाननेवाले श्रीकृष्णने अपने