विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 337, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] एकोनत्रिंशोऽध्यायः ३१५ और भी बहुत-से मञ्च थे, जो लकड़ियोंके ढेरसे आवद्ध थे। उनपर भी अच्छे बिछावन डाले गये थे। इस तरहके सैकड़ों-हजारों मञ्च वहाँ शोभा पा रहे थे ॥१२॥ उत्तमागारिकाश्चैव सूक्ष्मजालावलोकिनः । स्त्रीणां प्रेक्षागृहा भान्ति राजहंसा इवाम्बरे ॥ १३ ॥ घरोंके ऊपर जो घर थे, उनमें स्त्रियोंके लिये प्रेक्षागृह बने थे। उनके दरवाजोंपर महीन जालीदार परदा पड़ा था, जिससे वहाँ बैठे हुए लोग बाहरकी सारी वस्तुएँ देख सकते थे। वे प्रेक्षाभवन आकाशमें राजहंसोंके समान सुशोभित हो रहे थे ॥ १३ ॥ प्राङ्मुखश्चारुनिर्मुको मेरुशृङ्गसमप्रभः । रुक्मपत्रनिभस्तम्भश्चित्रनिर्यूहशोभितः ॥ १४ ॥ प्रेक्षागारः स कंसस्य प्रचकाशेऽधिकं श्रिया । शोभितो माल्यदामैश्च निवासकृतलक्षणः ॥ १५ ॥ कंसके लिये जो प्रेक्षागार (दृश्य देखनेका स्थान ) बना था, वह अधिक शोभासे प्रकाशित हो रहा था। उसका दरवाजा पूर्वकी ओर था। उसपर मनोहर जालीदार पर्दा पड़ा था। वह भवन मेरुपर्वतके शिखरके समान सुनहरी प्रभासे उद्भासित होता था। उसके खम्भे स्वर्णपत्रसे जटिल होनेके कारण विशेष शोभासे सम्पन्न थे तथा वह भवन चारु चित्रोंके संनिवेशसे सुशोभित था। मालाओंकी लड़ियोंसे भी उसे सजाया गया था। राजाकी बैठक या निवास-स्थानके लिये जो आवश्यक लक्षण होने चाहिये, उन सबसे वह सम्पन्न था ॥ १४-१५ ॥ तस्मिन् नानाजनाकीर्णे जनौघप्रतिनादिते । समाजवाटे संस्तब्धे कम्पमानाणर्वप्रभे ॥ १६ ॥ राजा कुवलयापीडः समाजद्वारि कुञ्जरः । तिष्ठत्विति समाज्ञाप्य प्रेक्षागारमुपाययौ ॥ १७ ॥ नाना प्रकारके मनुष्योंसे भरा-पूरा और जनसमुदायके शब्दोंसे प्रतिध्वनित होता हुआ वह समाजवाट या रङ्गस्थल चञ्चल लहरोंवाले विक्षुब्ध महासागरके समान प्रतीत होता था। थोड़ी ही देरमें वहाँ सन्नाटा छा गया और 'कुवलया- पीड नामक हाथी रङ्गशालाके द्वारपर खड़ा रहे'—यह आज्ञा देता हुआ राजा कंस अपने प्रेक्षागारमें आ पहुँचा ॥१६-१७॥ स शुक्ले वाससी बिभ्रच्छुक्लव्यजनचामरः । शुशुभे श्वेतमुकुटः श्वेताभ्र इव चन्द्रमाः ॥ १८ ॥ उसने दो श्वेत वस्त्र धारण कर रखे थे। उसपर श्वेत चँवर और व्यजन डुलाये जा रहे थे तथा उसके मस्तकपर श्वेत मुकुट प्रकाशित होता था, अतः वह श्वेत बादलोंसे युक्त चन्द्रमाके समान शोभा पा रहा था ॥ १८ ॥ तस्य सिंहासनस्थस्य सुखासीनस्य धीमतः । रूपमप्रतिमं दृष्ट्वा पौराः प्रोचुर्जयाशिषः ॥ १९ ॥ जब वह सिंहासनपर सुखपूर्वक विराजमान हुआ, उस समय उस बुद्धिमान् नरेशके अनुपम रूपको देखकर समस्त पुरवासी उसकी 'जय' बोलते हुए उसे आशीर्वाद देने लगे ॥ ततः प्रविविशुर्मल्ला रङ्गमावलिताम्बराः । तिस्रश्च भागशः कक्षाः प्राविशन् बलशालिनः ॥ २० ॥ तदनन्तर मल्लोंने रङ्गभूमिमें प्रवेश किया। उनके कपड़े फहरा रहे थे। वे बलशाली मल्ल अलग-अलग तीन कक्षाओं- में प्रविष्ट हुए ॥ २० ॥ ततस्तूर्यनिनादेन क्ष्वेदितास्फोटितेन च । वसुदेवसुतौ दृष्टौ रङ्गद्वारमुपस्थितौ ॥ २१ ॥ तत्पश्चात् वाद्योंकी तुमुल ध्वनिके साथ मल्लोंके गर्जने और ताल ठोंकनेके शब्द सुनायी देने लगे। इसी समय हर्षमें भरे हुए दोनों वसुदेव-पुत्र रङ्गशालाके द्वारपर उपस्थित हुए ॥ २१ ॥ बल्लवौ वस्त्रसंवीतौ सुरचन्दनभूषितौ । ऊर्ध्वपीडौ स्रगापीडौ बाहुशस्त्रकृतौ यमौ ॥ २२ ॥ आस्फोटयन्तावन्योन्यं बाहू चैवार्गलोपमौ । वे दोनों बन्धु ग्वालवालोंके ही वेषमें थे। उनके अङ्ग सुन्दर वस्त्रोंसे आच्छादित एवं सुशोभित थे। वे दिव्य चन्दन (अङ्गराग) से विभूषित थे। सिरके ऊपर पुष्पमाला और गलेमें गजरे शोभा दे रहे थे। उन्होंने अपनी भुजाओंको ही आयुध बना रखा था। वे दोनों जुड़वें-से जान पड़ते थे और एक दूसरेकी अर्गलाके समान मोटी बाँहोंपर ताल ठोंक रहे थे ॥ २२ ॥ तावापतन्तौ त्वरितौ प्रतिषिद्धौ वराननौ । तेन मत्तेन नागेन चोद्यमानेन वै भृशम् ॥ २३ ॥ वे दोनों सुन्दर मुखवाले वीर बड़ी उतावलीके साथ रङ्गशालाकी ओर आ रहे थे, किंतु महावतके द्वारा अत्यन्त प्रेरित किये गये उस मतवाले गजराजने उन्हें सहसा रोक दिया ॥ २३ ॥ स मत्तहस्ती दुष्टात्मा कृत्वा कुण्डलिनं करम् । चकार चोदितो यत्नं निहन्तुं बलकेशवौ ॥ २४ ॥ वह मदमत्त हाथी बड़ा ही दुष्ट था। महावतके हाँकने- पर उसने अपनी सूँड़को सिकोड़कर श्रीकृष्ण और बलरामको मार डालनेका प्रयत्न किया ॥ २४ ॥ ततः प्रहसितः कृष्णस्त्रास्यमानो गजेन वै । कंसस्य तन्मतं चैव जगर्हे स दुरात्मनः ॥ २५ ॥ उस हाथीके त्रास देनेपर श्रीकृष्ण हँस पड़े और दुरात्मा कंसके उस मनसूबेकी निन्दा करने लगे ॥ २५ ॥