भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 343

विष्णुपर्व ] त्रिंशोऽध्यायः ३२१

युद्ध आरम्भ होनेपर पहले तो कालके अधीन हुए वे दोनों असुर मल्ल क्रोधसे मूर्च्छित हो बलराम और श्रीकृष्णसे भिड़ गये, परंतु जब उन दोनों वीरोंकी मार पड़ी, तब वे सिर झुकाकर अखाड़ेमें इधर-उधर उछल-कूद मचाने लगे ॥

कृष्णस्तोशलमुद्यम्य गिरिशृङ्गोपमं बली।
भ्रामयित्वा शतगुणं निष्पिपेष महीतले ॥ ५० ॥

बलवान् श्रीकृष्णने पर्वतशिखरके समान विशालकाय तोशलको दोनों हाथोंसे उठा लिया और सौ बार घुमानेके बाद पृथ्वीपर पटककर उसे पीस डाला ॥ ५० ॥

तस्य कृष्णाभिपन्नस्य पीडितस्य बलीयसः।
मुखाद् रुधिरमत्यर्थमुज्जगाम मुमूर्षतः ॥ ५१ ॥

श्रीकृष्णके द्वारा आक्रान्त एवं पीड़ित होकर मरणासन्न हुए उस महाबली मल्लके मुखसे बहुत अधिक रक्त निकलने लगा ॥ ५१ ॥

संकर्षणस्तु सुचिरं योधयित्वा महाबलः।
आन्ध्रमल्लं महामल्लो मण्डलानि व्यदर्शयत् ॥ ५२ ॥

इधर महाबली महामल्ल संकर्षण आन्ध्रदेशीय मल्ल मुष्टिकके साथ देरतक युद्ध करके उसे कुश्तीके अनेक पैंतरे दिखाने लगे ॥ ५२ ॥

मुष्टिनैकेन तेजस्वी साशानिस्तनयित्नुना।
शिरस्यभ्यहनद् धीरो वज्रेणेव महागिरिम् ॥ ५३ ॥

फिर उन तेजस्वी वीरने उसके मस्तकपर एक मुक्का मारा। उससे वज्रपातके समान शब्द हुआ। मानो किसी महान् पर्वतपर वज्रसे आघात किया गया हो ॥ ५३ ॥

स निष्पतितमस्तिष्को विस्रस्तनयनो भुवि।
पपात निहतस्तेन ततो नादो महानभूत् ॥ ५४ ॥

इससे उसका मस्तक फटकर गिर पड़ा, आँखें निकल आयीं और बलरामजीके द्वारा मारा गया वह मल्ल पृथ्वीपर गिर पड़ा। उस समय बड़े जोरसे धमाकेका शब्द हुआ ॥

आन्ध्रतोशलकौ हत्वा कृष्णसंकर्षणावुभौ।
क्रोधसंरक्तनयनौ रंगमध्ये ववल्गतुः ॥ ५५ ॥

आन्ध्र-देशीय मुष्टिक और तोशल इन दोनोंको मारकर श्रीकृष्ण और बलराम दोनों भाई क्रोधसे लाल आँखें किये अखाड़ेमें उछलने-कूदने लगे ॥ ५५ ॥

समाजवाटो निर्मल्लः सोऽभवद् भीमदर्शनः।
आन्ध्रे तदा महामल्ले मुष्टिके च निपातिते ॥ ५६ ॥

उस समय महामल्ल चाणूर और मुष्टिकके मारे जानेपर वह समाजवाट (रंगभवन) मल्लोंसे सूना हो गया और अत्यन्त भयंकर दिखायी देने लगा ॥ ५६ ॥

ये च सम्प्रेक्षका गोपा नन्दगोपपुरोगमाः।
भयक्षोभितसर्वाङ्गाः सर्वे तत्रावतस्थिरे ॥ ५७ ॥

नन्द आदि जो-जो गोप यह सब देख रहे थे, उनके सारे अङ्ग भयसे क्षुब्ध हो उठे थे। वे सब लोग वहाँ चुपचाप बैठे रहे ॥ ५७ ॥

हर्षजं वारि नेत्राभ्यां वर्षमाणा प्रवेपती।
प्रस्रुवोत्पीडिता कृष्णं देवकी समुदैक्षत ॥ ५८ ॥

उधर देवकी थर-थर काँपती और दोनों नेत्रोंसे हर्षजनित आँसुओंकी वर्षा करती हुई स्तनोंमें दूधकी बाढ़ आ जानेसे पीड़ित हो श्रीकृष्णकी ओर देख रही थी ॥ ५८ ॥

कृष्णदर्शनजातेन बाष्पेणाकुलितेक्षणः।
वसुदेवो जरां त्यक्त्वा स्नेहेन तरुणायते ॥ ५९ ॥

श्रीकृष्ण-दर्शनजनित आँसुओंसे भरे हुए नेत्रोंवाले वसुदेवजी मानो अपनी वृद्धावस्था त्यागकर वात्सल्य-स्नेहसे परिपुष्ट हो तरुण हो रहे थे ॥ ५९ ॥

वारमुख्याश्च ताः सर्वाः कृष्णस्य मुखपङ्कजम्।
पपुर्हि नेत्रभ्रमरैर्निमेषान्तरगामिभिः ॥ ६० ॥

वहाँ जो मुख्य-मुख्य वाराङ्गनाएँ उपस्थित थीं, वे सब-की-सब निमेषके भीतर चलनेवाले नेत्ररूपी भ्रमरोंद्वारा श्रीकृष्णके मुखारविन्दका रस पान करने लगीं ॥ ६० ॥

कंसस्याथ मुखे स्वेदो भ्रूभेदान्तरगोचरः।
अभवद् रोषनिर्यासः कृष्णसंदर्शनेरितः ॥ ६१ ॥

तदनन्तर श्रीकृष्णको देखनेसे कंसके मुखमें दोनों भौंहोंके बीच रोषवश पसीना निकल आया ॥ ६१ ॥

केशवाय सधूमेन रोषनिश्वासवायुना।
दीप्तमन्तर्गतं तस्य हृदयं मानसाग्निना ॥ ६२ ॥

श्रीकृष्णके प्रति कंस जो कठोरता प्रकट करता था, वही जिसका धुआँ था तथा रोषरूपी उच्छ्वास-वायु जिसे प्रज्वलित कर रही थी, उस मानसिक चिन्तारूपी आगने कंसके आन्तरिक हृदयको जलाना आरम्भ किया ॥ ६२ ॥

तस्य प्रस्फुरितौष्ठस्य स्विन्नालिकतलस्य वै।
कंसवक्त्रस्य रोषेण रक्तसूर्यायते वपुः ॥ ६३ ॥

जिसके ओठ फड़क रहे थे और ललाटमे पसीना निकल आया था, कंसके उस मुखमण्डलका स्वरूप रोषके कारण लाल सूर्यके समान प्रतीत होता था ॥ ६३ ॥

क्रोधरक्ताननस्यास्य निःसृताः स्वेदबिन्दवः।
यथा रविकरस्पृष्टा वृक्षावश्यायबिन्दवः ॥ ६४ ॥

क्रोधसे लाल हुए कंसके मुखसे जो पसीनेकी बूँदें निकली थीं, वे वृक्षोंके पत्तोंपर पड़े हुए उन ओसकणोंके समान सुशोभित होती थीं, जिन्हें सूर्यकी किरणोंका स्पर्श प्राप्त हुआ हो॥

सोऽज्ञापयत संक्रुद्धः पुरुषान् व्यायतान् बहून्।
गोपावेतौ समाजाद्वान्निष्क्राम्येतां वनेचरौ ॥ ६५ ॥

म० ह० ११