विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 336, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३१४ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
एकोनत्रिंशोऽध्यायः
नागरिकॉसे भरी रङ्गशालामें मञ्चों तथा प्रेक्षागृहोंकी शोभा, कंस तथा मल्लोंका आगमन, श्रीकृष्ण और बलरामका रङ्गद्वारपर पदार्पण, कुवलयापीड, महावत तथा हाथीके पादरक्षकोंका वध और दोनों बन्धुओंका रङ्गस्थलमें प्रवेश
वैशम्पायन उवाच
तस्मिन्नहनि निर्वृत्ते द्वितीये समुपस्थिते।
आपूर्यत महारङ्गः पौरैर्युद्धदिदृक्षुभिः॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! वह दिन समाप्त होकर जब दूसरा उपस्थित हुआ, तब युद्ध देखनेकी इच्छावाले पुरवासियोंसे वह महान् रङ्गस्थल भर गया॥ १ ॥
सचित्राष्टास्रिचरणाः सार्गलद्वारवेदिकाः।
सगवाक्षार्धचन्द्राश्च सुतल्पोत्तमभूषिताः॥ २ ॥
वहाँ जो मञ्च रखे गये थे, वे चित्रोंसे सुशोभित तथा आठ कोणवाले पायोंसे अलंकृत थे। जिन घरोंमें वे मञ्च थे, उनके द्वारोंपर वेदियाँ बनी थीं और कुण्डीके साथ किवाड़ें भी थीं। उनमें झरोखोंके रूपमें अर्धचन्द्राकार छिद्र रखे गये थे। वे मञ्च और मञ्चागार उत्तमोत्तम बिछौनोंसे विभूषित थे॥ २ ॥
प्राङ्मुखैश्चारुनिर्मुक्तैर्माल्यदामावतंसितैः।
अलंकृतैर्विराजद्भिः शारदैरिव तोयदः॥ ३ ॥
मञ्चागारैः सुनिर्यक्तैर्योद्धाय सुविभूषितैः।
समाजवाटः शुशुभे समेघौघ इवार्णवः॥ ४ ॥
उन मञ्चागारोंके द्वार पूर्वाभिमुख थे। वे सब-के-सब सुन्दर और खुले हुए थे (अथवा उनमें झीने सूतके मनोहर परदे लगे थे)। फूलोंकी मालाओं तथा मोती आदिकी लड़ियोंसे उन सबको सजाया गया था। वे शोभासम्पन्न एवं अलंकृत मञ्चागार शरद्-ऋतुके बादलोंके समान शोभा पाते थे। उनमें सुन्दर मल्ल आदि यथास्थान बैठे थे, जिन्हें युद्धके लिये भलीभाँति विभूषित किया गया था। उन सबके द्वारा वह समाजवाट या रङ्गस्थल मेघोंकी घटासे युक्त महासागरके समान शोभा पा रहा था॥ ३-४ ॥
स्वकर्मद्रव्ययुक्ताभिः पताकाभिर्निरन्तरम्।
श्रेणीनां च गणानां च मञ्चा भान्त्यचलोपमाः॥ ५ ॥
वहाँ एक ही शिल्पसे जीवननिर्वाह करनेवाले श्रेणी नामक कारीगरों तथा एक जातिके समुदायोंके लिये पृथक्-पृथक् मञ्च थे। उन मञ्चोंपर जो पताकाएँ निरन्तर फहराती रहती थीं, उनमें उन कारीगरोंके उपकरण-द्रव्यके चिह्न अङ्कित थे। उन पताकाओंसे वे मञ्च पर्वतोंके समान शोभा पाते थे॥ ५ ॥
अन्तःपुरचराणां च प्रेक्षागाराण्यनेकशः।
रेजुः काञ्चनचित्राणि रत्नज्वालाकुलानि च॥ ६ ॥
अन्तःपुरकी स्त्रियोंके लिये अनेक प्रेक्षागार सुशोभित हो रहे थे, जो सुवर्णसे चित्रित तथा रत्नोंकी प्रभासे व्याप्त थे॥ ६ ॥
तानि रत्नौघक्लृप्तानि ससानुप्रग्रहाणि च।
रेजुर्जवनिकाक्षेपैः सपक्षा इव खे नगाः॥ ७ ॥
रत्नराशिसे निर्मित उन प्रेक्षागारोंके ऊपरी भागमें पताकाएँ फहरा रही थीं और उनके निचले भागमें परदे पड़े हुए थे। इससे वे आकाशमें पंखयुक्त पर्वतके समान शोभा पाते थे॥ ७ ॥
तत्र चामरहारैश्च भूषणानां च सिञ्जितैः।
मणीनां च विचित्राणां विचित्राश्चेरुरर्चिषः॥ ८ ॥
उन प्रेक्षागारोंमें चामरों, हारों, झनकारते हुए भूषणों तथा विचित्र मणियोंकी चित्र-विचित्र प्रभाएँ सब ओर फैल रही थीं॥ ८ ॥
गणिकानां पृथङ्मञ्चाः शुभैरास्तरणाम्बरैः।
शोभिता वारमुख्याभिर्विमानप्रतिमौजसः॥ ९ ॥
गणिकाओंके लिये पृथक् मञ्च बने थे, जो सुन्दर बिछौनों और वस्त्रोंसे ढके हुए थे। वे सब-के-सब विमानके समान कान्तिमान् दिखायी देते थे और मुख्य-मुख्य वाराङ्गनाएँ उनकी शोभा बढ़ाती थीं॥ ९ ॥
तत्रासनानि ख्यातानि पर्यङ्काश्च हिरण्मयाः।
प्रकीर्णाश्च कुथाश्चित्राः सपुष्पस्तवकैर्वृताः॥ १० ॥
वहाँ विख्यात आसन, सोनेके पलंग तथा बिछे हुए विचित्र एवं पुष्पगुच्छोंसे युक्त कालीन सुशोभित थे॥ १० ॥
सौवर्णाः पानकुम्भाश्च पानभूम्यश्च शोभिताः।
फलावदंशपूर्णाश्च चाङ्गेर्यः पानयोजिताः॥ ११ ॥
वहाँ सोनेके घड़ोंमें पीनेके लिये जल रखे गये थे। जलपानके जो स्थान थे, उन्हें भी शोभासे सम्पन्न किया गया था। वहाँ फलके टुकड़ोंसे भरी हुई चँगेरियाँ (टोकरियाँ) रखी गयी थीं, जिन्हें जलपान या कलेवेके उपयोगके लिये वहाँ स्थापित किया गया था॥ ११ ॥
अन्ये च मञ्चा बहवः काष्ठसंचयबन्धनाः।
रेजुः प्रस्तरणास्तत्र शतशोऽथ सहस्रशः॥ १२ ॥