भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 334

३१२ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

'जबतक मैं लौटकर न आऊँ, तबतक तुम यहीं मेरी प्रतीक्षा करते हुए खड़े रहो।' द्रुमिलकी यह बात सुनकर उसके सारथिने कहा, 'बहुत अच्छा ! ऐसा ही होगा'॥ ८८॥

एवमुक्त्वा दानवेन्द्रो गमनाय मनो दधे।
वार्युपस्पृश्य बलवान् ध्यानमेवान्वचिन्तयत् ॥ ८९ ॥

सारथिसे उपर्युक्त बात कहकर बलवान् दानवराज द्रुमिल-ने उसके पास जानेका विचार किया। फिर उसने जलसे आचमन किया और ध्यान लगाकर उसके विषयमें चिन्तन करने लगा ॥

मुहूर्तं ध्यानमात्रेण दृष्टं ज्ञानबलात् ततः।
उग्रसेनस्य पत्नीति ज्ञात्वा हर्षमुपागतः ॥ ९० ॥

दो घड़ीतक ध्यान करनेमात्रसे उसने ज्ञानबलसे देख लिया कि यह राजा उग्रसेनकी पत्नी है। यह जानकर उसे बड़ा हर्ष हुआ ॥ ९० ॥

उग्रसेनस्य रूपं वै कृत्वा स्वं परिवर्त्य सः।
उपासर्पन्महाबाहुः प्रहसन् दानवेश्वरः ॥ ९१ ॥
स्वयमानम्रय शनकैर्जग्राहामितवीर्यवान् ।
उग्रसेनस्य रूपेण मातरं ते व्यधर्षयत् ॥ ९२ ॥

फिर तो उसने अपना रूप बदलकर उग्रसेनका रूप धारण कर लिया। तत्पश्चात् वह अमितपराक्रमी महाबाहु दानवराज हँसता हुआ उसके पास गया, फिर धीरे-धीरे मुसकराते हुए ही उसने उसे अपनी भुजाओंमें कस लिया। इस प्रकार उग्रसेनके ही रूपसे उसने तुम्हारी माताका सतीत्व भङ्ग किया ॥ ९१-९२ ॥

सा पतिस्निग्धहृदया तं भावेनोपसर्पती।
शङ्किता चाभवत् पश्चात् तस्य गौरवदर्शनात् ॥ ९३ ॥

पतिके प्रति हृदयमें अत्यन्त स्नेह रखनेके कारण वह देवी बड़े प्रेमसे उसकी सेवामें उपस्थित हुई। पीछे उसके शरीरके भारीपनका अनुभव करके वह शङ्कित हो उठी ॥

सा तमाहोत्थिता भीता न त्वं मम पतिर्ध्रुवम् ।
कस्य त्वं विकृताचारो येनास्मि मलिनीकृता ॥ ९४ ॥

उठकर भयभीत हो उसने उससे कहा—'निश्चय ही तू मेरा पति नहीं है; अतः बता, तू किसका दुराचारी पुत्र है, जिसने मुझे कलङ्कित कर दिया ? ॥ ९४ ॥

एकभर्तृव्रतमिदं मम संदूषितं त्वया।
पत्युर्मे रूपमास्थाय नीच नीचेन कर्मणा ॥ ९५ ॥

'नीच ! तूने मेरे पतिका रूप धारण करके अपने नीच कर्मसे मेरे पातिव्रत्यको दूषित कर दिया ॥ ९५ ॥

किं मां वक्ष्यन्ति रुषिता बान्धवाः कुलपांसनीम् ।
जुगुप्सिता च वत्स्यामि पतिपक्षैर्निराकृता ॥ ९६ ॥

'अब रोषमें भरे हुए मेरे बन्धु-बान्धव मुझ कुल-कलङ्किनीको क्या कहेंगे ? मुझे पतिपक्षके लोगोंसे निन्दित और तिरस्कृत होकर रहना पड़ेगा ॥ ९६ ॥

धिक्त्वामीदृशमक्षान्तं दुष्कुलं व्युत्थितेन्द्रियम् ।
अविश्वास्यमनार्यं च परदाराभिमर्शनम् ॥ ९७॥

'तू ऐसा असहनशील, दूषित कुलमें उत्पन्न, अजितेन्द्रिय, अविश्वसनीय, अनार्य तथा परस्त्रीको कलङ्कित करनेवाला है, तुझे धिक्कार है' ॥ ९७ ॥

स तामाह प्रसञ्जन्तीं क्षिप्तः क्रोधेन दानवः।
अहं वै द्रुमिलो नाम सौभस्य पतिरूर्जितः ॥ ९८ ॥
किं मां क्षिपसि रोषेण मूढे पण्डितमानिनि ।
मानुषं पतिमाश्रित्य नीचं मृत्युवशे स्थितम् ॥ ९९ ॥

जब इस प्रकार धिक्कार देती हुई वह उससे उलझ पड़ी, तब उसके आक्षेप सुनकर उस दानवने क्रोधपूर्वक कहा—'मूढ़ नारी ! तू अपनेको बड़ी विदुषी मानती है ? अरी ! मैं सौभ विमानका अधिपति ओजस्वी दानव द्रुमिल हूँ, तू मृत्युके वशमें रहनेवाले तुच्छ मानव पतिका आश्रय लेकर रोषपूर्वक मेरे ऊपर आक्षेप क्यों करती है ? ॥ ९८-९९ ॥

व्यभिचारान्न दुष्यन्ति स्त्रियः श्रीमानगर्विते ।
न ह्यासां नियता बुद्धिर्मानुषीणां विशेषतः ॥१००॥

'स्त्रीके सम्मानपर गर्व करनेवाली नारी ! (देवताओं और दानवोंके साथ) विवशतापूर्वक व्यभिचार घटित होनेसे स्त्रियाँ दूषित नहीं होती हैं। इन स्त्रियोंकी विशेषतः मानवी स्त्रियोंकी बुद्धि निश्चल नहीं होती ॥ १०० ॥

श्रूयन्ते हि स्त्रियो बह्व्यो व्यभिचारव्यतिक्रमैः।
प्रसूता देवसंकाशान् पुत्रान् निश्चलविक्रमान् ॥१०१॥

'सुननेमें आता है कि बहुतेरी स्त्रियाँ व्यभिचाररूप दोष बन जानेपर भी अविचल पराक्रमी देवोपम पुत्रोंकी जननी हुई हैं ॥ १०१ ॥

अतीव हि त्वं स्त्रीलोके पतिधर्मवती सती।
शुद्धा केशान् विधुन्वन्ती भाषसे यद्यदिच्छसि ॥१०२॥

'स्त्री-जगत्में एक तू ही तो बड़ी पतिधर्म-परायणा और दूधकी धोयी हुई शुद्ध सती है, जो अपने केश-कलापोंको कम्पित करती हुई जो-जो चाहती है, बकती चली जा रही है ॥१०२॥

कस्य त्वमिति यच्चाहं त्वयोक्तो मत्तकाशिनि ।
कंसस्तस्माद् रिपुध्वंसी तव पुत्रो भविष्यति ॥१०३॥

'मतवाली स्त्री ! तुमने जो मुझसे यह पूछा है कि—'कस्य त्वम्—तू किसका पुत्र है' इससे तुम्हें कंस नामक शत्रुनाशक पुत्र प्राप्त होगा' ॥ १०३ ॥

सा सरोषा पुनर्भूत्वा निन्दन्ती तस्य तं वरम्।
उवाच व्यथिता देवी दानवं धृष्टवादिनम् ॥ १०४॥