भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 332

३१० | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे

(होनेके पश्चात् स्नान कर चुकी) थी, कौतूहलवश दूसरी स्त्रियोंके साथ सुयामुन नामक पर्वतका दर्शन करनेके लिये गयी ॥ ५८ ॥

सा तत्र रमणीयेषु रुचिरद्रुमसानुषु ।
चचार नगशृङ्गेषु कन्दरेषु नदीषु च ॥ ५९ ॥
वह वहाँ पर्वतके रमणीय शिखरोंपर, जो मनोहर वृक्षोंसे सुशोभित थे, विचरने लगी। उसने वहाँकी कन्दराओंमें तथा नदियोंके तटोंपर भी भ्रमण किया ॥ ५९ ॥

किन्नरोद्गीतमधुराः प्रतिश्रुत्यभिनादिताः ।
शृण्वती कामजननीर्वाचः श्रोत्रसुखावहाः ॥ ६० ॥
वहाँ उसे कानोंको सुख देनेवाली कुछ ऐसी बातें सुननेको मिलीं, जो कामोद्दीपन करनेवाली थीं। वे बातें किन्नरोंके गाये हुए गीतोंके रूपमें उपलब्ध होनेके कारण बड़ी मधुर प्रतीत होती थीं और प्रतिध्वनिसे सब ओर गूँजती रहती थीं ॥ ६० ॥

वर्हिणां चैव विरुतं खगानां च विकूजितम् ।
अभीक्ष्णमभिशृण्वती स्त्रीधर्ममभिरोचयत् ॥ ६१ ॥
मयूरोंकी मधुर केकाध्वनि तथा विहंगमोंके कलरवोंको निरन्तर सुनती हुई तुम्हारी माताके मनमें स्त्रीधर्म (पुरुष-सहवास) की रुचि जाग्रत् हो उठी ॥ ६१ ॥

एतस्मिन्नन्तरे वायुर्वनराजीविनिःसृतः ।
हृद्यः कुसुमगन्धाढ्यो ववौ मन्मथबोधनः ॥ ६२ ॥
इसी बीचमें वनश्रेणियोंसे निकलकर फूलोंकी सुगन्धसे भरी हुई मनोरम वायु चलने लगी, जो कामभावको जगानेवाली थी ॥ ६२ ॥

द्विरेफाभरणाश्चैव कदम्बा वायुघट्टिताः ।
मुमुचुर्गन्धमधिकं संततासारमूर्च्छिताः ॥ ६३ ॥
खिले हुए कदम्बोंपर भ्रमर छाये हुए थे, जो उनके आभूषणसे जान पड़ते थे। वायुके झोंके खाकर और निरन्तर गिरती हुई जलधाराओंसे मूर्च्छित-से होकर वे कदम्ब अधिकाधिक गन्ध छोड़ने लगे ॥ ६३ ॥

केसराः पुष्पवर्षैश्च ववृषुर्मदबोधनाः ।
नीपा दीपा इवाभान्ति पुष्पकण्टकधारिणः ॥ ६४ ॥
मदोन्मादको जगानेवाले नागकेसर अपने फूलोंकी वर्षा कर रहे थे। पुष्पमय कण्टक धारण करनेवाले नीप दीपके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ ६४ ॥

मही नवतृणच्छन्ना शक्रगोपविभूषिता ।
यौवनस्थेव वनिता स्वं दधारार्तवं वपुः ॥ ६५ ॥
नयी-नयी घासोंसे ढकी और वीरबहूटीसे विभूषित हुई वसुधा नवयुवती नारीके समान मानो रजस्वला-रूप धारण किये हुए थी ॥ ६५ ॥

अथ सौभपतिः श्रीमान् द्रुमिलो नाम दानवः ।
भविष्यद्दैवयोगेन विधात्रा तत्र नीयते ॥ ६६ ॥
ऐसे समयमें सौभविमानका अधिपति द्रुमिल नामक दीप्तिमान् दानव भावी दैवयोगसे विधाताद्वारा प्रेरित होकर वहाँ आ पहुँचा ॥ ६६ ॥

कामगेन रथेनाशु तरुणादित्यवर्चसा ।
यदृच्छया गतस्तत्र सुयामुनदिदृक्षया ॥ ६७ ॥
इच्छानुसार चलनेवाला उसका विमान प्रभातकालके सूर्यकी भाँति तेजःपुञ्जसे प्रकाशित हो रहा था। उसके द्वारा वह वहाँ सुयामुन पर्वतकी शोभा देखनेकी इच्छासे शीघ्रतापूर्वक सहसा आ गया ॥ ६७ ॥

विहायसा कामगमो मनसोऽप्याशुगामिना ।
स तं प्राप्य पर्वतेन्द्रमवतीर्य रथोत्तमात् ॥ ६८ ॥
मनसे भी तीव्र गतिवाले उस विमानद्वारा आकाशमार्गसे इच्छानुसार चलनेवाला वह दानव पर्वतराज सुयामुनपर आकर उस श्रेष्ठ रथसे नीचे उतरा ॥ ६८ ॥

पर्वतोपवने न्यस्य रथं पररथारुजम् ।
अथासौ सूतसहितश्चचार नगमूर्धनि ॥ ६९ ॥
शत्रुओंके रथको तोड़ डालनेवाले उस रथ (विमान) को उस पर्वतके उपवनमें खड़ा करके वह विमानचालकके साथ पर्वत-शिखरपर विचरण करने लगा ॥ ६९ ॥

ततो बहून्यपश्येतां काननानि वनानि च ।
सर्वर्तुगुणसम्पन्नं नन्दनस्येव काननम् ॥ ७० ॥
उन दोनोंने वहाँ बहुत-से वन और कानन देखे। वहाँकी वनस्थली नन्दनवनके समान सभी ऋतुओंके गुणोंसे सम्पन्न थी ॥ ७० ॥

चेरतुर्नगशृङ्गेषु कन्दरेषु नदीषु च ।
नानाधातुपिनद्धैश्च शृङ्गैर्र्बहुभिरुच्छ्रितैः ॥ ७१ ॥
नानारत्नविचित्रैश्च काञ्चनाञ्जनराजतान् ।
नानाकुसुमगन्धाढ्यान् नानासत्त्वगणैर्युतान् ॥ ७२ ॥
नानाद्विजगणैर्घुष्टान् नानापुष्पफलद्रुमान् ।
नानौषधिसमायुक्तान्नृपसिद्धानुसेवितान् ॥ ७३ ॥
वे दोनों उस पर्वतके शिखरोंपर, कन्दराओंमें और नदियोंके किनारे-किनारे घूमने लगे। उस पर्वतके बहुत-से ऊँचे-ऊँचे शिखर नाना प्रकारकी धातुओंसे आवृत्त थे। भाँति-भाँतिके रत्नोंसे उनकी विचित्र शोभा हो रही थी। उन दोनोंने देखा, पर्वतके विभिन्न शिखर सुवर्णमय, रजतमय तथा अञ्जनमय दिखायी दे रहे हैं। नाना प्रकारके फूलोंकी सुगन्ध वहाँ व्याप्त हो रही है। भाँति-भाँतिके जीव-जन्तुओंके समुदाय वहाँ निवास करते हैं। अनेक प्रकारके पक्षी अपने कलरवोंसे उन शिखरोंको कोलाहलपूर्ण कर रहे हैं। भाँति-भाँतिके पुष्प