विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 342, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३२० | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
कभी वे दोनों योद्धा एक-दूसरेके शरीरपर कोहनियों और घुटनोंसे चोट करते थे, कभी हाथकी अँगुलियोंको फैलाकर एक दूसरेको पीटते थे, कभी आपसमें पंजे लड़ाते थे, कभी रोषपूर्वक अँगुलियोंके नखोंसे बकोट लेते थे, कभी पैरोंमें उलझाकर दोनों दोनोंको गिरा देते। इस प्रकार भयंकर दाँव-पेंचका प्रयोग करते थे॥ ३४॥
जानुभिश्वाश्मनिर्घोषैः शिरोभ्यां चावघट्टितैः।
तद् युद्धमभवद् घोरमशस्त्रं बाहुतेजसा॥ ३५॥
बलप्राणेन शूराणां समाजोत्सवसंनिधौ।
अरज्यत जनः सर्वः सोत्कृष्टनिनदोत्थितः॥ ३६॥
कभी घुटनों और सिरसे टक्कर मारते थे, जिससे पत्थरोंके टकरानेके समान शब्द होता था। जनसमुदायके समक्ष किये जानेवाले उस उत्सवमें शूरवीरोंके निकट उन दोनोंमें केवल बाहुबल, शारीरिक बल तथा प्राणबलसे किसी अस्त्र-शस्त्रके बिना ही बड़ा भयंकर युद्ध हुआ। उस युद्धके रंगमें सब लोग रँग गये। सभी दर्शक विजेताका उत्साह बढ़ानेके लिये जोर-जोरसे हर्षनाद कर उठते थे॥ ३५-३६॥
साधुवादांश्च मञ्चेषु घोषयन्त्यपरे जनाः।
ततः प्रस्विन्नवदनः कृष्णप्रणिहितेक्षणः।
न्यवारयत् तूर्याणि कंसः सव्येन पाणिना॥ ३७॥
दूसरे लोग मञ्चोंपर बैठे-बैठे ही 'साधु-साधु' (बहुत अच्छा, बहुत अच्छा) की घोषणा करते थे। यह सब देख-सुनकर कंसके वदनसे पसीना छूटने लगा। उसकी आँखें श्रीकृष्णकी ओर ही लगी थीं। उसने बायें हाथसे संकेत करके बाजे बंद करा दिये॥ ३७॥
प्रतिषिद्धेषु तूर्येषु मृदङ्गादिषु तेषु वै।
खे संगतान्यवाद्यन्त देवतूर्याण्यनेकणः॥ ३८॥
कंसने जब मृदङ्ग आदि वाद्योंका बजाना रोक दिया, तब आकाशमें देवताओंके अनेक प्रकारके वाद्य स्वतः एक साथ बज उठे॥ ३८॥
युद्ध्यमाने हृषीकेशे पुण्डरीकनिभेक्षणे।
स्वयमेव प्रवाद्यन्त तूर्यघोषास्तु सर्वशः॥ ३९॥
कमलनयन श्रीकृष्णके युद्ध करते समय सब प्रकारके वाद्य स्वयं ही बजने लगे और उनकी ध्वनि सब ओर छा गयी॥
अन्तर्धानगता देवा विमानैः कामरूपिभिः।
चेरुर्विद्याधरैः सार्द्धं कृष्णस्य जयकाङ्क्षिणः॥ ४०॥
देवता अदृश्य होकर श्रीकृष्णकी विजय चाहते हुए अपने कामरूपी विमानोंद्वारा विद्याधरगणोंके साथ वहाँ आकाशमें विचर रहे थे॥ ४०॥
जयस्व कृष्ण चाणूरं दानवं मल्लरूपिणम्।
इति सप्तर्षयः सर्वे ऊचुश्चैव नभोगताः॥ ४१॥
समस्त सप्तर्षि यहाँके आकाशमें स्थित हो कहने लगे— 'श्रीकृष्ण! तुम्हें इस मल्लरूपधारी दानव चाणूरपर विजय प्राप्त हो'॥ ४१॥
चाणूरेण चिरं कालं क्रीडित्वा देवकीसुतः।
बलमाहारयामास कंसस्याभावदर्शिवान्॥ ४२॥
कंसकी मृत्युको समीप देखनेवाले देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने चाणूरके साथ चिरकालतक युद्धकी लीला करके अपनेमें अनन्त बलका समावेश किया॥ ४२॥
ततश्चचाल वसुधा मञ्चाश्चैव जुघूर्णरे।
मुकुटाच्चापि कंसस्य पपात मणिरुत्तमः॥ ४३॥
फिर तो धरती डोलने लगी। वहाँ बिछे हुए मञ्च झूमने लगे और कंसके मुकुटसे भी उत्तम मणि गिर पड़ी॥ ४३॥
दोर्भ्यामानम्य कृष्णस्तु चाणूरं शीर्णजीवितम्।
प्राहरन्मुष्टिना मूर्ध्नि वक्षस्याहत्य जानुना॥ ४४॥
चाणूरकी जीवनीशक्ति अथवा आयुक्षीण हो चुकी थी। श्रीकृष्णने अपनी दोनों भुजाओंसे चाणूरको झुकाकर उसकी छातीमें घुटनेसे चोट करके उसके मस्तकपर मुक्केसे प्रहार किया॥ ४४॥
निःसृते साश्रुरुधिरे तस्य नेत्रे सबन्धने।
तापनीये यथा घण्टे कक्षोपरि विलम्बिते॥ ४५॥
इससे स्नायु-बन्धन तथा आँसू और रक्तके साथ उसकी दोनों आँखें बाहर निकल आयीं और ऐसी दिखायी देने लगीं मानो हाथीको कसनेवाली रस्सी या जंजीरमें दो सोनेकी घंटियाँ लटक रही हों॥ ४५॥
पपात स तु रङ्गस्य मध्ये निःसृतलोचनः।
चाणूरो विगतप्राणो जीवितान्ते महीतले॥ ४६॥
आँखें निकल जानेपर जीवनके अन्तमें प्राणशून्य हुआ चाणूर अखाड़ेके बीचमे गिर पड़ा॥ ४६॥
देहेन तस्य मल्लस्य चाणूरस्य गतायुषः।
संनिरुद्धो महारङ्गः स शैलेनेव लक्ष्यते॥ ४७॥
जिसकी आयु समाप्त हो गयी थी, उस चाणूर मल्लके शरीरसे वह विशाल रंगस्थल इस प्रकार अवरुद्ध दिखायी देता था, मानो किसी पर्वतसे रुँध गया हो॥ ४७॥
रौहिणेयो हते तस्मिंश्चाणूरे बलदर्पिते।
जग्राह मुष्टिकं रङ्गे कृष्णस्तोशलकं पुनः॥ ४८॥
बलाभिमानी चाणूरके मारे जानेपर रोहिणीनन्दन बलरामने उस रंगभूमिमें मुष्टिकको पकड़ लिया तथा श्रीकृष्णने पुनः तोशलकको धर दबाया॥ ४८॥
सन्निपाते तु तौ मल्लौ प्रथमे क्रोधमूर्च्छितौ।
समेयातां रामकृष्णौ कालस्य वशवर्तिनौ।
निर्घातावनतौ भूत्वा रङ्गमध्ये चवल्गतुः॥ ४९॥