विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 349, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| विष्णुपर्व ] | एकत्रिंशोऽध्यायः | ३२७ |
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तथैव ज्ञातिलुब्धस्य मम पुत्रस्य धीमतः ।
ज्ञातिभ्यो भयमुत्पन्नं शरीरान्तकरं महत् ॥ ४६ ॥
'उसी प्रकार मेरा बुद्धिमान् पुत्र अपने सजातीय बन्धुओंपर लुभाया रहता था तो भी इसे भाई-बन्धुओंसे ही यह देह-विनाशक महान् भय प्राप्त हुआ है' ॥ ४६ ॥
सा पतिं भूपतिं वृद्धमुग्रसेनं विचेतसम् ।
उवाच रुदती वाक्यं विवत्सा हरिणी यथा ॥ ४७ ॥
एह्येहि राजन्शुद्धात्मन् पश्य पुत्रं जनेश्वरम् ।
शयानं वीरशयने वज्राहतमिवाचलम् ॥ ४८ ॥
वह अपने पति बूढ़े राजा उग्रसेनसे, जो उस समय अचेत-से हो रहे थे, बछड़ेसे बिछुड़ी हुई हरिणीके समान रोती हुई बोली—'शुद्ध अन्तःकरणवाले महाराज ! आइये, आइये ! अपने पुत्र राजा कंसको देखिये, जो वज्रके मारे हुए पर्वतकी भाँति वीरशय्यापर सो रहा है ॥ ४७-४८ ॥
अस्य कुर्मो महाराज निर्याणसदृशीं क्रियाम् ।
प्रेतत्वमुपपन्नस्य गतस्य यमसादनम् ॥ ४९ ॥
'महाराज ! अब हमलोग इसके लिये मृत्युकालोचित कर्म करें; क्योंकि यह यमलोकमें जाकर प्रेतत्वको प्राप्त हुआ है ॥ ४९ ॥
वीरभोग्यानि राज्यानि वयं चापि पराजिताः ।
गच्छ विज्ञाप्यतां कृष्णः कंससत्कारकारणात् ॥ ५० ॥
'राज्यका उपभोग तो वीर पुरुष ही करते हैं। हमलोग तो अब पराजित हो गये; अतः जाइये, कृष्णको यह सूचित कीजिये कि कंसके अन्त्येष्टि-संस्कारकी व्यवस्था होनी चाहिये ॥ ५० ॥
मरणान्तानि वैराणि शान्ते शान्तिर्भविष्यति ।
प्रेतकार्याणि कार्याणि मृतः किमपराध्यते ॥ ५१ ॥
'शत्रुके मरनेतक ही वैर रहता है। उसके शान्त हो जानेपर अब वैरकी भी शान्ति हो ही जायगी। इसके प्रेत-कार्य तो करने ही चाहिये। मरा हुआ क्या अपराध करता है' ॥
एवमुक्त्वा पतिं भोजं केशानालुप्य दुःखिता ।
पुत्रस्य मुखमीक्षन्ती विललापैव सा भृशम् ॥ ५२ ॥
अपने पति भोजराजसे ऐसा कहकर दुःखिनी राजमाता पुत्रका मुख निहारती हुई अपने केश खींच-खींचकर अत्यन्त विलाप करने लगी ॥ ५२ ॥
इमास्ते किं करिष्यन्ति भार्या राजन् सुखोषिताः ।
त्वां पतिं सुपतिं प्राप्य या विपन्नमनोरथाः ॥ ५३ ॥
'राजन् ! ये सुखमें पली हुई तुम्हारी रानियाँ अब क्या करेंगी। तुम्हारे-जैसे श्रेष्ठ पतिको पाकर भी इन बेचारी बहुओंका सारा मनोरथ नष्ट हो गया ॥ ५३ ॥
इमं ते पितरं वृद्धं कृष्णस्य वशवर्तिनम् ।
कथं द्रक्ष्यामि शुष्यन्तं कासारसलिलं यथा ॥ ५४ ॥
'ये तुम्हारे बूढ़े पिता अब श्रीकृष्णके अधीन हो गये। सूखते हुए पोखरेके जलकी भाँति अब मैं इन्हें परतन्त्र दशामें कैसे देख सकूँगी ॥ ५४ ॥
अहं ते जननी पुत्र किमर्थं नाभिभाषसे ।
प्रस्थितो दीर्घमध्वानं परित्यज्य प्रियं जनम् ॥ ५५ ॥
'बेटा ! मैं तुम्हारी जननी हूँ। मुझसे क्यों नहीं बोलते हो ? क्यों आज अपने प्रियजनोंका परित्याग करके तुमने परलोकके विशाल पथको प्रस्थान किया है ? ॥ ५५ ॥
अहो वीराल्पभाग्यायाः कृतान्तेनाभिचर्तिना ।
आच्छिद्य मम संदायो नीयसे नयकोविदः ॥ ५६ ॥
'अहो वीर ! तुम नीतिकुशल नरेश थे, मेरी सम्पत्ति थे; किंतु सदा समीप रहनेवाला काल आज तुम्हें मुझ अभागिनीकी गोदसे छीनकर लिये जा रहा है ॥ ५६ ॥
दानमानगृहीतानि तृप्तान्येतानि तैर्गुणैः ।
रुदन्ति तव भृत्यानां कुलानि कुलयूथप ॥ ५७ ॥
'कितने ही कुलों (परिवारों) के समुदायका पालन करनेवाले मेरे वीर पुत्र ! तुमने जिन्हें दान और मानसे अनुगृहीत कर रखा था, जो तुम्हारे उन गुणोंसे अत्यन्त संतुष्ट थे, वे ही ये तुम्हारे भृत्योंके कुलोंके लोग आज तुम्हारे लिये रो रहे हैं ॥ ५७ ॥
उत्तिष्ठ नरशार्दूल दीर्घबाहो महाबल ।
त्राहि दीनं जनं सर्वं पुरमन्तःपुरं यथा ॥ ५८ ॥
'नरश्रेष्ठ ! उठो ! महाबाहो ! महाबली वीर ! इन दीन-दुखी लोगोंकी और समस्त नगरकी अन्तःपुरके समान ही रक्षा करो' ॥ ५८ ॥
रुदतीनां भृशार्तानां कंसस्त्रीणां सुविस्तरम् ।
जगामास्तं दिनकरः संध्यरागेण रञ्जितः ॥ ५९ ॥
अत्यन्त आर्त होकर उसके विस्तृत गुणोंको याद करके कंसकी स्त्रियों और माताके रोते-रोते संध्या हो गयी और संध्याकालीन अरुण-रागसे रंजित हुए दिवाकर (सूर्य) अस्ताचलको चले गये ॥ ५९ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि कंसस्त्रीविलापे एकत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें कंसकी स्त्रियोंका विलापविषयक इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३१ ॥