भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 339

विष्णुपर्व ] त्रिंशोऽध्यायः ३१७ वृष्ण्यन्धकाश्च भोजाश्च ददृशुर्वनमालिनौ । पौराणामनुरागं च हर्षं चालक्ष्य भारत ॥ ४३ ॥ क्ष्वेडितोत्कृष्टनादेन बाहोरास्फोटितेन च । भारत ! व्यर्थ बुद्धिवाला भोजराज कंस उन दोनों सिंहनादैश्च तालैश्च हर्षयामासुतूर्जनम् ॥ ४२ ॥ भाइयोंको उपस्थित देख, उनके प्रति पुरवासियोंके अनुराग उस समय वृष्णि, अन्धक तथा भोजकुलके यादवोंने और हर्षको लक्ष्य करके विषादमें डूब गया ॥ ४३ ॥ वनमालाधारी श्रीकृष्ण-बलरामको देखा । उन दोनों वीरोंने तं हत्वा पुण्डरीकाक्षो नदन्तं दन्तिनां वरम् । गर्जने, किलकारने, भुजाओंपर ताल ठोकने, सिंहोंके समान अवतीर्णोऽर्णवाकारं समाजं सहपूर्वजः ॥ ४४ ॥ दहाड़ने और ताली पीटने आदिके द्वारा वहाँके जनसमुदायको इस प्रकार कमलनयन श्रीकृष्णने गरजते हुए गजश्रेष्ठ हर्षसे उत्फुल्ल कर दिया ॥ ४२ ॥ कुवलयापीडको मारकर अपने पूर्वज बलरामजीके साथ तौ दृष्ट्वा भोजराजस्तु विषसाद वृथामतिः । उस समुद्रके समान विशाल जनसमुदायमें प्रवेश किया ॥ इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि कुवलयापीडवधे एकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥ २९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें कुवलयापीड हाथीका वधविषयक उन्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २९ ॥ त्रिंशोऽध्यायः रङ्गशालामें मल्लयुद्धके विषयमें श्रीकृष्णके विचार, श्रीकृष्ण और बलदेवके द्वारा चाणूर और मुष्टिक आदिका वध, कंसका संहार तथा पिता-माताके चरणोंमें प्रणाम करके दोनों भाइयोंका उनके घरमें जाना वैशम्पायन उवाच भुजासक्तेन शुशुभे गजदन्तेन केशवः । प्रविशन्तं तु वेगेन मारुतावलिताम्बरम् । चन्द्रार्धविम्बसंसक्तो यथैकशिखरो गिरिः ॥ ५ ॥ पूर्वजं पुरतः कृत्वा कृष्णं कमललोचनम् ॥ १ ॥ अपने हाथमें सटे हुए उस गजदन्तसे सुशोभित होने- गजदन्तकृतोल्लेखं सुभुजं देवकीसुतम् । वाले श्रीकृष्ण अर्धचन्द्रके विम्बसे संयुक्त हुए एक शिखर- लीलाकृताङ्गदं वीरं मदेन रुधिरेण च ॥ २ ॥ वाले पर्वतके समान जान पड़ते थे ॥ ५ ॥ वल्गमानं यथा सिंहं व्यूहमानं यथा घनम् । वल्गामाने तु गोविन्दे स कृत्स्नो रङ्गसागरः । बाहुशब्दप्रहारेण चालयन्तं वसुंधराम् ॥ ३ ॥ जनौघप्रतिनादेन पूर्यमाण इवावभौ ॥ ६ ॥ औग्रसेनिः समालोक्य दन्तिदन्तोद्यतायुधम् । श्रीकृष्णके उछलते-कूदते आते ही वह समुद्र-जैसा सम्पूर्ण कृष्णं भृशायस्तमुखः सरोषं समुदैक्षत ॥ ४ ॥ रंगस्थल जनसमुदायके हर्षनादसे परिपूर्ण हुआ-सा प्रतीत होने वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! कमलनयन लगा ॥ ६ ॥ श्रीकृष्ण अपने बड़े भाई बलरामको आगे करके बड़े वेगसे ततः क्रोधाभिताम्राक्षः कंसः परमकोपनः । रंगशालामें घुसे थे। उस समय उनके वस्त्र हवाके झोंकेसे चाणूरमादिशद् युद्धे कृष्णस्य सुमहाबलम् ॥ ७ ॥ फहरा उठे थे। हाथीका दाँत उनकी पहचान करानेवाला अन्ध्रं मल्लं च निकृतिं मुष्टिकं च महाबलम् । चिह्न या उपलक्षण बन गया था। उनकी भुजाएँ बड़ी सुन्दर बलदेवाय संक्रोधो दिदेशाद्रिच्योपमम् ॥ ८ ॥ थीं। देवकीनन्दन वीर श्रीकृष्णकी बाहोंमे हाथीके मद और तदनन्तर क्रोधसे लाल आँखें किये परम क्रोधी कंसने रुधिर इस तरह लिपटे थे कि उनमें लीलापूर्वक अङ्गद (बाजू- महाबली अन्ध्र मल्ल चाणूरको जो कपटयुद्ध करनेवाला था, बंद) की रचना हो गयी थी। वे सिंहकी तरह उछलते तथा श्रीकृष्णके साथ लड़नेका आदेश दिया और जिसका शरीर कंसवधकी युक्ति सोचते हुए आकाशमें बादलकी भाँति रंग- प्रस्तरसमूहके समान सुदृढ़ था, उस कपटी महाबली मुष्टिक- शालामें विचर रहे, थे। भुजाओपर ताल ठोककर जब वे को रोषमें भरे हुए कंसने बलदेवके साथ जूझनेकी उसकी ध्वनि फैलाते थे, तब पृथ्वीको भी हिला देते थे। उन्हे आज्ञा दी ॥ ७-८ ॥ हाथीके दाँतको ही आयुध रूपसे हाथमें लिये देख उग्रसेन- कंसेनापि समाजस्थाश्चाणूरः पूर्वमेव तु । कुमार कंस अत्यन्त मलिन हो गया और वह बड़े रोषमें योद्धव्यं सह कृष्णेन त्वया यत्नवतेति वै ॥ ९ ॥ भरकर उनकी ओर देखने लगा ॥ १-४ ॥