विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 347, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] एकत्रिंशोऽध्यायः [ ३२५
आपके अङ्गमे ही क्रीड़ाएँ की हैं; किंतु एक ही क्षणमें हम उस सौभाग्यसे वञ्चित हो गयीं । सचमुच ही मनुष्योंकी गति अनित्य है—क्षणभङ्गुर है ॥ १६ ॥
अहो वलविहीनाः स्म विपन्ने त्वयि मानद ।
एकदुष्कृतकारिण्यः सर्वा वैधव्यलक्षणाः ॥ १७ ॥
'दूसरोंको मान देनेवाले महाराज ! आपके निधनसे हम सब-की-सब निर्बल हो गयीं । जान पड़ता है, हम सबने एक समान ही पाप किया था, जिससे सबको वैधव्यका चिह्न धारण करना पड़ा ॥ १७ ॥
त्वया स्वर्गप्रतिच्छन्दैर्लालिताः स्म रतिप्रियाः ।
त्वयि कामवशाः सर्वाः स नस्त्यक्त्वा क्व गच्छसि ॥ १८॥
'आपने हम रतिप्रिया रमणियोंको स्वर्गके समान सुख-भोग देकर सदा हमारा लालन-पालन किया था । हम सभी आपके प्रति कामासक्त रही हैं, फिर आप हमें छोड़कर कहाँ चले जा रहे हैं ॥ १८ ॥
अस्माकं त्वमनाथानां नाथो ह्यसि सुरोपम ।
आसां विलपमानानां कुररीणामिव प्रभो ।
प्रतिवाक्यं जगन्नाथ दातुमर्हसि मानद ॥ १९ ॥
'देवोपम प्रभो ! आप ही हम अनाथाओंके नाथ हैं । जगन्नाथ ! मानद ! कुररीके समान विलाप करनेवाली अपनी इन पत्नियोंको कुछ उत्तर देनेकी कृपा करें ॥ १९ ॥
एवमार्तकलत्रस्य शाम्यमानेषु बन्धुषु ।
गमनं ते महाभाग दारुणं प्रतिभाति नः ॥ २० ॥
'महाभाग ! जब कि आपके सभी बन्धु मारे जा रहे हैं और स्त्रियाँ शोकसे पीड़ित हैं, ऐसे अवसरपर आपका परलोक-गमन हमें बड़ा दारुण प्रतीत होता है ॥ २० ॥
नूनं कान्ततराः कान्त परलोके वरस्त्रियः ।
यतस्त्वं प्रस्थितो वीर विहायेमं गृहे जनम् ॥ २१ ॥
'प्रियतम ! वीर ! निश्चय ही परलोककी सुन्दरियाँ बड़ी ही कमनीय हैं, जिससे आप अपने घरकी इन रानियोंको छोड़कर उनके पास जानेके लिये प्रस्थित हो गये ॥ २१ ॥
किं नु ते कारणं वीर भार्यास्वेतासु भूरिद ।
आर्तनादं रुदन्तीषु यन्मोहान्नावबुध्यसे ॥ २२ ॥
'अधिक-से-अधिक (सुख-सुविधा) प्रदान करनेवाले महाराज ! क्या कारण है, जो अपनी इन पत्नियोंके रोने और आर्तनाद करनेपर भी आप मोहवश इनके दुःखको समझ नहीं पाते अथवा इस मोहनिद्रासे जाग नहीं उठते हैं ॥ २२॥
अहो निष्करुणा यात्रा नराणामौर्ध्वदेहिकी ।
यत् परित्यज्य दारान् स्वान् निरपेक्षा व्रजन्ति हि ॥ २३ ॥
'अहो ! पुरुषोंकी यह पारलौकिक यात्रा बड़ी ही निर्दय होती है; क्योंकि वे अपनी पत्नियोंको छोड़कर उनकी कोई अपेक्षा न रखते हुए चल देते हैं ॥ २३ ॥
अपतित्वं स्त्रियाः श्रेयो न तु शूरः पतिः स्त्रियाः ।
स्वर्गस्त्रीणां प्रियाः शूरास्तेषामपि च ताः प्रियाः ॥ २४॥
'स्त्रियोंका बिना पतिके ही रह जाना अच्छा, किंतु उनके लिये शूरवीर पतिका होना अच्छा नहीं है; क्योंकि वे शूरवीर स्वर्गलोककी सुन्दरियोंको प्रिय होते हैं और वे सुन्दरियाँ भी उन शूरवीरोंको प्रिय होती हैं ॥ २४ ॥
अहो क्षिप्रमदृश्येन नयता त्वां रणप्रियम् ।
प्रहृतं नः कृतान्तेन सर्वासामन्तरात्मसु ॥ २५ ॥
'अहो ! जिन्हें युद्ध ही प्रिय था, उन आपको अदृश्य-भावसे शीघ्रतापूर्वक ले जानेवाले कालने हम सबकी अन्त-रात्माओंपर एक साथ ही प्रहार किया है ॥ २५ ॥
हत्वा जरासंधबलं जित्वा यक्षांश्च संयुगे ।
कथं मानुषमात्रेण हतस्त्वं जगतीतले ॥ २६ ॥
'वीरवर ! आप युद्धमें जरासंधकी सेनाका विनाश करके यक्षोंको भी हराकर इस भूतलपर एक मनुष्यमात्रके हाथसे किस तरह मार डाले गये ? ॥ २६ ॥
इन्द्रेण सह संग्रामं कृत्वा सायकविग्रहम् ।
अमर्त्यैरजितो युद्धे मर्त्येनासि कथं हतः ॥ २७ ॥
'इन्द्रके साथ बाणोंद्वारा युद्ध करके जो समराङ्गणमें अमरोंसे भी पराजित न हो सके, वे ही आप एक मरणधर्मा मनुष्यके हाथसे कैसे मारे गये ? ॥ २७ ॥
त्वया सागरमक्षोभ्यं विक्षोभ्य शरवृष्टिभिः ।
रत्नसर्वस्वहरणं जित्वा पाशधरं कृतम् ॥ २८ ॥
'आपने अपने बाणोंकी वर्षासे पाशधारी वरुणको परास्त करके अक्षोभ्य महासागरको भी विक्षुब्ध करते हुए उसके रत्नरूपी सर्वस्वका अपहरण कर लिया था ॥ २८ ॥
त्वया पौरजनस्यार्थे मन्दं वर्षति वासवे ।
सायकैर्जलदाञ्जित्वा बलाद् वर्षं प्रवर्तितम् ॥ २९ ॥
'एक बार इन्द्रने जब वर्षांमें कमी कर दी थी, तब आपने अपने सायकोंसे बादलोंको जीतकर पुरवासियोंके हितके लिये बलपूर्वक वर्षा करवायी थी ॥ २९ ॥
प्रतापावनताः सर्वे तव तिष्ठन्ति पार्थिवाः ।
प्रेषयन्तो वरार्हाणि रत्नान्युपच्छादनानि च ॥ ३० ॥
'भूमण्डलके समस्त भूपाल आपके प्रतापसे नतमस्तक रहा करते थे और उपहारके रूपमें आपके पास बहुमूल्य रत्न एवं वस्त्र भेजते रहते थे ॥ ३० ॥
तथैवं देवकल्पस्य दृष्टवीर्यस्य शत्रुभिः ।
कथं प्राणान्तकं घोरमीदृशं भयमागतम् ॥ ३१ ॥