विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 340, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें३१८ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे कंसने चाणूरको तो पहलेसे ही यह आज्ञा दे रखी थी, कि तुम्हें श्रीकृष्णके साथ यत्नपूर्वक युद्ध करना चाहिये ॥९॥ स रोषेण तु चाणूरः कषायीकृतलोचनः । अभ्यावर्तत युद्धार्थमपां पूर्णो यथा घनः ॥ १० ॥ अतः रोषसे लाल आँखें किये चाणूर युद्ध करनेके लिये श्रीकृष्णके निकट आया। उस समय वह जलसे भरे-पूरे मेघके समान जान पड़ता था ॥ १० ॥ अवघुष्टे समाजे तु निश्शब्दस्तिमिते जने । यादवाः सहितास्तत्र इदं वचनमब्रुवन् ॥ ११ ॥ राजाकी ओरसे शान्त रहनेकी घोषणा होते ही वहाँ- का सारा जनसमुदाय नीरव तथा निश्चल हो गया, तब वहाँ एक साथ बैठे हुए यादव इस प्रकार कहने लगे - ॥११॥ बाहुयुद्धमिदं रंगे सप्राश्निकमकातरम् । क्रियावलसमाज्ञातमशस्त्रं निर्मितं पुरा ॥ १२ ॥ 'पूर्वकालमें विधाताने मल्लयुद्धके विषयमें यह नियम बनाया था कि यह युद्ध रङ्गस्थलके अखाड़ेमें केवल भुजाओं द्वारा हो । इसमें किसी प्रकारके अस्त्र-शस्त्रका प्रयोग न किया जाय। इसमे (दो व्यक्तियोंका जोड़ निश्चित करनेके लिये ) कोई-न-कोई परीक्षक रहना चाहिये। इसमें कायर या डरपोकको सम्मिलित नहीं करना चाहिये। इसमें क्रिया ( दाँव-पेंच आदि ) और बल (शारीरिक शक्ति ) के द्वारा ही विपक्षीको परास्त करनेकी आज्ञा दी गयी है ॥ अद्भिश्चातिश्रमो नित्यं विनेयः कालदर्शिभिः । करीषेण च मल्लस्य सततं सक्रिया स्मृता ॥ १३ ॥ 'समयोचित कर्तव्यको देखने और समझनेवाले पुरुषोंको उचित है कि वे सदा योद्धाओंके लिये जल प्रस्तुत करके उनकी भारी थकावट दूर करें और गोबरका चूर्ण सुलभ करके पहलवानका सदा सत्कार करना चाहिये ॥ १३ ॥ स्थितो भूमिगतेनैव यो यथा मार्गतः स्थितः । संयुज्यतश्च पर्यायः प्राश्निकैः समुदाहृतः ॥ १४ ॥ 'युद्धपरीक्षकोंने यह बताया है कि जो जिस मार्ग (दाँव-पेंच) से लड़े, उसके साथ उसीके अनुरूप दाँव लगाकर भूमिपर खड़े हुएके साथ खड़ा होकर ही लड़ना चाहिये और एक-एक योद्धाको क्रमशः एक-एकके साथ ही लड़ाना चाहिये॥ १४ ॥ बालो वा यदि वा वृद्धो मध्यो वापि कृशोऽपि वा । बलस्थो वा स्थितो रंगे ज्ञेयः कक्षान्तरेण वै ॥१५॥ 'कोई बालक हो, वृद्ध हो, मध्य अवस्थाका हो, दुर्बल हो, अथवा बलवान् हो, वह यदि अखाड़ेमें उतरे तो उसके जोड़का विचार उसीकी कक्षाके लोगोंमेंसे ही करना चाहिये ॥ १५ ॥ वलतश्च क्रियातश्च बाहुयुद्धविधिर्भुवि । • निपातानन्तरं किंचिन्न कर्तव्यं विजानता ॥ १६ ॥ 'शारीरिक बल और क्रिया ( दाँव-पेंच ) से ही बाहुयुद्ध करनेका विधान है। विज्ञ पुरुषको चाहिये कि प्रतिद्वन्द्वीको गिरा देनेके बाद उसके साथ और कुछ न करे ॥ १६ ॥ तदिदं प्रस्तुतं रंगे युद्धं कृष्णान्ध्रमल्लयोः । बालः कृष्णो महानन्ध्रः कथं न स्याद् विचारणा ॥ १७ ॥ 'इस समय रंगस्थलमे श्रीकृष्ण और अन्ध्र मल्ल चाणूर- का युद्ध प्रस्तुत है, परंतु इनमें श्रीकृष्ण तो अभी बालक हैं और यह चाणूर विशालकाय पहलवान है, इस विषमतापर विचार क्यों नहीं किया जाता ?' ॥ १७ ॥ ततः किलकिलाशब्दः समाजे समजायत । प्रावल्गत च गोविन्दो वाक्यं चेदमुवाच ह ॥ १८ ॥ यह सुनकर उस जनसमाजमे कोलाहल मच गया। तब भगवान् श्रीकृष्ण उछल पड़े और इस प्रकार बोले- ॥१८॥ अहं बालो महानन्ध्रो वपुषा पर्वतोपमः । युद्धं ममानेन सह रोचते बाहुशालिना ॥ १९ ॥ 'मैं बालक हूँ और यह महामल्ल अन्ध्र शरीरसे पर्वत- जैसा दिखायी देता है, तथापि इस बाहुशाली वीरके साथ मेरा युद्ध हो, यह मुझे पसंद है ॥ १९ ॥ युद्धव्यतिक्रमः कश्चिन्न भविष्यति मत्कृतः । न ह्यहं बाहुयोधानां दूषयिष्यामि यन्मतम् ॥ २० ॥ 'मेरी ओरसे युद्धसम्बन्धी नियमका कोई उल्लङ्घन नहीं होगा। बाहुयुद्ध करनेवाले योद्धाओंका जो मत है, उसे मैं कलंकित नहीं करूँगा ॥ २० ॥ योऽयं करीषधर्मश्च तोयधर्मश्च रंगजः । कषायस्य च संसर्गः समयो ह्येष कल्पितः ॥ २१ ॥ 'गोवरके चूर्णको उबटनके समान शरीरमें मलना, जल- से धोना और गेरूके रंगका लेपन करना रंगस्थल (अखाड़ेमें. उतरनेवालों) का धर्म है, यह मह्लोंका बनाया हुआ आचार है ॥ २१ ॥ संयमः स्थिरता शौर्यं व्यायामः सक्रिया बलम् । रंगे च नियता सिद्धिरेतद् युद्धविदां मतम् ॥२२॥ 'संयम ( एक दूसरेको पीछे हटाना ), स्थिरता ( अपने स्थानसे न हटना ), शौर्य, व्यायाम ( स्थिर रहते हुए भी हाथ-पैर चलाना ), सक्रिया ( सद् बर्ताव - मर्मस्थानोंमें चोट न पहुँचाना), असद् व्यवहारसे बचते हुए भी अधिक-से-अधिक बल प्रकट करना, इन छः साधनोंके द्वारा रङ्गभूमिमे विजय- रूप सिद्धिका प्राप्त होना निश्चित है; यह मल्लयुद्धके विद्वानों- का मत है ॥ २२ ॥