विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 338, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें३१६ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे
त्वरते खलु कंसोऽयं गन्तुं वैवस्वतक्षयम्।
यो मामनेन नागेन प्रधर्षयितुमिच्छति ॥ २६ ॥
वे बोले—'निश्चय ही जान पड़ता है कि यह कंस यमलोक-में जानेके लिये उतावला हो उठा है, इसीलिये इस हाथीके द्वारा वह मुझे कुचल देना चाहता है' ॥ २६ ॥
संनिकृष्टे ततो नागे गर्जमाने यथा घने।
सहसोत्पत्य गोविन्दश्चक्रे तालस्वनं प्रभुः ॥ २७ ॥
तदनन्तर मेघके समान गम्भीर गर्जना करता हुआ वह हाथी जब बहुत निकट आ गया, तब भगवान् गोविन्द सहसा उछलकर ताली पीटने लगे ॥ २७ ॥
क्ष्वेडितास्फोटितरवं कृत्वा नागस्य चाग्रतः।
करं ससीकरं तस्य प्रतिजग्राह वक्षसा ॥ २८ ॥
हाथीके सामने ही गर्जने और ताल ठोंकनेकी आवाज करके उन्होंने जलके फुहारे छोड़नेवाली उसकी सूँड़को अपनी छातीपर दबा लिया ॥ २८ ॥
विषाणान्तरगो भूत्वा पुनश्चरणमध्यगः।
बबाधे तं गजं कृष्णः पवनस्तोयदं यथा ॥ २९ ॥
फिर श्रीकृष्ण उसके दोनों दाँतोंके बीचसे होकर पैरोंके मध्यभागमें आ गये और जैसे हवा बादलोंको इधर-उधर उड़ाती रहती है, उसी प्रकार वे उस हाथीको सताने और व्याकुल करने लगे ॥ २९ ॥
स हस्ताग्राद् विनिष्क्रान्तो विषाणाग्राच्च दन्तिनः।
विमुक्तः पदमध्याच्च कृष्णो द्विपमपोधयत् ॥३०॥
वे उस हाथीकी सूँड़के अग्रभागसे निकलकर, दाँतोंके भी अग्रभागसे बचकर तथा पैरोंके भी बीचसे छूटकर बाहर आ गये। फिर श्रीकृष्णने उस हाथीको पीछेसे ऊँचाईकी ओर खींचकर घसीटना आरम्भ किया ॥ ३० ॥
सोऽतिकायस्तु संमूढो हन्तुं कृष्णमशक्नुवन् ।
गजः स्वेष्वेव गात्रेषु मथ्यमानो ररास ह ॥३१॥
वह विशालकाय हाथी व्याकुल हो उठा और श्रीकृष्णको मारनेमें असफल हो अपने ही अङ्गोंमें मथित होता हुआ जोर-जोरसे चिग्घाड़ने लगा ॥ ३१ ॥
पपात भूमौ जानुभ्यां दशनाभ्यां तुतोद च।
मदं सुस्राव रोषाच्च घर्मापाये यथा घनः ॥ ३२ ॥
फिर तो वह दोनों घुटनोंके बल गिर पड़ा, दोनों दाँत भूमिसे टकरा जड़से हिल गये, जिससे उसको बड़ी व्यथा हुई। वह रोषसे मदकी धारा बहाने लगा, मानो पावसमें मेघ पानी बरसा रहा हो ॥ ३२ ॥
कृष्णस्तु तेन नागेन क्रीडित्वा शिशुलीलया।
निधनाय मतिं चक्रे कंसद्विष्टेन चेतसा ॥ ३३ ॥
श्रीकृष्णने उस हाथीके साथ बालकोंके समान खिलवाड़ करके कंसके प्रति मनमें द्वेष लेकर कुवलयापीडको मार डालने का विचार किया ॥ ३३ ॥
स तस्य प्रमुखे पादं कृत्वा कुम्भादनन्तरम्।
दोर्भ्यां विषाणमुत्पाट्य तेनैव प्राहरत् तदा ॥ ३४ ॥
उन्होंने उसके ललाटमें कुम्भस्थलसे नीचे पैर लगाकर दोनों हाथोंसे एक दाँत उखाड़ लिया और उस समय उसीसे उसको पीटना आरम्भ किया ॥ ३४ ॥
स तेन वज्रकल्पेन स्वेन दन्तेन कुञ्जरः।
हन्यमानः शकृन्मूत्रं सुमोचार्तो ररास ह ॥ ३५॥
उस वज्रतुल्य दाँतसे पीटा जाता हुआ वह हाथी मल-मूत्र त्यागने और आर्तभावसे चीत्कार करने लगा ॥ ३५ ॥
कृष्णजर्जरिताङ्गस्य कुञ्जरस्यार्तचेतसः।
कटाभ्यामति सुस्राव वेगवद् भूरि शोणितम् ॥ ३६ ॥
श्रीकृष्णने जिसके अङ्गोंको पीट-पीटकर जर्जर बना दिया था, उस आर्तचित्त हाथीके दोनों गालोंसे वेगपूर्वक भूरि-भूरि रक्तकी धारा बहने लगी ॥ ३६ ॥
लाङ्गूलं चास्य वेगेन निष्प्रकर्ष हलायुधः।
शैलपृष्ठार्धसंलीने वैनतेय इवोरगम् ॥ ३७ ॥
इधर बलरामजी उसकी पूँछ पकड़कर बड़े वेगसे खींचने लगे, मानो शिलापृष्ठमें आधे शरीरसे छिपे हुए किसी सर्पको गरुड़ खींच रहे हों ॥ ३७ ॥
तेनैव गजदन्तेन कृष्णो हत्वा तु दन्तिनम्।
जघानैकप्रहारेण गजारोहणमुल्बणम् ॥ ३८ ॥
हाथीको मारकर श्रीकृष्णने उसके उसी दाँतसे एक प्रहार करके मतवाले महावतको भी मौतके मुखमें डाल दिया ॥ ३८ ॥
सोऽऽर्तनादं महत् कृत्वा विदन्तो दन्तिनां वरः।
पपात सहमामात्रो वज्रभिन्न इवाचलः ॥ ३९ ॥
तदनन्तर दाँतवाले हाथियोंमें श्रेष्ठ वह कुवलयापीड दन्तहीन हो महान् आर्तनाद करके वज्रसे विदीर्ण हुए पर्वतके समान महावतसहित गिर पड़ा ॥ ३९ ॥
ततस्तौ तोरणाङ्गानि प्रगृह्य रणकर्कशौ।
गजस्य पादरक्षांश्च जघ्नतुः पुरुषर्षभौ ॥ ४० ॥
फिर उन दोनों पुरुषप्रवर रणकर्कश वीरोंने फाटकके खम्भे आदि लेकर हाथीके पादरक्षकोंको भी मार डाला ॥४०॥
तांश्च हत्वा विविशतुर्मध्यं रङ्गस्य तावुभौ।
नासत्यावश्विनौ स्वर्गादवतीर्णाविवેચ્છया ॥ ४१ ॥
उन सबका संहार करके वे दोनों भाई रङ्गस्थलमें प्रविष्ट हुए, मानो दोनों अश्विनीकुमार इच्छानुसार स्वर्गसे भूतलपर उतर आये हों ॥ ४१ ॥