भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

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पृष्ठ 333

विष्णुपर्व ] अष्टाविंशोऽध्यायः ३११

और फलोंसे सम्पन्न वृक्ष वहाँ लहलहा रहे हैं। नाना प्रकारकी ओषधियोंसे संयुक्त उन शिखरोंपर ऋषि और सिद्ध पुरुष निवास करते हैं ॥ ७१-७३ ॥

विद्याधरान् किम्पुरुषानृक्षवानरराक्षसान्। सिंहान् व्याघ्रान् वराहांश्च महिषाञ्छरभाञ्छशान् ॥ सूमरांश्चमरान् न्यङ्कन् मातङ्गान् यक्षराक्षसान्। एवं बहुविधान् पश्यंश्चरमाणो नगोत्तमम् ॥ ७६ ॥

विद्याधर, किन्नर, रीछ, वानर, राक्षस, सिंह, व्याघ्र, वराह, भैंसे, शरभ, खरगोश, सूमर (मृगविशेष), चमर (चँवरी गाय), न्यङ्कु (बारहसिंगा), हाथी, यक्ष, निशाचर तथा ऐसे ही नाना प्रकारकी जातिके प्राणियोंको देखता हुआ वह दानव उस उत्तम पर्वतपर भ्रमण कर रहा था ॥ ७४-७५ ॥

दूराद् ददर्श नृपतिदेवीं देवसुतोपमाम्। क्रीडमानां सखीभिश्च पुष्पं चैव विचिन्वतीम् ॥ ७६ ॥

इसी समय उस दानवराजने दूरसे ही उग्रसेनकी रानीको देखा, जो सखियोंके साथ क्रीडा करती तथा फूल चुनती हुई देवकन्याके समान सुशोभित हो रही थी ॥ ७६ ॥

ततश्चरन्तीं सुश्रोणीं सखीभिः सह संवृताम्। दृष्ट्वा सौभपतिर्दूराद् विस्मयन् सूतमब्रवीत् ॥ ७७ ॥

सखियोंसे घिरी हुई उस सुन्दर कटिप्रदेशवाली रमणीको दूरसे ही वहाँ विचरती देख सौभ विमानका स्वामी द्रुमिल चकित हो उठा और अपने विमानचालकसे इस प्रकार बोला— ॥ ७७ ॥

कस्येयं मृगशावाक्षी वनान्तरविचारिणी। रूपौदार्यगुणोपेता मन्मथस्य रतिर्यथा ॥ ७८ ॥

'सूत ! इस वनके भीतर विचरनेवाली यह मृगनयनी बाला किसकी स्त्री है, जो रूप और उदारता आदि गुणोंसे सम्पन्न होकर कामपत्नी रतिके समान शोभा पा रही है ॥ ७८ ॥

शचीव पुरुहूतस्य उताहो वा तिलोत्तमा। नारायणोरुं निर्भिद्य सम्भूता वरवर्णिनी। ऐलस्य दयिता देवी योषिद्रत्नं किमुर्वशी ॥ ७९ ॥

'अहो ! क्या यह देवराज इन्द्रकी पत्नी शची है या तिलोत्तमा है अथवा जो भगवान् नारायणके ऊरुका भेदन करके प्रकट हुई और पुरूरवाकी प्यारी महारानी बनी थी, वह सुन्दर कान्तिवाली रमणीरत्न उर्वशी है ? ॥ ७९ ॥

क्षीरार्णवे मथ्यमाने सुरासुरगणैः सह। मन्थानं मन्दरं कृत्वामृतार्थमिति नः श्रुतम् ॥ ८० ॥ ततोऽमृतात् समुत्तस्थौ देवी श्रीर्लोकभाविनी। नारायणाङ्कललिता किं श्रीरेषा वराङ्गना ॥ ८१ ॥

'हमने सुना है—देवताओंने असुरोंके साथ मिलकर अमृतकी प्राप्तिके लिये मन्दराचलको मेथानी बनाकर जब क्षीरसागरका मन्थन किया था, उस समय उसके अमृतमय दुग्धसे लोकभाविनी लक्ष्मी देवीका प्रादुर्भाव हुआ था, जो भगवान् नारायणके अङ्कमें सुशोभित होती हैं, यह सुन्दरी अङ्गना वही लक्ष्मी देवी तो नहीं है ॥ ८०-८१ ॥

नीलमेघान्तरगता द्योतयन्त्यचिरप्रभा। तथा योषिद्गणान् मध्ये रूपं प्रद्योतयद् वनम् ॥ ८२ ॥

'जैसे थोड़ी-थोड़ी देरमें चमकनेवाली बिजली नील मेघके भीतर रहकर अपना प्रकाश फैलाती है, उसी प्रकार यह स्त्रियोंके बीचमें रहकर अपने रूप और वनको प्रकाशित करती हुई यहाँ विचर रही है ॥ ८२ ॥

अतीव सुकुमाराङ्गी सुप्रभेन्दुनिभानना। दृष्ट्वा रूपमनिन्दाङ्ग्या विभ्रान्तो व्याकुलेन्द्रियः ॥ ८३ ॥

'इसके अङ्ग बड़े ही सुकुमार हैं, मुख चन्द्रमाके समान सुन्दर कान्तिसे उद्भासित हो रहा है। इस निर्दोष अङ्गोंवाली रमणीका रूप देखकर मैं पागल हो गया हूँ। मेरी सारी इन्द्रियाँ व्याकुल हो उठी हैं ॥ ८३ ॥

कामस्य वशमापन्नो मनो विह्वलतीव मे। भृशं कृन्तति मेऽङ्गानि सायकैः कुसुमायुधः। भित्त्वा हृदि शरान् पञ्च निर्दयं हन्ति मे मनः ॥ ८४ ॥

'मैं कामके अधीन हो गया हूँ। मेरा मन विह्वल-सा हो रहा है। पुष्पधन्वा कामदेव अपने सायकोंसे मेरे अङ्गोंको बड़े वेगसे छिन्न-भिन्न कर रहा है। मेरे हृदयमें अपने पाँचों बाणोंका प्रहार करके वह बड़ी निर्दयताके साथ उसे विदीर्ण कर रहा है ॥ ८४ ॥

हृदयाग्निर्वर्धयति आज्यसिक्त इवानलः। कथमद्य भवेत् कार्यं शमार्थं मन्मथाग्निना ॥ ८५ ॥ केनोपायेन किं कुर्मो भजेन्मां मत्तगामिनी।

'मेरे हृदयके भीतर कामाग्नि बढ़ रही है। वह घीकी आहुति पाकर बढ़ी हुई आगके समान प्रज्वलित हो उठी है। इस कामाग्निसे शान्ति पानेके लिये इस समय कैसे कौन-सा यत्न किया जाय ? अहो ! किस उपायसे हम क्या करें, जिससे यह मतवाली चालसे चलनेवाली रमणी मुझे अङ्गीकार कर ले' ॥ ८५ ॥

एवं बहु चिन्तयानो नोपलभ्य च दानवः ॥ ८६ ॥ सूतमाह मुहूर्त्तं तु तिष्ठस्व त्वमिहानघ। अहं यास्यामि तां द्रष्टुं कस्येयमिति योषितम् ॥ ८७ ॥

इस प्रकार बहुत सोचनेपर भी जब कोई उपाय नहीं सूझा, तब उस दानवने अपने सारथिसे कहा—'अनघ ! तुम दो घड़ी यहीं ठहरो, मैं स्वयं ही उसे देखने तथा यह किसकी स्त्री है, इस बातका पता लगानेके लिये जाता हूँ ॥ ८६-८७ ॥

प्रतीक्षमाणस्तिष्ठस्व यावदागमनं मम। श्रुत्वा तु वचनं तस्य तथास्त्विति वचोऽब्रवीत् ॥ ८८ ॥