भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 346
३२४श्रीमद्भारते खिलभागे[ हरिवंशे

जो कभी पृथ्वीके स्वामी और संरक्षक थे, वे ही पतिदेव आयु समाप्त होनेपर भूमिमयी शय्यापर सो रहे हैं, यह देख राजा कंसकी रानियाँ उसके लिये उसी तरह शोक करने लगीं, जैसे हरिणियाँ यूथपति हरिणके लिये शोकमग्न हो जाती हैं ॥

हा हताः स्म महाबाहो हताशा हतबान्धवाः ।
वीरपत्न्यो हते वीरे त्वयि वीरव्रतप्रिये ॥ ३ ॥

(वे विलाप करती हुई कहने लगीं—) 'हाय ! महाबाहु वीर ! आपको वीरव्रत प्रिय था। आपके मारे जानेपर हम सब वीर-पत्नियों मारी गयीं। हमारी आशाओंकी हत्या हो गयी। हमारे बन्धु-बान्धव भी (अनाथ होनेके कारण) मारे ही गये ! ॥ ३ ॥

इमामवस्थां पश्यन्त्यः पश्चिमां तव नैष्ठिकीम् ।
कृपणं राजशार्दूल विलपामः सबान्धवाः ॥ ४ ॥

'राजशिरोमणे ! आपकी मृत्युसम्बन्धिनी इस अन्तिम अवस्थाको देखती हुई हम सब (आपकी पत्नियाँ) अपने बान्धवोंसहित दीनतापूर्ण विलाप कर रही हैं ॥ ४ ॥

छिन्नमूलाः स्म संवृत्ताः परित्यक्तास्त्वया विभो ।
त्वयि पञ्चत्वमापन्ने नाथेऽस्माकं महाबले ॥ ५ ॥

'प्रभो ! आप हमारे महाबली प्राणनाथ थे, आपके मारे जानेसे हमारी तो जड़ कट गयी। हाय ! आपने हमें त्याग दिया ! ॥ ५ ॥

को नः कोपपरीताङ्गी रतिसंसर्गलालसाः ।
लता इव विचेष्टन्तीः शयनीयानि नेष्यति ॥ ६ ॥

'हा प्राणाधार ! हम मनमें रतिसंसर्गकी लालसा रखकर भी (मानावस्थामें) प्रणयकोपसे युक्त हो जब पृथ्वीपर लताओंकी भाँति लोटकर विपरीत चेष्टा करने लगतीं, उस समय आप हमें प्रेमपूर्वक मनाकर शय्याओंपर सुलाते थे। अब हमें कौन इस तरह उठाकर सेजोंतक ले जायगा ? ॥ ६ ॥

इदं तेऽसदृशं सौम्य हृद्यनिःश्वासमारुतम् ।
दहत्यर्को मुखं कान्तं निस्तोयमित्र पङ्कजम् ॥ ७ ॥

'सौम्य ! जिससे मनोरम निःश्वास वायु निकला करती थी, आपके उस कान्तिमान् मुखको सूर्य जलरहित (तालाबमें उगे हुए) कमलकी भाँति अपनी दुःसह किरणोंसे दग्ध कर रहे हैं। यह दुरवस्था आपके योग्य नहीं है ॥ ७ ॥

इमे ते श्रवणे शून्ये न शोभेते विकुण्डले ।
शिरोधरायां संलीने सततं कुण्डलप्रिये ॥ ८ ॥

'ये आपके कुण्डलरहित सूने कान, जिन्हें सदा ही कुण्डल धारण करना प्रिय रहा है, इस समय कण्ठमें विलीन होकर शोभा नहीं पा रहे हैं ॥ ८ ॥

क्व ते स मुकुटो वीर सर्वरत्नविभूषितः ।
अत्यर्थं शिरसो लक्ष्मीं यो दधारार्कसप्रभाम् ॥ ९ ॥

'वीर ! सम्पूर्ण रत्नोंसे विभूषित आपका वह मुकुट कहाँ है, जो आपके मस्तकपर सूर्यकी प्रभाके समान अतिशय शोभाका आधान करता था ! ॥ ९ ॥

अनेन हि कलत्रेण त्वदन्तःपुरशोभिना ।
कथं दीनेन कर्तव्यं त्वयि लोकान्तरं गते ॥ १० ॥

'प्राणनाथ ! आपकी ये रानियाँ जो अन्तःपुरकी शोभा बढ़ाती थीं, आपके लोकान्तरमें चले जानेसे अब दीन और अनाथ होकर कैसे निर्वाह करेंगी ॥ १० ॥

ननु नाम स्त्रियः साध्व्यः प्रियभोगैश्चवञ्चिताः ।
पतीनामपरित्याज्याः स त्वं नस्त्यज्य गच्छसि ॥ ११ ॥

'नाथ ! सुना था, साध्वी स्त्रियाँ न तो प्रिय भोगोंसे कभी वञ्चित होती हैं और न उनके पति उनका परित्याग ही करते हैं; परंतु आप तो हमें छोड़कर चले जा रहे हैं (हाय ! अब हम कैसे रहेंगी ) ॥ ११ ॥

अहो कालो महावीर्यो येन पर्ययकर्मणा ।
कालतुल्यः सपत्नानां त्वं क्षिप्रमपनीयसे ॥ १२ ॥

'अहो ! काल महान् बलसे सम्पन्न है, जो अपनी उलट-फेरकी क्रियाद्वारा शत्रुओंके लिये कालके समान आपको भी शीघ्रतापूर्वक यहाँसे लिये जा रहा है ॥ १२ ॥

वयं दुःखेष्वनूचिताः सुखेष्वेव त्वयैधिताः ।
कथं वत्स्याम विधवा नाथ कार्पण्यमाश्रिताः ॥ १३ ॥

'नाथ ! आपने हमें सदा सुखोंमें ही रखकर पाला-पोसा और बड़ी किया है। हम दुःख भोगनेके योग्य नहीं हैं; किंतु आज आपसे बिछुड़कर विधवा होकर दयनीय दशाको पहुँच गयी हैं। अब हम कैसे यहाँ रह सकेंगी ? ॥ १३ ॥

स्त्रीणां चारित्रलुब्धानां पतिरेकः परा गतिः ।
त्वं हि नः सा गतिश्छिन्ना कृतान्तेन बलीयसा ॥ १४ ॥

'जिनके मनमें सदाचारके पालनका लोभ हो, उन साध्वी स्त्रियोंके लिये एकमात्र पति ही परम गति है—सबसे बड़ा सहारा है, किंतु महाबली कालने हमारे उस सहारेको काट डाला ॥ १४ ॥

वैधव्येनाभिभूताः स्मः शोकंसंतप्तमानसाः ।
रोदितव्यह्रदे मग्नाः क्व गच्छामस्त्वया विना ॥ १५ ॥

'हम वैधव्यसे अभिभूत हो गयी हैं। हमारा मन शोकसे संतप्त हो उठा है। हम विपत्तिके उस गहरे कुण्डमें डूब गयी हैं, जहाँ केवल रोना-ही-रोना रह जाता है। अब हम आपके बिना कहाँ जायँगी ? ॥ १५ ॥

सह त्वया गतः कालस्त्वदङ्के क्रीडितं कृतम् ।
क्षणेन तद्विहीनाः स्म अनित्या हि नृणां गतिः ॥ १६ ॥

'हमारा समय आपके साथ ही बीता है। हमने जबतक