विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 345, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें[ विष्णुपर्व ] \hfill एकत्रिंशोऽध्यायः \hfill ३२३
उस समय श्रीकृष्ण मञ्चसे निकलकर बाहर आ गये। कंस क्लेशयुक्त शोचनीय अवस्थामें पड़ गया था। श्रीकृष्ण पुनः बलपूर्वक उसके सिरके बाल पकड़कर उस महान् रंगस्थलमे उसे घसीटने लगे ॥ ८२ ॥
कृष्यमाणः स कृष्णेन भोजराजो महाद्युतिः ।
समाजवाटे परिखां देहक्षुण्णां चकार ह ॥ ८३ ॥
श्रीकृष्णके द्वारा घसीटे जाते हुए महातेजस्वी भोजराज कंसने उस रंगशालामें अपनी देहकी रगड़से खाई-सी बना दी ॥
समाजवाटे क्रीडित्वा विकृष्य च गतायुषम् ।
कृष्णो विसर्जयामास कंसदेहमदूरतः ॥ ८४ ॥
रंगशालामें खिलवाड़ करते हुए घसीटकर निर्जीव हुए कंसके शरीरको श्रीकृष्णने पास ही छोड़ दिया ॥ ८४ ॥
धरण्यां मृदितः शिष्ये तस्य देहः सुखोचितः ।
क्रमेण विपरीतेन पांसुभिः परुषीकृतः ॥ ८५ ॥
उसका जो शरीर सुख भोगनेके योग्य था, वह मर्दित होकर पृथ्वीपर सो गया। शूरवीरोंके लिये अयोग्य विपरीत विधिसे धूलमें सनकर वह कोमल अङ्ग कठोर हो गया ॥ ८५ ॥
तस्य तद् वदनं श्यामं सुप्ताक्षं मुकुटं विना ।
न विभ्राति विपर्यस्तं विपलाशं यथाम्बुजम् ॥ ८६ ॥
गर्दन टूट जानेसे उसका शरीर अस्त-व्यस्त हो गया था। उसके नेत्र बन्द हो गये थे तथा उसका श्याम मुख मुकुटके बिना दलरहित कमलके समान सुशोभित नहीं हो रहा था ॥ ८६ ॥
असंग्रामहतः कंसः स बाणैरपरिक्षतः ।
केशग्राहान्निरस्तासुर्वीरमार्गान्निराकृतः ॥ ८७ ॥
कंस बिना युद्धके मारा गया था। उसके शरीरपर बाणोंसे घाव नहीं होने पाया था। उसको केश पकड़कर घसीटा गया था, इस अवस्थामें उसके प्राण निकले और वह वीरोचित मार्गसे भ्रष्ट हो गया ॥ ८७ ॥
तस्य देहे प्रकाशन्ते सहसा केशवार्पिताः ।
मांसच्छेदघनाः सर्वे नखाग्रा जीवितच्छिदः ॥ ८८ ॥
उसके शरीरमें श्रीकृष्णद्वारा सहसा गड़ाये गये उनके सभी नखाग्र कंसके जीवनका उच्छेद करके प्रकाशित हो रहे थे। वे उसके मांसको छेद-छेदकर सघन रूपसे वहाँ अङ्कित हो गये थे ॥ ८८ ॥
तं हत्वा पुण्डरीकाक्षः प्रहर्षाद् द्विगुणप्रभः ।
ववन्दे वसुदेवस्य पादौ निहतकण्टकः ॥ ८९ ॥
उसका वध करके कमलनयन श्रीकृष्णको इतना अपार हर्ष हुआ कि उनके अङ्गोंकी प्रभा द्विगुण दीप्तिसे प्रकाशित हो उठी। उन्होंने जगत्के लिये कण्टकरूप कंसका विनाश करके पिता वसुदेवके दोनों चरणोंमें प्रणाम किया ॥ ८९ ॥
मातुश्च शिरसा पादौ निपीड्य यदुनन्दनः ।
सास्रैश्चक्षुःप्रस्रवोत्पीडैः कृष्णमानन्दजैः स्स्रुतैः ॥ ९० ॥
तत्पश्चात् यदुनन्दन श्रीकृष्णने माताके दोनों चरणोंमें अपना मस्तक रखकर उनकी वन्दना की। उस समय देवकी आनन्दातिरेकसे निकले हुए अपने स्तनोंके दूधसे उन्हें सींचने लगी ॥ ९० ॥
यादवांश्चैव तान् सर्वान् यथास्थानं यथावयः ।
पप्रच्छ कुशलं कृष्णो दीप्यमानः स्वतेजसा ॥ ९१ ॥
तदनन्तर अपने तेजसे उद्दीप्त हुए श्रीकृष्णने वय और स्थितिके अनुसार उन समस्त यादवोंकी कुशल पूछी ॥ ९१ ॥
बलदेवोऽपि धर्मात्मा कंसभ्रातरमूर्जितम् ।
बाहुभ्यामेव तरसा सुनामानमपोथयत् ॥ ९२ ॥
इधर धर्मात्मा बलदेवने भी कंसके ओजस्वी भ्राता सुनामाको अपनी दोनों भुजाओं द्वारा ही वेगपूर्वक मार गिराया ॥ ९२ ॥
तौ जितारी जितक्रोधौ चिरविप्रोषितौ व्रजे ।
स्वपितुर्भवने वीरौ जग्मतुर्हृष्टमानसौ ॥ ९३ ॥
शत्रु और क्रोध दोनोंको जीतकर व्रजमे चिरकालतक रहे हुए वे दोनो वीर मन-ही-मन हर्ष और उल्लाससे भरकर अपने पिताके भवनमे गये ॥ ९३ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि कंसवधे त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें कंसवधविषयक तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३० ॥
एकत्रिंशोऽध्यायः
कंसकी स्त्रियों और माताका विलाप
वैशम्पायन उवाच
भर्तारं पतितं दृष्ट्वा क्षीणपुण्यमिव ग्रहम् ।
कंसपत्न्यो हतं कंसं समन्तात् पर्यवारयन् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! जिसका पुण्य क्षीण हो गया हो, उस ग्रहके समान भूमिपर गिरे हुए पतिको देखकर राजा कंसकी पत्नियाँ उसके मृतक शरीरको सब ओर-से घेरकर बैठ गयीं ॥ १ ॥
तं महीशयने सुप्तं क्षितिनाथं गतायुषम् ।
भार्याः स्म दृष्ट्वा शोचन्ति मृग्यो मृगपतिं यथा ॥ २ ॥