भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 326

३०४ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


हाथकी दो अँगुलियोंसे कुब्जाके कूबड़के मध्यभागमें धीरेसे दबाया (इससे कूबड़ सीधा हो गया) ॥ ३५ ॥

सा च मग्नं स्थगुं मत्वा स्वायताङ्गी शुचिस्मिता।
जहासोच्चैः स्तनतटी ऋजुयष्टिलता यथा ॥ ३६॥

मेरा कूबड़ बैठ गया, ऐसा जानकर सुन्दर एवं उन्नत अङ्गवाली कुब्जा पवित्र मुस्कानसे सुशोभित हो हँसने लगी। उसके स्तन प्रान्त उभरकर ऊँचे हो गये और वह सीधी लकड़ीपर चढ़ी हुई लताके समान शोभा पाने लगी ॥ ३६ ॥

प्रणयाच्चापि कृष्णं सा बभाषे मत्तकाशिनी।
क्व यास्यसि मया रुद्धः कान्त तिष्ठ गृहाण माम् ॥ ३७॥

फिर तो मतवाली-सी होकर वह श्रीकृष्णसे प्रेमपूर्वक बोली—'प्रियतम! अब तुम कहाँ जाओगे? मैंने तुम्हें रोक लिया, यहीं रहो और मुझे अंगीकार करो' ॥ ३७ ॥

तौ जातहासावन्योन्यं सतलाक्षेपमव्ययौ।
वीक्षमाणौ प्रहसितौ कुब्जायाः श्रुतविस्तरौ ॥ ३८ ॥

यह सुनकर उन्हें हँसी आ गयी। फिर तो वे अविनाशी बन्धु एक दूसरेकी ओर देखते हुए ताली पीट-पीटकर जोर-जोरसे हँसने लगे। कुब्जाके कानोंने उन दोनों भाइयोंके गुण विस्तारपूर्वक सुने थे ॥ ३८ ॥

कृष्णस्तु कुब्जां कामार्तां सस्मितं विससर्ज ह।
ततस्तौ कुब्जया मुक्तौ प्रविष्टौ राजसंसदम् ॥ ३९॥

श्रीकृष्णने मुस्कराते हुए कामपीड़ित कुब्जाको वहीं छोड़ दिया और उससे छूटकर वे दोनों बन्धु राज-भवनमें प्रविष्ट हुए ॥ ३९ ॥

तावुभौ व्रजसंवृद्धौ गोपवेषविभूषितौ।
गूढचेष्टाननौ भूत्वा प्रविष्टौ नृपवेश्म तत् ॥ ४० ॥

व्रजमें बड़े होकर गोपवेषसे विभूषित हुए उन दोनों वीरोंने जब उस राजभवनमें प्रवेश किया, उस समय उनकी प्रत्येक चेष्टा गूप्तरूपसे होती थी। उनके मुखका भाव ही ऐसा गूढ़ था कि उससे आन्तरिक चेष्टाका पता नहीं लगता था ॥

धनुःशालां गतौ तत्र बालावपरितर्कितौ।
हिमवद्वनसम्भूतौ सिंहाविव मदोत्कटौ ॥ ४१ ॥

हिमालयके वनमें उत्पन्न हुए दो मदमत्त सिंहोंके समान वे दोनों बालक वहाँ धनुषशालामें जा पहुँचे। उस समय वहाँ उनके पहुँचनेकी सम्भावना किसीको नहीं थी ॥ ४१ ॥

दिदृक्षन्तौ महत्तत्र धनुरार्योगभूषितम्।
पप्रच्छतुश्च तौ वीरावायुधागारिकं तदा ॥ ४२ ॥

वे वहाँ रखे हुए विशाल धनुषको, जो पुष्पमालासे विभूषित था, देखना चाहते थे; अतः उन दोनों वीरोंने उस समय शस्त्रागारके संरक्षकसे पूछा— ॥ ४२ ॥

भोः कंसधनुषां पाल श्रूयतामावयोर्र्वचः।
कतरत् तद् धनुः सौम्य महोऽयं यस्य वर्तते ॥ ४३ ॥
आयोगभूतं कंसस्य दर्शयस्व यदीच्छसि।

'राजा कंसके धनुषोंकी रक्षा करनेवाले अस्त्र-संरक्षक ! तुम हम दोनोंकी बातें सुनो। सौम्य ! जिसका यह उत्सव होने जा रहा है, वह धनुष कौन-सा है? यदि तुम्हारी इच्छा हो तो कंसके इस उत्सवका जो प्रधान निमित्त है, उस धनुषका हमें दर्शन कराओ' ॥ ४३½ ॥

स तयोर्दर्शयामास तद् धनुः स्तम्भसंनिभम् ॥ ४४ ॥
अनारोप्यमसम्भेद्यं देवैरपि सवासवैः।

उसने उन दोनों भाइयोंको वह खम्भ-जैसा मोटा धनुष दिखा दिया। उस धनुषपर प्रत्यञ्चा चढ़ाना या उसे तोड़ना इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओंके लिये भी असम्भव था ॥४४½॥

तद् गृहीत्वा तदा कृष्णस्तोलयामास वीर्यवान् ॥४५॥
दोर्भ्यां कमलपत्राक्षः प्रहृष्टेनान्तरात्मना।

पराक्रमी कमलनयन श्रीकृष्णने प्रसन्नचित्तसे दोनों हाथोंद्वारा उस धनुषको उठाकर तौला ॥ ४५½ ॥

तोलयित्वा यथाकामं तद् धनुर्दैत्यपूजितम् ॥ ४६ ॥
आरोपयामास बली नामयामास चासकृत्।
आनाम्यमानं कृष्णेन प्रकर्षादुरगोपमम् ॥ ४७ ॥
द्विधाभूतमभून्मध्ये धनुरार्योगभूषितम्।

दैत्योंद्वारा पूजित हुए उस धनुषको इच्छानुसार तौलकर बलवान् श्रीकृष्णने कई बार उसको झुकाया और उसके ऊपर प्रत्यञ्चा चढ़ायी। श्रीकृष्णके द्वारा बहुत अधिक झुका दिये जानेके कारण वह पुष्पहारोंसे विभूषित सर्पाकार धनुष बीचसे टूटकर दो भागोंमें विभक्त हो गया ॥ ४६-४७½ ॥

भङ्क्त्वा तु तद् धनुः श्रेष्ठं कृष्णस्त्वरितविक्रमः।
निष्क्राम महावेगः स च संकर्षणो युवा ॥४८॥

उस श्रेष्ठ धनुषको तोड़कर श्रीकृष्ण तथा वे नवयुवक संकर्षण शीघ्रतापूर्वक कदम बढ़ाते हुए बड़े वेगसे उस भवनसे बाहर निकल गये ॥ ४८ ॥

धनुषो भङ्गनादेन वायुनिर्घोषकारिणा।
चचाचान्तःपुरं सर्वं दिशश्चैव पुपूरिरे ॥ ४९ ॥

उस धनुषके टूटनेसे जो धड़ाका हुआ, वह सहसा उठी हुई प्रचण्ड आँधीके समान गम्भीर घोष करनेवाला था। उससे सारा अन्तःपुर काँप उठा और सम्पूर्ण दिशाओंमें वह आवाज गूँज उठी ॥ ४९ ॥

निर्गम्य त्वायुधागाराज्जग्मतुर्गोपसंनिधौ।
वेगेनायुधपालस्तु गच्छन् सम्भ्रान्तमानसः ॥ ५० ॥
समीपं नृपतेर्गत्वा काकोच्छ्वासोऽभ्यभाषत।