विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 330, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंAn exact transcription of the Devanagari text from the image, line by line:
३०८ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे यद्यावयोस्तौ प्रमुखे स्थास्येते गोपकिल्बिषौ । 'साथ ही ये जो-जो मूर्ख यादव श्रीकृष्णका भरोसा रखते हतावित्येव मन्तव्यौ प्रेतरूपौ तपस्विनौ ॥ २७ ॥ हैं, वे सब श्रीकृष्णको मारा गया देख हताश होकर विनाशके 'यदि वे दोनों गोपकुल-कलंक युद्धमें हमारे सामने खड़े गर्तमें गिर जायेंगे ॥ ३५ ॥ हो जायेंगे तो आप उन्हें मरा हुआ ही समझिये। वे कष्ट एतौ हत्वा गजेन्द्रेण मल्लैर्वा स्वयमेव वा । उठानेवाले प्रेतरूप ही हैं- ऐसा मानिये ॥ २७ ॥ पुरीं निर्यादवीं कृत्वा विचरिष्याम्यहं सुखी ॥ ३६ ॥ यद्यावां प्रतियोत्स्येते तावरिष्टपरिक्लुतौ । 'इन दोनोंको गजराज कुवलयापीड अथवा मल्लोंके द्वारा आवाभ्यां रोषयुक्ताभ्यां प्रमुखे तौ वनेचरौ ॥ २८ ॥ मरवाकर या स्वयं ही मारकर मथुरापुरीको यादवोंसे सूनी 'यदि किसी अरिष्ट-ग्रहसे ग्रस्त होकर वे दोनों हमलोगों- करके मैं सुखपूर्वक विचरूँगा ॥ ३६ ॥ से लड़ेंगे तो हम रोषमें भरकर सबके सामने उन दोनों पिता हि मे परित्यक्तो यादवानां कुलोद्वहः । वनेचरोंको अवश्य मार डालेंगे ॥ २८ ॥ शेषाश्च मे परित्यक्ता यादवाः कृष्णपक्षिणः ॥ ३७ ॥ एवं वाग्विषमुत्सृज्य तावुभौ मल्लपुङ्गवौ । 'मैंने यादवकुलका भार वहन करनेवाले अपने पिताको ही अनुज्ञातौ नरेन्द्रेण स्वे गृहे तौ प्रजग्मतुः ॥ २९ ॥ त्याग दिया । कृष्णका पक्ष लेनेवाले जो शेष यादव हैं, वे भी इस तरह वाणीरूप विषका वमन करके वे दोनों मल्ल- मेरे द्वारा परित्यक्त हो चुके हैं ॥ ३७ ॥ पुङ्गव राजा कंसकी आज्ञा ले अपने घर चले गये ॥ २९ ॥ न चाहमुग्रसेनेन जातः किल सुतार्थिना । महामात्रं ततः कंसो वभाषे हस्तिजीविनम् । मानुषेणाल्पवीर्येण यथा मामाह नारदः ॥ ३८ ॥ हस्ती कुवलयापीडः संमाजद्वारे तिष्ठतु ॥ ३० ॥ 'यथार्थ बात यह है कि पुत्रकी इच्छा रखनेवाले इस बलवान् मदलोलाक्षश्चपलः क्रोधनो नृषु । अल्पपराक्रमी मानव उग्रसेनके द्वारा मेरा जन्म नहीं हुआ दानोत्कटकटश्चण्डः प्रतिवारणरोषणः ॥ ३१ ॥ है, जैसा कि नारदजीने मुझे बताया है? ॥ ३८ ॥ स संनोदयितव्यस्ते तावुद्दिश्य वनौकसौ । महामात्र उवाच वसुदेवसुतौ वीरौ यथा स्यातां गतायुषौ ॥ ३२ ॥ त्वया चैव गजेन्द्रेण यदि तौ गोष्ठजीविनौ । कथमुक्तं नारदेन राजन् देवर्षिणा पुरा । आश्चर्यमेतत् कथितं त्वत्तः श्रुतमरिंदम ॥ ३९ ॥ भवेतां पतितौ रङ्गे पश्येयमहमुत्कटौ ॥ ३३ ॥ महावतने पूछा- राजन् ! पूर्वकालमें देवर्षि नारदने तत्पश्चात् कंसने हाथीकी परिचर्या से ही जीविका चलाने- कैसी बात बतायी थी? शत्रुदमन ! यह तो मैंने आपके मुख- वाले अपने महावतको बुलाकर कहा- 'कुवलयापीड नामक से बड़े आश्चर्यकी बात सुनी है ॥ ३९ ॥ हाथी रंगशालाके द्वारपर खड़ा रहे। वह बलवान्, मदसे चञ्चल नेत्रवाला, चपल तथा मनुष्योंके प्रति कुपित रहनेवाला कथमन्थेन जातस्त्वमुग्रसेनात् पितुर्विना । है। उसके गण्डस्थल मदकी धारासे उत्कट दिखायी देते हैं। तव मात्रा कथं राजन् कृतं कर्मेदमीदृशम् ॥ ४० ॥ वह किसी विपक्षी हाथीको देखते ही रोषसे भर जाता है यदि आपके पिता उग्रसेन नहीं हैं तो उनके बिना दूसरे- तथा स्वभावसे ही अत्यन्त क्रोधी है। वसुदेवके जो वनमें से आपका जन्म कैसे हुआ है? महाराज ! आपकी माताने रहनेवाले वीर पुत्र हैं, वे यदि द्वारपर आ जायँ तो तुम उनके यह ऐसा कुत्सित कर्म कैसे किया ? ॥ ४० ॥ ऊपर उस हाथीको हाँक देना, जिससे वहीं उनकी जीवन- अन्यापि प्राकृता नारी न कुर्याच्च जुगुप्सितम् । लीला समाप्त हो जाय। मैं चाहता हूँ कि गोष्ठमे जीनेवाले विस्तरं श्रोतुमिच्छामि ह्येतत् कौतूहलं हि मे ॥ ४१ ॥ उन दोनों मदमत्त बालकोंको तुम्हारे और गजराज कुवलया- दूसरी साधारण स्त्री भी ऐसा घृणित कार्य नहीं कर पीडके द्वारा रंगशालाके द्वारपर धराशायी किया हुआ देखूँ ॥ सकती है; फिर उन्होंने कैसे किया ? मै विस्तारपूर्वक इस ततस्तौ पतितौ दृष्ट्वा वसुदेवः सबान्धवः । प्रसङ्गको सुनना चाहता हूँ। इसे जाननेके लिये मेरे मनमे छिन्नमूलो निरालम्बः सभार्यो विनशिष्यति ॥ ३४ ॥ बड़ा कौतूहल है ॥ ४१ ॥ • उन दोनोंको पृथ्वीपर पड़ा देख वसुदेवकी तो जड़ ही कंस उवाच कट जायगी। वे पत्नी और बन्धु-बान्धवोंसहित निरालम्ब यथा कथितवान् विप्रो महर्षिनरदः प्रभुः । होकर स्वयं नष्ट हो जायेंगे ॥ ३४ ॥ तथाहं सम्प्रवक्ष्यामि यदि ते श्रवणे मतिः ॥ ४२ ॥ ये चेमे यादवा मूर्खाः सर्वे कृष्णपरायणाः । कंसने कहा महावत ! यदि तुम्हारा विचार इस विनशिष्यन्ति च्छिन्नाशा दृष्ट्वा कृष्णं निपातितम् ॥३५॥ रहस्यको सुननेका ही है तो प्रभावशाली महर्षि नारद बाबाने