विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 329, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] अष्टविंशोऽध्यायः ३०७
स्थाप्यन्तां सुनिखाताश्च पानकुम्भा यथाक्रमम्।
उदभारसहाः सर्वे सकाञ्चनघटोत्तमाः ॥ १३ ॥
‘अखाड़ेमें गोमयचूर्णके अधिक-से-अधिक ढेर बिछा दिये जायँ। जिससे उनकी कमी न पड़े। जगह-जगह शोभाके लिये सुन्दर परदे लगा दिये जायँ। उनके अनुरूप खम्भे खड़े किये जायँ, जो भूमिमें खूब गहराई तक गड़े हों। क्रमशः पानकुम्भ स्थापित कि ये जायँ, वे सब-के-सब जलका भार सह लेनेमें समर्थ हों। उनपर जलपूर्ण सोनेके उत्तम घड़े रख दिये जायँ ॥ १२-१३ ॥
बल्यश्चोपकल्प्यन्तां कषायाश्चैव कुम्भशः।
प्राश्निकाश्च निमन्त्र्यन्तां श्रेण्यश्च सपुरोगमाः ॥ १४ ॥
‘उपहारकी वस्तुएँ भी एकत्र की जायँ, घड़ोंमें रस भर-भर कर रखे जायँ, मल्लयुद्धके नियमोंको जाननेवाले लोग निमन्त्रित किये जायँ, व्यवसायियों तथा कारीगरोंको उनके अगुओंसहित बुलाया जाय ॥ १४ ॥
आज्ञा च देया मल्लानां प्रेक्षकाणां तथैव च।
समाजे मञ्चशोभाश्च कल्प्यन्तां रूपकल्पिताः ॥ १५ ॥
‘मल्लों तथा प्रेक्षकों (युद्धमें हार-जीतके निर्णायकों) को ठीक समयसे आनेकी आज्ञा दे दी जाय। रङ्गशालामें स्थापित किये गये मञ्चोंकी शोभा बढ़ानेके लिये उन्हें अच्छी तरह सजाया जाय' ॥ १५ ॥
एवमाज्ञाप्य राजा स समाजविधिमुत्तमम्।
समाजवाटान्निष्क्रम्य विवेश स्वं निवेशनम् ॥ १६ ॥
इस प्रकार रंगशालाको अच्छी तरहसे सजानेकी उत्तम व्यवस्थाके लिये आज्ञा देकर राजा कंस वहाँसे निकला और अपने महलमें चला गया ॥ १६ ॥
आह्वानं तत्र संचक्रे तस्य मल्लद्वयस्य वै।
चाणूरस्याप्रमेयस्य मुष्टिकस्य तथैव च ॥ १७ ॥
वहाँ उसने अपने दो मल्लोंको बुलाया—एक तो अप्रतिम बलशाली चाणूर था और दूसरा मुष्टिक ॥ १७ ॥
तौ तु मल्लौ महावीर्यौ बलिनौ बाहुशालिनौ।
कंसस्याज्ञां पुरस्कृत्य हृष्टौ विविशतुस्तदा ॥ १८ ॥
अपनी भुजाओंसे सुशोभित होनेवाले वे दोनों महा-पराक्रमी बलशाली मल्ल कंसकी आज्ञा शिरोधार्य करके बड़े हर्षके साथ उसके भवनमें प्रविष्ट हुए ॥ १८ ॥
तौ समीपगतौ दृष्ट्वा मल्लौ जगति विश्रुतौ।
उवाच कंसो नृपतिः सोपन्यासमिदं वचः ॥ १९ ॥
उन दोनों विश्वविख्यात पहलवानोंको अपने समीप आया देख राजा कंसने यह युक्तियुक्त वचन कहा—॥१९॥
भवन्तौ मम विख्यातौ मल्लौ वीरध्वजोच्छ्रितौ।
पूजितौ च यथान्यायं सत्कारार्हौ विशेषतः ॥ २० ॥
‘तुम दोनों मेरे दरबारके विख्यात मल्ल हो और वीर-ध्वज (शौर्यसूचक सम्मान-चिह्न) प्राप्त करके मल्लोंमें उच्चतम स्थानपर प्रतिष्ठित हुए हो। तुम दोनों मेरे द्वारा विशेष सत्कार पानेके योग्य रहे हो, इसलिये मैंने सदा ही तुम्हारा यथोचित सम्मान किया है ॥ २० ॥
तन्मत्तो यदि सत्कारः स्मर्यते सुकृतानि च।
कर्तव्यं मे महत् कर्म भवद्भ्यां स्वेन तेजसा ॥ २१ ॥
‘अतः यदि तुम्हें मुझसे प्राप्त हुए सत्कारोंका स्मरण है, मेरे द्वारा किये गये उपकार और सद्व्यवहार भूले नहीं हैं तो आज तुम दोनोंको अपने तेज (बल-पराक्रम) से मेरा एक महान् कार्य सिद्ध करना होगा ॥ २१ ॥
यावेतौ मम संवृद्धौ व्रजे गोपालकावुभौ।
संकर्षणश्च कृष्णश्च बालावपि जितश्रमौ ॥ २२ ॥
‘ये जो मेरे व्रजमे पले हुए संकर्षण और कृष्ण नामक दो ग्वाले हैं, बालक होनेपर भी परिश्रमको जीत चुके हैं (कभी थकते नहीं हैं) ॥ २२ ॥
एतौ रङ्गगतौ युद्धे युध्यमानौ वनेचरौ।
निपातानन्तरं शीघ्रं हन्तव्यौ नात्र संशयः ॥ २३ ॥
‘ये दोनों वनेचर जब अखाड़ेमें उतरकर युद्धके समय तुमसे लड़ने लगें, तब तुम दोनो उन्हें नीचे गिराते ही शीघ्र मार डालना। इसमें कोई संशय नहीं मानना चाहिये ॥२३॥
बालाविमौ सुचपलावक्रियाविति सर्वथा।
नावज्ञा तत्र कर्तव्या कर्तव्यो यत्न एव हि ॥ २४ ॥
‘ये चञ्चल बालक हैं, इन्हें युद्धकी शिक्षा नहीं मिली है—सर्वथा ऐसा समझकर तुम उन दोनोंकी अवहेलना न करना। तुम्हें उन्हें मार डालनेके लिये पूरा-पूरा यत्न करना ही चाहिये ॥
ताभ्यां युधि निरस्ताभ्यां गोपाभ्यां रङ्गसंनिधौ।
आयत्यां च तदात्वे च श्रेयो मम भविष्यति ॥२५॥
‘यदि रंगस्थलके समीप युद्धमें वे दोनों गोप-बालक मार डाले जायँ तो वर्तमान और भविष्यमे भी मेरा कल्याण होगा'॥
नृपतेः स्नेहसंयुक्तैर्वचोभिर्हृष्टमानसौ।
ऊचतुर्युद्धसम्मत्तौ मल्लौ चाणूरमुष्टिकौ ॥ २६ ॥
राजा कंसके इन स्नेहयुक्त वचनोंसे उन दोनों मल्लोंके हृदयमे बड़ी प्रसन्नता हुई। युद्धके लिये सदा मतवाले रहने-वाले वे दोनों पहलवान चाणूर और मुष्टिक राजासे इस प्रकार बोले—॥ २६ ॥
१. पानीसे भरे घड़ों या माँटोंको रखनेके लिये काठकी बनी हुई चार या छह पायोंकी टेबुल-जैसी एक चीज, जिसे कुछ स्थानोंपर पल्हँडी कहते हैं। इसीका नाम पानकुम्भ है। नीलकण्ठने इसका पर्यायवाची शब्द घटोच्छ्रायिका बताया है।