विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 335, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] अष्टाविंशोऽध्यायः [ ३१३
यह सुनकर वह देवी पुनः रोषमें भरकर उसके उस वरकी निन्दा करने लगी और ढिठाईके साथ बात करनेवाले उस दानवसे व्यथित होकर बोली—॥ १०४॥
धिक् ते वृत्तं सुदुर्वृत्त यः सर्वा निन्दसि स्त्रियः।
सन्ति स्त्रियो नीचवृत्ताः सन्ति चैव पतिव्रताः ॥१०५॥
'दुराचारी दानव ! तेरे इस घृणित आचारको धिक्कार है, जो तू संसारकी सारी स्त्रियोंकी निन्दा कर रहा है। माना कि जगत्में नीच आचार-विचारवाली स्त्रियाँ भी हैं, परंतु पतिव्रताएँ भी कम नहीं हैं ॥ १०५ ॥
यास्त्वेकपत्न्यः श्रूयन्तेऽरुन्धतीप्रमुखाः स्त्रियः।
धृता याभिः प्रजाः सर्वा लोकाश्चैव कुलाधम ॥१०६॥
'कुलाधम ! अरुन्धती आदि जो पतिव्रता स्त्रियाँ सुनी जाती हैं, उनका स्मरण कर ! जिन्होंने समस्त प्रजाओं तथा सम्पूर्ण लोकोंको अपने सतीत्वके बलसे ही धारण किया है ॥ १०६ ॥
यस्त्वया मम पुत्रो वै दत्तो वृत्तविनाशनः।
न मे बहुमतस्त्वेवं शृणु चापि यदुच्यते ॥१०७॥
'तूने जो मुझे सदाचारनाशक पुत्र प्रदान किया है, इसके प्रति मेरे मनमे अधिक आदर नहीं है। इस विषयमें मैं जो कुछ कहती हूँ, उसे सुन ले ॥ १०७ ॥
उत्पत्स्यति पुमान् नीच पतिवंशे ममाद्य यः।
भविष्यति स ते मृत्युर्र्यश्च दत्तस्त्वया सुतः ॥१०८॥
'नीच ! अद्य मेरे पतिके कुलमें परमपुरुष परमेश्वर अवतार लेंगे, जो तेरी तथा तूने जो पुत्र दिया है, उसकी भी मृत्युके कारण होगे' ॥ १०८ ॥
द्रुमिलस्त्वेवमुक्तस्तु जगामाकाशमेव तु।
तेनैव रथमुख्येन दिव्येनाप्रतिगामिना ॥१०९॥
उसके ऐसा कहनेपर द्रुमिल उसी अनुपम गतिवाले दिव्य विमानद्वारा पुनः आकाशको ही चला गया ॥ १०९ ॥
जगाम च पुरीं दीना माता तदहरेव ते।
मामेवमुक्त्वा भगवान् नारदो मुनिसत्तमः ॥११०॥
दीप्यमानस्तपोवीर्यात् साक्षादग्निरिव ज्वलन्।
वल्लकीं वाद्यमानो हि सप्तस्वरविमूर्च्छिताम् ॥१११॥
गायनो लक्ष्यवीथीं स जगाम ब्रह्मणोऽन्तिकम्।
तुम्हारी माता अत्यन्त दीन होकर उसी दिन मथुरापुरीको चली गयीं ! महावत ! मुझसे इस प्रकार कहकर मुनिश्रेष्ठ भगवान् नारद अपने तपोबलसे प्रकाशित तथा साक्षात् अग्निके समान देदीप्यमान हो, सात स्वरोंकी मूर्च्छनाका विस्तार करनेवाली वीणा बजाते और गाते हुए लक्ष्यवीथी (अथवा अलक्ष्यवीथी) देवयान मार्गसे ब्रह्माजीके पास चले गये ॥ ११०-१११½ ॥
शृणुष्वेदं महामात्र निबोध वचनं मम ॥११२॥
तथ्यं चोक्तं नारदेन त्रैलोक्यज्ञेन धीमता।
महावत ! मेरी वह बात सुनो और समझो। तीनों लोकोंकी बातें जाननेवाले बुद्धिमान् नारदने सब कुछ ठीक ही कहा था ॥ ११२½ ॥
अलं बलेन वीर्येण नयेन विनयेन च ॥११३॥
प्रमाणैर्वापि वीर्येण तेजसा विक्रमेण च।
सत्येन चैव दानेन नान्योऽस्ति सदृशः पुमान् ॥११४॥
अधिक कहनेकी क्या आवश्यकता—बल, वीर्य, नय, विनय, प्रमाण, शक्ति, तेज, पराक्रम, सत्य और दानके द्वारा मेरी समानता करनेवाला दूसरा कोई पुरुष नहीं है॥११३-११४॥
विदित्वा सर्वमात्मानं वचनं श्रद्दधाम्यहम्।
क्षेत्रजोऽहं सुतस्तस्य उग्रसेनस्य हस्तिप ॥११५॥
महावत ! अपनेको सर्वथा इन गुणोंसे युक्त समझकर मै नारदजीकी बातपर श्रद्धा करता हूँ, इसमें संदेह नहीं कि मैं उग्रसेनका क्षेत्रज पुत्र ही हूँ ॥ ११५ ॥
मातापितृभ्यां संत्यक्तः स्थापितः स्वेन तेजसा।
उभाभ्यामपि विद्विष्टो बान्धवैश्च विशेषतः ॥११६॥
माता-पिताने तो मुझे त्याग ही दिया है। मैं अपने तेजसे ही इस सिंहासनपर बैठा हूँ। मेरे माता-पिता तथा विशेषतः सभी बन्धु-बान्धव मुझसे द्वेष रखते हैं ॥ ११६ ॥
एतानपि हनिष्यामि यादवान् कृष्णपक्षिणः।
तदिमौ घातयित्वा तु हस्तिना गोपकिल्बिषौ ॥११७॥
ये सभी यादव श्रीकृष्णके पक्षमें मिल गये हैं, अतः मैं इन दोनों गोपकुलकलंकोंको हाथीके द्वारा मरवाकर इन यादवोंका भी वध कर डालूँगा ॥ ११७ ॥
तद् गच्छ गजमारुह्य सांकुशप्रासतोमरः।
स्थिरो भव महामात्र समाजद्वारि मा चिरम् ॥११८॥
अतः महावत ! तुम जाओ ! कुवलयापीड़ हाथीपर आरूढ़ हो अंकुश, भाला और तोमर लिये रङ्गशालाके द्वारपर दृढ़तापूर्वक डट जाओ, विलम्ब न करो ॥ ११८ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि कंसवाक्येऽष्टाविंशोऽध्यायः॥ २८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें कंसका वाक्यविषयक अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २८ ॥