भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 341, कुल 1169 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 341

[ विष्णुपर्व ] त्रिंशोऽध्यायः ३१९


अवैरेमेवं यदयं सवैरं कर्तुमुद्यतः।
अत्र वै निग्रहः कार्यस्तोपयिष्याम्यहं जगत् ॥ २३ ॥

‘यह (चाणूर अथवा कंस) इस वैररहित युद्धको भी वैरयुक्त कर देनेपर तुला हुआ है, अतः यहाँ इसका निग्रह करना आवश्यक है, ऐसा करके मैं सम्पूर्ण जगत्‌को संतुष्ट करूँगा ॥ २३॥

करूषेषु प्रसूतोऽयं चाणूरो नाम नामतः।
बाहुयोधी शरीरेण कर्मभिश्चात्र चिन्त्यताम् ॥ २४ ॥

‘यह चाणूर नामक बाहुयोधी मल्ल करूष देशमें उत्पन्न हुआ है। इसके शरीर और कर्मसे जो घटनाएँ घटित हुई हैं, उनपर भी आपलोग विचार कर लें ॥ २४ ॥

एतेन बहवो मल्ला निपातानन्तरं हताः।
रङ्गप्रतापकामेन मल्लमार्गश्च दूषितः ॥ २५ ॥

‘इसने रंगभूमिमें अपना प्रताप प्रकट करने या दबदबा जमानेकी इच्छासे बहुतेरे पहलवानोंको भूमिपर गिरानेके बाद मार डाला और इस प्रकार मल्ल-मार्गको कलंकित किया है ॥ २५॥

शस्त्रसिद्धिस्तु योधानां संग्रामे शस्त्रयोधिनाम्।
रङ्गसिद्धिस्तु मल्लानां प्रतिमल्लनिपातजा ॥ २६ ॥

‘शस्त्रद्वारा युद्ध करनेवाले योद्धाओंके लिये संग्राममें शत्रुको विदीर्ण कर देना ही सिद्धि है, परंतु मल्लोंकी प्रतिद्वन्द्वी मल्लको गिरा देनेमात्रसे ही रंगस्थलमे विजयरूप सिद्धि प्राप्त हो जाती है ॥ २६ ॥

रणे विजयमानस्य कीर्तिर्भवति शाश्वती।
हतस्यापि रणे शस्त्रैर्नाकपृष्ठं विधीयते ॥ २७ ॥

‘शस्त्रयुद्धमे विजय पानेवालेको अक्षय कीर्ति प्राप्त होती है। यदि वह रणक्षेत्रमे शस्त्रोंद्वारा मारा गया तो भी उसे स्वर्गलोककी प्राप्ति होती है ॥ २७ ॥

रणे ह्युभयतः सिद्धिर्हतस्येह मृतोऽपि वा।
सा हि प्राणान्तिकी यात्रा महद्भिः साधुपूजिता ॥ २८ ॥

‘शस्त्रयुद्धमें मारे जानेवालेकी तथा मारनेवाले दोनोंकी ही सिद्धि प्राप्त होती है, क्योंकि वह प्राणान्तक यात्रा है, जिसकी महान् पुरुषोंने भलीभाँति पूजा (प्रशंसा) की है ॥ २८ ॥

अयं तु मार्गो बलतः क्रियातश्च विनिःसृतः।
मृतस्य रङ्गे क्व स्वर्गो जयतो वा कुतो रतिः ॥ २९ ॥

‘परंतु यह मल्ल-युद्धका मार्ग शारीरिक बल और दाँव-पेंचके कौशलसे प्रकट हुआ है। अखाड़ेमे मरनेवालेको कहाँ स्वर्ग मिलता है ? अथवा जीतनेवालेको कहाँका सुख प्राप्त होता है ? ॥ २९ ॥

ये तु केचित् स्वदोषेण राज्ञः पण्डितमानिनः।
प्रतापार्थे हता मल्ला मल्लहन्तुर्वधो हि सः ॥ ३० ॥

‘किसी पण्डितमानी राजाका प्रताप बढ़ानेके लिये जो कोई भी मल्ल किसी पहलवानके द्वारा अपने अपराधसे मारे गये हैं, वहाँ उस मल्ल-हत्यारेको हत्याजनित पाप ही लगता है'॥ ३०॥

एवं संजल्पतस्तस्य ताभ्यां युद्धं सुदारुणम्।
उभाभ्यामभवद् घोरं वारणाभ्यां यथा वने ॥ ३१ ॥

जब श्रीकृष्ण ऐसा कह रहे थे, उसी समय उनमें और चाणूरमें—दोनोंमें ही अत्यन्त दारुण एवं भयानक युद्ध होने लगा, जैसे वनमें दो हाथी लड़ पड़ें ॥ ३१ ॥

कृतप्रतिकृतैश्चित्रैर्बाहुभिश्च सकण्ठकैः।
सन्निपातादवधूतैश्च प्रमाथोन्मंथनैस्तथा ॥ ३२ ॥

उनमेसे जब एक-दूसरेका कोई अङ्ग जोरसे दबाता, तब दूसरा तुरंत उसका प्रतीकार करता—उस अङ्गको उसकी पकड़से छुड़ा लेता था। दोनों एक-दूसरेके हाथोंको मुष्टीसे पकड़कर विवश कर देते और विचित्र ढंगसे परस्पर प्रहार करते थे। दोनों ही एक-दूसरेको अपनी भुजाओंमे बाँधकर रोक लेते, कभी दोनों आपसमें गुँथ जाते और फिर, धक्के देकर दूर हटा देते थे। कभी एक दूसरेको जमीनपर पटककर रगड़ता तो दूसरा नीचेसे ही कुलँचकर ऊपरवालेको दूर फेंक देता, या लिये-दिये खड़ा हो अपने शरीरसे दबाकर उसके अङ्गोंको भी मथ डालता था ॥ ३२ ॥

तावुभावपि संश्लिष्टौ यथा शैलमयौ तथा।
क्षेपणैर्मुष्टिभिश्चैव वराहोद्धर्तनैःस्वनैः ॥ ३३ ॥

वे दोनों ही एक-दूसरेसे सटकर ऐसे जान पड़ते थे, मानो दो पर्वत परस्पर भिड़ गये हों। कभी दोनों दोनोंको बलपूर्वक पीछे हटाते और मुक्कोसे एक-दूसरेकी छातीपर चोट करते थे, कभी एकको दूसरा अपने कंधेपर उठा लेता और उसका मुँह नीचे कर घुमाकर पटक देता था, जिससे ऐसा शब्द होता, मानो किसी शूकरने चोट की हो ॥ ३३ ॥

कीलैर्वज्रनिपातैश्च प्रसृष्टाभिस्तथैव च।
शलाकानखपातैश्च पादोद्धूतैश्च दारुणैः ॥ ३४ ॥


१. प्रमाथ तथा उन्मथन आदि मल्ल-युद्धके दाँव-पेंचोंके नाम हैं। मल्ल-शास्त्रके अनुसार इनके लक्षण नीचे दिये जाते हैं। इनका भाव मूलश्लोकके अनुवादमें आ गया है—
निपात्य पेषणं भूमौ प्रमाथ इति कथ्यते।
यत् त्वायाताङ्गमथनं तदुन्मथनमुच्यते ॥
२. क्षेपणं कथ्यते यत् तु स्थानात् प्रच्यावनं हठात् ॥
३. उभयोर्भुजयोर्मुष्टिरुरोमध्ये निपात्यते ।
मुष्टिरित्युच्यते तज्ज्ञैर्मल्लविद्याविशारदैः ॥
४. अवाङ्मुखं स्कन्धगतं भ्रामयित्वा तदैव यः।
क्षिप्तस्य शब्दः स भवेद् वराहोद्धूतिःस्वनः ॥
५. अङ्गुल्यः प्रसृतायास्तु ताः प्रसृष्टा उदीरिताः ॥