विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 344, कुल 1169 में से
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३२२ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे उसने अत्यन्त कुपित होकर बहुत-से व्यायामशाली पुरुषोंको आज्ञा दी कि 'इन दोनों वनेचर गोपोंको इस जन- समुदायसे बाहर निकाल दो ॥ ६५ ॥ न चैतौ द्रष्टुमिच्छामि विकृतौ पापदर्शनौ । गोपानामपि मे राज्ये न कश्चित्स्थातुमर्हति ॥ ६६ ॥ 'ये दोनों विकृत हो गये हैं। इन्हें देखना भी पाप है। मैं इनकी ओर दृष्टिपात करना नहीं चाहता। गोपोंमेंसे भी कोई मेरे इस राज्यमें नहीं रह सकता ॥ ६६ ॥ नन्दगोपश्च दुर्मेधाः पापेष्वभिरतो मम । आयसैर्निगडत्कारैर्लोहपाशैर्निगृह्यताम् ॥ ६७ ॥ 'खोटी बुद्धिवाला नन्दगोप सदा मेरे प्रति कपटपूर्ण बर्तावोंमें ही तत्पर रहा है, अतः इसे लोहेकी बेड़ियों और हथकड़ियोंमें बाँधकर कैद कर लो ॥ ६७ ॥ वसुदेवश्च दुर्बुत्तो नित्यं द्वेषपरो मम । अवृद्धार्हेण दण्डेन क्षिप्रमद्यैव शास्यताम् ॥ ६८ ॥ 'दुराचारी वसुदेव सदा मुझसे द्वेष रखता है। इसे आज ही शीघ्र-से-शीघ्र ऐसा कठोर दण्ड दो, जो अवृद्ध ( नौजवान ) पुरुषोंके योग्य हो ॥ ६८ ॥ ये चेमे प्राकृता गोपा दामोदरपरायणाः । ह्रियन्तां गाव एतेषां यच्चास्ति वसु किंचन ॥ ६९ ॥ 'ये जो दामोदरका आश्रय लेकर रहनेवाले गँवार गोप हैं, इन सबकी गौओंको तथा इनके पास जो कुछ धन हो, उसको भी छीन लो' ॥ ६९ ॥ एवमाज्ञापयानं तं कंसं परुषभाषिणम् । ददर्शात्यन्तनयनः कृष्णः सत्यपराक्रमः ॥ ७० ॥ इस तरह आज्ञा देते और कठोर बातें कहते हुए उस कंसकी ओर सत्यपराक्रमी श्रीकृष्णने आँखें फाड़कर देखा ॥ क्षिप्ते पितरि चुक्रोध नन्दगोपे च केशवः । ज्ञातीनां च व्यथां दृष्ट्वा विसंज्ञां चैव देवकीम् ॥ ७१ ॥ स सिंह इव वेगेन केशवो जातविक्रमः । आरुरुक्षुर्महाबाहुः कंसनाशार्थमच्युतः ॥ ७२ ॥ रङ्गमध्यादुत्पपात कृष्णः कंसासनान्तिकम् । असज्जद्वायुनाऽऽक्षिप्तो यथा खस्थो घनाघनः॥ ७३ ॥ पिता वसुदेव तथा नन्दगोपपर आक्षेप होते ही केशव कुपित हो उठे। उन्होंने बन्धु-बान्धवोंकी व्यथा और माता देवकीकी अचेत अवस्था देखकर कंसका विनाश करनेके लिये उसके मञ्चपर चढ़नेका विचार किया। उस समय केशवका पराक्रम जाग उठा और अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले महाबाहु श्रीकृष्ण उस रंगस्थलसे सिंहके समान वेगपूर्वक उछले और कंसके सिंहासनके पास जा पहुँचे, ठीक उसी तरह जैसे आकाशवर्ती महामेघ वायुसे फेंका जाकर दूर पहुँच जाता है ॥ ७१-७३ ॥ ददृशुर्न हि तं सर्वे रङ्गमध्यादवप्लुतम् । केवलं कंसपार्श्वस्थं ददृशुः पुरवासिनः ॥ ७४ ॥ वे कब अखाड़ेसे कूदे हैं, इसको सब लोगोंने नहीं देखा। पुरवासियोंको वे केवल कंसके पास खड़े दिखायी दिये ॥७४॥ सोऽपि कंसस्तथाऽऽव्यस्तः परीतः कालधर्मणा । आकाशादिव गोविन्दं मेने तत्रागतं प्रभुम् ॥ ७५ ॥ कालधर्म ( मौत ) से घिरा हुआ कंस भी व्याकुल हो उठा और उसने यही समझा कि भगवान् गोविन्द आकाशसे ही मेरे पास उतर आये हैं ॥ ७५ ॥ स कृष्णेनायतं कृत्वा बाहुं परिघसंनिभम् । मूर्धजेषु परामृष्टः कंसो वै रङ्गसंसदि ॥ ७६ ॥ श्रीकृष्णने अपनी परिघ-जैसी मोटी एक बाँह बढ़ाकर रंगशालामें कंसकी चोटी पकड़ ली ॥ ७६ ॥ मुकुटश्चापतत् तस्य काञ्चनो वज्रभूषितः । शिरसस्तस्य कृष्णेन परामृष्टस्य पाणिना ॥ ७७ ॥ उस समय श्रीकृष्णके हाथसे पकड़े गये कंसके सिरसे उसका वज्रमणिसे विभूषित सुवर्णमय मुकुट खिसककर गिर पड़ा ॥ ७७ ॥ स ग्रहग्रस्तकेशश्च कंसो निर्यत्नतां गतः । तथैव च विसम्मूढो वैकल्यं समपद्यत ॥ ७८ ॥ जैसे किसी ग्रहने केश पकड़ लिये हों, उस अवस्थामे पड़ा हुआ कंस निश्चेष्ट हो गया तथा किंकर्तव्यविमूढ़ हो व्याकुलतामें पड़ गया ॥ ७८ ॥ निगृहीतश्च केशेषु गतासुरिव निःश्वसन् । न शशाक मुखं द्रष्टुं कंसः कृष्णस्य वै तदा ॥ ७९ ॥ केश पकड़ लिये जानेपर कंस मुर्दा-सा हो गया। वह लंबी साँस लेता हुआ उस समय कृष्णके मुखकी ओर दृष्टि न डाल सका ॥ ७९ ॥ विकुण्डलाभ्यां कर्णाभ्यां छिन्नहारेण वक्षसा । प्रलम्बाभ्यां च बाहुभ्यां गात्रैर्विस्तृतभूषणैः ॥ ८० ॥ भ्रंशितेनोत्तरीयेण सहसावलिताननः । चेष्टमानः समाक्षिप्तः कंसः कार्ष्णेन तेजसा ॥ ८१ ॥ उसके कानोंसे कुण्डल खिसक गये। वक्षःस्थलका हार छिन्न-भिन्न हो गया। दोनों भुजाएँ लटक गयीं। सारे अङ्गोंके आभूषण गिर गये। चादर खिसक गयी और उसने सहसा उसके कण्ठको आवेष्टित कर लिया। श्रीकृष्णके अनुपम तेजसे झटकेके साथ नीचे डाला गया कंस पृथ्वीपर गिरकर छटपटाने लगा ॥ ८०-८१ ॥ चकर्ष च महारङ्गे मञ्चान्निष्क्रम्य केशवः । केशेषु तं वलाद् गृह्य कंसं क्लेशार्हतां गतम् ॥ ८२ ॥