भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 348, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 348
३२६श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

'इस प्रकार आप देवताओंके समान तेजस्वी थे। शत्रुओंने आपके बल-पराक्रमको प्रत्यक्ष देखा था तो भी आपके ऊपर ऐसा प्राणान्तकारी घोर भय कैसे आया ॥ ३१ ॥

प्राप्ताः स्मो विधवाशब्दं त्वयि नाथे निपातिते।
अप्रमत्ताः प्रमत्तेन कृतान्तेन निराकृताः ॥ ३२ ॥

'हा नाथ! आपके मारे जानेसे आज हमें विधवाकी पदवी प्राप्त हुई है। हम सदा प्रमादसे दूर रहती थीं; परंतु मतवाले कृतान्तने हमको भी मिट्टीमें मिला दिया ॥ ३२ ॥

यद्येवं नाथ गन्तव्यं यदि वा विस्मृता वयम्।
वाङ्मात्रेणापि यामीति वक्तव्ये कः परिश्रमः ॥ ३३ ॥

'नाथ ! यदि इस प्रकार आपको जाना ही था अथवा यदि हमें भुला ही देना था तो वाणीमात्रसे भी 'मैं जा रहा हूँ'—ऐसा कहकर विदा ले लेनेमें आपके लिये क्या परिश्रम था ॥ ३३ ॥

प्रसीद नाथ भीताः स्म पादौ ते याम मूर्द्धभिः।
अलं दूरप्रवासेन निवर्तस्व नराधिप ॥ ३४ ॥

'प्राणनाथ ! प्रसन्न होइये। हम भयभीत हैं। आपके चरणोंमें मस्तक रखकर प्रार्थना करती हैं। नरेश्वर ! दूर देशमें जाने और रहनेसे कोई लाभ नहीं। आप घरको ही लौट चलिये ॥ ३४ ॥

अहो वीर कथं शेषे निषण्णस्तृणपांसुषु ।
शयानस्य हि ते भूमौ कस्मान्नोद्विजते वपुः ॥ ३५ ॥

'वीर ! हमें आश्चर्य है, आप तिनकों और धूलोंमें लोटकर कैसे सो रहे हैं? इस तरह पृथ्वीपर सोये हुए आपके शरीरको उद्वेग क्यों नहीं प्राप्त होता है ? ॥ ३५ ॥

केन सुप्तप्रहारोऽयं दत्तोऽस्माकमकर्कितः।
प्रहृतं केन सर्वासु नारीष्वेवं सुदारुणम् ॥ ३६ ॥

'जैसे किसीपर सोते समय आघात किया जाय, उस प्रकार किसने हमलोगोंको यह अप्रत्याशित (जिसकी हमें कोई आशा नहीं थी, ऐसा) घोर दण्ड दिया है? किस निष्ठुरने हम सब नारियोंपर इस तरह अत्यन्त दारुण प्रहार किया है? ॥ ३६ ॥

रुदितानुशयो नार्या जीवन्त्याः परिदेवनम्।
किं वयं सति गन्तव्ये सह भर्त्रा रुदामहे ॥ ३७ ॥

'अहो ! विधवा नारी जबतक जीवित रहती है, उसे विलाप ही करना पड़ता है। उसका अन्तःकरण रोता रहता है। हमें तो पतिके साथ ही चलना है, ऐसे अवसरपर हम रो क्यों रही हैं?' ॥ ३७ ॥

एतस्मिन्नन्तरे दीना कंसमाता प्रवेपती।
क्व मे वत्सः क्व मे पुत्र इति रोरूयती भृशम् ॥ ३८ ॥

इसी बीचमें कंसकी दुखिया माता काँपती हुई वहाँ आयी और 'कहाँ है मेरा बच्चा ? कहाँ है मेरा बेटा ?' ऐसा कहकर जोर-जोरसे रोने लगी ॥ ३८ ॥

सापश्यन्निहतं पुत्रं निष्प्रभं शशिनं यथा।
हृदयेन विदीर्णेन भ्राम्यमाणा पुनः पुनः ॥ ३९ ॥

उसने अपने मरे हुए पुत्रको देखा। वह कान्तिहीन चन्द्रमाके समान प्रतीत होता था। उसकी ऐसी दशा देखकर माताका हृदय विदीर्ण हो गया। उसे बार-बार चक्कर आने लगा ॥ ३९ ॥

पुत्रं समभिवीक्षन्ती हा हतास्मीति वाशती।
स्नुषाणामार्तनादेन विललाप रुरोद च ॥ ४० ॥

वह पुत्रके मुखकी ओर देखती हुई चीखने लगी—'हाय ! मैं मारी गयी!' पुत्रवधुओंके आर्तनादके साथ रोने-बिलखने लगी ॥ ४० ॥

सा तस्य वदनं दीनमुत्सङ्गे पुत्रगृद्धिनी।
कृत्वा पुत्रेति कारुण्यं विललापार्तया गिरा ॥ ४१ ॥

पुत्रके जीवनकी इच्छा रखनेवाली राजमाता उसके दीन मुखको अपनी गोदमें रखकर आर्त वाणीमें 'हा पुत्र' कहकर करुणाजनक विलाप करने लगी— ॥ ४१ ॥

पुत्र शूरव्रते युक्त ज्ञातीनां नन्दिवर्द्धन ।
किमिदं त्वरितं वत्स प्रस्थानं कृतवानसि ॥ ४२ ॥

'बेटा ! तुम तो वीर-व्रतमें तत्पर रहते थे और अपने बन्धु-बान्धवोंका आनन्द बढ़ाते थे। वत्स ! तुमने क्यों इतनी जल्दी यहाँसे प्रस्थान किया है ? ॥ ४२ ॥

प्रसुप्तश्चातिविवृते किं पुत्र नियमं विना।
वत्स नैवंविधा भूमौ शेरते कृतलक्षणाः ॥ ४३ ॥

'पुत्र ! तुम बिना किसी नियम (नियन्त्रण) के इस अत्यन्त खुले हुए स्थानमें क्यों सो रहे हो ? वत्स ! तुम्हारे-जैसे शुभ-लक्षण-सम्पन्न नरेश इस तरह भूमिपर नहीं सोते हैं ॥ ४३ ॥

रावणेन पुरा गीतः श्लोकोऽयं साधुसम्मतः ।
बलज्येष्ठेन लोकेषु राक्षसानां समागमे ॥ ४४ ॥

'तीनों लोकोंमें जो बलमें सबसे बढ़ा-चढ़ा था, उस रावणने प्राचीनकालमें राक्षसोंके समुदायमे इस सत्पुरुषोंद्वारा सम्मानित श्लोकका गान किया था ॥ ४४ ॥

एवमूर्जितवीर्यस्य मम देवनिघातिनः।
बान्धवेभ्यो भयं घोरं दुर्निवार्यं भविष्यति ॥ ४५ ॥

'मैं इस प्रकार बल और पराक्रममे बढ़ा हुआ हूँ तथा देवताओंका वध करनेमें समर्थ हूँ तो भी मुझे अपने ही भाई-बन्धुओंसे घोर एवं अनिवार्य भय प्राप्त होगा ॥ ४५ ॥